बुधवार, 29 दिसंबर 2010

कब दूर होंगे ये अंधेरे?

दक्षिण भारत के कुक्के सुब्रह्मण्यम मंदिर में तकरीबन चार सौ सालों से भी ज्यादा समय से हर साल एक घिनौनी और अमानवीय रस्म अदा की जा रही है- "ऊरुलू-सेवे।" इस रस्म के तहत सवर्ण जातियों द्वारा खाना खाकर छोड़ी गई जूठी पत्तलों पर दलित समुदाय के लोग लोट लगाते हैं। इस मान्यता के तहत कि ऐसा करने से उनके त्वचा रोग ठीक हो जाएँगे। समझा जा सकता है कि ऐसी मान्यता क्यों विकसित हुई होगी। सवर्णों के जातिवादी दंभ और दलितों में अपने भी एक मनुष्य होने के सत्य से अपरिचय के कारण। ताज्जुब तो यह है कि आज भी यह रस्म जीवित है। उसके कई कारण हैं। पहला तो यह कि आजादी के इतने सालों बाद और संविधान में समानता के बावजूद वर्णभेद किसी न किसी रूप में मौजूद है। दूसरा कारण यह है कि समय के साथ भारतीय समाज में अंधविश्वास और रूढ़िवाद बढ़ा ही है, घटा नहीं। फिर व्यक्ति किसी भी वर्ण का हो, शिक्षित हो, अशिक्षित हो, अमीर हो, गरीब हो यहाँ अधिक से अधिक लोग रूढ़ियों में जकड़े हैं। कुप्रथाओं में लिप्त हैं।

पहले तो आज भी मौजूद वर्ण भेद की बात करें। बेंगलुरू की एक ब्राण्ड स्ट्रेटजी और मार्केटिंग कंसल्टेंसी फर्म ने किस उपभोक्ता के पास कितनी क्रय शक्ति है। कौन कितनी अच्छी चीजखरीदने की कूवत रखता है या कितनी साधारण चीज खरीदता है, इसका विभाजन ब्राह्मण, क्षत्रिय, दलित के आधार पर किया है। इसमें जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि ऊँची खरीद या हलकी खरीद के कारण व्यक्ति को "जात" बाँटी गई है। इस सवर्णवादी मानसिकता में ब्राह्मण वह कहा जाता है, जो ऊँचे ब्राण्ड खरीदता है! क्षत्रिय वह जो दिखावे पर खर्च कर सकता है। और... कहना नहीं चाहिए! दलितों के पास भले ही वोट बैंक होने की राजनीतिक ताकत आ गई है, मगर हिन्दुस्तान के गाँव-कस्बों से आज भी अस्पृश्यता गई नहीं है। मध्यप्रदेश में मुरैना के एक गाँव में पिछले दिनों सुनीता नामक दलित महिला अपने पति को खाना परोस रही थी। एक रोटी बच गई, जो उसने एक कुत्ते को खिला दी। कुत्ता रामपाल नामक राजपूत का था। रामपाल दलित महिला पर सरे आम चिल्लाया कि उसने अपने हाथ से रोटी खिलाकर उसके कुत्ते को अछूत कर दिया है। यही नहीं, पंचायत बुलाई गई, जिसने यह फैसला दिया कि कुत्ता अब अस्पृश्य हो गया है और अब से दलित बस्ती में ही रहेगा। वर्णभेद के रंग में रंगी और भी बातें होती हैं, जैसे वरुण गाँधी की मँगनी की खबर पर एक अखबार ने लिखा कि वरुण जवाहरलाल नेहरू के बाद नेहरू परिवार के पहले ऐसे व्यक्ति होंगे, जो एक ब्राह्मण से शादी कर रहे हैं। ऐसे ही फिल्म दबंग में सलमान खान प्रेमिका के पिता से विवाह में अपनी कन्या देने के आग्रह स्वरूप अपने गुण गिनाता है "मैं" ये हूँ, मैं वो हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ। आज भी लोग दान करते हैं तो वे यह नहीं देखते कि सामने वाला जरूरत मंद है या नहीं? वे यह देखते हैं कि सामने वाला ब्राह्मण हो। ब्राह्मण भी निर्धन और जरूरतमंद हो सकता है, यह अलग बात है।

जूठी पत्तलों पर लोट लगाने वाले आयोजन में अब दलितों के साथ ही अन्य लोग भी आने लगे हैं। वजह यह है कि वर्णवाद तो पूरी तरह गया नहीं, रूढ़िवाद जुड़ गया सो ऊपर से। जूठी पत्तलों पर लोट लगाने से त्वचा रोग ठीक हो जाएँगे, जैसे कई अंधविश्वास विज्ञान चेतना से दूरी और तर्क को तिलांजलि देने की वजह से हैं। कई लोग ऐसे मिल जाएँगे, जो रोगों की सही चिकित्सा करवाने की बजाय उल-जलूल टोटकों में उलझ जाते हैं। इक्कीसवीं सदी तकनीकी, विज्ञान और चिकित्सा का युग है। इस युग में भी हम भारतीय आधुनिक ज्ञान को नहीं अपनाते तो यह चेतना की कमी ही है।

- निर्मला भुराड़िया

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

जात बाहर की ‍िकस्सागोई

वाशिंगटन डीसी, होटल लिंकन स्यूट। मैं यहाँ हफ्ते भर के लिए ठहरी हूँ। वैसे ही अमेरिका कई राष्ट्रीयताओं वाला देश है। जगह-जगह के अप्रवासियों से ही मिलकर यह देश बना है, किन्तु वाशिंगटन डीसी चूँकि राजधानी है, यहाँ ‍िभन्न-विभिन्न लोगों की आमदरफ्त अधिक ही है। इस होटल लिंकन स्यूट में एक विशेष व्यवस्था है। यहँ रोज शाम को ठंडा दूध और चॉकलेट-क्रीम कुकीज लॉबी में एक काउंटर पर रख दिए जाते हैं, बगैर दाम चुकाए सेवन के लिए। पास ही रखी होती है थप्पी वाशिंगटन पोस्ट एवं अन्य अखबारों की। उसके साथ ही कुछ लोग लॉबी में बैठकर गपियाते भी हैं। अत: होटल में ठहरने वाले अपने कमरों से निकलकर अपनी शाम लॉबी में ही बिताना पसंद करते हैं। पेमेंट काउंटर पर शाम को जिन तीन व्यक्तियों की ड्‍यूटी होती है, उसमें से एक युवक मोरक्को का है। वह जैसे ही खाली होता है झपटता हुआ आता है। बातें करने की कोशिश करता है। भारत के बारे में मुझसे पूछता है, मोरक्को के हालात के बारे में बताता है। इधर-उधर की पूछते-सुनते हुए भावनात्मक मूड में पहुँच जाता है तो यह कहकर अपना बोझ भी हल्का कर लेता है कि होम ‍िसक फील करता है।

एक और व्यक्ति से मुलाकात होती है, वह रास्ताफेरियन है। रास्ताफेरियन अफ्रीकी अश्वेत समुदाय का एक धड़ा है। इस अफ्रीकी-अमेरिकन व्यक्ति की हेयरस्टाइल कुछ विशेष तरह की है। पहले ही घुँघराले, कंधे तक के बालों की टें भी उसने मोड़-मोड़कर रस्सी की तरह बटी हुई है। जब उससे उसके बालों के बारे में पूछा तो उसने बताया ‍यह दिखावट के ‍िलए नहीं है। इस हेयर स्टाइल का आध्यात्मिक महत्व है। उसने बताया, यह हमारा ध्यान करने का एक तरीका है। रोजाना बालों की ढेर सारी लटें एकाग्रता से बटने में हमें कम से कम आधा-पौन घंटा तो लगता है! वे लोग कर्लर लगाकर यह स्टाइल नहीं बनाते क्योंकि फिर यह स्टाइल रखना ‍िसर्फ प्रतीकात्मक होगा। इसका असली उद्देश्य यानी 'ध्यान' पूरा नहीं होगा। है न दुनिया रंग-बिरंगी! ऐसी-ऐसी जीवन पद्धतियाँ हैं दुनिया भर में अलग-अलग लोगों की कि जानकारी प्राप्त करने का भी अपना मजा है। ऐसे में लोग जानकारी देते ही नहीं लेते भी हैं। एक मैक्सिकन महिला ने मुझसे मिर्ची-धनिए की चटनी बनाने की विधि पूछी और गंभीरता से बाकायदा उसे अपनी जेबी डायरी में नोट भी की। जब मैंने मालवी नाम कोथमीर की चटनी बताया तो उसने प्रसन्नतापूर्वक दोहराया 'कॉट्‍म्यीर वाऊ'।

भूटानी लड़की कर्मा के देश में तो बहुत से लोग हिन्दुस्तान के सास-बहू सीरियल भी देखते हैं। कर्मा ने आश्चर्य से पूछा था ‍िक क्या हिन्दुस्तान के परिवार ऐसे ही होते हैं? 'अरे नहीं बढ़ा-चढ़ाकर कहानी ‍िदखाते हैं,' मैंने तुरंत कहा क्योंकि यह कैफियत देने का अच्छा मौका ‍िमल गया था। देश की छबि का सवाल जो था। युद्धग्रस्त बोस्निया से अमेरिका आकर सेटल हुआ टूर गाइड था तो लंदन से अमेरिका आकर बस गई महिला भी थी, जिसे अजनबियों को भी 'हाऊ आर यू टूडे' पूछने की प्रवृत्ति अखरती थी। तात्पर्य यही कि आप यात्राओं पर जाते हैं, तो दुनिया के और लोगों का ‍िमजाज और संस्कृति भी जानते हैं। कुछ अपनी कहते हैं, कुछ उनकी सुनते हैं।

दरअसल यह सब बात इसलिए ‍िनकली है कि पिछले ‍िदनों एक टूर एंड ट्रेवल कंपनी के ‍िवज्ञापन में एक अजीब बात देखी। उसमें यह प्रावधान था ‍िक आप फलाँ जाति-समुदाय के हैं तो ऐसा टूर अरेंज किया जाएगा ‍िक आपकी जाति के लोग ही आपके सहयात्री हों, मैनेजर, प्रबंधक आदि भी आपकी जाति के लोग हों। बाहर की यात्रा में भी अपनी ही जाति के लोगों का साथ करेंगे यह कूपमंडूकत्व के साथ ही कट्‍टरपन का भी प्रतीक है। यह ठीक है कि सुपरिचित लोगों के साथ होने की बेतकल्लुफी अलग ही होती है। पर उसका आधार मित्रता भी तो हो सकती है जाति-समुदाय ही क्यों? इस वक्त देश में जातिवाद को लेकर जो राजनीतिक, सामाजिक हालात हैं उनके चलते तो आम जनता को और अधिक उदार और लचीला होने की जरूरत है। फिर क्या घर से बाहर निकलकर भी हम परिचय का दायरा न बढ़ाएँ, उसी घेरे में घूमते रहें? हम कहीं जाते हैं तो पत्थर-चूने की इमारतें देखने ही नहीं जाते वहाँ के इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन से भी रूबरू होते हैं। दूसरों की गलतियों से सबक भी लेते हैं।

लंदन में ‍िनर्वासित अफगानों के समुदाय में एक अफगान जब दूसरे अफगान से मिलता है तो पराए देश भी वह 'अपना अफगान भाई' नहीं होता। वहाँ भी उनमें यह भेदभाव और नफरत का नजरिया बरकरार रहता है कि फलाँ तो पश्तून है, फलाँ हाजरा है, फलाँ ताजिक है... वगैरह। इतनी मुश्किलों के बीच भी वे एक नहीं हो पाते। बाहरी ताकतें उनके इसी जातिगत विद्वेष को उनके पतन का हथियार बना देती हैं। हम भारतीयों को भी यह बात समझना होगी। बात-बात में जात का हवाला देना छोड़ना होगा। यह समझ भारतीय घरों से ही विकसित हो सकेगी।

- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

क्या आपको भिंडी भाती है?

कहने को तो हम सबके पास एक-से माँस-मज्जा, एक-से हड्‍डी जोड़ हैं, मगर हम सब बेजोड़ हैं। यानी हमारा कोई जोड़ नहीं। हममें से हर व्यक्ति यूनीक और अनूठा है। एक-दूसरे से ‍िभन्न है, गुण में भी और दोषों में भी। हथेलियों की छाप में भी, आवाज और सुर और शक्लो-सूरत में भी। हर एक की अपनी अभिरुचियाँ, स्वभाव और मनोविज्ञान भी होता है। शायद इसीलिए दार्शनिकों से लेकर आधुनिक मैनेजमेंट गुरुओं तक सभी कहते आए हैं- दुनिया से तालमेल बैठाना है तो खुद को पहचानो।

इन दार्शनिक बातों को छोड़ भी ‍िदया जाए तो भी पहले स्वयं को पहचानो वाली बात व्यावहारिक सत्य भी है, जो जिंदगी की बेहद आम रोजमर्रा की भौतिक बातों से भी जुड़ सकती है। ये ख्याल आया हाल ही में एक ब्यूटी पार्लर उपकरण का विज्ञापन देखकर, जिसके जरिए अलग-अलग प्रकार की त्वचाओं की प्रकृति पहचानी जाती है। ‍िफर त्वचा की प्रकृति के ‍िहसाब से ब्यूटीशियन या त्वचा विशेषज्ञ द्वारा आपको वे प्रोडक्ट सुझाए जाते हैं, जो आपको अपनी त्वचा पर इस्तेमाल करने हैं ताकि त्वचा की प्रकृति से ‍िभन्न प्रोडक्ट इस्तेमाल करने से आपकी त्वचा को नुकसान न हो। खैर, यह वर्गीकरण ऊँगलियों की छाप, जितना वृहद नहीं होता, थोड़ा मोटे तौर पर किया हुआ वर्गीकरण होता है, मगर जो भी हो खुद को पहचानने वाले मुहावरे में तो फिट बैठता है!

हममें से कइयों ने अपनी दादी माँओं को कहते सुना होगा ‍िक फलाँ चीज तो मैं खाती नहीं क्योंकि फलाँ चीज मुझे 'सदती' नहीं। हममें से कइयों ने ही इस बात पर दादी माँ की खिल्ली भी उड़ाई होगी कि दादी माँ बड़ी वनस्पतिशास्त्री बनती हैं, तो कइयों पर दादी माँ ने पंजा भी कसा होगा कि फलाँ चीज मत खाओ इससे सर्दी हो जाती है, पेट खराब हो जाता है वगैरह। दोनों ही की बातें गलत थीं। यानी यह कि ट्रेडिशनल विस्डम से दादी माँ ने स्वयं की प्रकृति समझ ली थी कि फलाँ खाद पदार्थ उन्हें सूट नहीं करता, इस पर उनकी चुटकी लेना गलत था। मगर वे अपने पर आजमाई बात यदि दूसरे पर थोपना चाहतीं तो वह भी गलत था। और आधुनिक विज्ञान भी अपनी-अपनी प्रकृति के हिसाब से भोजन चुनने और न चुनने की ताकीद करता है। यदि छींक चलती है तो चिकित्सक कहेंगे- आप पता कीजिए आपको किस पदार्थ से एलर्जी है। और यह काम आपसे स्वयं से बेहतर कोई नहीं कर सकता, डॉक्टर भी नहीं। क्योंकि अपनी प्रकृति पहचानने का काम आप ही कर सकते हैं, चिकित्सक तो उसमें मदद भर कर सकता है। अपनी-अपनी शारीरिक-प्रकृति का यह अनूठापन सर्दी-गर्मी इत्यादि में भी चलता है। कहते हैं हरेक की अपनी तासीर होती है। किसी को ठंड ज्यादा लगती है, किसी को गर्मी ज्यादा लगती है। ‍िकसी को भिंडी बेहद पसंद होती है तो ‍िकसी को भिंडी से इतनी चिढ़ होती है ‍िक वह उसे थाली में भी नहीं लेना चाहता। मगर हम लोग अक्सर देखा-देखी करते हैं या फिर कोई दूसरा हम पर फोर्स करता है अपनी पसंद को। आजकल कॉकटेल पार्टियाँ बहुत चलती हैं। कई लोग देखा-देखी हार्डड्रिंक ले लेते हैं, कुछ इस डर के मारे ‍िक कहीं उन्हें पिछड़ा न समझ लिया जाए तो कुछ दोस्तों के अति आग्रह में। मगर ये 'पीलो यार!' के चक्कर में पीने वाले कभी उल्टियाँ करते नजर आते हैं तो कभी दूसरे दिन हैंगओवर के चलते सिर पकड़े बैठे होते हैं। फिर सोचते हैं (यदि सोचने वाले हुए तो) कि काश अपनी प्रकृति पहचानी होती। इसी तरह नींद इत्यादि के साइकल भी व्यक्ति-व्यक्ति के ‍िभन्न होते हैं। गहरी नींद का दौर सबका अलग-अलग समय का हो सकता है। नींद के घंटे ‍िकतने हों, यह भी व्यक्ति-व्यक्ति में बदल सकता है। किसी व्यक्ति को माइग्रेन हो तो उसे पता होना चाहिए कि उसे चॉकलेट, पनीर, कॉफी इत्यादि से परहेज करना है। यानी आप स्वस्थ जीवन चाहते हैं, तो आपका 'कॉन्स्टीट्‍यूशन' या संरचना क्या है, इसको आपको खुद को जानना बेहद जरूरी है। इसके ‍िलए चिकित्सा ‍िवज्ञान की डिग्री की जरूरत नहीं, बस थोड़ा-सा ऑब्जर्वेशन ही आपको बता देगा कि आपकी प्रकृति क्या है और इस ‍िहसाब से आप अपने जीवन को ‍िनयमित कर सकेंगे। यानी 'पहले खुद को पहचानो' पूरी तरह दार्शनिक वाक्या ही नहीं, भौतिक और व्यावहारिक सत्य भी है। न देखा-देखी न दबाव, आपको पता होना चाहिए आप क्या चाहते हैं।

- ‍िनर्मला भुराड़िया

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

पहली फिल्म 'माय फैमिली'

एक किशोर वय का लड़का है; जिज्ञासु, उत्सुक एवं बुद्धिमान। वह दुनिया का अच्छे से अच्छा साहित्य पढ़ता है, साथ ही अपने आसपास के समाज को, संसार को जानने-समझने की कोशिश करता है। उसने नया-नया वीडियो कैमरा खरीदा है और शौकिया डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहता है। उसने सोचा क्यों न पहली डॉक्यूमेंट्री बनाई जाए 'माय फैमिली'। उसने लिए वह ऐसे किसी त्योहार का इंतजार कर रहा है, ‍िजस ‍िदन पूरा परिवार इकट्‍ठा हो; चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ, मौसी उन लोगों के बच्चे आदि। दादी तो घर पर साथ ही रहती है। अत: उसने सोचा क्यों न दादी के शॉट्‍स तो लेकर ही रख लिए जाएँ। लड़के की माँ उसके इस आइडिया से सहमत हैं, बल्कि इससे आगे का सुझाव भी दे देती है, 'तुम बनाओ दादा-दादी की प्रेम कहानी, आखिर हम सब उसी कहानी का ‍विस्तार हैं। दादा-दादी का शाश्वत और अमर प्रेम ही है तुम्हारी 'माय फैमिली।'

लड़का दादी के पास पहुँचता है। दादी हारसिंगार के फूलों की माला बना रही है। लड़के ने दादी को कई बार सुबह फूल चुनते और माला बनाते देखा है, पर शायद अपनी व्यस्तताओं के चलते कभी ध्‍यान नहीं दिया। इस बारे में पूछा तो कभी नहीं। आज पूछा तो दादी माँ पहले तो थोड़ा तुनकी और वो ताना भी दिया जो वे घर में सभी को देती हैं, 'अच्छा तो आज तुझे फुरसत ‍िमल गई दादी से बात करने की।' पोते ने हँसकर टाल ‍िदया, 'छोड़ो भी दादी...' और सुलह हो गई। दरअसल दादी वह हार दादाजी की तस्वीर के लिए बनाती हैं। रोज फूल चुनकर ताजा, अपने हाथों का बना हार वे पति की तस्वीर को पहनाती हैं, वे नहीं चाहतीं कि एक बार चंदन हार लटकाकर काम खतम कर दिया जाए। दरअसल दादी हार नहीं प्यार गूँथती हैं। और तो और, दादी कभी-कभी गुजर चुके दादाजी की तस्वीर से बात करते भी नजर आती हैं। एक बार तो वह तस्वीर में बैठे दादाजी पर नाराज भी हो रही थीं कि मुझे छोड़कर पहले क्यों चले गए। उन्होंने पोते को बताया ‍िक जब दादाजी जीवित थे तब वे दोनों झगड़ा भी बहुत करते थे, पर शाम तक फिर हेल-मेल हो जाता था, क्योंकि ऊपरी झगड़ा होता था मनमुटाव नहीं। दादी ने और भी ढेर सारी बातें बताई और पोते को गेब्रियल गार्सिया मरक्वेज के उपन्यास 'लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा' की याद आ गई, जिसमें प्रेम को दो प्रेमियों की बड़ी उम्र भी बाधित नहीं करती। यह कहानी तो उससे भी आगे थी। इस प्रेम कहानी को तो मृत्यु ने भी बाधित नहीं किया था। ... और पोता इससे बहुत प्रभावित हुआ, उसने उत्सुक होकर दादी से पूछा, 'मुझे आपकी जैसी लड़की मिलेगी, जो मुझे हमेशा चाहे...। दादी ने टके-सा जवाब दिया, 'हाँ जरूर मिलेगी, यदि तू अपने दादाजी जैसा लड़का साबित हुआ तो... तुझे पता है यदि में पहले जाती तो वो मेरे लिए माला बनाते मिलते...' और दादी ने नम हो आई आँखें पोंछी।

'ओ हो दादी तो ये पतिव्रता होने की बात नहीं है, आपसी प्रेम की बात है' पोते ने कहा। 'बिलकुल यही है,' दादी ने जवाब दिया।

पोते के पास अगले सवाल भी थे, 'पर दादी पहले तो सभी अरेंज मैरेज होती थी, अब लव मैरेज होती है। तुम क्या सोचती हो दोनों में से कौन सी वाली में प्यार पक्का रहता है।' दादी अब हँसने लगी थी, 'लोग यूँ ही झगड़ते हैं कोई कहता है अरेंज मैरेज ठीक होती है, कोई कहता है लव मैरेज ठीक होती है। दोनों में से कोई भी तरीका हो, खास बात तो है आपसी समझ। पर, इसका मतलब यह भी नहीं ‍िक तुम ऐसी लड़की चाहो जो ‍िक बस तुम्हारी तुक में तुक मिलाए। आपसी समझ का मतलब आपसी समझ से ही है। सिर्फ लड़की द्वारा हाथियार डालने से नहीं है।' 'पर, दादी विज्ञापन में तो लड़की के लिए लिखते हैं, 'सुंदर, सुशील, वगैरह...।'

दादी ने जवाब दिया, 'मगर असल में तो तुम्हारे दादाजी सुंदर, सुशील, वगैरह... पुरुष थे, जिसने मेरे जैसी अपनी बातों पर लड़ने वाली स्त्री से भी प्रेम किया।' अब हार पूरा बन चुका था। दादी ने उठकर तस्वीर पर हार डाल दिया। पोते ने शॉट ले लिया था और जिंदगी के बारे में एक विचार भी। ताली एक हाथ से नहीं बजती। सुलझे हुए दाम्पत्य में पुरुष के अवदान को नहीं नकारा जा सकता।

- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

एक गाथा

जिंदगी के पर्दे पर की

संजय भंसाली की फिल्म गुजारिश औंधे मुँह गिरी। खैर बॉक्स ऑफिस फिल्म के सफल या असफल होने का फैसला करता है, मगर अच्छा या बुरा होने का फैसला कई बार नहीं कर पाता। लिहाजा कुछ लोगों ने इस फिल्म को पसंद किया है, क्योंकि कुछ दृश्य इस फिल्म में बेहद कलात्मकता के साथ फिल्माए गए हैं, कुछ लोगों ने ऋतिक-ऐश्वर्या की जोड़ी पर फिल्माए दृश्यों में प्रेम की तीव्रता को भी देखा है। कतिपय लोग बिस्तर पर सीमित रोगी की घुटन को लेकर भी भावुकता में बह गए हैं, मगर कुल मिलाकर फिल्म असफल ही रही है। सिर्फ बॉक्स ऑफिस के लिहाज से ही असफल नहीं, बल्कि सही संदेश देने और फिल्म में उठाए गए उद्देश्यों को प्रतिपादित करने में भी। यह फिल्म उस समय, काल, परिस्थिति में बनी है, जब वृद्ध, दुःखी और रोगी तो छोड़िए सामान्य युवा जिसके सामने भविष्य खुला है, वह तक आत्महत्या की प्रवृत्ति अपनाने पर आमादा है। ऐसे समय में जीवन से घबराकर जीवन को त्यागने की फिल्म बनाना घोर नकारात्मकता है। सामान्य युवाओं के परिजन शायद ही चाहेंगे कि उनके बच्चे इस फिल्म को देखें। वैसे भी इस समय यूथनेशिया, दया-मृत्यु अथवा मर्सी कीलिंग की अनुमति भारत की ऐसी कोई ज्वलंत समस्या नहीं है कि इसके लिए लोग तख्तियाँ हाथ में लेकर जुलूस निकालें और रोगी जनमत बनाए, जैसा कि फिल्म में बताया गया है।

डिप्रेशन, एंक्जाइटी और तनाव के इस बढ़ते दौर में तो उत्साह, प्रयास और प्रबल जिजीविषा की जरूरत है। फिल्म इसलिए भी प्रेरित नहीं करती कि नायक के चेहरे पर रोग की कोई बेबसी, कोई झुर्री, कोई ऊब या विषाद नहीं है। नायक को ऐसा बुजुर्ग बताने की हिम्मत भंसाली नहीं कर पाए हैं, जिसके लिए जीवन में कोई मकसद नहीं बचा, जो असुंदर है, जिसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। यहाँ तो नायक तथा कथित रूप से जिंदादिल आदमी है, मगर दया मृत्यु चाहता है! उसके पास एक अदद सदा सजी-सँवरी शाश्वत युवा प्रेमिका भी है। माँ, मित्र मंडली, रेडियो जॉकी का जॉब, प्रशंसक वर्ग सब है। कुल मिलाकर वह बेबस होकर मरना नहीं चाहता, बिस्तर में पड़े-पड़े बोर होकर मरना चाहता है। बस इसीलिए उसकी अपील मार्मिक नहीं बन पाती। न दिल को छू पाती है। कुल मिलाकर लिजलिजी भावुकता की चाशनी और नकली रूमानियत का घोल बनकर रह जाती है। कोई भी किसी बीमार या अपंग व्यक्ति को यह फिल्म देखने की सलाह नहीं देगा, क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में पड़े व्यक्ति को नकारात्मकता नहीं प्रेरणा की जरूरत होती है। तो चलिए फिल्मी पर्दे को छोड़कर एक नायक की गाथा असल जिंदगी से ली जाए।

श्री राकेश वर्मा का पिछले हफ्ते निधन हो गया। राकेशजी की गाथा जमीं से उठकर आसमान छूने की गाथा है। मिलियन डॉलर वर्थ वाली अमेरिका की सॉफ्टवेयर कंपनी एजटेक के सीईओ व संस्थापक राकेशजी ने बहुत सामान्य परिस्थितियों में जीवन की शुरुआत की। अंग्रेजी मुहावरे का प्रयोग करें तो इसे हम्बल बिगनिंग कहा जा सकता है। पारिवारिक परिस्थितियों की वजह से अपनी पढ़ाई के लिए उन्होंने किशोरावस्था में ही कपड़े सिलना, किताब की बाइंडिंग करना जैसे कामों में भी दक्षता हासिल कर ली थी। रात में किताबों की बाइंडिंग का काम करके अतिरिक्त आय जुटाते थे। वे सामान्य स्कूलों में शिक्षित हुए, मगर एक बार राह बनाई तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। राकेशजी स्कूल में होनहार छात्र थे। उन्होंने समझ लिया था कि आगे बढ़ना है तो पढ़ना जरूरी है। वे भविष्यदृष्टि से भी सोचते थे, जैसे कि बीई इलेक्ट्रॉनिक्स में करने के बाद उन्होंने सोचा कि आगे कम्प्यूटर का ही जमाना आएगा और उन्होंने आईआईटी मुंबई में एमटेक के दौरान विषय बदलकर कम्प्यूटर साइंस कर लिया। फिर उन्होंने इंदौर में जीएसआईटीएस व कुछ प्रायवेट संस्थाओं में शिक्षण भी किया। उस दौरान मैंने भी उनकी कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर की क्लास अटेंड की, जहाँ उन्होंने उस वक्त चलने वाली कम्प्यूटर की भाषा "बेसिक" पढ़ाई थी। इसके बाद राकेशजी स्टील ट्यूब्स ऑफ इंडिया से जुड़े तो उन्होंने अपने काम के अलावा बिजनेस, फायनेंस आदि भी समझा। हमेशा नया करने, नया सोचने वाले राकेशजी यहीं नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च जॉइन किया। यहाँ उन्होंने गाँव के टेलीफोन एक्सचेंज के लिए सॉफ्टवेयर लिखा। वे इंजीनियर, वैज्ञानिक एवं लेखक भी थे। अंग्रेजी के अलावा मातृभाषा हिन्दी में भी लिखते थे। सत्तर के दशक में धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं में भी उनके लेख प्रकाशित हुए थे। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भी वे कुछ मौलिक और क्रांतिकारी करने में यकीन करते थे, ऐसा कुछ जो सुखद परिवर्तन लाए। बनी बनाई लीक पर चलने वाले प्रोग्राम्स का गुणन करके बाजार के लिए कंपनी खड़ी कर लेना ही उनका लक्ष्य नहीं था। लिहाजा उन्होंने अपने नाम पर चार पेटेंट भी कराए। बदकिस्मती से कुछ साल पहले उनके साथ एक हादसा हो गया था, तब से वे व्हील चेयर पर थे। वे स्वयं कुछ भी नहीं कर पाते थे, मगर उनकी पत्नी प्रेरणाजी निरंतर उनके साथ लगी रहती थीं। भंसाली साहब को प्रेम की तीव्रता और जोड़े के एक-दूसरे के प्रति समर्पण के लिए इधर देखना चाहिए था। खैर वर्माजी पत्नी के प्रेम से बेहद अभिभूत व आभारी थे और हिन्दी में आत्मकथा लिखने (बोलकर लिखवाने) की योजना भी बना रहे थे, जिसमें वे पत्नी के प्रति अपनी भावनाएँ भी अभिव्यक्त करना चाहते थे। वे नए क्रांतिकारी सॉफ्टवेयर लिखने (बोलकर लिखने) की योजना भी बना रहे थे। ऐसी शारीरिक परिस्थितियों के बावजूद वे कंपनी तो चला ही रहे थे, क्योंकि वे अदम्य जिजीविषा के स्वामी थे। दुर्भाग्य से पिछले दिनों उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और वे बच नहीं सके, मगर अंत तक भी उन्होंने कुछ अच्छा और परिवर्तनकारी करने की इच्छा को नहीं त्यागा। वे उसी जोश से कहते थे एक नया और क्रांतिकारी सॉफ्टवेयर लिखूँगा। असल मिसाल तो ऐसा जोश और ऐसा जज्बा है जो जमीं से हाथ बढाकर आसमान छूने की प्रेरणा दे।

- निर्मला भुराड़िया

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

गणित तू एक कविता है!

जब दो जानकार अपने विषय के बारे में बात कर रहे होते हैं या ज्ञान का आदान-प्रदान कर रहे होते हैं, तब उन्हें एक-दूसरे को बहुत अधिक समझाकर कहने की आवश्यकता नहीं होती। मगर यदि जानकार गुरु है और सामने वाला शिष्य, तब जानकार को यह बात जेहन में रखना जरूरी होती है कि बिलकुल बुनियादी बातें भी बताना पड़ेंगी। कठिन बातें सरल और रोचक ढंग से समझाना होंगी।

गुरु का बात कहने का रसपूर्ण तरीका और छोटी-छोटी बातें भी समझाने का धीरज जरूरी होगा। अक्सर सिखाने वाला यह बात भूल जाता है और सीखने वाले पर झल्लाने लगता है कि अरे इतनी छोटी-सी बात भी समझ नहीं आ रही! मूर्ख, भोट आदि की पदवी भी जल्दबाज शिक्षक अपने शिष्य को दे डालता है। वस्तुतः नासमझ तो वह खुद होता है जो यह नहीं जानता कि डंडे से सिर फोड़कर उसमें ज्ञान नहीं भरा जा सकता। कई विषय पढ़ने वालों को रुखे-सूखे भी लगते हैं इसलिए भी विद्यार्थी उन्हें ग्रहण करने में रुचि नहीं रखता। गणित जैसे विषय भी होते हैं जिनका इतना भय विद्यार्थी के मन में भर दिया जाता है कि वे सीखने के पहले ही विषय से आतंकित होते हैं। लिहाजा गणित-ग्रंथि की वजह से गणित नहीं सीख पाते। इन्हें यदि भास्कराचार्य द्वितीय जैसे गुरु मिल गए होते तो गणित इनके लिए इतना बड़जब दो जानकार अपने विषय के बारे में बात कर रहे होते हैं या ज्ञान का आदान-प्रदान कर रहे होते हैं, तब उन्हें एक-दूसरे को बहुत अधिक समझाकर कहने की आवश्यकता नहीं होती। मगर यदि जानकार गुरु है और सामने वाला शिष्य, तब जानकार को यह बात जेहन में रखना जरूरी होती है कि बिलकुल बुनियादी बातें भी बताना पड़ेंगी। कठिन बातें सरल और रोचक ढंग से समझाना होंगी। गुरु का बात कहने का रसपूर्ण तरीका और छोटी-छोटी बातें भी समझाने का धीरज जरूरी होगा। अक्सर सिखाने वाला यह बात भूल जाता है और सीखने वाले पर झल्लाने लगता है कि अरे इतनी छोटी-सी बात भी समझ नहीं आ रही! मूर्ख, भोट आदि की पदवी भी जल्दबाज शिक्षक अपने शिष्य को दे डालता है। वस्तुतः नासमझ तो वह खुद होता है जो यह नहीं जानता कि डंडे से सिर फोड़कर उसमें ज्ञान नहीं भरा जा सकता। कई विषय पढ़ने वालों को रुखे-सूखे भी लगते हैं इसलिए भी विद्यार्थी उन्हें ग्रहण करने में रुचि नहीं रखता। गणित जैसे विषय भी होते हैं जिनका इतना भय विद्यार्थी के मन में भर दिया जाता है कि वे सीखने के पहले ही विषय से आतंकित होते हैं। लिहाजा गणित-ग्रंथि की वजह से गणित नहीं सीख पाते। इन्हें यदि भास्कराचार्य द्वितीय जैसे गुरु मिल गए होते तो गणित इनके लिए इतना बड़ा हौवा नहीं होता। गणित लड़कियों का विषय नहीं, लड़के और लड़की के दिमाग को भी वीनस और मार्स में बाँटने वाले समाज ने यही बताया। पर यह भी सच नहीं। यह भास्कराचार्य के बारें में जानने से पता चल जाएगा।

ईस्वीं सन्‌ ग्यारह सौ चौदह में जन्मे भास्कराचार्य को संसार के एक महान गणितज्ञ के रूप में जाना जाता है। भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो पद्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे। उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे। कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे। वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, "हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं...।" बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने "लीलावती" रख दिया। बादशाह अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन्‌ १५८७ में "लीलावती" का फारसी भाषा में अनुवाद किया। अंग्रेजी में "लीलावती" का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन्‌ १७१६ में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा ...तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे... अट्ठबीसा, नौ पैंतीसा...। इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था, "सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस, अट्ठाईस की फरवरी चौथे सन्‌ उनतीस!"

अर्थशास्त्र जैसा विषय भी कइयों को रुखा-सूखा और कठिन लगता है। इसे भी कुछ लोग कॉमिक्स के जरिए समझाने का प्रयास कर रहे हैं। रॉयल सोसायटी फॉर द एनकरेजमेंट ऑफ आर्ट्स जैसी संस्थाएँ ऑनलाइन प्रेजेंटेशन कर हल्के-फुल्के चित्रों के माध्यम से अर्थशास्त्र समझा रही हैं। पूँजीवाद का संकट जैसे विषय कार्टूनों के जरिए रोचक व सरलीकृत ढंग से समझाए जा रहे हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर नैन्सी फाल्बर "फेमिनिस्ट इकॉनॉमिक्स" की पुरोधा हैं। यानी वे अर्थशास्त्र के उन ‍िवषयों से जुड़ी हैं, जो महिलाओं और आम आदमी से संबंधित हैं, बड़े जटिल व्यापारों और व्यापारियों से नहीं। नैन्सी की सारी रिसर्च महिलाओं के दृष्‍टिकोण को आर्थिक विश्लेषणों में शामिल करने व घरेलू और सामाजिक अर्थशास्त्र को लेकर है। नैन्सी भी इकॉनॉमिक्स कॉमिक्स की पक्षधर हैं। तात्पर्य यही कि धीरज और रसबोध बहुत महत्वपूर्ण है। साहित्य और कला के माध्यम से तथाकथित रूप से जटिल विषयों को भी रोचक और सरल बनाया जा सकता है। हाँ यह ठीक है कि कभी-कभी कोई व्यक्ति किसी विषय में कमजोर होता है, दूसरे विषयों में तेज होने के बावजूद।

गणित का डिसलेक्सिया यानी केलकुलेक्सिया भी कुछ लोगों को होता है। धीरजपूर्ण और रोचक तरीके से तो ऐसे लोगों को भी ‍िवषय पढ़ा ‍िदया जाता है। जैसे अपनी ‍िफल्म 'तारे जमीं पर' में आमिर खान डिसलेक्सिक बच्चे को भी स्पेलिंग बनाना सिखा देते हैं। विषयों की समझ को लेकर चलने वाला लिंगभेदी सोच, फोबिया, सामाजिक पूर्वाग्रह आदि सिखाने के सही तरीके से दूर हो सकते हैं। बशर्ते स्कूलों के मैनेजमेंट शिक्षक को अपने तरीकों से पढ़ाने दें और शिक्षक भी पढ़ाने के नाम पर बला न टालें, नवीनता की खोज करें, मौलिकता अपनाएँ।

- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

बेचारा उल्लू!

जीवन के रंगमंच से...

घर के बाहर खड़े बिल्वपत्र के एक शानदार पेड़ पर कुछ समय पहले उल्लुओं का एक जोड़ा रहने आ गया था। हल्के भूरे रंग के ये सलोने उल्लू फर के गोलों की तरह लगते थे। पेड़ के नीचे खड़े होकर उन्हें देखो तो ऐसा प्रतीत होता था मानो वे नीचे हमारी तरफ ही देख रहे हों- ऊपर देखने के प्रत्युत्तर में! सुबह-शाम कभी बालकनी से, कभी बरामदे से, कभी पेड़ की तलहटी से इस खुशनुमा जोड़े को देखकर उल्लासित होना मानो शगल बन गया।

मगर 6-8 महीने पेड़ पर रहने के बाद तकरीबन पिछली दीपावली के आसपास पहले एक उल्लू फिर कुछ अंतर से दूसरा उल्लू गायब हो गया! इनके गायब होने का जो कारण जानकारों ने बताया उसे सुनकर दुख हुआ कि कदाचित दीपावली पर किसी ने उनकी तांत्रिक बलि दे दी हो!

हमारे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पिछले दिनों यह खेद व्यक्त किया कि हैरी पॉटर की लोकप्रियता ने उल्लुओं का नाश किया है। कुछ हद तक यह बात सही है थीम पार्टियों में यदि हैरी पॉटर थीम है तो बच्चे हैरी के पालतू उल्लू हैडविग की तर्ज पर अपने साथ उल्लू ले जाना चाहते हैं। हैरी पॉटर से प्रभावित कुछ बच्चे उल्लू पालने की जिद भी करते हैं! मगर उल्लू की बढ़ती दुर्गति का महज यही कारण नहीं है। हमारे बहुत से देशी कारण भी हैं।

भारतीय पौराणिकता में उल्लू चूँकि लक्ष्मी का वाहन माना गया है, अतः कई लालची लोग यह सोचते हैं कि उल्लू के संग तंत्र पूजा से लक्ष्मी उनके पास आएगी। या तांत्रिकगण उन्हें ऐसा समझा देते हैं और उल्लू के रक्त से स्नान जैसी वीभत्स प्रक्रियाएँ भी दीपावली की रात संपन्न करवाई जाती हैं। इसके अलावा ओझा लोग उल्लू की आँख, उल्लू की हड्डी, उल्लू का पंजा, उल्लू का सुखाया हुआ मांस आदि अवयवों का उपयोग इंसानी रोगों के तथाकथित इलाज के लिए करते हैं।

जिन पिछड़े इलाकों में आधुनिक चिकित्सा का ज्ञान नहीं पहुँचा है वहाँ तो लोग उल्लू के अवयवों को दवा के रूप में इस्तेमाल करते ही हैं, कई अंधविश्वासी, अतार्किक अगड़े (?) या यूँ कहें शहरी पढ़े-लिखे भी अक्सर इस फेर में पड़ जाते हैं। यही नहीं उल्लू के अवयवों का उपयोग तथाकथित वशीकरण के लिए भी किया जाता है।

उल्लू के अवयव बेचने वाले खुलेआम घोषणा करते हैं कि उल्लू के फलाने अवयव से प्रेमिका पट जाएगी तो फलाने पार्ट से दुश्मन का खात्मा, फलानी हड्डी या आँख से आदमी आपका गुलाम हो जाएगा। अशिक्षा, अंधविश्वास एवं रूढ़ियाँ और भी तरह से उल्लुओं की दुश्मन हैं। जैसे कि दक्षिण के कई इलाकों में उल्लू की आवाज को मौत का पैगाम माना जाता है, अतः लोग ढूँढकर उल्लू को मार डालते हैं। कई लोग उल्लू को अपशगुन मानते हैं और इनका खात्मा करने पर तुल जाते हैं।

पर्यावरण-मित्र, लेखक अनिल यादव कहते हैं, 'पता नहीं क्यों लोग इस कृषक मित्र पक्षी को मनहूस और बेवकूफ मानते हैं।' उनका कहना है उल्लू की एक प्रजाति फिश आऊल को हिन्दी में मुआ कहते हैं। एक और उल्लू प्रजाति है 'खूसट'। ये दोनों ही शब्द गालियों और तानों की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं। उल्लू को बेवकूफ का पर्याय और उल्लू का पट्ठा को महामूर्ख के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

दरअसल उल्लू तो लक्ष्मी का वाहन इसलिए होना चाहिए कि फूड चेन के अंतर्गत इसका सबसे बड़ा काम चूहों और कृषि को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों का खात्मा करना है। इस तरह उल्लू फसल को बचाता है और धन-धान्य में वृद्धि करता है। अतः उल्लू तो इंसान के आदर का पात्र है और इसे अभिरक्षा चाहिए।

-निर्मला भुराड़िया

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

चमत्कारिक द्रव्य!

जल की क्षमता के बारे में एक विचित्र-सी थ्योरी पढ़ी, जो ‍िवचित्र किन्तु सत्य भी हो सकती है। यह थ्योरी कहती है कि पानी आवाजों को रिकॉर्ड करता है! मान लीजिए कि कोई पुरानी कोठी, हवेली या खंडहर है। वहाँ घर के अतीत से जुड़ी आवाजें किसी-किसी को कभी-कभार सुनाई पड़ती हैं तो डरने की जरूरत नहीं, यह कोई भूत-प्रेत का चक्कर नहीं बल्कि जरूर जमीन के भीतर, नीचे कहीं पानी है जिसमें अतीत की कुछ ध्वनियाँ दर्ज हैं! दरअसल, पानी हमारे आसपास का ही होते हुए भी इतना चमत्कारिक द्रव्य है कि इसके बगैर धरती तो क्या स्वर्ग की कल्पना भी अधूरी है। अरबी लोगों की स्वर्ग की कल्पना में बड़ी-बड़ी आँखों वाली हूर समाहित है, जो पलक झपकते ही पानी का गिलास लेकर हाजिर हो जाती है! पानी है तो मरुस्थल भी नखलिस्तान है। जल है तो धरती पर जीवन है। पृथ्वी का बड़ा भाग जल है, छोटा हिस्सा भू-भाग है। हमारे शरीर में भी काफी प्रतिशत जल का ही है। खैर जल की महिमा तो एक विस्तृत ललित निबंध की माँग करती है। मगर फिलहाल यहाँ हम एक दूसरे ही पानी की बात करना चाहेंग। वह है 'आँख का पानी'।

इन ‍िदनों जल संकट की काफी बात हो रही है। पानी बचाना पर्यावरणविदों ही नहीं आम जनता के लिए भी एक बड़ा अभियान है। लेकिन एक और पानी है वो है आँख का पानी। हमारी सामाजिकता पर यह एक बड़ा जल संकट मँडरा रहा है कि आँख की शर्म की जगह खुली बेशर्मी ने ले ली है। हम एक 'मैं' केंद्रित संस्कृति की ‍िगरफ्त में आ रहे हैं, जो समाज से कुछ भी साझा नहीं करना चाहती, सिर्फ अपनी जेब भर लेना चाहती है। संस्कृति जो लिहाज को ताक पर रखकर खुद को फिर-फिर रेवड़ी बाँटती है। यूँ छुपी हुई आत्मकेन्द्रितता हर वक्त मनुष्य में कुछ न कुछ रूप में रहती आई है। मगर सामाजिकता के नाते इंसान हमेशा इस आत्मकेन्द्रितता पर काबू पाने की कोशिश करता आया है और कुछ नहीं तो जमाने के लिए ही सही। संस्कारित व्यक्ति स्वयं की गरिमा की रक्षा के लिए भी स्वयं को बड़प्पन की दिशा में साधता रहा है। मगर आज टुच्चई नॉर्म बन गई है और बड़बोलापन बाजार का मूल मंत्र बन गया है। लिहाजा 'सिर्फ मैंने ही यह किया', ‍'सिर्फ हम में ही यह गुणवत्ता है', 'सबसे पहले हम पहुँचे' जैसी उक्तियाँ चलने वाले स्लोगन बन चुकी हैं। खुद के लिए झूठे श्रेय लेना, खुद की झूठी तारीफ करना, अपने बारे में बढ़-चढ़कर बोलना आज मार्केटिंग कहलाता है। 'मैं ये हूँ', 'मैं वो हूँ' तक भी ठीक था अब तो बात यहाँ तक आ गई है कि जो कुछ हूँ वो मैं ही हूँ। पहले आप वाली विनम्रता भी खो-सी रही है। दु:खद यह है कि यह सबकुछ बड़ी बेशर्मी से हो रहा है। गैंडे की खाल और बेशर्मी गुणों में गिनी जा रही है। सादगी, संवेदनशीलता, विनम्रता और आँख का पानी न रहा। यह सामाजिकता जल संकट है। इससे मानवता सूख रही है और करुणा प्यासी मर रही है।

इस पानी के लिए त्राहि-त्राहि हो उससे पहले ही अच्छा हो हम यह दोहा फिर याद कर लें- 'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून, पानी गये न ऊबरे, मोती मानस चून।' यानी पानी है तो आब है। हमारी सामाजिकता यह आब खोने का जोखिम नहीं ले सकती।

- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 24 नवंबर 2010

Soul of a poet

Sensitivity of a butterfly
Adrian Khare

It is sometimes said that the interview is a flat format. This is merely a matter of perception. In the interview numerous details about the interviewee are brought out. Here talking to Adrian Khare a poet ,a literator, journalist, music lover and a "vagabond", Nirmala Bhuradia carefully pulls out the roots that have gone into his making.

When did you begin writing poetry ?

Well, it must have been around 1965-66 or thereabouts. Most of what I wrote at that time was Nature oriented...Naturally, I had yet to acquire depth and variety at the time.

Do you think poetry can be taught or poetry explained by a teacher ?

Taught by a teacher ? No, no. But explained, yes, provided the guide has the soul of a poet and the sensitivity of a butterfly. Otherwise, everyone will be trying to sail a boat on dry land.
Do you agree that a poet or an artist must have a Muse?

Yes. But the Muse need not necessarily be a person. It can be an inspiration powerful
enough to drive the artist\poet to create a piece of work. Personally speaking it is either Dylan Thomas and his Fern Hill or
Arthur Rimbaud and his Drunken Boat I would say that they are my "forever Muse". I would never say that one was an alcoholic and the other a *junkie*. And what about Neil Young?

You are a music lover and have interviewed a fine musician like Louis Banks...What have your impressions been of him and his music?

He is a humble man and has made his way through deep waters. This genius from Nepal owes his success to his father who would rap him on the knuckles while teaching him to play the piano. Banks has stood his own playing the biggest names in jazz. A keyboardist and pianist par excellence

You have also interviewed M.F.Husain...Can you say something of your interaction with him ?
I believe Mr. Husain is as much of a showman as he is an artist. I was
working with the tabloid BLITZ at the time and he insisted on greeting me that Indian way, with a 'namaste'. It seemed rather odd for a man who had incensed so many Indians by depicting deities in the nude. There seems no limit to what Husain was painting .

Husain has a lot to say in his other paintings, not so for Pritish Nandy. There was a time when he turned out paintings not
without zest. He’s made a niche for himself in the film world and is preoccupied with his image. When this happens, the artist dies. But there is one exhibition when Nandy worked with Samir Mondal. It was Mondal's rendering of Pritish's portrait with some of his poetry accompanying them It was a well presented show at the Sophia Art Gallery. I cannot think of anything more significant from Nandy after that.

Are any of the stories that you have done while in BLITZ still close to your heart ?

O
h, yes! One was the coverage of a ghastly incident. Briefly, it was the murder of a girl inside an examination hall. She was burned to death ny a man who was said to be her "lover”. It was reported that he later committed suicide. The other was a piece of the Mondal- Nandy show which still stands out in my mind.
Mondal was brought straight from a village in rural Bengal and made a place for himself in the art world in Mumbai. Nandy was directly responsible for this.The uniqueness of this exhibition was that it was rendered entirely on glass.

Who is your favourite author? And your poem ?

I find it hard to think of an author better than J.G.Ballard whose writing is like sharp edged hallucinations. Dylan Thomas and Arthur Rimbaud are two poets I have already mentioned. No serious reader can overlook their "Fern Hill" and "The Drunken Boat" respectively. But to the new generation of readers I would definitely recommend Adil Jusawalla and Dom Moraes. There are so many books for them to read. They may dismiss Jusawalla and Moraes as old hat.They are entitled to their own opinions but they should read Khaled Hosseini "A Thousand Splended Suns"

Your book of poetry is titled "Majoun" what does this title mean?

I was pondering over a title when I came across this word in a book called "Report from the Bunker" by Victor Bockris who has spent time with Burroughs in New
York
's Bowery area where Burroughs lived at the time. Majoun is a sweet made of flour, honey and hashish. It is kneaded to a consistency of dough. It is then rolled out into thin wafers and dried in the sun. It is best consumed with a hookah and coffee. Burroughs says it as being extremely potent. So why "Majoun"?


Simply because the poems have been drawn from many sources, just as majoun is made up of various ingredients. Add to this the cut up and spliced method.

What are you working on at present ?

This is a state secret -- no, seriously, it is a book of poems. yes, AGAIN!

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

अन्न- ध्‍यान!

एक नए अनुसंधान ने बताया है कि टीवी के सामने बैठकर खाने से मोटापा बढ़ता है। इस वैज्ञानिक निष्कर्ष का सामान्यजन तक पहुँचना जरूरी है, क्योंकि टीवी के सामने बैठकर खाना नए जमाने की नई कुरीति बन चुकी है। न सिर्फ यह कि टीवी के सामने बैठकर लोग जाने कितना चुटुर-पुटुर खा जाते हैं, बल्कि कई लोग तो अपना मुख्य भोजन भी रसोई या डाइनिंग रूम में करने की बजाए टीवी के सामने ही थाली मँगवा लेते हैं। कई घरों में डाइनिंग रूम में ही टीवी रखा होता है। कई जगह डाइनिंग रूम कम ड्राइंगरूम में टेलीविजन रखा होता है। दोनों को बाँटने के लिए कोई मामूली पर्दा तक नहीं लगा होता। अत: खाना और टीवी देखना साथ-साथ चलता है। विदेशों में कुछ लोगों को यह चस्का होता है कि वे हाथ में ‍िचप्स, चॉकलेट अथवा पॉपकार्न का पैकेट रखे बगैर टीवी नहीं देख पाते। कुछ खाते-खाते टीवी देखने का उन्हें इतना अनुकूलन हो जाता है। नतीजा होता है काउच-पोटेटो सिंड्रोम। यानी काउच पर पड़े-पड़े, खाते-खाते टीवी देखकर मुटा जाना।

वैज्ञानिकों का कहना है ‍िक खाना सिर्फ पेट से जुड़ी प्रक्रिया नहीं है, मस्तिष्क से जुड़ी प्रक्रिया भी है। अत: पेट भरने पर भूख की तृप्ति का सिग्नल मस्तिष्क से प्राप्त होता है, लेकिन जब आप टीवी देखते हुए, कोई किताब पढ़ते हुए, फोन पर बात करते हुए खाते हैं तो मस्तिष्क भोजन के अलावा भी किसी और कर्म में उलझ जाता है और सिग्नल देने में देर कर देता है यानी आप ज्यादा खा जाते हैं। इसका उपाय बताया गया है - माइंडफुल ईटिंग अथवा सचेत भोजन क्रिया। सचेत भोजन का अर्थ यह है कि व्यक्ति एकचित्त से भोजन ग्रहण करें। भोजन की मात्रा के प्रति सचेत रहे। स्वाद और रस के साथ शांतचित्त हो भोजन ग्रहण करें। इससे खाया-पीया ठीक से दर्ज होगा और सामान्य मात्रा में ही पेट भर जाएगा।

दुनियाभर के धार्मिक विश्वासों में भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। ईसाइयों में भोजन पूर्व ग्रेस, इस्लाम में खाने से पहले दुआ व हिन्दू धर्म में भी भोजन पूर्व प्रार्थना का रिवाज रहा है। कई स्कूलों में भी बच्चों को भोजन पूर्व प्रार्थना करवाई जाती है, ताकि आप शांत और एकाग्र होकर भोजन ग्रहण करने को तैयार हो जाएँ और सब लोग एकत्रित होकर नियत स्थान, नियत समय पर भोजन करें। भोजन कक्ष या घर के ‍िनयत भोजन स्थल पर भोजन करने से चलते-फिरते खाने की आदत को भी काफी हद तक टाला जा सकता है। कंपल्सिव इंटिंग करने वाले मन का खालीपन भरने के लिए कुछ न कुछ खाते रहते हैं। भोजन स्थल में बैठकर पेटभर रुचिपूर्वक खाने से हर वक्त मुँह चलाने की आदत पर विराम लग सकता है। यदि आप पढ़ते-पढ़ते भी खा रहे हैं तो फिर मनोरंजन में लिप्त होने का नुस्खा भी कंपल्सिव इंटिंग को नहीं टाल सकता। आप शयनकक्ष में भी खाने का सामान ले जा रहे हैं तो फिर मनोवैज्ञानिक रूप से आपके लिए डाइनिंग रूम और शयनकक्ष अलग नहीं है। तब बार-बार खाने के लिए न आपको रसोईघर में जाने का प्रयत्न करना पड़ेगा, न इस मानसिक संकोच से लड़ने का कि यह
कोई खाना खाने का वक्त है या यह कोई खाने की जगह है क्या? नतीजा यह कि भोजन से जुड़ा रस और अध्यात्म बेखयाली में भकोसने में बदल जाएगा और यह भकोसना मोटापा और अन्य बीमारियों में।

डाइनिंग रूम में सचेत भोजन के भी अपने नियम है। जैसे भोजन के वक्त लड़ाई-झगड़े की बात न की जाए, शिकायतों का पुलिंदा भोजन के वक्त के लिए ही न रखा जाए। भोजन सामग्री आने के पूर्व हल्की-फुल्की किस्म की, उत्फुल किस्म की बातें की जाएँ। भोजन ग्रहण करते वक्त कमोबेश मौन रखा जाए। जीवन के प्रति कृतज्ञता के साथ भोजन ग्रहण किया जाए। भोजन ग्रहण की प्रक्रिया में यह सकारात्मकता जोड़ लेने से भोजन बीमारियों का घर नहीं बनेगा अपितु शक्ति और ऊर्जा देगा।

- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 17 नवंबर 2010

जाने भी दो यारों!

एक युवक ने एक सेकंडहैंड कार खरीदी, पड़ोस में रहने वाले एक साठ वर्षीय व्यक्ति से। उन सज्जन ने युवक को कार तो दे दी थी, मगर वे उससे मुक्त नहीं हो पाए थे। वे आते-जाते रोज कार के बारे में युवक को हिदायतें देते रहते। 'बेटा आज तुमने गाड़ी पर कपड़ा नहीं मारा।' या 'अरे लाल रंग क्यों करवा लिया इस पर तो कत्थई रंग जमता', 'धीरे चलाओ। टकरा दोगे तो बोनट की जय हो जाएगी', 'पीछे के दरवाजे पर खरोंच किसने मार दी' वगैरह-वगैरह। इन सज्जन के इस दखल से युवक इतना परेशान हो गया कि उसने गाड़ी किसी और को बेच दी।

वे सज्जन इतनी-सी बात नहीं समझ पाए कि अब वह चीज उनकी नहीं है, अब उन्हें इस पर आसक्ति नहीं रखना है। कहते हैं डिटेचमेंट अथवा अनासक्ति को साधना एक बहुत बड़ी कला है और यह कला सुंदर, निर्द्वंद्व और जटिलता रहित जीवन जीने की कला है। अनासक्ति संसार से भागने का नुस्खा नहीं है, न ही संसार त्याग इसका ध्येय है। जिन चीजों पर हमारा इख्तियार नहीं है, उनका मोह न रखना पीड़ा से बचाता है। खुद को भी और दूसरों को भी। इसी तरह दूसरों से ज्यादा अपेक्षा करना गुलामी है। आत्म उत्थान के लिए दूसरों पर ‍िनर्भर न रहना, अपने गुणों के साथ ही अपनी गलतियों की भी ‍िजम्मेदारी लेना असली आजादी है।

मगर अनासक्त होने का मतलब अप्रासंगिक होना भी नहीं है। मान लीजिए बेचने वाले सज्जन गाड़ी के प्रति 'अब वह दूसरे की चीज है' मानकर अनासक्ति धर चुके होते, इस बीच गाड़ी खरीदने वाला युवक किसी ‍िदन बीमार हो जाता तो अनासक्ति धर लेने वाले सज्जन यह नहीं कह सकते थे ‍िक भई अब मैं गाड़ी को हाथ नहीं लगाऊँगा, युवक जाने युवक का काम जाने। उचित होगा ‍िक ऐसे में वे स्वयं ड्राइव करके युवक को अस्पताल ले जाएँ।

दुनिया में किसी की भी मर्जी से चाँद और सूरज नहीं उगते। न हर चीज पर हम अधिकार जता सकते हैं, न दूसरों का अपनी मर्ची से चला सकते हैं। ऐसे में कई स्थितियों के प्रति स्वयं को अनासक्त करना उचित होता है, परंतु अनासक्त होने का मतलब न तो अप्रासंगिक होना है, न ही गैर जिम्मेदार होना है। अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता बनी रहे, परंतु आप मोहांध न हों, यह संतुलन साधना बाजीगरी है। एक ऐसी बाजीगरी, जो ताउम्र साथ देती है।

- निर्मला भुराड़िया

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

सीधा चुनो या उल्टा तुम्हारी मर्जी!

बच्चे छोटो और नन्हे जरूर होते हैं, मगर आधे-अधूरे नहीं होते। छोटा बच्चा भी एक सम्पूर्ण इंसान होता है। अपनी आवश्यकताओं के लिए जरूर वह बड़ों पर ‍िनर्भर होता है, अनुभवहीनता के चलते वह दुनियादारी की समझ भी बड़ों को देखकर ही विकसित करता है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि एक बच्चा चाबी वाला गुड्‍डा या गुड़िया होता है। हमारे यहाँ बच्चों को अमूमन ऐसा ही समझा जाता है। वह भी यह कहकर कि यह सब उसकी भलाई के लिए ही तो है। लिहाजा बच्चों को सुधार-सुधारकर दुनियादार बनाने का क्रम हर वक्त जारी रहता है, यह बात समझे बगैर कि जिन बातों को हम अनुशासन और मार्गदर्शन का नाम दे रहे हैं, मनोविज्ञान के स्तर पर कहीं वह कठोरता, दबाव और कैद तो नहीं? माँ-बाप तो छोड़िए पड़ोसी तक बच्चों को तथाकथित रूप से सुधारने की फिक्र में रहते हैं। ऐसा ही एक किस्सा है। एक बच्ची शाम को पड़ोसन के घर पढ़ने जाती थी। दो-चार दिन में ही पड़ोसन आई और बच्ची की माँ से कहने लगी 'अरे आपने कभी ध्यान नहीं ‍िदया आपकी बच्ची तो उल्टे हाथ से लिखती है। मार-मार के शुरू में ही छुड़ा दो, नहीं तो गलत आदत पड़ जाएगी।'

यह हमने कैसे तय कर लिया कि सीधे हाथ से ही लिखना सही है? यह थोड़ा देखा-देखी वाला मामला है। दुनिया में अधिक प्रतिशत लोग सीधे हाथ से काम करते हैं इसलिए यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सीधे हाथ से काम करना ही सही है और लिखने आदि के लिए उल्टा हाथ वापरना गलत। व्यक्ति राइट हैंडर होगा या लैफ्ट हैंडर यह प्रकृति तय करती है।

मस्तिष्क का बायाँ गोलार्द्ध शरीर के सीधे तरफ के हिस्से को संचालित करता है अत: जिनका डॉमिनेंट हाथ सीधा होता है वे सीधे हाथ से सब काम करते हैं। यहाँ तक कि उनकी दाँईं आँख, दायाँ पाँव, दायाँ कान भी ज्याद तेज होता है। जिन लोगों के मस्तिष्क का दायाँ गोलार्द्ध अधिक सक्रिय होता है उनके शरीर के बाएँ हिस्से अधिक संचालित होते हैं। कुछ लोग क्रॉस वायर्ड भी होते हैं। उनके दोनों गोलार्द्ध सक्रिय होते हैं। ऐसे लोग सीधे हाथ से लिखते हो तो फोन उल्टे कान से सुनते हैं या खाना दाढ़ के उल्टी तरफ से चबाते हैं। इन लोगों को दाएँ-बाएँ में बहुत गफलत होती है। इसका मतलब यह नहीं कि यह लोग नाकारा होते हैं। बल्कि यह कि इन लोगों में मस्तिष्क की कई पगडंडियाँ और रास्ते काम कर रहे होते हैं, जो शायद दूसरों में सोए पड़े हों। अत: इनमें कई गजब के प्रतिभाशाली भी निकलते हैं।

कहने का तात्पर्य यही कि हमारी सामाजिकता नहीं हमारे दिमाग की व्यक्तिगत कार्यप्रणाली यह तय करती है कि कोई व्यक्ति राइट लेटरेलिटी वाला होगा, लेफ्ट लेटरेलिटी वाला या क्रॉस वायर्ड। ऐसे में अपने बनाए कायदे थोपने और बच्चे को तरीका बदलने पर मजबूर करने पर बच्चे का दिमाग उलझन में फँस सकता है या अच्छा-भला बच्चा दब्बू बन सकता है। यही नहीं हमारी अतार्किक कठोरता दुनिया को किसी लियोनार्डों दा विंची या आइंस्टिन से वंचित कर सकती है।

- निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

नो डिप्रेशन: हटाइए अवसाद का अंधेरा - भाग 3

अवसाद से उबरने लगें या उबर चुकें तब

* संतुलित, पौष्टिक, नियमित भोजन लें।
* शराब, सिगरेट, तंबाकू, पान-मसाला त्याग दें।
* शक्कर और चाय-कॉफी में कटौती करें।
* नियमित व्यायाम, सैर करें। तेज गति से पैदल चलें।
* ध्यान, प्राणायाम जैसी रिलेक्सेशन तकनीक अपनाएँ।
* अपने-आपको शारीरिक व मानसिक रूप से व्यस्त रखें।
* पौधों की निराई-गुड़ाई या घर के फर्नीचर की सफाई जैसे शारीरिक कार्य करें। खेलों में रुचि हो तो फुटबॉल, बैडमिंटन, क्रिकेट इत्यादि खेलें। चाहें तो बच्चों के साथ गिल्ली-डंडा ही खेलें। कोई आपको व्यावसायिक परफॉरमेंस की ‍चिंता तो करना नहीं है। यह शारीरिक-मानसिक व्यस्तता न सिर्फ आपका मनोरंजन करेगी, बल्कि आपको जिंदगी में 'हिलगाए' रखेगी। आपके खुशी के हारमोंस का स्तर भी बढ़ाएगी।
* अपना हास्यबोध कायम रखें। आपके जीवन के बड़े वाले तनाव कौन-से हैं, उन्हें सुझाव के द्वारा स्वयं को समझाएँ कि जीवन का यह भी एक पक्ष है।
* अपनी बॉडी क्लॉक या शरीर की घड़ी को डिस्टर्ब न करें। बिना बात देर तक जागने, सरे-शाम सो जाने आदि आ‍दतों से बचें। रात को नियत समय पर सो जाएँ। सुबह-सवेरे नियत समय पर उठें, पर नींद में कटौती न करें। ऐसा चार्ट बनाएँ कि सही समय पर सोने-उठने में ही आपकी कम से कम सात-आठ घंटे की नींद पूरी हो जाए। नींद को नियमित और पूरी रखने से आपके मिलेनिन नामक हारमोन का चक्र दुरुस्त रहेगा, जैविक घड़ी ठीक रहेगी, इससे सामान्य स्वास्थ्य और स्वाभाविक प्रसन्नता बनी रहेगी।

अवसादग्रस्त को परिजनों की सहायता-
* मरीज की मन:स्थिति समझने का प्रयास करें। उसे उसकी स्थिति के बारे में ताने न मारें। न धिक्कारें, न खिल्ली उड़ाएँ। वस्तुस्थिति समझकर अपने वैज्ञानिक सोच का परिचय दें।
* मरीज के प्रति नरम रुख रखें, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार रखें। उसके प्रति कठोरता, कटुता न बरतें। यह समझें कि अभी वह सामान्य स्थिति में नहीं है।
* यह मरीज को उसकी कमियाँ गिनाने का समय नहीं है। उसका आत्मसम्मान बढ़ाने और हीनताबोध से ‍िनकलने में उसकी मदद करें।
* यह समझें कि बीमार होने में उसकी कोई गलती नहीं है। उसे कोसें नहीं। उसकी नकारात्मकता की तात्कालिक है, यह समझें। हालाँकि यह सब आपके धैर्य की परीक्षा है। पर यह ध्यान रहे। आपका धीरज ही उसका इलाज है, आप तो सामान्य अवस्था में हैं, उसे दोष देकर उसकी ग्लानि न बढ़ाएँ।
* उसे किसी मनोचिकित्सक को ‍िदखाएँ। मनोचिकित्सक के पास जाने में ‍िझझकें नहीं। मरीज ‍चिकित्सा के ‍िलए तैयार न हो तो उसे बहला-फुसलाकर इलाज हेतु तैयार करें। उसके द्वारा दवा फेंक देने की आशंका हो तो अपने हाथ से दवा दें।
* घर का वातावरण हलका-फुलका, आनंदमय बनाने की कोशिश करें। मरीज के साथ कैरम आदि जैसे मनोरंजक खेल खेलें। उसे पिकनिक पर ले जाएँ। हो सके तो किसी हिल स्टेशन आदि की यात्रा भी की जा सकती है, ताकि उसके आसपास का माहौल कुछ समय के लिए बदल जाए। इससे नीरस जीवन के साथ ही ‍िदमाग का भी थोड़ा ट्रैक बदलेगा। मरीज कुछ समय को ही सही, निर्जीव-नकारात्मक निराशा से उबरेगा।

क्यों जरूरी है दवाइयाँ-
अवसाद की बीमारी एक शारीरिक-परिवर्तन ही है और एंटी डिप्रेसेंट दवाइयाँ मरीज के शरीर में रसायनों के कम हुए स्तर को पुन: दुरुस्त करती हैं। हाँ यह दवाइयाँ थोड़ा धीरे-धीरे प्रभाव करती हैं। मगर तीन-एक हफ्ते में इनका असर नजर आने लगता है। ये दवाइयाँ लेना बहुत जरूरी है। मगर ‍किसी ‍िचकित्सक की देखरेख में।
चिकित्सक दवाइयों के अलावा अन्य थैरापी भी करते हैं। जैसे 'साइकोथैरापी', जिसमें मरीज का 'मनोविश्लेषण किया जाता है। उसकी कठिनाइयों को, उसके उलझ गए धागों को समझा-सुलझाया जाता है। 'कॉगनीटिव थैरापी', जिसमें जीवन के प्रति मरीज के नजरिये, उसकी भावनाओं को समझा जाता है। 'बिहेवियर थैरापी', जिसमें मरीज के व्यवहार को सकारात्मक ‍िदशा में मोड़ा जाता है। 'इंटरपर्सनल थैरापी', जिसमें यह समझा जाता है कि मरीज की परेशानी कहीं ‍िकसी रिश्ते में दरार की वजह से तो नहीं। तब चिकित्सक परामर्शदाता द्वारा उस रिश्ते में पुल बनाने की पहल और प्रयास किया जाता है। 'फैमिली थैरापी', मरीज के परिवार की मदद ली जाती है। यह सब बहुत-से परीक्षणों के बाद तैयार, बेहद वैज्ञानिक प्रविधियाँ हैं, मगर इनका लाभ लेना तो तभी संभव है न कि जब आप चिकित्सक से सम्पर्क करें।

'कोई होता जिसको अपना, हम अपना कह लेते यारों। पास नहीं तो दूर ही होता, लेकिन कोई मेरा अपना।' शायर गुलजार का यह फिल्मी गीत है। यह बिल्कुल सटीक है। जीवन में हर व्यक्ति को भावनात्मक आधार चाहिए। जिनके पास परिवारजों और ‍िरश्तों का सपोर्ट सिस्टम नहीं होता, उनके अवसाद में जाने के ज्यादा आसार होते हैं। किसी से घनिष्ठता, किसी से खुलकर अपनी बात कह पाने की सुविधा शॉक एब्जॉरवर का काम करती है। अत: अपनों से सम्पर्क रखें। लगाव रखने की क्षमता वाले मित्र बनाएँ। कभी मित्रों से ‍िदल की बात करें, फोन लगाएँ, घूमे-फिरे, मिले-जुलें, अच्छा व्यवहार करें, बदले में अच्छा व्यवहार पाएँ। इससे मन हलका रहेगा।
साथ ही मेडिकल चिकित्सा भी जरूरी है, क्योंकि डिप्रेशन मस्तिष्क में एड्रेनलीन और सिरोटॉनिन जैसे रसायनों की कमी से होता है, जिनके जरिये मस्तिष्क की कोशिकाएँ आपस में बात करती है। अवसादरोधी दवाइयों एवं चिकित्सक द्वारा सुझाई गई अन्य दवाइयाँ उपरोक्त रसायनों का संतुलन पुन: स्थापित करती हैं। अत: चिकित्सक के मार्गदर्शन में इन्हें लेने में ‍िझझक कैसी?

(समाप्त)

- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 10 नवंबर 2010

नो डिप्रेशन: हटाइए अवसाद का अंधेरा - भाग 2

मेजर डिप्रेशन या यूनीपोलर डिप्रेशन
इसमें व्यक्ति की अवस्था के बिगड़ने के लक्षण बहुत गंभीर होते हैं। यह कुछ महीनों या सालभर तक चल सकता है। अवसाद के ये दौरे जिंदगी में और कई बार भी आ सकते हैं। इसमें कुछ लोग तो अपने-आपको औरों से काट लेते हैं। मगर कुछ विध्वंसात्मक, चिड़चिड़े, बुरा व्यवहार करने वाले हो जाते हैं और वे ये कतई नहीं समझ पाते ‍िक वे नकारात्मक व्यवहार कर रहे हैं।

क्रॉनिक डिप्रेशन : इसे dysthymia भी कहा जाता है। यह थोड़ा हलका अवसाद होता है। मगर यह सालों तक चल सकता है। ऐसे व्यक्ति नाखुश रहते हैं। जीवन का आनंद उठाने के बजाय चिड़चिड़े हो जाते हैं। ये कभी भी मेजर डिप्रेशन में जा सकते हैं।

एटिपिकल ‍िडप्रेशन : इस डिप्रेशन को पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है, क्योंकि इससे घिरे व्यक्ति कभी-कभी खुश भी होते हैं। मगर ये जीवन के सामान्य व्यवहारों की अति भी कर सकते हैं। जैसे निरंतर खाते रहना, खूब ज्यादा सोना, अच्छा-खासा वजन बढ़ाना इत्यादि।

reactive, neurotic या psychotic depression में भी फर्क होता है। reactive depression भावनात्मक तनाव का परिणाम हो सकता है। neurotic depression शब्द का सामान्यतया इस्तेमाल ऐसे समय किया जाता है, जब तनाव या घटना के अनुपात में व्यक्ति की अवसादी प्रतिक्रिया काफी अधिक हो। इसमें ऐसा भी हो सकता है कि पूर्व में हुई या दबाई गई भावनात्मक पीड़ा की प्रतिक्रिया बाद में हो। मगर इनमें सबसे गंभीर psychotic depression माना जा सकता है, क्योंकि इसका कोई खास बाहरी करण नहीं ‍िदखाई देता। कई बार ‍िजंदगी में ‍िमले-जुले दबावों से भी अवसाद हो सकता है, जिसमें भावनात्मक तनाव, शारीरिक बीमारी या शरीर में हार्मोन परिवर्तन की वजह से अवसाद हो सकता है।

अवसादग्रस्त व्यक्ति स्वयं की मदद कैसे करें?
* परिजन इलाज की पहल करें तो उसे न ठुकराइए। स्वयं ही ‍िचकित्सकीय सहायता लेने का सोचा है तो मनोचिकित्सक के पास जाने में न शर्माएँ। इलाज अवश्य कराएँ।
* मन में यह ग्लानि न रखें ‍िक आपकी बीमारी कोई कमजोरी या कलंक है। किसी भी अन्य बीमारी की तरह यह भी ‍िबन बुलाए आ धमकती है। इसमें आपकी कोई गलती नहीं है।
* दवा ठीक वक्त पर बराबर लें। उसे फेंके या छुपाएँ नहीं।

थोड़ा सुधार होने पर
* लम्बे समय तक अकेले न रहें।
* नई रुचियाँ विकसित करने का प्रयास करें पुरानी रुचियों को सँवारने, ‍िनखारने का प्रयास करें, ताकि जिंदगी में चाव पैदा हो।
* अपने व्यक्तित्व की खूबियों पर भी कभी गौर करें। पीछे मुड़कर अपनी किन्हीं खुशियाँ, किन्हीं उपलब्धियों पर भी नजर डालें। चाहे वे छोटी हों या बड़ी।
* आपको नीचा दिखाने वाले, आप पर नकारात्मक टिप्पणी करने वालों से दूर रहें। अगर यह संभव न हो (जो कि अधिकांश मामलों में संभव नहीं होता) तो ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान न ‍दें। उनकी टिप्पणियों को नजर अंदाज करें।
* छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित करें, रोजमर्रा की छोटी-छोटी क्रियाओं में संलग्न होकर मन लगाने का प्रयास करें।
* दिन व्यतीत करने का सुव्यवस्थित टाइमटेबल बना लें, ‍िजसमें नहाने, खाने आदि का भी वक्त नियत हो, ताकि इच्छा न होते हुए भी आप अपने को खींचकर उठा लें और एक चक्र चल पड़े, भले कम गति से ही सही।
* सुबह टहलें, व्यायाम करें, बाहर निकलकर सूर्योदय, सूर्यास्त देखें। शाम को आसपास के बाग-बगीचे, मंदिर आदि में हो आएँ। (चाहें तो ‍िकसी को साथ लेकर) बच्चों को खेलते हुए देखें। छोटे बच्चों को खिलाएँ। सुबह पंछियों को दाना चुगाएँ।
* पुस्तकें पढ़ें, परन्तु भारी-भरकम फिलॉसफी वाली नहीं, न जीवन से विमुख करने वाली, जीवन को व्यर्थ बतानेवाली गहन आध्यात्मिक पुस्तकें, न ही दु:ख व निराशा व बोझिलता बढ़ाने वाली पुस्तकें। सकारात्मक विचारों को जगाने वाली, सरल उदाहरणों से बात समझाने वाली सरल, सादा ‍िकताबें पढ़ें। हँसी-मजाक के प्रसंग इत्यादि भी पढ़ सकते हैं।
* टीवी पर रुलाई-धुलाई वाली कहानियाँ, दुरभिसंधियों, षड्‍यंत्रों वाले धारावाहिक देखकर अपने मन को और न उलझाएँ।
* खुद को बताते रहें कि सब समय-समय की बात है। जीवन का यह दौर भी गुजर जाएगा।

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

नो डिप्रेशन: हटाइए अवसाद का अंधेरा

हममें से सभी कभी न कभी, किसी-किसी दिन खराब मूड में रहते हैं। जिंदगी है तो सुख-दुःख भी आता-जाता है। दुःखी होना किसी बुरी घटना का प्रभाव भी हो सकता है। आप "हैप्पी गो लकी' या खुशनुमा टाइप के हैं तो कभी-कभार आप बुझा हुआ-सा महसूस कर सकते हैं और आप सदा-विलापी या कुड़-कुड़ टाइप के हैं तो भी कोई न कोई बात तो आपको खुशी देती होगी। आप दोनों में से किसी प्रकार के भी हों, पर कभी-कभी उदासी भी आती होगी। मगर यह उदासी इतनी ठहर जाए कि व्यक्ति बिलकुल "निरानंद' या anhedonic हो जाएं। बोलना, गाना, फूल, चिड़िया, बच्चे या किसी चीज में उसकी रुचि न रहे। यहां तक कि पहले जिन चीजों में उसकी रुचि रही हो वे भी उसका मन न बहला पाएं। यहां तक कि सुबह बिस्तर से उठने का भी उसका मन न करे। मगर रात में नींद न आए। उसके नियमित कार्य भी ठप हो जाएं, क्योंकि उसमें ऑफिस जाना या घर की जिम्मेदारियां निबटाना तो दूर नहाने आदि की ही ऊर्जा नहीं बची है। तो यह अवसाद या डिप्रेशन हो सकता है।

डिप्रेशन के अन्य लक्षणों में हैं -
एकाग्रता की कमी, हीनभावना हो जाना, बेवजह ग्लानि महसूस होना, अपने आपको बिना कारण दोषी समझना, रुलाई आते रहना, छोटे-मोटे निर्णय तक लेेने की क्षमता खत्म हो जाना (जैसे कि दो में से कौन सी शर्ट पहनना है), वजन में अचानक कमी या बढ़ौतरी, भूख का खत्म हो जाना, बिना बात चिंतित और व्यग्र रहना, जीवन के प्रति किसी भी आशा का समाप्त हो जाना, बार-बार आत्महत्या के विचार मन में आना, बुरा-बुरा -सा लगना, सब कुछ उलटा सोचना, व्यर्थ महसूस होना, शरीर में जान ही नहीं ऐसा लगना। छोटी-छोटी बातों में गफलत होना या भूल जाना, आशा का समाप्त हो जाना, बार-बार आत्महत्या के विचार मन में आना इत्यादि। इसके साथ ही कई शारीरिक परेशानियां भी हो सकती हैं, क्योंकि डिप्रेशन एक साइकोसोमेटिक या मनोशारीरिक परिस्थिति है। इसलिए डिप्रेशन की अवस्था में बदन दर्द, पीठ दर्द, पेट की गड़बड़ियां हो सकती हैं। बढ़ी हुई धड़कन, तेज घबराहट महसूस हो सकती हैं, परंतु डिप्रेशन को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि इसका कोई ब्लड टेस्ट नहीं है या कोई थर्मामीटर नहीं है, जो यह बता दे कि व्यक्ति को डिप्रेशन है।

यहां तक कि घबराहट और धड़कन भी महसूस होगी, हृदय परीक्षण में नहीं आएगी। फिर भी यह रोग वास्तविक है, जिसे लक्षणों के जरिए आराम से चिह्नित किया जा सकता है। चिह्नित किए जाने के बाद इसका इलाज भी किया जा सकता है। या यूं कहे इलाज किया ही जाना चाहिए। इसे अनुपचारित नहीं छोड़ा जाना चाहिए। मगर डिप्रेशन की पहचान और इसके इलाज में सबसे बड़ी अड़चन है शरीर विज्ञान के प्रति अज्ञान, डिप्रेशन को कलंक मानने और छुपाकर रखने की वृत्ति, जबकि अवसाद एक जैविक शारीरिक स्थिति है, जो जैव रसायनों के स्तर के उठते-गिरने से संबंधित है। अतः जैसे बुखार में रोगी का दोष नहीं, वैसे ही अवसाद पर भी उसका जोर नहीं। इसे इच्छाशक्ति की कमी या व्यर्ंिक्त की कमजोरी मानना गलत होगा। हां इस रोग से बाहर निकलने में जरूर इच्छाशक्ति की जरूरत पड़ेगी। जैसे कि किसी भी बीमारी से लड़ने के लिए पड़ती है, बल्कि इसमें समाज और परिवार की इच्छाशक्ति और सदाशयता की भी जरूरत पड़ेगी, क्योंकि रोगी आपे में नहीं है। उसकी यह निश्र्चिंतता और अनमनापन उसके रोग का ही एक लक्षण मात्र है, उसकी कमजोरी नहीं। वैसे भी इच्छाशक्ति के बल पर उम्मीदें की जा सकती हैं। इच्छाशक्ति के बलबूते चुनौतियों ली जा सकती हैं, मगर जैव रसायन का संतुलन वाली शारीरिक स्थिति सुधारने के लिए सिर्फ भावनाएं नहीं, ठोस इलाज और औषधियां चाहिए, जो कि रोग को छुपाने से नहीं हो सकता।

जो यह सोचते हैं कि "अवसाद' होना शर्म की बात है या दिमागी कमजोरी, भावनात्मक दुर्बलता आदि की निशानी है, उन्हें यह ध्यान दिलाना होगा कि दुनिया के सबसे स्मार्ट, सबसे बेहतरीन, सबसे ज्यादा रणनीतिक और सबसे ज्यादा सृजनात्मक दिमागों का भी अवसाद से पाला पड़ चुका है। अब्राहम लिंकन और विंसटन चर्चिल जैसे संघर्षशील, चुनौतियों का मुकाबला करने की अपार शक्ति वाले राजनीतिज्ञ यदि डिप्रेशन के शिकार हुए तो वर्जीनिया वुल्फ, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, वॉन गॉग पाल जैसे सृजनशील लोगों पर भी अवसाद का आक्रमण हुआ। कहने का तात्पर्य यही कि इसे दिमागी या व्यक्तित्व की कमजोरी समझकर दबाया-छुपाया न जाए। रोगी की खिल्ली भी कदापि न उड़ाई जाए, बल्कि अन्य किसी भी बीमारी की तरह इसका सामना किया जाए, अन्यथा रोगी निर्जीव होने की हद तक निराशा की गर्त में जा सकता है या आत्महत्या भी कर सकता है, जो कि वह कहत रहता है तो कोरी धमकी समझकर खारिज कर दिया जाता है।

क्यों होता है डिप्रेशन
किसी का बिछड़ना, किसी की मृत्यु, रिश्तों का टूटना, पीड़ाजनक बचपन की स्मृतियां, भय या दबाव में जिंदगी गुजारना आदि दुःख अवसाद को उभाड़ सकते हैं। वंशानुगत रूप से भी व्यक्ति अवसाद के प्रति संवेदनशील हो सकता है। महिलाओं में मेनुपॉज, प्रसूति पश्र्चात इत्यादि स्थितियों में हारमोन संबंधी गड़बड़ियों से भी डिप्रेशन हो सकता है। ये हारमोनल डिप्रेशन की विशिष्ट स्थितियां हैं, जो इतनी आम हैं कि इनके नामकरण भी हैं। जैसे प्रसूति पश्र्चात के डिप्रेशन को पोस्ट पार्टम (post-partum) डिप्रेशन कहा जाता है। बायोकेमिकली डिप्रेशन न्यूरोट्रांसमीटर्स के स्तर की गड़बड़ियों से होता है। यह क्लिनिकल डिप्रेशन ही होगा। इसे ठीक उसी तरह देखना-समझना होगा, जैसे मधुमेह की तरह की हारमोनल बीमारियां।

कई प्रकार हैं डिप्रेशन के -
बायपोलर या मोनिक डिप्रेशन - इस तरह का डिप्रेशन चक्र में आता है। एक बार हारमोन का स्तर बहुत ऊंचा होता है तो दूसरी बार यह एकदम नीचे चला जाता है। यह वैकल्पिक होता है। जब हारमोंस का स्तर ऊंचा होता है, तब व्यक्ति अपने आपको सामान्य से बहुत ज्यादा ऊर्जावान महसूस करता है और जब हारमोन्स का स्तर नीचे जाता है तो बिलकुल नीचे चला जाता है और व्यक्ति सुस्ती, अनमनेपन और निराशा के फेज में चला जाता है। हारमोन स्तर के छलांग लगाने पर यदि ऐसा व्यक्ति सृजनात्मक है तो अपरिमित ऊर्जा के साथ अद्भुत सृजनात्मकता को अंजाम देता है। यह क्रॉनिक हाइपोमेनिया की स्थिति होती है, जो कि अक्सर सामान्य व्यक्ति के बजाय बेहदत बुद्धिमान व्यक्ति को होती है। बस इसमें खतरा यह है कि हारमोन स्तर नीचे आने पर यहीं अति सक्रिय, अति सृजनात्मक व्यक्ति अवसाद से घिर जाता है।

क्रमश:

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

लौट चलें अब प्रकृति के पास

घर के बाहर बिल्व वृक्ष है। शहरों, कस्बों यहाँ तक कि गाँवों में भी फलदार पेड़ों की संख्या इतनी कम हो गई है कि यह पेड़ हर गुजरते राही के लिए आकर्षण का केन्द्र है। गर्मियों में जब यह पेड़ पके सुनहरे बिल्व फलों अथवा ‍िबल्लों से लदा होता है तब तो इसकी छटा ‍िनराली ही होती है। वह गर्मी की एक शाम थी। कॉलोनी में पानी का सरकारी टैंकर अभी-अभी अफरा-तफरी मचा कर गया था। पानी की हायतौबा और खाली बालटियों की सखी टंकार ने हम लोगों की एक टोली को चर्चा का सूत्र थमा ‍िदया। पर्यावरण प्रेमी मित्रों के बीच बहस होने लगी, रीतते जलस्रोतों पर, धरती के गर्म होने पर पर्यावरण का नाजुक संतुलन ‍िबगड़ने पर। इस तरह के मसलों पर सुझाव देने और दोष मढ़ने दोनों का ही सिलसिला जारी था कि बहस कर रहे अतिथियों के साथ आया एक नन्हा बच्चा, जो अब तक आँगन में खेल रहा था, बड़ा उत्साहित हो भीतर दौड़ता हुआ आया और अपने पिता को बताने लगा, 'देखो पापा, यहाँ तो गेंद का पेड़ है, पेड़ पर कितनी सारी बॉल्स लगी हैं।' बच्चे के इस भोलेपन पर सब हँसने लगे तो वह शरमाकर बाहर चला गया। उसका आशय बिल्व पत्र से था। मगर बच्चे की बात ने एक ही बात याद दिला दी।

सत्तर-अस्सी के दशक तक के बच्चों के लिए खिलौने सचमुच पेड़ों पर लगते थे और वे खिलौने बैटरी से नहीं, कल्पनाशक्ति से चलते थे। यही नहीं, उस पूरी जीवनशैली में बहुत कुछ ऐसा था, जो बाद के दशकों में एंटी-मॉर्डन कहकर नकार दिया गया। मगर आज फिर सादगीपूर्ण एवं पर्यावरण सम्मत जीवनशैली की जरूरत महसूस की जाने लगी है। मोटा खाओ, मोटा पहनो, प्रकृति का सान्निध्य प्राप्त करो। हवा और धूप की बिजली बनाओ। चिड़ियाओं को बचाओ, साइकल चलाओ आदि नारे लगने लगे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में एक नजर पीछे डालें तो काफी ‍िनकट के अतीत में प्रकृति से करीबी, पर्यावरण रक्षा और सादगी के सूत्र ‍िमल जाएँगे।

साठ-सत्तर के दशक की स्कूली बच्चियाँ कनेर के फलों से खेला कारती थीं। वे 'पाँचे' कहलाते थे। कनेर के फल तोड़ने पर पतली लकड़ी जैसी पीली-सी सख्त गिरी ‍िनकला करती थी। इन गिरियों को लड़कियाँ इकट्‍ठा कर लेती थीं। इससे उन्होंने जो खेल रचा था वह किसी ब्रेन-जिम से कम नहीं था। पाँचे जमीन पर बिखेरना, एक हाथ से पाँचा उछालना, दूसरे से जमीन पर थपकी देना फिर हर पारी में मुट्‍ठी के पाँचों की संख्या बढ़ाते चलना। इसमें काफी एकाग्रता, फुर्ती, दृष्टि संतुलन, मुट्‍ठियाँ संभालने की दक्षता की जरूरत होती थी। पाँचे खेलती लड़कियों को हँसी भी बहुत आती थी, क्योंकि दक्षता की जरूरत के बावजूद क्लबों वाली औपचारिकता की वहाँ कोई जगह नहीं थी। मुफ्त के पाँचे, मुफ्त की ठिठौली। न किसी का अहसान चढ़े, न किसी का धन लगे। न धूल-धुआँ, न बिजली-बैटरी की जरूरत है।

इसी तरह इमली के बीच जिन्हें मालवी में 'चीँ' कहा जाता है, इन चींओं का भी बहुत मजेदार चौसर बनता था। घर के बाहर के ओटलों (चबूतरों) पर बच्चे चॉक या पेम से चौखाना खाका बनाते और उस पर चीओं की मोहरें रखकर बड़ा बुद्धिमत्तापूर्ण एक खेल 'अष्ट चें पे' खेलते थे। यह स्थानीय चौसर की ऐसी बिसात थी जिसे कहीं भी खींच लो, कभी भी मिटा दो। न प्रकृति को खतरा, न जेब पर वजन। आम की गुठली से बबूल के काँटे तक प्रकृति से जुड़ी हर चीज इन बच्चों की कल्पनाशक्ति के ‍िनशाने पर होती थी।

इन दिनों प्लास्टिक द्वारा पर्यावरण बिगड़ने का बड़ा शोर है। मगर धरती को कचराघर बनाने वाला यह प्लास्टिक सिर्फ फैक्टरियों से ही नहीं निकला है, हमारी बदली हुई जीवनशैली से भी निकला है। आज लाख अपीलें की जाएँ या उपदेश दिए जाएँ कि कागज की थैली का उपयोग करें, मगर प्लास्टिक लोगों को आसान लगती है। यह आदत में शुमार हो गई है। ऐसे में याद कीजिए उस जमाने के बाबूजी लोगों की कपड़े की वह थैली। वह थैली थी कि जादूगरी। तहों पर तहें करके छोटी-सी बना ली जाती और जेब में डाल ली जाती। सुबह नियम से खाली थैली जेब में लेकर ‍िनकले बाबूजी शाम को थैली में कुछ न कुछ भरकर ही लौटते। फल, सब्जी, जामुन, खिरनी, गजक या घर का सौदा कुछ भी। थैली वही, समान सदा अलग। सप्ताहांत में थैली धुल जाती, इस्तिरी कर ली जाती। थस तरह रोज-रोज हर सामान के लिए प्लास्टिक की थैली की जरूरत नहीं थी। कपड़ा पर्यावरण मित्र ही था। मगर धीरे-धीरे उस थैली से लोगों को गँवारूपन की बू आने लगी। वे इस थैली पर हँसने लगे और यह मित्र थैली गायब हो गई। इसकी जगह प्लास्टिक की चिकनी थैलियों ने ले ली। ये पर्यावरण को बिगाड़ने लगीं, मगर इसकी फूहड़ता पर कभी कोई नहीं हँसा ! उलटे उसकी पैरवी में तरह-तरह की दलीलें दी जाने लगीं।

इसी तरह एक और पर्यावरण मित्र प्रथा याद आती है, वह है पत्तलों में भोजन। ये पत्तों की बनी वे थाली-कटोरियाँ हैं, जो बायोडिग्रेडेबल है। खाओ और फेंक दो। मिट्‍टी में घुल-मिल जाएगी। आजकल भारत में शादी-ब्याह में ‍िजस गंदगी से प्लेटें मंजती-धुलती हैं और कीटाणु फैलाती हैं उसे देखते हुए 'यूज एंड थ्रो' पत्तलें अच्छी थीं। मगर जाने क्यों ये अच्छी भली पत्तलें तक एक दिन के आयोजनों से बाहर ठेल दी गईं। इन दोनों-पत्तलों जगह टेंट हाउस वालों की प्लेटें और प्लास्टिक की यूज एंड थ्रो प्लेटें आ गईं।

अभी-अभी विदेश में होने वाले एक फैशन शो के बारे में जानकारी मिली कि यह ऑर्गेनिक वस्त्रों का फैशन शो है। इसमें शुद्ध कपास से बने और वेजिटेबल डाई से रंगे कपड़े होंगे। रैंप पर खादी टाइप के भी कई शो हमारे यहाँ भी हो चुके हैं। इन दिनों फिल्मी सितारे जुवार, बाजरे, मोटे आटे की रोटी, ब्राउन राइस, ब्राउन ब्रेड खाते हैं। अपने फार्म हाउस में लोग ऑर्गेनिक उत्पाद उगाते हैं। धूप खाने समुद्र किनारे के पर्यटन स्थलों पर जाते हैं। पता नहीं तपती धरती ने प्रकृति की महिमा समझा दी है या पर्यवरण प्रेम जताना फैशन हो गया है, मगर जो भी हो जीवनशैली में पर्यावरण की रक्षा और प्रकृति से नजदीकी शामिल करना आज समय की माँग है। इस समय में जब सादगी सबसे बड़ा आडंबर बन कई हो, सचमुच की सादगी करना सचमुच बुद्धिमानी की बात होगी।

- निर्मला भुराड़िया

रविवार, 31 अक्तूबर 2010

हम-तुम ?

दुनिया में तरह-तरह के मनुषय हैं। तरह-तरह की आस्थाएँ। और हर एक मनुष्य का यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह जिसमें चाहे उसमें आस्था रखे और जिस भी चीज में आस्था रखे, उसे बेधड़क अपनाए। अपनी पूर्ण स्वतंत्रता से अपनी व्यक्तिगत आस्था का पालन कर पाए। जाहिर है दुनिया में कई तरह के धर्म हैं और आस्थाओं के अपने-अपने अलग केन्द्र भी। धर्म की तरह ही विभिन्न मनुष्यों की सामाजिकताएँ भी भिन्न हैं। अपने तरीके की सामाजिकता को ‍िनभाया जा सके संभवत: इसलिए मनुष्यों ने इन्हें अलग-अलग समाजों की इकाई में भी बाँटा होगा, ताकि हर छोटी इकाई को सुचारु रूप से चलाया जाए तो कुल मिलाकर वृहद मनुष्य समाज को व्यवस्थितता प्राप्त हो। परन्तु काल के प्रवाह में ऐसी व्यवस्थाओं का मूल भाव हमेशा खो जाता है। नतीजा, जो बात सुचारुपन के ‍िलए सोची गई थी वह संकीर्णता की जनक बन गई। आज आलम यह है कि धर्म और जातिवाचक संघों की बाढ़ सी आ गई है। फलाँ जाति महासभा का आज ये कार्यक्रम, फलाँ संघ के प्रतिभाशाली (?) बच्चों का स्वागत, फलाँ जाति के लोग अपनी जाति के ही निर्धनों को (कैमरे के सामने) फलाँ सहायता दे रहे हैं- वगैरह। हाल ही में एक नाम पढ़ा 'अ.भा. फलाँ जाति पत्रकार महासंघ'। यानी उनके सम्मेलन में उस जाति विशेष के पत्रकार इकट्‍ठे होंगे! जो संघ व्यवसाय के आधार पर बनना चाहिए उसे जाति के आधार पर कैसे बाँटा जा सकता है? चुनाव की राजनीति ने इस जातिवाद को और बढ़ाया है। इससे मनुष्य समाज सुचारु इकाइयों में नहीं, टुकड़ों-टुकड़ों में बँटा है। वह भी लड़ाकू, स्वार्थी और संकीर्ण टुकड़ों में। हमारे धर्मों और आस्थाओं के साथ भी कमोबेश यही हुआ है।

जो भी व्यक्ति यह विश्वास करता है ‍िक इस अखिल ब्रह्मांड का संचालन करने वाली कोई सर्वोच्च सत्ता है वह उसे ईश्वर कहे, खुदा कहे या गॉड कहे- लक्ष्य सबका एक ही है बस नाम अलग हैं। मगर मुर्ख मनुष्य इन पवित्र लक्ष्यों के नाम पर भी लड़ता है और नाम देता है उसे 'धर्म' का! और बात जब हमारे भगवान, तुम्हारे भगवान से भी ‍िनचले स्तर पर चली जाती है तो हमारे धर्मगुरु, तुम्हारे धर्मगुरु पर आ जाती है। अच्छा काम किसी भी गुरु ने ‍िकया हो वह सभी का पूज्य और श्रद्धेय है और बुरा काम किसी भी गुरु ने ‍िकया तो वह आलोचना का विषय होगा ही। हमारे धर्मगुरु को ही सजा क्यों? तुम्हारे को तो नहीं होती? वह बात यहाँ नहीं होना चाहिए। जिस व्यक्ति पर गर्व हो उसे तो इंसान अपना बताकर गर्व करता ही है। मगर बात जब बुरे काम की है तो उसे 'हम' में शामिल करने की बात कहाँ आती है? आती भी है तो यह कहकर आना चाहिए कि पहला त्याग 'हम' करेंगे, यदि गलती साबित होती है तो पहला सिर हम कटाएँगे एवं अन्य सम्प्रदायों का मार्ग प्रशस्त करेंगे कि जब न्याय की बात आए तो सब जन बराबर हों। धर्म-सम्प्रदाय की परिभाषा से ऊपर हों। गलत बात में हम उनके साथ 'हम' होकर क्या करेंगे? यह बात सही हो सकती है कि किसी संत पर कोई इल्जाम महज राजनतिक प्रतिशोध हो। मगर संतों को भी तो सीकरी से इतना काम पड़ने लगा है! कोई हिमालय से ढूँढकर तो लाया नहीं जाएगा किसी संत को राजनीतिक प्रतिशोध भांजने के ‍िलए!

दरअसल मनुष्य के धार्मिक होने में और आध्यात्मिक होने में अंतर है एवं धार्मिक होने और धर्मांध होने में तो और भी अंतर है। आध्यात्मिक में सद्‍वृत्तियाँ और सदाचरण आते हैं। धार्मिकता में किसी खास किस्म के पूजा-पाठ आ सकते हैं। धर्मभीरूता में यह भय आ सकता है कि भई फलाँ तो संत है तो उनकी आलोचना करने से पाप लगेगा! हालाँकि कोई खास रंग का कपड़ा पहनने से कोई संत नहीं हो जाता न ही कपड़ा छोड़ने से कोई साधु होता है जब तक कि राग, द्वेष, अहंकार, पद लालसा, यशाकांक्षा आदि न छोड़े जाएँ। तो धर्मभीरू आदमी 'फैन्सी ड्रेस' वाले साधु तक की आलोचना करने से डरता है! और धर्मांध तो इससे भी आगे होता है। वह बेहद कट्‍टर होता है, तर्क की बजाय जड़बुद्धि से सोचता है। वह धर्म का संबंध मानव धर्म की बजाए कर्मकांड से अधिक मानता है।

जाहिर है उसके धर्मयुद्ध और ‍िजहाद की सीमा में मानव के मानव के प्रति न्याय की लड़ाई नहीं, किसी भी खास धर्म का 'बिल्ला' आता है। दुनिया भर में राजनीति ने इस धर्मांधता को और बढ़ाया है। अत: इस वक्त दुनिया को उदार विचारों की सर्वाधिक और सबसे सख्त जरूरत है, ताकि हमें और अधिक युद्ध, गृहयुद्ध, राजनीतिक मार-काट, सामाजिक कलह न देखना पड़ें। भारत के एक बहुसंख्यक धर्म में घर-घर में आरती के पश्चात ये पंक्तियाँ कही जाती हैं- 'धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्‍भावना हो, विश्व का कल्याण हो।'

आशा है धर्म की जय से हमारा आशय मानव धर्म की जय रहा है और रहेगा। वर्ना सद्‍भावना और कल्याण की बात भी सिर्फ कर्मकांड से अधिक कुछ नहीं है।

- ‍िनर्मला भुराड़िया

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

चलो, भाड़ में जाएँ!

'लो कैलरी फूड' आज के जमाने की भोजनचर्या का सबसे खास शब्द बन गया है। और क्यों न बनें? पेट भी भरे, स्वाद भी मिले, भूखा भी न रहना पड़े और मोटापा भी न बढ़े, इसके लिए सबसे सही तरीका हो सकता है कम कैलरी वाले पौष्टिक भोजन का चुनाव।

जब कोई शब्द खास शब्द बन जाता है, तो सबसे पहले बाजार की बन आती है। इसी तरह 'लो कैलरी' के नाम पर फैन्सी भोज्य पदार्थ महँगे दाम पर बिकने लगे हैं। और तो और मोटापा वृत्ति रखने वाले स्वाद के शौकीनों के लिए लो कैलरी आइसक्रीम, लो कैलरी नमकीन और लो कैलरी ‍िमठाइयाँ तक उपलब्ध कराई जाती हैं। अमेरिका जैसे देशों में ‍िडब्बाबंद सामग्री की एक बड़ी रेंज ऐसी है जहाँ स्वाद भी है और कैलरी भी कम है। लेकिन अमेरिका में वर्ग भेद की खाई हमारे यहाँ जितनी बड़ी न हीं है। वहाँ ऐसे प्रयोगों का फायदा आम नागरिकों को मिलता है। हमारे यहाँ जब बाजार में ऐसी चीजें आती हैं तो विज्ञापनों और गाँव-शहरों की गली- गली में खुले अत्याधुनिक शॉपिंग सेंटरों के जरिएँ, पहुँचती वह भी है हमारे आम आदमी के पास। इन्हें 'कभी-कभार' खरीद लेना आम आदमी के बूते का भी हो सकता है, मगर सही कहें तो यह उसे 'पोसाता' नहीं है। पैकिंग के खर्चे से महँगे बने 'चार-दाने' सेंव-चिप्स के पाउच स्वाद और क्षुधा दोनों को ही पूरी तरह शांत नहीं कर पाते। मगर क्या करें 'स्लिम बॉडी' और 'लो कैलरी' भी इसी बाजार की माँग है। दरअसलयह बाजार भूख बढ़ाने के लिए है, भूख शांत करने के लिए नहीं है। आधुनिक बाजार का स्वार्थ इसी में है कि आदमी की भूख बनी रहे!

इसी आधुनिक बाजार में इन दिनों एक 'लो कैलरी' नमकीन घूमते देखा। नमकीन बेचने वाले का दावा था कि यह 'लो कैलरी' है। उनके दावे की पुष्टि के लिए पूछा कि भाई यह नमकीन है तो फिर लो कैलरी कैसे है, इसे तला तो तेल या घी जैसे किसी गहरी चिकनाई में ही होगा न! बेचने वाले ने कहा- नहीं तेल सिर्फ स्प्रिंकल (छिड़का) किया जाता है इसमें।

लो कैलरी नमकीन वाले की बात सुनकर भीड़ में भुना हुआ अपना चना-परमल याद आ गया। छिड़कने की बात तो दूर भाड़ में भुने हुए नाश्ते में तेल का प्रयोग बिलकुल भी नहीं होता। भाड़ में भूँजने के लिए चावल को उबाला, सुखाया जाता है, फिर भूसी अलग करके व नमक का पानी लगाकर, भट्‍टी में समुद्र वाली रेत के साथ सेंका जाता है। इस तरह यह बिलकुल ही कम कैलरी वाली भोज्य सामग्री होता है। भाड़ में भूँजे जाने वाला चना तो पौष्टिक भी होता है। इसमें काफी प्रोटीन होती है। फिर चने-परमल जैसी भाड़ में सिंकी वस्तुएँ खाने के बाद प्यास अधिक महसूस होती है, पानी पीने में आता है, तो यदि कोई कम खाना चाहे तो कम खाकर भी अपना पेट भरा हुआ महसूस कर सकता है। भूला-बिसरा यह तरीका आधुनिक डाइटिंग में भी काम आ सकता है।

रही बात स्वाद की, तो पारंपरिक चीजों का स्वाद खादे-पीते ही विकसित होता है। चना-चिरौंजी, गुड़-चना, परमल-सेंव खाने वाले इन स्वादों की महत्ता बखूबी जानते हैं। और फिर उस लो कैलरी नमकीन का स्वाद याद किया जाए तो तेल छिड़के हुए उस नमकीन का स्वाद बेहद मामूली ही था, क्योंकि नमकीन का स्वाद तो तेल से ही है। शुक्र है भुने चने का स्वाद भुने चने से ही है। और हाँ, शुक्र यह भी है ‍िक भड़कीले पैकेटों की तरह कागज की पुंगी या पु‍ड़िया का पैसा भी यहाँ आपसे नहीं वसूला जाता।

- निर्मला भुराड़िया

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

चाहिए माथे तीन बस भरकर!

स्कूल के प्रिंसीपल के पास एक सरकारी आदमी का फोन आता है फलाँ समारोह है फलाँ नेता आने वाले हैं तीन बस बच्चे चाहिए! गोया बच्चे न हुए 'आलू' हुए। तीन बस बच्चे यानी जानिए तीन बोरा आलू! ये बच्चे जो सिर्फ कुछ माथे हैं। भीड़ बढ़ाने वाले माथे। भाषण सुनकर उबासियाँ लेकर गरदन हिलाने वाले माथे। अतिथियों को सलामी या गार्ड ऑफ ऑनर देने वाले माथे। उन विषयों के पक्ष या विरोध में जुलूस निकालने वाले माथे जिन विषयों के बारे में उनके ‍िदमागों में समझ पैदा नहीं की गई है। उन्हें तो सिर्फ आदेशों पर जुलूस और सभाओं में शामिल होना है। पोस्टर और तख्तियाँ थामना है। कभी-कभी तो घंटों और भूखे-प्यासे रहकर चिप्स चबाकर और समोसा निगलकर। नतीजा! एक बार एक सभा में कई मासूम बच्चे बेहोश हो गए थे।

दरअसल भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में बच्चे अपने प्रजातांत्रिक अधिकार न जानते हैं, न उन्हें यह अधिकार ‍िदया जाता है या समझाया जाता है। शिक्षा व्यवस्था यह सब कुछ समझाने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि शिक्षा व्यवस्था शिक्षा तंत्र में बदल चुकी है या इससे भी आगे कहने का दुस्साहस किया जाए तो शिक्षातंत्र भी अब शिक्षा माफिया में बदल चुका है। बच्चों की स्कूली शिक्षा का कोई महत्व नहीं बचा है। बच्चे दो-दो स्कूल जाते हैं। स्कूल नं. एक में औपचारिकता के लिए, शाम को स्कूल नं. दो में तगड़ी ‍फीस देकर विशेष पढ़ाई (!) के ‍िलए। कभी-कभी तो वे विशेष पढ़ाई के लिए स्कूल नंबर दो में ज्यादा समय जा सकने के लिए स्कूल नं. एक की झूठी अटेंडेंस भी लाते हैं। यानी भारत में स्कूली शिक्षा की शुरुआत ही झूठ की बुनियाद पर होती है। इस झूठ को कुसंस्कार नहीं माना जाता, क्योंकि भारतीय सोचते हैं ''संस्कार-वंस्कार'' तो गर्मी की छुट्‍टियों में संस्कार शिविर में श्लोक रटवाकर बच्चों को दिलवा देंगे। शिक्षा से जुड़ा ज्ञान, नैतिकता, अनुशासन आदि संस्कार में शामिल हैं यह हम भारतीय मानना भूल गए हैं। देखें शिक्षा व्यवस्था की यह संस्कारहीनता हमें कहाँ ले जाती है?

- निर्मला भुराड़िया

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

'वाह' बिकती है!

एक हैं धन्ना सेठ। उनके पास सबकुछ है, गाड़ी, बंगला, नौकर, चाकर..., इससे भी आगे महल-सा घर, घर न हो जैसे फाइव स्टार होटल हो! और जब घर पर न हों तब महँगे फाइव स्टार होटल हैं ही। इससे भी आगे हैं पार्टियाँ, प्रदर्शन, चकाचौंध, ‍िदखावा। और जब इतना सब है तो सब लोग सेठजी को 'धन्ना सेठ' मानते ही हैं। उनकी इस रईसी से लोग भौंचक और अवाक् भी हैं। आम भाषा में कहें तो उनके आसपास के समाज में का उनकी रईसी का बड़ा भभका है, यही वे चाहते भी हैं। उन्होंने 'रईस' होने का टाइटल प्राप्त कर लिया है। इस टाइटल के जरिए सत्ता से संबंध बनाए और 'पॉवरफुल' होने का टाइटल प्राप्त कर लिया। इसके बाद 'टाटपट्‍टियाँ' बाँटकर 'समाजसेवी' होने का, अपनी अंटी से कथा-भागवत कराके 'धर्मपरायण' होने का यानी अब सेठजी रईस, ताकतवर, समाजसेवी, धर्मपरायण हैं। लेकिन सेठजी को एक चीज अखरती रही है कि 'बुद्धिजीवी' उन्हें अपने बीच का नहीं मानते-बावजूद इसके ‍िक उन्होंने जो व्यापार स्थापित ‍िकया है उसमें काफी बुद्धि और सयानापन लगा ही होगा। चतुराई के बगैर यह सब कैसे होता? पर अब सेठजी को नई धुन लगी है 'उस तरह' का बुद्धिजीवी होने की जिस तरह के बुद्धिजीवी उन्हें बुद्धिजीवी नहीं समझते। इसके ‍िलए उन्होंने एक 'इमेज-गुरु' की नियुक्ति की है।

'इमेज-गुरु' ने सेठजी की 'छवि बनाओ' प्रक्रिया के तहत सबसे पहले उनके ड्रॉइंग रूम के बुक रैक में रखने के ‍िलए बुद्धिजीवी हलकों में चर्चित कुछ आला दर्जे की किताबों के डीलक्स, हार्डकवर एडीशन खरीदकर सजाए हैं। घर के अलग-अलग कमरों के ‍लिए प्रख्यात (यहाँ ब्रांडेड पढ़ें) चित्रकारों की पेंटिंग खरीदी है। इमेज-गुरु ने सेठजी को इन चीजों के ज्ञान का इतना सार ‍िनकालकर पकड़ा ‍िदया है कि वे इन ‍िवषयों पर चर्चाएँ होने पर अनभिज्ञ से न खड़े रहें। मगर इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली घटना तो एक निमंत्रण पत्र देखने पर सामने आई। यह ‍िनमंत्रण पत्र एक कला प्रदर्शनी का था। उसकी अध्यक्षता सेठजी कर रहे थे। सेठजी और पेंटिंग की प्रदर्शनी की अध्यक्षता? मगर वे तो 'कला-मर्मज्ञ' कभी रहे ही नहीं हैं? शास्त्रीय संगीत की महफिलों में नगर सेठ होने की वजह से आदरणीय अतिथि के रूप में जाना भी पड़े तो वे सबसे आगे की पंक्ति की सीट पर बैठकर भी आराम से ऊँघते हैं। ‍िफर आयोजकों को ऐसी क्या पड़ी थी कि उन्होंने प्रदर्शनी के उद्‍घाटन के ‍िलए ‍िकसी कलाकार या कला प्रेमी को बुलाने के बजाय सेठजी को बुलया? - इस बात का राज भी दो ‍िदन में ही पता चल गया। कला प्रदर्शनी को सेठजी ने ही प्रायोजित किया था। चूँकि पैसा उनका था अत: कला-मर्मज्ञता का टाइटल भी उन्हीं का था।

यहाँ हमारा इरादा ‍िकसी की व्यर्थ नुक्ता-चीनी करने का नहीं है। और यह 'धन्ना सेठ' नाम के ‍िकसी एक व्यक्ति की बात भी नहीं है। यह तो एक पूरी प्रक्रिया की बात है, ‍िजसके तहत आज का पूँजीवादी, सत्ताधारी, वंशवादी तबका हर चीज पर कब्जा कर लेना चाहता है। जो 'वी.आई.पी.' है वही बुद्धिजीवी और कला-मर्मज्ञ भी है, वही समाजसेवी और धर्मपरायण है। उसी के बच्चे महँगी फीस भरकर, डोनेशन देकर डॉक्टर, इंजीनियर बनेंगे, उसी के बच्चे नेता और अभिनेता... सत्ता तो सत्ता आम व्यक्ति की योग्यता के लिए वे बुद्धि, प्रतिभा और योग्यता के क्षेत्र भी नहीं छोड़ेंगे। सबकुछ खरीद लेंगे। अब हम सेठजी से यह तो नहीं कह सकते कि तुम अपनी आलीशान गाड़ियों में घूमो और पार्टियों में व्यस्त रहो, रईसी के सारे सुख उठाओ पर आम आदमी के लिए आम चीजें तो छोड़ो। पर हम आम आदमी से तो यह कह सकते हैं ‍िक भाई पैसे से खरीदी कला-मर्मज्ञता पर वाहवाही मत करो! वाहवाही लुटाकर सेठजीनुमा लोगों की प्रवृत्ति को तूल देना घातक है। सोचिए जरा, कोई कुछ भी खरीद सकता है पर आपकी अंतरआत्मा की आवाज तो नहीं न!

- निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

'सुरसती'

नाम है उसका 'सुरसती' पर देवी सरस्वती से उसका कोई नाता नहीं है, वैसे ही जैसे उसकी बहन 'लछमी' का धन की देवी लक्ष्मी से दूर-दूर तक का कोई नाता नहीं। न लछमी स्कूल जाती है न सुरसती। हाँ छोटे भाई 'परकास' को दोनों बारी-बारी से संभालती हैं और घर में चौका-चूल्हा भी करती हैं जब माँ बरतन माँजने जाती है। और चूँकि सुरसती कुछ और बड़ी हो गई है इसलिए माँ के साथ काम पर भी जाती है। साल-दो साल और बड़ी होने पर वो भी काम पकड़ लेगी...।

फीसवाले स्कूल जाने का तो सवाल नहीं। वो तो 'परकास' के लिए है, उसके लिए पेट काट के फीस जमा हो रही है। सरकारी मे भी भेजा तो लछमी तो अँगूठा छाप ही लौट आई थी इसलिए सुरसती को काम का टेम बिगाड़ने नहीं भेजेगी माँ! झाडू-पौंछा, बरतन-बासन, रोटी-पानी कितना तो काम निपटा देती है दस बरस की सुरसती! लेकिन सुरसती के नाम ने एक ‍िदन थोड़ा तो कमाल ‍िदखाया। बरतन वाले घर की एक गृहिणी की दया-दृष्टि सुरसती पर पड़ गई। वह गृहिणी उसे दोपहर में अक्षर ज्ञान कराने लगी और गिनती सिखाने लगी। गृहिणी को पता है, अपने खुद के घरवालों से, सुरसती के घरवालों से और सुरसती की ‍िस्थतियों से लड़कर वह 'सुरसती' को स्कूल नहीं भिजवा सकती। गृहिणी अपने पास से फीस भरकर सुरसती को स्कूल ‍िभजवा दे यह भी कम से कम उसजैसी मध्यमवर्गीय गृहिणी के लिए तो कल्याण की एक हवाई योजना होगी। मगर इतना तो उसके बूते में है कि सुरसती को इतना ‍िसखा दे ‍िक सुरसती दुकानों के बोर्ड पढ़ ले, बाहर जाए तो स्टेशनों के नाम पढ़ ले, इतनी ‍िगनती-पहाड़ा जान जाए कि ‍िकराने वाले से ठगाए नहीं। सचमुच इस गृहिणी ने बहुत अच्छा काम किया। और भी गृहिणियाँ अपने आसपास की 'सुरसतियों' को ढ़ूँढकर ऐसे काम में लग जाएँ तो इन निर्धन बच्चों की बहुत मदद हो। गृहिणियाँ ठान लें तो ऐसे छोटे-छोटे काम भी क्रांति में बदल सकते हैं और बाकी समाज की सद्‍इच्छा भी वंचित बच्चों के साथ रहे तो उन्हें भी ‍िशक्षा का उजाला मिल सकता है। क्योंकि सरकारें तो आती-जाती हैं और एक-दूसरे की नीतियाँ पलटने को ही 'डिटॉक्सीफिकेशन' समझती हैं। ‍िशक्षा के व्यावसायीकरण या 'स्वार्थीकरण' को कौन रोकता है? और यदि सामाजिक सद्‍इच्छा न रही तो सरकारें कर भी क्या लेंगी? एक उदाहरण है मनोज का। वह गाँव में एक धनिक के यहाँ काम करता था। मनोज के ‍िपताजी की इच्छा हुई उसको स्कूल में भर्ती कर दें। धनिक को लगा जम के काम करने वाला 'बैल' स्कूल चला जाएगा तो उसके काम का हर्जा होगा। तो उसने माट्‍साब को कहा- 'छोणे के अच्छे कान खींचना और झापड़े भी देना, अपने आप भूल जाएगा स्कूल जाना...' यह है हमारा स्वार्थी समाज। इसी तरह ‍िनमाड़ के एक गाँव से दो बच्चे आए थे, उनसे पूछा माट्‍साब क्या पढ़ाते हैं तो एक बच्चे की कक्षा के माट्‍साब तो पढ़ाते थे, मगर दूसरे बच्चे के माट्‍साब कुर्सी पर सोते थे और बच्चे एक-दूसरे पर कागज के रॉकेट चलाते थे। और सरकार द्वारा निर्धारित मध्याह्न भोजन? तो बच्चों ने फट से कहा- दोपहर में सेंव-परमल देकर भगा देते हैं! सेंक्शन किया हुआ राशन कहाँ जाता होगा? माट्‍साब का दु:खड़ा भी अपनी जगह ठीक ही है कि सरकार मास्टर नाम के जीव को ही दुनियाभर के आलतू-फालतू काम में लगाती है। वे भी सही कहते हैं पर इसका फल ‍िनर्धन बच्चे क्यों भुगतें! पहले क्या सरकारी स्कूलों से पढ़कर गुदड़ी के लाल नहीं निकले हैं?

- निर्मला भुराड़िया

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

काश कोई चाँदनी होती! : यश चोपड़ा

निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा का नाम हिन्दी फिल्म दर्शकों के लिए नया नहीं है। 'दाग' से लेकर 'दिल तो पागल है' जैसी फिल्मों के ‍िनर्देशक और 'चक दे इंडिया', और 'न्यूयॉर्क' जैसी फिल्मों के ‍िनर्माता यश चोपड़ा का नाम एक खास किस्म की कहानी बनाने वाले स्कूल का रूप ले चुका है। खूबसूरत और संवेदनशील फिल्में बनाने वाले यशजी को इस साल किशोर कुमार सम्मान प्रदान ‍िकया गया। प्रस्तुत है यश चोपड़ा से संक्षिप्त बातचीत।

- आपकी फिल्म 'धर्मपुत्र' में बड़ा ही अच्छा संदेश था साम्प्रदायिक एकता का। अभी फिर से वही हालात हैं। सहिष्णुता कम हो गई है। क्या आप फिर 'धर्मपुत्र' जैसी फिल्म बनाएँगे?
- यह सारी दुनिया की समस्या है। सहिष्णुता अब बची ही नहीं है, इस वजह से अपराध और आतंकवाद बढ़ गया है। टालरेंस किसी के पास भी नहीं बचा है, लेकिन इस देश में हमें सुखी और शांति से रहना है तो साहिष्णुता तो रखनी ही पड़ेगी। आप यह नहीं कह सकते कि आपको मुस्लिमों की परवाह नहीं है। ये हमार देश, हमारी संस्कृति का, हमारा हिस्सा हैं। अयोध्या का फैसला हुआ तो सभी समुदायों ने इसे पॉजीटिवली लिया, कारण जो भी हो। 'धर्मपुत्र'
यदि आज बनाई जाए तो शायद स्वीकृत न हो क्योंकि सहिष्णुता और घट गई है।

- मैसेज देना तो और भी जरूरी हो गया ऐसे में...!
जैसा अयोध्या का मैसेज है, मैंने वैसा 'वीर-जारा' में मैसेज दिया, लेकिन कहानी में भावनात्मकता डालकर दिया। मैंने किसी पाकिस्तानी को गालियाँ नहीं दीं, मुस्लिम को गालियाँ नहीं दीं। उस कहानी का कोई भी पात्र विलेन नहीं था। एक भारतीय लह़का पाकिस्तानी लड़की से प्यार करने लगता है। ऐसी फिल्म में सरहद बीच में नहीं आती। रूमानियत की ही नहीं, इंसानियत की भी कोई सरहद नहीं थी वहाँ। पिक्चर पाकिस्तान में भी अच्छी चली। मुझे कहा गया था ‍िक वो सिंदूर वाला सीन काट दो, हम पिक्चर सेंसर करा देंगे... मैंने कहा नहीं, वो ही तो पिक्चर है, यही मेरा सिंबल है। मेरा हिन्दुइज्म ही सिंबल है। एक हिन्दू लड़का एक मुस्लिम लड़की के प्रति प्रेम कैसे व्यक्त करेगा? शेक हैंड करके तो नहीं! अपनी संस्कृति के ‍िहसाब से ही करेगा।

- एक महत्वपूर्ण बात जो आपकी फिल्मों में देखने को ‍िमलती है, वह है प्लेटोनिक लव। 'दिल तो पागल है' में एक दृश्य है जिसमें माधुरी को देखा नहीं है शाहरुख ने और वे शाहरुख की धुन पर डांस कर रही हैं।
... मैं मानता हूँ कि कोई न कोई आपके लिए बना होगा...। यह अलग बात है कि कभी आप उससे मिल पाते हैं और कभी-कभी नहीं भी मिल पाते हैं। माधुरी-शाहरुख को हम 'सोलमेट्‍स' कह सकते हैं। जो धुन वहाँ बज रही है, वह लोकेशन पर नहीं, माधुरी के अंतरमन में है। लेकिन मैं इंसानी रिश्तों पर फिल्म बनाता हूँ। इसका मतलब यह नहीं है कि वे हमेशा रोमांटिक हों। 'दीवार' में प्यार हाशिए पर था। यह कहानी दो भाइयों और माँ-बेटे की कहानी थी और यही महत्वपूर्ण हिस्सा था फिल्म का। इसमें शशि-नीतू और परवीर-अमिताभ का लव कैसा है? वह कहानी का हिस्सा है, लेकिन वही मुख्य कहानी नहीं है।

- एक कहानी ‍िजस पर आप फिल्म बनाना चाहते हैं, वह कितना समय लेती है?
ठीक वैसे ही जैसे कोई महिला कंसीब करती है। जैसे ही वह प्रैग्नेंट होती है, वैसे ही डिलीवर नहीं कर सकती। कभी-कभी कोई आइडिया आता है, लेकिन शेप नहीं ले पाता है, बहुत समय लगता है। कर्मशियली बहुत चलता रहता है, पिक्चर ऐसे बनाऊँगा, वैसे बनाऊँगा... यूँ बहुत सारे आइडिया आते हैं लेकिन हर आइडिया कहानी का रूप नहीं ले पाता है। मेरे ‍िदमाग में आइडिया है कि ‍'दिल तो पागल' बनानी है, मैं बनाऊँगा। अब 'दिल तो पागल है' को लोगों ने कहा कि ये बहुत एलिट आइडिया है, चलेगा नहीं। मैंने कहा- मैं बनाऊँगा। लोग कहते हैं कि मैंने 'सिलसिला' और 'लम्हें' वक्त से पहले बना दी। मैं सही नहीं मानता हूँ। मेरे कंसेप्ट, मेरे मिजाज से मैं फिल्म बनाता हूँ। हाँ, हर फिल्म में व्यावसायिक और सृजनात्मक दोनों वजहों को ध्यान में रखता हूँ।

- साहिर लुधियानवी के साथ आपने बहुत काम किया। साहिर जैसे लोग तो कभी-कभी ही पैदा होते हैं। क्या आपको उनकी कमी खलती है?
बहुत खलती है...। वे मेरे बहुत करीबी दोस्त थे। मैं पाँच मिनट में उनको कोई बता समझाऊँ, फिर उन्हें दोबारा समझाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। अपने सामाजिक और भावनात्मक गानों में भी दृश्य के अनुरूप कविता कर लेते थे। ही डाइड टू सून... वे बहुत जल्दी चले गए। वे अकेले और तन्हा हो गए थे, क्योंकि उन्होंने शादी नहीं की थी, लेकिन उनका योगदान बहुत रहा। मैं नहीं सोचता हूँ कि कोई और लेखक उनके स्तर का काम कर पाएगा।

- नए निर्देशकों को आपने बहुत मौका दिया। इसके पीछे कोई विजन है?
मैं सोचा करता हूँ कि ईश्वर ने मुझे कुछ दिया है कि मैं नए लोगों को मौका दे सकता हूँ। नए निर्देशक नए आइडिया लेकर आते हैं, कभी वो अच्छे होते हैं, कभी अच्छे नहीं होते हैं। कभी फिल्में चलती हैं, कभी नहीं चलती हैं, हम कंपनी के तौर पर कोशिश करते हैं कि हम नए लोगों, चेहरे, निर्देशक, गायकों, म्यूजिक डायरेक्टर, नए राइटर को मौका दें। हमने 'चक दे इंडिया', 'फना', 'धूम', 'न्यूयॉर्क', 'रब ने बना दी जोड़ी', 'हम तुम' में नए लोगों के नए आइडिया के साथ काम किया है।

-स्विट्‍जरलैंड आपका प्रिय डेस्टिनेशन कैसे बना?
पहले मैं टूरिस्ट की तरह गया था, फिर पत्नी के साथ हनीमून पर गया। वहाँ घुसते ही बहुत शांति-सी लगती है आज भी। स्विट्‍जरलैंड ने मुझे बड़ा सम्मान ‍िदया है। मैं जब भी वहाँ जाता हूँ तो महसूस करता हूँ कि ईश्वर ने इस देश को बहुत खूबसूरत बनाया है और वहाँ के लोगों ने उस देश को और भी खूबसूरत बना दिया है।

-'चाँदनी' नाम आपकी फिल्मों में बहुत यूज हुआ है।
चाँदनी आई फील इज प्योरिटी... यू थिंक ब्यूटी ऑफ चाँदनी... पर्ल... व्हाइट... ज्वेलरी... लाइट, प्योर, व्हाइट, व्हेन यू थिंक ऑफ चाँदनी यू थिंक ऑफ ब्यूटी...।

-लोग क्या समझते हैं, आप जानते हैं? नहीं, क्या ?
कि चाँदनी नाम की कोई लड़की पार्टीशन के समय पाकिस्तान में छूट गई है। नहीं, ऐसा नहीं है... काश ऐसा होता...!

- निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

सफर का आनंद

बरसों पुरानी बात है एक स्कूली छात्रा के रूप में मैंने कलागुरु श्री ‍िवष्णु चिंचालकरजी का ऑटोग्राफ ‍िलया था। बाल उत्सुकता से यह सवाल भी पूछ लिया था कि अच्छी चित्रकारी कैसे सीखी जा सकती है। मैंने उनकी ओर अपनी एकदम नन्हे आकार की ऑटोग्राफ डायरी बढ़ाई तो उन्होंने अपने ट्‍यूब-कलर्स पिचकाकर उसके एक पन्ने पर बगैर ब्रश सीधे ट्‍यूब से ही दो-तीन प्रकार के रंग लगा दिए। फिर डायरी बंद करने की मुद्रा में उस पन्ने के रंगों को अगले पन्नों पर ‍िचपका ‍िदया। ऐसा करके उन्होंने डायरी खोली तो डायरी के दो पन्नों पर मिलकर एक सिमेट्रिकल डिजाइन तैयार हो गया था। उस डिजाइन के नीचे उन्होंने मेरे सवाल का जवाब या कहें अपना प्रेरक संदेश लिख ‍िदया, 'अपने माध्यम के साथ खेलते रहने पर माध्यम ही सबकुछ बता देगा।' है न! अद्‍भुत बात। और आगे ‍िजंदगी ने इस प्रेरक संदेश की बार-बार पुष्टि ही की ‍िक मन लगाकर करते रहना सीखने का सबसे अच्छा उपाय है। और शब्द 'खेलते रहो' इसमें भी गहन संदेश है। इसमें भार रहित हो आनंद और मजे से अनुभव अर्जित करने का संदेश है। दबाव से नहीं।

अभी कुछ ‍िदनों पहले की ही बात है। कुछ स्कूली बच्चे ग्रुप बनाकर परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। वे विभिन्न विषयों के सवाल-जवाब याद कर रहे थे, जो उनके ‍िशक्षकों ने तैयार करवाए थे। कुछ बच्चों ने उत्तर वैसे के वैसे याद कर लिए थे, कुछ ने उत्तर समझने के प्रयास भी किए थे, मगर उनसे संबंधित चैप्टर ढंग से नहीं पढ़े थे। ये बायोलॉजी के छात्र थे। जब उनसे ‍िकसी ने कहा ‍िक 'प्राणी जगत प्रकृति का अजब करिश्मा है। ढंग से पढ़ोगे तो बहुत मजा आएगा। प्रकृति की लीलाएँ देखकर अरे वाह! कहने को जी होगा।' तो बच्चे हँसने लगे। उन्हें बात समझ नहीं आई क्योंकि वे समझने के ‍िलए ‍िवषय पढ़ते ही नहीं। प्रतिस्पर्धा के दबाव में पढ़ते हैं। मगर यह दबाव ही उनके परीक्षा परिणाम का दुश्मन बन जाता है और पढ़ने के आनंद का भी। और पढ़ने का मजा सिर्फ प्राणी विज्ञान में ही नहीं है। भाषा, गणित, समाजशास्त्र आदि में भी है। हिन्दी और अँगरेजी पढ़ते हुए जब एक-एक शब्द का नया अर्थ खुलता है तो मजे से पढ़ने वाले के ‍िलए यह एक आह्लादकारी क्षण होता है। गणित के स्टेप्स करते हुए लोग नशे में डूब जाते हैं, अपने आपको भूल जाते हैं। इसीलिए यह व्यवस्था है ‍िक प्राथमिक पढ़ाई करते वक्त सभी ‍िवषय पढ़ाए जाने के बाद उच्च कक्षाओं में पसंद के ‍िवषय चुनने का कहा जाता है, लेकिन होता यह है कि जो चुने जाते हैं वे विषय व्यक्ति की पसंदगी और विशेषज्ञता से अधिक संबंध नहीं रखते। माता-पिता के अधूरे सपनों और रोजगार के दबावों से अधिक संबंध रखते हैं। नतीजा होता है बेमन से पढ़ना और बेदिली से रोजगार चुनना। कभी-कभी यह मजबूरी भी होती है। पर अक्सर सामाजिक दबाव ही होते हैं।

जीवन के कार्यक्षेत्र में भी फिर यह मानसिकता जारी रहती है। कार्यालयों में ऐसे लोग बहुतायत में पाए जाते हैं, जो काम तभी करते हैं जब कोई देख रहा हो (खासकर बॉस)। जब आप सिर्फ किसी को ‍िदखाने के ‍िलए कार्य करते हैं या काम करके किसी अन्य पर एहसान करते हैं, तो ‍कार्य से तथाकथित प्रगति के लाभ अवश्य पा सकते हैं, लेकिन असली प्रगति और असली आनंद तो तभी है, जब आप अपनी गुणवत्ता के ‍िलए कार्य करें, किसी को ‍िदखाने के ‍िलए नहीं और आपको अपने काम में मजा आए। यह अपने माध्यम से खेलते रहने के ‍समान ही रुचिकर होगा और खेल ही खेल में जीवन सबकुछ सिखा भी देगा। किया हुआ कभी व्यर्थ नहीं जाता। कोई देखे न देखे, आपके अनुभव आपकी दक्षता से ही जुड़ेंगे और दक्षता सममुच की प्रगति से। ऐसा करते हुए मंजिल पर तो आप पहुँचेगे ही और सफर का आनंद उठाते हुए पहुँचेगे।

- निर्मला भुराड़िया