सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

संगीत का संस्कार

आज की एक सफल गायिका कविता कृष्णमूर्ति मेरे सामने बैठी हैं। बातचीत का ‍िवषय ‍िनश्चित ही संगीत है और बातचीत का यह सिलसिला एक बहुत ही महत्वपूर्ण ‍िबंदु पर पहुँचता है। वह है इन ‍दिनों भारत में जोर पकड़ता रीमिक्स संगीत का गोरखधंधा! रीमिक्स संगीत में यह होता है कि नए-पुराने प्रचलित गीतों के ट्रेक पर नई आवाजें चढ़ा दी जाती हैं या पुराने गीतों में अपने ढंग से मिलावट करके नए रूप में तैयार करके बाजार में जारी कर ‍िदया जाता है। इस गोरखधंधे में कुछ अच्छे गीतों की शुद्धता और नायाब गीत-संगीत इस कदर खो गए हैं ‍िक नई पीढ़ी अच्छी और मौलिक चीज से परिचित ही नहीं है। वह इस चोरी और सीनाजोरी वाली धुनों और गीतों को ही सही समझती है और अपनाती है। इस तरह युवा कुछ बहुत ही उम्दा गीत रचनाओं से वंचित रह जाते हैं।

रीमिक्स, सस्ते गीतों, नकली कैसेटों और भोंडे वीडियो के बढ़ते चलन पर कविताजी ने भी दु:ख प्रकट किया, ‍िकन्तु साथ ही उन्होंने एक और बहुत महत्वपूर्ण बात भी ध्यान दिलाई। कविताजी का कहना है ‍िक व्यवसाय के लिए नई पीढ़ी को यह गलत सौगात देने के लिए गायक, संगीत निर्देशक, निर्माता आदि तो जिम्मेदार हैं ही, लेकिन आज के माता-पिता भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। क्योंकि वे बचपन से ही संगीत संबंधी सुरुचि बच्चों में ‍िवकसित नहीं करते। दक्षिण भारत में अल सबेरे ही घर-घर में सुब्बालक्ष्मी बजती हैं तो नई पीढ़ी उनसे परिचित हुए बगैर नहीं रहती। कविताजी ने उल्टे प्रश्न किया- 'यहाँ ऐसे कितने घर हैं, जहाँ सुबह अच्छा गीत और अच्छा भजन बजता हो अौर चार साल की उम्र में बच्चा उन्हें सुनता आया हो?' कविताजी की बात में दम है। यदि बहुत बचपन से ही हमारे घरों में बच्चे अच्छा संगीत सुनें तो ‍िनश्‍चित ही वे परिष्कृत रुचि के साथ बड़े होंगे। तब रीमिक्स और नकली कैसेट वे सुनेंगे तब भी इसके प्रति रुझान विकसित नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें असली-नकली का भेद स्वयं ही पता होगा।

भारत एक ऐसा देश है, ‍िजसके कण-कण में संगीत बसा है। हमारे जनजीवन में संगीत हर रीति-रिवाज से जुड़ा है। कृष्ण की बाँसुरी हो या सरस्वती की वीणा या सूफी संतों की मजारों पर गाई जाने वाली कव्वालियाँ। बच्चों को सुलाने की लोरियाँ हों या समाजसेवियों की प्रभात फेरियाँ। हर चीज में गीत-संगीत है। शादी-ब्याह में मेहँदी से लेकर बिदाई तक कोई भी रस्म बगैर गीत-संगीत के पूरी नहीं होती। गाँव की औरत घट्‍टी चलाते हुए भी गाती हैं। तो कभी कोई राहगीर नारियल के गोले और घोड़े के बाल से वाद्य बनाकर गाता चलता है। जनजातीय लोग लौकी की तरही और कद्दू का तमूरा बनाकर गा-बजा लेते हैं। भजनों और कीर्तनों में झाँझ-मजीरे बजते हैं। शंख, घड़ियाल और करतल ध्वनि के साथ आरती होती है। अग्नि प्रज्वलित करने और बरखा लाने वाले राग तक हमारे शास्त्रीय संगीत में रहे हैं। ऐसी अमूल्य विरासत हस्तांतरित नहीं हुई तो एक दिन नष्ट हो जाएगी। वैसे भी संगीत एक दिव्य कला है। तो हमारी नई पीढ़ी इसके दिव्य स्वरूप से वंचित क्यो हो? शुद्ध संगीत का यह निर्मल आनंद नई पीढ़ी तक पहुँचे, इसकी ‍िजम्मेदारी समाज और माता-पिता की भी है। कुरुचिपूर्ण सामग्री बेचने में ‍िजनके ‍िनहित स्वार्थ जुड़े हैं, उन्हें दोष देना मुश्किल है और रोकना असंभव। दरअसल संगीत का पहला संस्कार घर से और कच्ची उम्र से ही शुरू होना चाहिए। तभी नई पीढ़ी में अच्छे संगीत का सम्मान करने, उसे ग्रहण करने एवं उसका आनंद उठाने की क्षमता आएगी और यदि बचपन से ही अच्छा संगीत सुना है तो नकली वैसे ही पसंद नहीं आएगा। उसके लिए किसी किस्म की पाबंदी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

यह नहीं कहा जा सकता कि हर कोई पक्के संगीत में ‍िनष्णात हो या शास्त्रीय संगीत की समझ रख पाए, किन्तु कम से कम ऐसा माहौल और ऐसी मानसिकता तो विकसित हो कि युवा पीढ़ी लोकप्रिय संगीत में भी फूहड़ता के बजाए सुरुचि को तरजीह दे।

-निर्मला भुराड़िया

1 टिप्पणी:

  1. आपने सामयिक और गंभीर मुदृदे की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है। कविता जी सही कह रही हैं कि आजकल हम बच्चों को अच्छे संगीत का संस्कार नहीं दे पा रहे हैं। सैकड़ों टी.वी. और रेडियो चैनल हैं पर पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय या सुगम संगीत का एक भी चैनल नहीं है। बच्चे वही सुनेंगे जो उन्हे सुनाया जाएगा। इस मुद्दे पर समाज, सरकार और मीडिया को ध्यान देने की आवश्यकता है। सार्थक चर्चा के लिए धन्यवाद।

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