मंगलवार, 29 नवंबर 2011

एक डुबकी आकाशगंगा में!


' अलकेमिस्ट" के लेखक पॉलो केलो को कौन पुस्तक-प्रेमी नहीं जानता। हाल ही में उन्होंने अपने पसंद के शहर के बारे में एक लेख लिखा है। यह शहर है स्पेन का सेनटियागो डी कॉम्पोस्टेला। यहाँ संत टियागो का मकबरा है। उन्हें यहाँ एक ऐसी खुली जगह में दफनाया गया था, जहाँ रात में चमकीले तारों की जगमग रोशनी बिखरी होती है। कॉम्पोस्टेला का मतलब होता है-स्टारलिट फील्ड, यानी कह लें तारों से जगमग जगह। यहाँ आने के लिए लोग सोलहवीं सदी में भी पैदल यात्रा करते थे और आज भी। आसमान में टिमटिमाते तारे इन पदयात्रियों का पथ प्रदर्शन करते हैं। पॉलो की बचपन से ही लेखक बनने की इच्छा थी और उनका दावा है कि सेनटियागो कॉम्पोस्टेेला की प्रथम यात्रा ने ही उन्हें लेखक बनाया और उनकी पुस्तक पिलग्रिमेज अस्तित्व में आई। वे कहते हैं मॉन्स गॉडी की पहाड़ी से आकाशगंगा की रोशनी में नहाए शहर और इसके पवित्र कैथेड्रल को देखना एक अद्भुत अनुभव है। इस स्थान की यात्रा इंसान को बदल देती है। एक पवित्र सुख देती है। हो सकता है पॉलो ने गुलजार साहब का वह गाना भी सुना हो ' जा, जा जिंद शामियाने के तले, जा जरीवाले नीले आसमान के तले। जय हो...", क्योंकि आखिर यह गाना ऑस्कर अवॉर्ड प्राप्त है। तात्पर्य यही कि निस्सीम आसमान में टिमटिमाते इन करोड़ों सितारों की चादर इंसान के मन को जादुई पुलक से भरती है।

हमारे अधिकांश त्योहारों में स्त्रियाँ चाँद को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोलती हैं। वे देवरानी-जेठानी, सखी-सहेलियों के संग मिलकर आँगन और छत पर जाती हैं। हँसती-खिलखिलाती हैं और चंद्र दर्शन करती हैं। चाँद, सूरज, पेड़, नाग आदि की पूजा के बहाने स्त्रियाँ सिर्फ प्रकृति को पूजती आई हैं, बल्कि इस बहाने वे बाग-बगीचों में जाती हैं, प्रकृति का सान्निाध्य पाती हैं। इससे उनका तन-मन स्वस्थ होता है। हाल ही में एक सज्जन की आँखों में तकलीफ थी, डॉक्टर ने व्यायाम बताया, दाएँ देखो, बाएँ देखो, ऊपर-नीचे देखो, दूर देखो, आसमान में चाँद की तरफ भी कभी-कभी देखोे! मगर बहुमंजिला इमारत में रहने वाले को क्या चंद्र दर्शन इतनी आसानी से नसीब है? यह उपक्रम करने के लिए मकान मालिक से छत की चाबी माँगनी पड़ेगी और वह देने में आना-कानी करेगा। उसे डर होगा कि भला आदमी कहीं चाँद देखने के बहाने आत्महत्या तो कर लेगा? बढ़ते शहरीकरण की यही मुश्किल है। लोग प्रकृति का सामीप्य खो रहे हैं। करवाचौथ भी अब होटल में हो जाती है, स्त्रियाँ वेब पर चाँद देख लेती हैं। इससे चंद्र दर्शन का असल मकसद यानी प्रकृति का सामीप्य यहीं खत्म हो जाता है। जावेेद अख्तर की बहुत अच्छी पंक्तियाँ हैं-

'ऊँची इमारतों से मेरा मकान घिर गया,

कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए।"

मनुष्य ने बहुत-सी चीजों पर विजय प्राप्त कर ली। मगर मृत्यु पर नहीं। दु: दूर करने की गोली भी अब तक नहीं बनी है। दु: तो सहना ही होता है। मगर प्रकृति में बहुत शक्ति है दु: हरने की। दु: चाहे दूर हो पाए, मगर निसर्ग का सान्निाध्य इंसानी पीड़ा को कम करने की ताकत अवश्य रखता है। हमारी जीवनशैली कितनी ही आधुनिक, कितनी ही नई क्यों हो जाए, प्रकृति के सान्निाध्य के अनमोल क्षण अवश्य निकाले जाना चाहिए।

निर्मला भुराड़िया

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