मंगलवार, 28 सितंबर 2010

ईश्वरों की दुनिया!

सबकी प्यारी, सबकी दुलारी, खुशमिजाज 'बिटिया' एक विशिष्ट बच्ची है। वह विशिष्ट बच्चों के लिए बने स्पेशल स्कूल में जाती है, जहाँ उसे और उसके जैसे या उससे भी अल्प विकसित बच्चों को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वे शिक्षित हो सकें। अपने छोटे-छोटे काम स्वयं कर सकें। आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन के अलावा इन बच्चों को स्वयं पर गर्व करने के अवसर भी दिए जाते हैं। पिछले दिनों ऐसा ही एक कार्यक्रम था ‍िबटिया के शिक्षण संस्थान में ‍िजसमें विशिष्ट बच्चों को मंच पर अपनी प्रस्तुतियाँ देना थीं। जो बच्चे मंच पर नहीं जा रहे थे, उन्हें दर्शक बनकर रंगारंग कार्यक्रम का आनंद लेना था। बिटिया बहुत खुश थी, क्योंकि उस डांस करना था। उसके मम्मी-पापा भी कार्यक्रम अटैंड करने गए थे, जहाँ वे अन्य विशिष्ट बच्चों के पालकों से भी मिले।

एक पालक ने बताया कि उनके एक नहीं बल्कि दो बच्चे अल्पविकसित रह गए। इन बच्चों में अलग-अलग दौर आते हैं, अलग-अलग मानसिक स्थिति के अनुसार। अत: कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वे बिस्तर में ही पड़े रह जाते हैं। उन्हें नहलाना भी पालकों को ही पड़ता है। ऐसे में, अनजाने में वे मूत्र त्याग आदि भी बिस्तर में ही कर देते हैं। जब ज्यादा बीमार हो तो उन्हें बिस्तर में ही खाना भी खिलाना होता है। हो सकता है शुरू मे इस स्थिति पर पालक खीजे हों। इसे दुर्भाग्य कहकर उन्होंने कोसा हो। पर वे कहते हैं अब अपने दोनों निष्कलुष बच्चों में वे ईश्वर देखते हैं। उनकी सेवा ईश्वर की सेवा मानते हैं। एक और पिता ने बताया कि उसके दो बेटों में एक सामान्य और एक विशिष्ट है। इस धनिक पिता ने आधी संपत्ति अपने सामान्य पुत्र को दे दी, आधी विशिष्ट बेटे और उसक ट्रेनिंग संस्थान में लगाई है। यही नहीं, वे स्वयं भी एक शिक्षक के रूप में अन्य बच्चों को भी ट्रेनिंग देने नियमित नौ से पाँच प्रशिक्षण संस्थान जाते हैं। एक और विशिष्ट युवती का पूरा परिवार ही विशिष्ट बच्चों की ट्रेनिंग, शिक्षण से जुड़ गया है। ये तो वो लोग हैं, जिनके अपने परिजन इस हालात से गुजरे, मगर ऐसे भी शिक्षक, प्रशिक्षक एवं प्रबंधक हैं, जो बगैर किसी वजह स्वप्रेरणा से इस काम से जुड़े हैं।

बिटिया के पापा कहते हैं यही लोग सच्चे संत हैं, क्योंकि इनमें अपार धीरज और ‍िन:स्वार्थता है। दुनियावी फंडों को न समझ पाने वाले बच्चों को सिखाना-समझाना बेहद कठिन कार्य है। लेकिन मूक साधकों ने यह चुनौती ली है। वे यह भी कहते हैं कि और भी कई संस्थानों की आवश्यकता अभी है और इसके लिए सरकार पर निर्भरता या सिर्फ सरकार से ही अपेक्षा करना ठीक नहीं होगा। निजी तौर पर ही, समाज के लिए सचमुच कुछ करने के ‍इच्छुक लोगों को इसके लिए आगे आना होगा। वे स्वयं भी इस तरह की और संस्थाओं का अध्ययन करने गुजरात, मुंबई आदि जगहों पर जा रहे हैं, ताकि मध्यप्रदेश में भी ऐसे और उपक्रम स्थापित किए जा सकें।


यह तो संस्थान स्थापित करने जैसे बड़े प्रयासों की बात हुई। व्यक्तिगत स्तर पर भी कुछ बातें इस सन्दर्भ में गौर करने लायक हैं। जैसे-जैसे समाज में बच्चों को स्टेट सिंबल मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वैसे-वैसे समाज में बच्चों को स्टेटस सिंबल मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वैसे-वैसे विशिष्ट बच्चों की और फजीहत हो रही है।

कुछ माता-पिता ऐसे भी हैं, जो अपने अल्पविकसित बच्चों पर शर्माते हैं। उन्हें अपने साथ कहीं लेकर
आना-जाना तो दूर, उन्हें मेहमान आदि आने पर लगभग छुपाकर रखते हैं। उन्हें घर के दायरे में ही कैद करके रखते हैं। आखिर वे किस दोष की सजा देते हैं इन बच्चों को और स्वयं को? बच्चे का अल्पविकसित होना पालक या बच्चे की गलती तो है नहीं? बिटिया के पापा कहते हैं, 'बल्कि ये बच्चे तो ईश्वर का प्रतिरूप हैं।'


सच्ची बात है ये हमारी सामान्य दुनिया के छल, कपट, राजनीति तो जानते नहीं ना! तो फिर कुदरत की भूल के लिए हम इन निष्कलुष मानवों को सजा क्यों देते हैं?


- निर्मला भुराड़िया

1 टिप्पणी:

  1. सच्ची बात है ये हमारी सामान्य दुनिया के छल, कपट, राजनीति तो जानते नहीं ना! तो फिर कुदरत की भूल के लिए हम इन निष्कलुष मानवों को सजा क्यों देते हैं?
    अच्‍छे प्रश्‍न उठाती हैं आप !!

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