बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

पेड़ हैं तो जिंदगी है

हम धूप में जाकर खड़े हो जाएँ तो क्या हमारे शरीर में अपन आप भोजन बन जाएगा? हम यह नहीं कर सकते न? तो फिर हमारे लिए भोजन कौन पकाता है? जी हाँ, पेड़! इस सृष्टि में पेड़ ही यह काम कर सकता है। सृष्टि का हर प्राणी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भोजन के लिए पेड़ों पर ‍िनर्भर है। क्योंकि, क्लोरोफिल सिर्फ पेड़ों के ही पास है। पेड़ों की पत्तियों का क्लोरोप्लास्ट सूर्य की रश्मियों से ‍िमलकर फोटोसिंथेसिस नामक प्रक्रिया करता है, ‍िजससे ग्लूकोज उत्पन्न होता है। इसी प्रक्रिया में पानी और कार्बन डायऑक्साइड का उपयोग कर पेड़ ऑक्सीजन उत्पन्न करता है और वायुमंडल में छोड़ता है। यानी पेड़ हमारे अन्नदाता ही नहीं प्राणवायुदाता भी हैं। पेड़ धरती पर भोजन ही नहीं, शुद्ध वायुका भी स्रोत हैं। हम अपनी सॉंसों के जरिए जो हानिकारक कार्बन डॉयऑक्साइड छोड़ते हैं उसे सोखकर पेड़ ऑक्सीजन देते हैं। सोचिए न हों तो हमारा क्या हो? लेकिन स्वार्थी और मूर्ख मनुष्य जिस डाल पर बैठा हैं उसी को काट रहा है। अपनी जिंदगी के आधार को ही नष्ट कर रहा है। और ऐसा करके अपने आपको आधुनिक और विकासोन्मुख समझ रहा है।

प्राचीनकाल से ही भारत में पेड़ों की महत्ता बताई जाती रही है। खासतौर पर महिलाएँ वृक्ष-पूजक रही हैं। वृक्ष-पूजा के जरिए उन्हें वृक्षों की महिमा समझाई जाती रही है। वृक्ष-पूजा के बहाने ही वह वृक्षों को जल अर्पण करना और वृक्षों की देखभाल करना इत्यादि करती चली आई हैं। लेकिन 21वीं सदी की स्त्री वृक्ष की उपयोगिता समझने में सर्वाधिक रूढ़िवादी और पिछड़ी हुई साबित हुई हैं। पूजा के बहाने वृक्ष-सेवा करना तो उसने छोड़ दिया है। लेकिन अब यदि धर्म और पापबोध के रास्ते से समझने को तैयार न हो तो उसे आधुनिक विज्ञानसम्मत तर्कों से तो वृक्ष की महत्ता समझ ही लेना चाहिए। कोई हर्ज नहीं कि आधुनिक घरों में भी तुलसी के चौरे बनने लगें और स्त्रियॉं उनमें जल चढ़ाएँ। लेकिन विडंबना यह है कि किसी भी बहाने हो, पारंपरिक और ग्रामीण स्त्रियों में वृक्ष-चेतना आधुनिक स्त्रियों से अधिक रही है। गढ़वाल के चिपको आंदोलन की स्त्रियों ने अक्सर पेड़ कटने नहीं दिए हैं। वे पेड़ों से आलिंगन करत हुए खड़ी हो जातीं, पहले हम पर कुल्हाड़ी चलाओं, फिर पेड़ पर चलाना।

ऐसा नहीं कि आधुनिक स्त्री और आधुनिक समाज के पास कोई रास्ता नहीं। कोई तरीका नहीं। वे चिपको आंदोलन न चलाएँ तो न सही, वृक्षारोपण महायज्ञ तो चला ही सकते हैं। अपने बच्चों के जन्मदिन पर जैसे केक काटने को आपने रस्म बनाया है वैसे ही पेड़ लगाने को भी बनाएँ। आपका कोई प्रेम दिवस है यानी किसी प्रिय से मिलने का दिवस या विवाह की वर्षगॉंठ तो उस दिन भी वृक्षारोपण कर मधुर स्मृतियों को चिर स्थायी बनाया जा सकता है। जब कभी भी आप उस पेड़ को बड़ा होता और फलता-फूलता देखेंगे तो मीठी यादें मस्तिष्क में कौंध जाएँगी। किसी दीवार या चट्‌टान पर अपना नाम खोदने और दिल का निशान बना आने से तो यह निश्चित ही बेहतर होगा। अपने मृत परिजनों की स्मृति में पेड़ लगाने के कार्य भी हुए हैं। संस्थाएँ अपने बैनर तले भी वृक्षारोपण जैसे पुण्य कार्य को अंजाम दे सकती हैं। न.... न.... लेकिन रुकिए सिर्फ एक अदद विज्ञप्ति या तस्वीर की खातिर एक पेड़ लगाकर नहीं। यह तो खुद को धोखा देना होगा। पेड़ हम सबके सगे हैं। हमें अपने आप के लिए उन्हें पोसना है, किसी को दिखाने के लिए नहीं।

हॉं, आपके अच्छे कार्य से दूसरे भी प्रेरणा लें, इसके लिए इक्के - दुक्के पेड़ रोपकर उन्हें भूल जाने से काम नहीं चलेगा। क्लबों और सामाजिक संस्थाओं के जरिए तो यह काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए, तभी आपकी प्रेरणा दूसरों के काम आएगी। स्कूल और कॉलेजों में भी वार्षिक समारोहों के साथ वृक्षारोपण समारोह मनाए जा सकते हैं। स्कूल में अध्यापक-अध्यापिकाएँ भी छात्रों को वृक्षों के महत्व और वृक्षारोपण के बारे में जानकारी दे सकते हैं। यह काम केवल वनस्पति शास्त्र के शिक्षकों और छात्रों के लिए न छोड़ें तो अच्छा है। कायदे से पेड़ समाज शास्त्र का विषय है या यूँ कहें जीवन का शास्त्र पेड़ों के बिना अधूरा है। पेड़ हैं तो जिंदगी है। हरियाली है तो खुशी है। फलदार और छायादार पेड़ भोन, प्राणवायु और छॉंह ही नहीं, प्रसता भी देते हैं। फूल और पत्तेदार पेड़ तितलियों को पराग, भॅंवरों को शहद, पंछियों को पनाह ही नहीं, इंसान को सुकून भी देते हैं। प्रकृति की सुरम्य गोद में मिलने वाला सच्चा सुकून। याद है वह गीत "हरी-भरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन है... ये कौन चित्रकार है'। क्या हम सृष्टिकर्ता की इस सुंदर कल्पना को सीमेंट के जंगलों में बदलकर प्रस रह सकेंगे?

- निर्मला भुराड़िया

1 टिप्पणी:

  1. अतिसुन्दर पोस्ट
    वनवासी भी वन कट कर उसे,कृषि की ओर जा रहे.
    ये तथाकथित आदिवासियो को सरकार द्वारा दिए जा रहे जंगल के हिस्सों (पट्टे) जिनका इत्सेमाल वे खेती के लिए करते है,सरकार इन्हें जंगल काटने के लिए प्रोत्साहित करती जा रही है.
    क्या आप बता सकती है की इसे किस तरह से रोका जा सकता है.

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