बुधवार, 16 मार्च 2011

चलो भेजा लड़ाएँ!

कम्प्यूटर पर काम करने वाले/वालियाँ जानते हैं कि हमारे द्वारा एक-दो बार उपयोग किया हुआ मेल आईडी का पहला अक्षर भी एड्रेस वाले खाने में डालें तो पूरा आईडी क्या होगा, इसके विकल्प स्क्रीन पर आ जाते हैं। आपको सिर्फ क्लिक करना होता है। अपना मेल बॉक्स खोलते हुए भी आप पहला अक्षर डालते हैं और पूरा आईडी लिखा हुआ आ जाता है, आपको सिर्फ एरो वहाँ ले जाकर क्लिक करना होता है। पासवर्ड के अलावा और कुछ भी आपको याद रखने की जरूरत नहीं है। फोन नंबरों का भी आजकल कुछ ऐसा ही है। मोबाइल की मेमोरी में सब नंबर हैं। आपने मेमोरी सर्च की और आप जो चाह रहे हैं वह नंबर हाजिर। अधिक इस्तेमाल होने वाले नंबर स्पीड डायल में डले होते हैं। आपने एक डिजिट दबाया और पूरा नंबर अपने आप लग जाता है। आपको अब न टेलीफोन नंबर की डायरी रखने की जरूरत है, न ही अपने निकटतम लोगों के नंबर याद रखने की जरूरत है। लैंड लाइन का इस्तेमाल कम से कम होता है, इसलिए कभी-कभी तो खुद के घरों के मोबाइल नंबर भी दिमाग से उतर जाते हैं। ऐसे मामले भी देखे गए हैं कि सिम खो गई या किसी वजह से सिम के नंबर डिलिट हो गए तो इमर्जेंसी कॉल लगाने हेतु भी भेजे में एक भी नंबर नहीं था। यही आलम अपने ईष्ट मित्रों, संबंधियों, आत्मीयजनों के जन्मदिन, शादी की सालगिरह या अन्य महत्वपूर्ण अवसर याद रखने के बारे में भी है। मोबाइल में साल में एक बार तिथियाँ फीड कर दीं तो उस खास दिन सुबह अलार्म बज जाएगा। आपने ऐसा नहीं किया है तो आप जिस भी सामाजिक नेटवर्क पर सदस्य हैं वहाँ से आपको आपके फ्रेंड की बर्थ-डे याद दिलाने के मैसेज एक हप्ते पहले ही आने लगेंगे। आपको याद रखने की जरूरत नहीं है। कई जगहों पर कारों में जीपीएस सिस्टम भी लग चुके हैं। आपने जीपीएस सिस्टम इन्स्टॉल किया हुआ है तो सिस्टम खुद आपको रास्ते और दिशा बताता हुआ चलेगा, आपको न ढूँढना पड़ेगा न याद रखना पड़ेगा। गूगल करते हुए आप किसी चीज का नाम गलत लिखते हैं तो खट आ जाएगा "डिड यू मीन दिस?" यही नहीं, अधिकांश सॉफ्टवेयर्स में स्पेलचेक के प्रोग्राम डले हुए हैं। आप गलत स्पेलिंग लिखते हैं तो लाल लाइन आ जाती है। क्लिक करो तो सही विकल्प भी। यानी आपको स्पेलिंग्स याद रखने की जरूरत नहीं। सब कुछ की-बोर्ड पर करते हैं तो मोती से अक्षर बनाना सीखने की भी आवश्यकता नहीं। यानी सब कुछ आपो-आप होगा। भेजा लड़ाने, स्मृति पर जोर देने, प्रयत्न करने की जरूरत नहीं है।

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक तकनीकी ने जीवन बहुत आसान बना दिया है। लगातार कनेक्टिविटी और सुलभ संचार व्यवस्था ने उन महिलाओं को भी अपने सपने पूरे करने और मनचाहे कार्य करने का अवसर दिया है, जो घरेलू दायित्वों के कारण अधिक भ्रमण नहीं कर सकतीं या घर के बाहर अधिक समय नहीं दे सकतीं। तकनीकी के कारण ही अधिकांश युवक-युवतियों को अपने आकाश का विस्तार करने का मौका मिला है, क्योंकि इसने दुनिया को छोटा कर दिया है और सबकी पहुँच के भीतर किया है। तकनीकी आपात स्थितियों में मनुष्य को बचाती भी है। अब आपके पास तुरंत संदेश की व्यवस्था है। तकनीकी ने दोस्तों का घेरा भी बढ़ाया है और व्यक्ति का एक्सपोजर भी। लेकिन कोई भी अच्छी चीज कितनी भी अच्छी क्यों न हो, उसके इस्तेमाल का संयम और उसके इस्तेमाल की तमीज जरूरी है। साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि यदि इसके सारे फायदे हम गिन रहे हैं तो एक-आध नुकसान हो तो उस पर भी नजर डाल लें और उससे अपने आप को बचा लें। तो यह दिमाग को आराम देने वाली तकनीकी का नुकसान यह है कि आप अपनी छोटी-छोटी बातें याद रखने की क्षमता का इस्तेमाल करना छोड़ रहे हैं। इंसान के लिए जितना जरूरी बॉडी जिम है, उतना ही जरूरी ब्रेन जिम भी है। अतः सुलभ तकनीकी के जमाने में यह जरूरी है कि दिमाग को क्रियाशील बनाने वाले कुछ काम किए जाएँ। नई भाषाएँ सीखना, नए शब्द याद करना, कैलकुलेटर परे रखकर कभी-कभी उँगलियों पर हिसाब गिनना या मेंटल मैथमेटिक्स करने की कोशिश करना अच्छा है। टीवी वाले रेडिमेड मनोरंजन में छवियाँ बनी-बनाई मिलती हैं। अतः अच्छा होगा कभी कोई अच्छी किताब पढ़ना, एक-दूसरे को कोई किस्सा सुनाना। महफिल में बैठकर गप्प लगाना। दादी-नानी की कहानियाँ बच्चों और बूढ़ों दोनों के लिए अच्छी इस मायने में भी होती थीं कि दादियाँ किस्सा कहने के लिए दिमाग पर जोर डालती थीं और बच्चे राजा, राक्षसया परी का कल्पना चित्र कहानी सुनते हुए बनाते थे। लोगों से मिलना-जुलना भी ब्रेन जिम है। किसी की आवाज, शरीरगंध, चेहरा, बर्ताव आदि याद रखने के लिए भी दिमाग को काफी कुछ प्रोसेस करना होता है। अच्छी याददाश्त और सहज-जीवन के लिए कभी-कभी दिमाग को प्रयत्न करने देना भी जरूरी है।

- निर्मला भुराड़िया

1 टिप्पणी:

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    डंके की चोट पर

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