गुरुवार, 20 जनवरी 2011

पापा, डैडी और बाबूजी!

पिता! एक निश्चिंतता का नाम है पिता। पिता छत है, पिता आकाश है। पिता वह सुरक्षा कवच भी है, जो अपनी छाती पर तूफान झेलकर संतान की रक्षा करता है। पिता के होते संतान को ज्यादा चिंता नहीं होती, उसे पता होता है 'पिता सब संभाल लेंगे।' डाटेंगे-डपटेंगे, ताना देंगे तब भी मझधार में तो नहीं छोड़ेंगे। पता नहीं कितने बेटे डाँटते पिता की मूँछों के नीचे छुपी मुस्कार को पढ़ पाते हैं, पर वह होती जरूर है। पिता के त्याग की महिमा कभी गाई नहीं जाती, पर वह होती जरूर है। पिता का त्याग अक्सर दिखाई नहीं पड़ता, पर वह भी होता जरूर है। यही बात पिता के वात्सल्य पर भी लागू होती है। वह छलक-छलक नहीं जाता, पर पिता के हृदय की हर धड़कन में व्याप्त होता है। नए युग के पिता तो अपने वात्सल्य की खुलकर अभिव्यक्ति भी करते हैं। अपने बच्चे के पालन-पोषण के हर पल का रोमांच भी लेते हैं। बच्चों से मित्रता स्थापित करते हैं। अत: बच्चे पिता से अपनी बातें साझा करते हैं। इसका फायदा यह होता है कि वे गुमराह होने और मुसीबत में फँसने से बचते हैं। मुसीबत में फडस भी जाएँ तो उस दलदल में ज्यादा धँसने से बच जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी गलतियाँ पिता से छुपाना नहीं पड़तीं। अत: कुछ गलत होने पर अपने अनुभव के माध्यम से पिता उन्हें उबार सकता है। पुत्र ‍कितना ही बड़ा हो जाए, वात्सल्य के सन्दर्भ में वह पिता के लिए छोटा ही होता है। हाल ही में एक किस्सा देखा- सत्तर वर्ष के पिता और चालीस वर्ष के पुत्र का। अब पुत्र कमाता है, घर संभालता है और पिता की देखभाल, सुख-सुविधा की जिम्मेदारी भी अब पुत्र की है। यह कर्तव्यों की ऋक तरह की अदला-बदली-सी है। लेकिन एक रोज पुत्र पर कोई विपत्ति आ पड़ी। आर्थिक और सामाजिक तौर पर पुत्र उस विपत्ति से स्वयं और स्वयं के संसाधनों द्वारा निपट ही रहा था, तभी पिता ने एक प्रस्ताव रखा, 'मैं तुम्हारे दु:ख को कम करना चाहता हूँ, बेटा मैं तुम्हें लगे लगाना चाहता हूँ।' यह एक ऐसा दृश्य रहा होगा कि पत्थर भी पिघल जाए। तो दु:ख क्यों न पिघले? पिता के आलिंगन से बेटे को दु:ख के क्षणों में गहन भावनात्मक संबल मिला। ऐसा लगा जैसे पिता ने अपनी सकारात्मक ऊर्जा पुत्र में स्थानांतरित कर दी हो।

बेटियों के लिए थोड़ा अधिक नरम तो हर युग का पिता रहा है, मगर आज का पिता इस कोमलता को अपनी भाव-भंगिमा में भी आने देता है। बेटियाँ पिता से अनुशासन में हमेशा ढील पा जाती हैं। स्नेह की हथकड़ी में बँधा पिता अक्सर बेटियों को कुछ कह नहीं पाता। बेटियाँ पिता के हृदय में महारानियों के पद पर विराजमान होती हैं तो बेटियों के मन में भी पिता के प्रति आस्था आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ लिए होती है। मेरे पिता जैसा कोई नहीं वाली भावना अक्सर उनके मन में होती है। सच तो यह है कि पुत्र हो या पुत्री दोनों के लिए ही पिता एक बहुत बड़ी शक्ति है, संबल है, आश्वासन है। पिता का न होना एक ऐसी रिक्ती है, जिसे और कोई नहीं भर सकता। इस सन्दर्भ में अपनी एक कविता की ये पंक्तियाँ ही रिक्ती की उस भावना को थोड़ी गहनता से अभिव्यक्त कर सकेंगी, पढ़िए-

लड़कियों के लिए पिता
उतने ही जरूरी होते हैं
गेहूँ की बालियों के लिए जितने कि
पानी, धूप और खाद
तभी वे सुनहरी हो लहलहाती हैं।
पिता न हों तो भी
उगती और बढ़ती तो हैं लड़कियाँ
क्योंकि दुनिया में कुछ भी रुक सकता है
बस लड़कियों की बाढ़ नहीं।
.... मगर तब लड़कियाँ
सुनहरी बाली नहीं
जंगली घास होती है
पिता होता है उनके लिए
मात्र एक बीज
जिसे वे नहीं जानतीं
हवाओं न कब बिखेरा था।
बिना पिता की लड़कियाँ
जानती हैं उनका उगना
किसान की ऊष्ण मुट्‍ठियों की
आत्मीयता नहीं लिए है
तभी वे ढ़ँढती फिरती हैं
अपना खोया बचपन हर घड़ी
और हर पुरुष में
सबसे पहले
खोजती हैं पिता।

- निर्मला भुराड़िया

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर सम्बन्ध विवेचन ...... मार्मिक आलेख.. बधाई

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  2. बहुत सुंदर विषय निर्मलाजी..... कविता मन को छूने वाली है.....

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  3. दिल भर आया आपकी पोस्ट पढ़ कर.....ऐसा कम ही होता है....!!!

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