सोमवार, 7 मार्च 2011

घर भी चलाएँगीं, विमान भी उड़ाएँगीं

महिलाओं के लिए मुकर्रर एक दिन! कोई बात नहीं जमाना तो पूरा का पूरा कुड़ियों का है। साहित्य, संस्कृति, प्रचार-प्रसार माध्यम स्त्री-विमर्श से भरे पड़े हैं। बेटियों को लेकर आम परिवारों का नजरिया बदल रहा है। भारतीय मध्यम वर्ग में अब बेटियाँ पढ़ती हैं। सिर्फ शादी के इंतजार में ही नहीं पढ़ती, वे अपनी पसंद का व्यावसायिक कोर्स भी करती हैं, ताकि अपना पसंदीदा करियर बना सकें। गाँव-कस्बों की लड़कियाँ भी शहरों में पढ़ने आती हैं। भारतीय समाज में मोटे तौर पर देखा जाए तो बहुओं की वेशभूषा पर ससुरालियों का उतना कठोर नियंत्रण नहीं रहा। रह भी नहीं सकता, लड़कियाँ अब आत्मनिर्भर हैं, उनके माता-पिता अमूमन अब यह नहीं करते कि जहाँ डोली गई वहीं से अर्थी उठेगी। जरूरत पड़ने पर वे अपनी बिटिया का समर्थन भी करते हैं, शादी कर दी कर्तव्य पूरा हुआ जैसी बातें नहीं करते। सास-ससुर भी अब बहू से तथाकथित मर्यादा में बँधे औपचारिक संबंध नहीं रखते। ससुर-बहू बौद्धिक-सामाजिक विषयों या घरेलू निर्णयों पर वैसे ही चर्चा-बहस करते हैं जैसे पिता-पुत्री। बहू अपनी सास को स्कूटी पर घुमाती है या सास-बहू दोपहर में साथ पिक्चर देखने या शॉपिंग पर जाती हैं। नई पीढ़ी के भारतीय पति-पत्नी का साथ अधिक मित्रवत होता है। पत्नी नौकरीपेशा है, थकी हुई, बीमार या व्यस्त है तो पति काम में हाथ भी बँटाता है। स्त्री को संपत्ति समझने वाले जमींदारनुमा पति अब भी होते हैं, मगर पढ़े-लिखे शहरी मध्य वर्ग में अब उनका प्रतिशत काफी कम हो गया है। भारतीय परिदृश्य में अब लड़कियाँ "विजिबल" हैं, पर्दे के पीछे नहीं।

उपरोक्त परिदृश्य बेहद सुखद है। परिवर्तन हुआ है, इससे कतई इंकार नहीं किया जा सकता, मगर कुछ लोग आज भी इस परिवर्तन को पचा नहीं पा रहे। वे तरह-तरह से अपनी कुंठा अभिव्यक्त करते हैं। पिछले दिनों इंडिगो की एक फ्लाइट में उड़ान भरने के पहले कप्तान के नाम की घोषणा हुई। फ्लाइट की पायलट महिला है, यह सुनते ही एक व्यक्ति ने ऐलान कर दिया कि वह इस विमान में यात्रा नहीं करेगा। चूँकि चालक महिला है, अतः दुर्घटना होने का डर है। "घर तो चला नहीं सकती, विमान क्या उड़ाएँगी", कहकर व्यक्ति ने अपना क्षोभ व्यक्त किया। हालाँकि विमान तो रुका नहीं, उस व्यक्ति की ही भद्द पिटी। उसे अंततः उसी विमान से यात्रा करनी पड़ी। आलोचना मिली, खबर बनी सो अलग। मन में पूर्वाग्रह रखकर महिलाओं की काबिलियत को नकारने वाले, महिला होने की वजह से उनकी योग्यता पर संदेह करने वाले आपको अब भी मिल ही जाएँगे। सदियों का पूर्वाग्रह, जमींदारी गर्व, पुरुष होने का अहंकार कई दिमागों से अभी गया नहीं है। गाँव-कस्बों में यदि आदिवासी स्त्री समूह बहुत अच्छा काम कर रहे हैं तो वहीं ऐसी घटनाएँ आज भी होती हैं, जब स्त्री को डायन घोषित करके उसकी जमीन हड़प ली जाती है। पिता या भाई से हुए झगड़े का बदला उसकी बहन या बेटी से बलात्कार करके लिया जाता है। स्त्री अपने अधिकार का प्रयोग करे तो उसे उसकी तथाकथित औकात बताने के लिए निर्वस्त्र करके घुमाने जैसी घटनाएँ भी होती हैं। यह सच है कि कई स्त्रियाँ सरपंच के रूप में बहुत अच्छा काम कर रही हैं, वहीं कुछ सरपंच पति भी हैं, जो स्त्री के नाम की मोहर और कुर्सी का उपयोग बड़ी बेशर्मी से स्वयं करते हैं। बाल विवाह, शिशु जन्म के वक्त मातृ-मृत्यु जैसी समस्याएँ अब भी पूरी तरह गई नहीं हैं। भारत में स्त्री के संदर्भ में बहुत-कुछ बदला है, मगर अब भी बहुत-कुछ बदलना बाकी है। ग्रामीण स्त्री शिक्षा और स्त्रियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ने पर और सुखद परिवर्तन आने वाले जमाने में हो सकते हैं। जरूरत है तो जनजागरण और सामाजिक संकल्प की।

- निर्मला भुराड़िया

3 टिप्‍पणियां:

  1. Please accept my congratulations, very nice article, Welcome to my blog atulkushwaha-resources.Blogspot.com
    Atul ..

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  2. Nirmalaji, Bahut satik bhasha me apne is samajik mudde ko ujagar kiya. Main ek educated aur mahila-purush samanta wale samaj ki kamna karne ke nate is baat se bilkul sehmat hun.

    Lekin Sawal ye hai ki hum samaj ko badale kaise?

    Aaj bhi kuch states me educated families apni beti ki shadi bina marzi ke karte hain, aur 'Demand' ke naam per DAhez bhi dete hain.
    Akhir Kyu???

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