गुरुवार, 29 जुलाई 2010

रूठ न जाना चिड़िया रानी!


अपनी बात

बहुत दिन नहीं बीते होंगे शायद हमारी दादी मॉंओं-परदादी मॉंओं के ही जमाने की बात होगी। उन दिनों की औरतें घर के बीचों-बीच बने चौक में बैठकर घट्‌टी पीसा करती थीं। वे पीसते-पीसते गाना गातीं, नीले आसमान को ताकती इतने में फुर्रऽऽ से कोई चिड़िया आती और औरत की मुट्‌ठी से फिसले दाने चुगने लगती। चिड़िया को देखकर औरत खुश हो जाती और कुछ और दाने जान-बूझकर ही उसकी ओर बिखेर देती और झर्रऽऽ करती कुछ और चिड़ियाएँ इस भोज में आ जुटतीं। फिर आया दादी मॉंओं-मॉंओं का जमाना। भीतर के चौक से उठकर स्त्रियॉं अब खुले आँगन में आ गई थीं। यहॉं वे चुगतीं-बिनती-दाने बिखेरतीं तो सहज ही भूरी घरेलू चिड़ियाएँ आतीं, जातीं और दाना खातीं। यह सब वो वक्त थे जब नन्हे बच्चे खाली समय में चिड़ियों से बातें करते थे। उनकी यह दोस्ती उसी समय से प्रारंभ हो जाती थी जब बाबा उन्हें गोद में उठाकर बहलाते थे, देख 'नन्नू' चिड़ी आई चिड़ी। बड़ा होते-होते नन्नू देखता था चिड़िया को कुंडी में नहाते और बदन फुरफुराकर पानी के छींटें उड़ाते। मुन्नी देखती थी चिड़िया को धूप का टुकड़ा पकड़ने की व्यर्थ कोशिश करते। हमारे घर-परिवार से जुड़ी यह गौरेया कभी भी छत, आँगन, बरामदे या खिड़की से हमारे घरों में आ धमकती थी और तस्वीरों के पीछे या छोटे मचान पर रखे डिब्बों की आड़ में घोंसले बना लेती थी। लोग इसके नन्हे बच्चों के आगमन की प्रतीक्षा करते थे।


भारतीय जनजीवन में पैठी यह भूरी घरेलू चिड़िया हमारे अनगिनत किस्सों-कहानियों, लोकगीतों और शायरियों का अंग बन चुकी है। मगर धीरे-धीरे यूँ हुआ कि हमारी यह प्यारी चिड़िया महज किस्सों में ही रहने लगी। शहरी भारतीयों के घर आना उसने लगभग बंद कर दिया। चिड़िया करे भी क्या? चुगे-चुगाए दाने अब पॉलीथिन में बंद मिलते हैं, जो उसे नसीब नहीं होते। एयरकंडीशन ने घरों की खिड़कियॉं सील कर दी हैं, बहुमंजिला इमारतों के चलते आँगन नहीं रहे। कीटाणुनाशकों ने उसके बच्चों को खिलाए जाने वाले कीट खत्म कर दिए हैं। हर जगह शोर है, प्रदूषण है, पैक घर-दरवाजे और खिड़कियॉं हैं। सो वह शहर वालों से रूठकर चली गई हैं। आगे खतरा यह है कि कहीं वह लुप्त न हो जाए।


एक भारतीय पर्यावरण विज्ञानी ने इस नन्ही चिड़िया को बचाने की जिम्मेदारी ली है। हालॉंकि खतरा इतना बड़ा है कि उनका प्रयास चिड़िया के जितना ही नन्हा है, मगर बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि नन्ही, छोटी-सी होकर भी चिड़िया धरती के पर्यावरण व प्राणी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस श्रृंखला से जुड़ी सभी चीजों को समय रहते न सहेजा गया तो पृथ्वी का विनाश हो जाएगा साथ ही मनुष्य का भी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'टाइम' ने एक विशेष स्टोरी की है 'हीरोज ऑफ द एवयारनमेंट' जिसके तहत अपने-अपने तई पर्यावरण के लिए काम करने वाले कुछ लोगों की प्रोफाइल दी गई है। इसी में भारत के मोहम्मद दिलावर के बारे में भी है।


नासिक में रहने वाले मोहम्मद दिलावर लुप्त होती चिड़ियाओं को बचाने और इस बारे में लोगों को जागृत करने के प्रयास में लगे हैं। घरेलू चिड़िया की विलुप्ति को दिलावर एक अशुभ संकेत मान रहे हैं। पर्यावरणीय रूप से अशुभ। और शायद हम सभी लोगों को उनकी इस बात से सहमत होना पड़ेगा कि चिड़िया को बचाने के अभियान में अभी से हम लोग न लगे तो हमारे बाल-बच्चे नहीं जान पाएँगे कि चिड़िया आखिर किस चिड़िया का नाम है।मुहम्मद दिलावर का यह सोचना है कि पर्यावरण के हित में सरकार और समुदाय को तो प्रयास करना ही चाहिए, मगर लोगों को व्यक्तिगत तौर पर भी कुछ न कुछ करना चाहिए। दिलावर के कई प्रयासों की कड़ी में एक यह है कि उन्होंने चिड़ियाएँ आकर घोंसला बना सकें। नासिक के आसपास के इलाकों में ही उन्होंने हजारों ऐसे बॉक्स नॉन प्राफिट बेसिस पर बेचे हैं। ये बॉक्स उन परिवारों ने खरीदे हैं, जो ये चाहते हैं कि उनके बच्चे चिड़ियाओं को चहचहाते देखें। इसी तरह सामान्य लोग चिड़ियों के लिए पानी की कुंडी रखें, चुग्गा डालें, पेड़-पौधे और बागड़ लगाएँ, हरियाली और पर्यावरण की कद्र करें तो गोरैया और उसके जैसे कई प्रसन्नचित, मददगार प्राणी हमारे जीवन को सुंदर बनाए रखेंगे।


- निर्मला भुराड़िया

1 टिप्पणी:

  1. ये छोटी भूरी चिड़िया अपने देश में देखने को तरस गये .आपके ब्लाक ने बचपन की यादों को ताजा कर दिया " धन्यवाद " .ये सांता क्लारा यू एस ए में बहुतायत से दिखी , देख कर बहुत ख़ुशी हुई .

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