गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

सदियों का संताप

www.hamarivani.com
रफ़्तार

हिंदी के प्रसिद्ध लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं रहे। 63 वर्ष की उम्र में उनका देहावसान हो गया। यह एक बड़ी क्षति है भारतीय साहित्य के लिए ही नहीं, भारतीय समाज के लिए भी। भारतीय समाज अस्पृश्यता और जाति के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव के लिए कुख्यात रहा है। सवर्ण समाज ने अपने ही समान हाड़-मांस के इंसानों के साथ सदियों तक जिस क्रूरता का व्यवहार किया है वैसा तो कोई जानवरों के साथ भी नहीं करता। श्री वाल्मीकि ने अपनी पीठ उघाड़ कर ये घाव दिखाने का साहस किया ताकि समाज को अपना घिनौना चेहरा साहित्य के आईने में दिखाई में दिखाई पड़ जाए। मराठी में दलित लेखन की परंपरा रही है। वहां दया पवार नामदेव ढसाल, शांताबाई काम्बले जैसे साहित्यकार रहे हैं। तमिल, तेलगु, मलयाली आदि भाषाओं में भी दलितों ने अपना दर्द बयान किया है। हिंदी में यह परंपरा थोड़ीसी देर से आई मगर जब आई तो यहां भी ओमप्रकाश वाल्मीकि, श्योराजसिंह बेचैन, मोहनदास नैमिश्यराय, कंवल भारती, अनिता भारती जैसे लेखक आए। श्री वाल्मीकि ने हिंदी में अपनी आत्मकथा लिखी, जिसका शीर्षक है 'जूठन" जब यह किताब पढ़ी तो वस्तुत: रोंगटे खड़े हो गए कि भला एक इंसान भी दूसरे इंसान से इस तरह का व्यवहार करता है? एक इंसान दूसरे इंसान को नारकीय यातनाएं देता है सिर्फ इसलिए कि उसने किसी खास जाति में जन्म लिया। 'जूठन" मैंने स्वयं दो-तीन बार पढ़ने के बाद अपनी कॉपी परिवार, मित्रों और सहयोगियों में पढ़ने के लिए घुमाना प्रारंभ की। मगर इसी श्र्ाृंखला में वह कहीं खो गई है या शायद किसी के पास रह गई है। उपहार स्वरूप देने के लिए भी खरीदी थी पर फिलहाल एक भी कॉपी मिल नहीं रही। अत: पाठकों के लिए, इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से ही कुछ अंश खंगाल कर परोसने का प्रयास कर रही हूं ताकि दलितों के दर्द की एक छोटी सी झलक यहां प्रस्तुत हो सके।
श्री ओमप्रकाश वाल्मीकि के ही शब्दों में,'पिताजी मुझे लेकर बेसिक प्राइमरी विद्यालय गए। वहां मास्टर हरफूलसिंह थे। उनके सामने पिताजी ने गिड़गिड़ा कर कहा, 'मास्टरजी थारी मेहरबानी हो जागी जो म्हारे इस बच्चा कू बी दो अक्षर सिखा दोगे।" बहुत चक्कर लगाने के बाद स्कूल में दाखिला तो हो गया मगर जनसामान्य की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया। स्कूल में दूसरों से दूर जमीन पर बैठना पड़ता। पीछे के दरवाजे के पास। प्यास लगे तो हैंडपंप के पास खड़े रहकर किसी के आने का इंतजार करना पड़ता। लड़के तो पीटते ही हैंडपंप छूने पर मास्टर भी सजा देते थे। तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते ताकि मैं स्कूल छोड़कर भाग जाऊं और उन्हीं कामों में लग जाऊं जिनके लिए मेरा जन्म हुआ है। उनके अनुसार  स्कूल आना मेरी अनाधिकार चेष्टा थी।" यहां हम कुछ पंक्तियां दे पा रहे हैं पूरी आत्मकथा पढ़ने पर खून खौल उठता है और अपने तथाकथित उच्च वर्ण के होने की वजह से शर्म भी आती है। बच्चा पढ़ने जाता और अध्यापक उससे रोज पूरे स्कूल की झाड़ू लगवाते, कक्षा में नहीं बैठने देते। लात-घूंसों से पिटाई, गालियों और अपमान जनक भाषा में बात सामान्य थी।
जब कभी यह गाना बजता है- है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं," तब यह पंक्तियां 'काले-गोरे का भेद नहीं, हर दिल से हमारा नाता है" सुनकर हंसी जाती है अपने इस कोरे दंभ पर ! हमारे यहां नस्लभेद सही जातिभेद तो रहा है और सवर्ण में भी तो वर्ण है। फिर रंगभेद और वर्णभेद में क्या फर्क है? अब संविधान ने हम सबको बराबरी का दर्जा दे दिया है, समाज भी काफी हद तक बदला है मगर फिर भी भेद-भाव के छींटे अक्सर दिख जाते हैं। मैंने स्वयं ने ऐसी कई स्त्रियां देखी हैं जो एक खास जाति के व्यक्ति के हाथ का बना खाना ही खाती हैं। हमारे गांव-कस्बों में आज भी कई लोग हैं जो हममें से ही कुछ इंसानों को निम्न मानते हैं और उनके हाथ का परोसा 'कच्चा खाना" नहीं खाते। कुछ जातियों के लोगों के लिए बर्तन-गिलास अलग रखना, छुआ-छूत पालना यह भी अब भी होता है। भारतीय राजनीति ने समाज में फैले जातिवाद को बढ़ावा ही दिया है कम नहीं किया है। दलित और सवर्ण के नाम पर आज भी खून खराबा होता है, राजनीति इसे और उकसाती है। समाज ने भी अंतरजातीयता को प्रोत्साहित करने के बजाए जात-कुटुंब-समुदाय के खेमे बनाए हैं और इन्हीं में, आपस में विवाह संबंध किए जाते हैं। गर्व से घोषणा होती है, 'फलां जाति का परिचय सम्मेलन।"
जरूरत पड़ने पर हम 'उलटे-जातिवाद" को कोसना नहीं भूलते। मगर अपने गिरेबान में झांकना फिर भी भूल जाते हैं।

बुधवार, 27 नवंबर 2013

पुरुष जात का नाम खराब करने वाले

www.hamarivani.com
पचास के पार के एक अधेड़ व्यंग्यकार ने अपनी रचना प्रकाशनार्थ भेजी है। व्यंग्य एक साहित्यिक गोष्ठी के बारे में है। इन गोष्ठियों की हास्यास्पद विसंगतियों पर, शिरकत करने वाले लेखकों की फितरत पर इसमें तक-तक कर शब्दों के तीर मारे गए हैं, लेकिन इसमें वर्णित लेखिकाओं और महिला श्रोताओं पर जो कटाक्ष किए गए हैं वे उनके आचरण के अटपटेपन पर नहीं बल्कि उनकी देह को लेकर किए गए हैं। गोया वे गलती करने वाली और कटाक्ष के निशाने पर आने वाली इंसान नहीं, सिर्फ एक देह हों। जहां पुरुषों को अपनी ही रचना पढ़-पढ़कर बोर करने, हार-फूल का अनंतक्रम चलाने, कार्यक्रमों की अध्यक्षता करने के लिए लार टपकाने, स्वयं द्वारा स्वयं को शॉल औढ़ाने और प्रशस्ति-पत्र देने के मजे लिए गए हैं, वहीं महिलाओं पर व्यंग्य इस तरह है कि फलां की कमर, कमर नहीं कमरा हो गई, फलां ने ढलते हुए पेट को साड़ी में ऐसे छुपा रखा था, फलां सिर पर बचे चार बालों को ब्यूटी पार्लर से सजवाकर आई थी वगैरह। जहां बर्ताव पर व्यंग्य होना चाहिए वहां शरीर पर व्यंग्य क्यों? दूसरे, किसी का बर्ताव व्यंग्य का विषय हो सकता है मगर ढलती उम्र व्यंग्य का विषय क्यों? और क्या लिखने वाला पुरुष स्वयं के उड़ते बाल, बढ़ता पेट, झुकते कंधे, भूल गया था? शायद दोष व्यक्ति का नहीं हमारी सामाजिकता का है जो पुरुष की अधेड़ावस्था को ज्यादा तवज्जों नहीं देता, मगर स्त्री की अधेड़ावस्था को लगभग गुनाह मानता है और गाहे-बाहे उसकी खिल्ली भी उड़ाता है।
खुद के भीतर ही यह भ्रम बनाए रखने के लिए कि वह बूढ़ा नहीं हुआ है, इस प्रकार का पुरुष अपने से बेहद कम उम्र की लड़कियों से देह संबंध बनाने को लालायित रहता है। इसमें वासनाओं से ज्यादा बड़ा हाथ इस अहंकार का होता है कि पुरुष भी भला बूढ़ा होता है? कम उम्र की लड़कियों से संबंध बना सकने में वह अपना पौरुष देखता है। डींग हांकने का मौका देखता है। निश्चित ही सभी पुरुष ऐसे नहीं होते, पर जो होते हैं उनके शब्दकोष में उम्र की मर्यादा नाम का शब्द नहीं होता। आखिर किसी किसी बिंदु पर आकर तो मनुष्य को यह मानसिकता बना ही लेना चाहिए कि अब मैं इस उम्र का हो गया हूं। यह स्वीकार करना कठिन जरूर है पर असंभव नहीं। उम्र की मर्यादा और रिश्तों की गरिमा नाम की भी कोई चीज होती है। नहीं होती तो हम इंसान नहीं पशु होते। अपनी जो भी उम्र है उसे गरिमा से स्वीकार करना स्त्री हो या पुरुष हर एक के लिए जरूरी है ताकि हमारी सामाजिकता आदिम वहशीपन में बदले। स्त्री और पुरुष के बीच देह का ही रिश्ता हो यह जरूरी नहीं। मां, बहन, बेटी, दोस्त-वह कुछ भी हो सकती है। रिश्तों की भावनाओं में देह को घसीटना और रिश्तों की पवित्रता का सम्मान करना यह भी इंसानी गुण ही है। गुरु-शिष्या और बॉस-मातहत के संबंध हैं तो उनकी भी अपनी गरिमा है जिसकी रक्षा किया जाना जरूरी है। गुरु, बॉस या मेंटर होना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, इसे छिछलेपन में कतई नहीं धकेला जा सकता। क्या लेखक-पत्रकार तरुण तेजपाल ने यह भी नहीं सोचा होगा कि कोई लड़की उनकी पुत्री की सहेली है तो उनकी भी पुत्री समान हुई। ऐसा सोचने में तो मानो लोगों की मर्दानगी को ठेस पहुंच जाती है। ऐसा भी देखा गया है कि कुछ लोग अपनी पोती की उम्र की लड़की को भी 'बेटा" संबोधन से पुकारने से बचते हैं, शर्माते हैं। इधर एक अधेड़ कवि ने भी अपनी कविता भेजी है जो एक षोडषी के अंग-प्रत्यंग का वर्णन है। यह जवान थे तब भी लड़की की देह गंध पर कविता लिखते थे, अब भी उन्होंने विषय परिवर्तन नहीं किया है। यह हास्यास्पद और शर्मनाक दोनों ही है। क्या पुरुष स्त्री के लिए सिर्फ एक भोगी है और कुछ नहीं? अक्सर ये खबरें आती हैं कि सौतेले पिता ने बेटी के साथ दुष्कर्म किया। क्या रक्त संबंध होते हुए भी, वह उसकी मां के साथ शादी करके लड़की का पिता नहीं हो गया? इस तरह के पुरुष अपने साथी पुरुषों का भी नुकसान करते हैं। समाज में अविश्वास का वातावरण बनने पर सचमुच गरिमामय पुरुषों पर भी जमाना विश्वास नहीं करेगा। लंपट पुरुष, पुरुष जात का ही नाम खराब करते हैं।


रफ़्तार

शनिवार, 23 नवंबर 2013

बू

www.hamarivani.com

इत्र और फूल में खुशबू होती है, यह कोई सूचना नहीं। खुशबू खुद अपने होने की सूचना दे देती है। यह तो हुई सचमुच की खुशबुओं की बात, जो वस्तुत: होती है, हमारी नासिका भी जिसे पकड ही लेती है। मगर क्या विचारों, भावनाओं और आचरण की भी खुशबू होती है? भावनाओं की खुशबुओं को कवियों ने हमेशा से पकडा है भले वह पहले प्यार की खुशबू हो या बकौल गुलजार साहब आंखों की महकती खुशबू जिसे हमें हाथ से छूकर रिश्तों का इल्जाम नहीं देना है! ये वे खुशबुएं हैं जो नहीं होतीं, पर होती हैं, जिन्हें हमारे इंद्रिय तंत्र नहीं आत्मा की तरंगों द्वारा कैच किया जाता है। इसी प्रकार आचरण की भी गंध होती है जो नाक से नहीं पकडी जाती पर उसकी उपस्थिति महसूस हो ही जाती है। प्यार की खुशबू, मैत्री की खुशबू, अपनेपन की खुशबू होती है। उसी तरह मदद, न्यायप्रियता और अच्छाई की भी खुशबू होती है। जिसके पास अच्छाई को समझने, उसकी कद्र करने का एंटिना हो, वही इस खुशबू का आनंद ले पाता है। इंसानियत की खुशबू उस व्यक्ति को तो महकदार व्यक्तित्व का स्वामी अथवा स्वामिनी बनाती ही है उसके घेरे में आने वालों को भी मन: शांति का वरदान देती है।
यदि अच्छे आचरण की खुशबू हो सकती है तो बुरे आचरण की दुर्गन्ध भी होती ही होगी। नाजी जर्मनी के दौर को बताने वाली कई किताबें समय-समय पर आई हैं। ऐसी ही एक किताब है 'हिटलर्स फ्यूरीज : जर्मन विमन इन नाजी किलिंग फील्ड्स।" नाजियों ने यहूदियों के प्रति जातिवादी घृणा आम जर्मनों के मन में भी भर दी थी। अत: नाजी सैनिक, शासक तो छोड़िए आम जर्मन पुरुष और स्त्रियां भी यहूदी आबादी के प्रति क्रूर और हिंसक व्यवहार करने लगे थे। बहुत थोड़े जर्मन थे जो आत्मा से सोचते थे और जाति के आधार पर की जाने वाली इस अमानवीयता से बहुत दु:खी थे। इन्हीं में से एक एनट शकिंग ने दु:खी होकर अपने घर पर यह पत्र लिखा था, 'पापा सही कहते हैं कि जिन लोगों को कोई नैतिक संकोच नहीं होता वे अजीब प्रकार की दुर्गन्ध छोड़ते हैं। मुझे अब जल्दी ही पकड में जाता है कि मेरे आस-पास कौन है जो दुष्ट हैं, क्योंकि उनमें से खून की बू आती है।" इस किताब के जरिए वेंडी लोअर ने एक महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाया है जो बाकी इतिहासकार भी कहते आए हैं, वह यह कि आम जनता के शामिल हुए बगैर इतने बड़े पैमाने पर मास मर्डर किए जाना संभव नहीं था। भारत में भ्रष्टाचार के लिए भी हम यह कह सकते हैं। दूसरे यह किताब, यह भी याद दिलाती है कि यह मानना गलत होगा कि जर्मन औरतें दुष्टता की राजनीति से कोई संबंध नहीं रखती थीं। सच तो यह है कि इस जातिगत घृणा और हिंसा में उस समय की जर्मन स्त्रियां भी शामिल थीं। उन्होंने भी किसी भी प्रकार की मानवीय संवेदना और कोमलता का प्रदर्शन नहीं किया था। भ्रष्टाचार के संदर्भ में ही हमारे यहां के लिए भी हम यह कह सकते हैं कि स्त्रियां भी कोई दूध की धुली नहीं हैं। रोजमर्रा के सामाजिक जीवन में जो भ्रष्टाचार व्याप्त है उसमें पुरुषों के साथ स्त्रियां भी शामिल हैं। अत: सिर्फ राजनीति के बदलने से देश और समाज नहीं बदलेगा। हम सबके बदलने से बदलेगा।
हम सबको नैतिकता की खुशबू की जरूरत है ताकि हम सुख-शांति से अच्छा जीवन जिएं। अनैतिकता हमारा सबका ही जीना मुश्किल करती है। वैसे भी व्यक्ति कृत्य छुपा सकता है पर कृत्य की गंध नहीं! वह कभी कभी प्रकट हो ही जाती है।

रफ़्तार