शनिवार, 14 अगस्त 2010

ओछी बोली, छोटा सोच

हिन्दी साहित्य में इस वक्त एक शब्द को लेकर बेहद हंगामा मचा हुआ है। महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति और साहित्यकार विभूति नारायण ने ज्ञानपीठ से निकलने वाली पत्रिका नया ज्ञानोदय को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि हिन्दी की महिला लेखिकाएँ अपने लेखन में खुद को एक-दूसरे से बड़ी छिनाल साबित करने में लगी हैं! यहाँ महिला के लिए ऐसे विशेषण को किसी और के उदाहरण से उद्धृत करने में हाथ काँप रहे हैं, पता नहीं बोलने वाले की ऐसी हिम्मत कैसे हुई। शायद इसलिए कि कतिपय लोगों को महिलाओं को ऐसे विशेषणों से नवाजने की आदत है। इसके लिए न उनको दोबारा सोचना पड़ता है, न ही उनकी जुबान काँपती है। छिनाल, रखैल, कुलटा, कुलबैरन, कर्कशा, डायन, कलंकिनी, सौतन जैसे विशेषणों की रोजमर्रा की बोली में भरमार है। रखैल और सौतन का पुलिंग आपको कहीं नहीं मिलेगा।

भाषा में यह लैंगिक पूर्वाग्रह दरअसल उस पूर्वाग्रह युक्त सामाजिक प्रवृत्ति की ओर ही इशारा करता है, जहाँ पुरुष के सौ खून माफ हैं और कुछ भी गलत होने पर ठीकरा स्त्री के सिर फोड़ने का रिवाज है। पश्चिमी संदर्भों में भी देखें तो यह माना जाता है कि आदम नर्क में इसलिए गिरा कि हव्वा ने उसको उकसाया। यानी आदम की हवस का दोष नहीं, दोष हव्वा के उकसाने का है। लेकिन पश्चिम में नारी हित समर्थकों और नारीवादियों की लगातार पहल के बाद जेंडर न्यूट्रल भाषा के प्रयोग पर जोर दिया जाने लगा है और जेंडर न्यूट्रल व्यवहार को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि लिंग भेद व्यवहार से उत्पन्ना होकर भाषा में न झलके। गैर बराबरी को दूर करने के लिए चेयरमैन, फायरमैन, स्टेवार्डेस, स्पोर्ट्‌समैन की जगह चेयरपर्सन, फायरफाइटर, फ्लाइट एटेंडेंट, एथलीट जैसे शब्द वापरे जा रहे हैं। एक्टर, डॉक्टर जैसे शब्द दोनों जेंडर के लिए हैं। अब कोई एक्ट्रेस नहीं कहता।

स्टेट्समैन को पॉलिटिकल लीडर कहा जा रहा है। मार्च २०१० में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने अपनी कार्रवाई से "चेयरमैन" शब्द बाहर कर दिया। उसकी जगह संबोधन हेतु "चेयर" शब्द का उपयोग होगा। ऐसा कॉमन्स लीडर हैरियट हरमन के प्रस्ताव पर किया गया, जिनका कहना था चेयरमैन शब्द पुरुषवादी है। ९० के मुकाबले २०६ मतों से यह प्रस्ताव पारित किया गया! हालाँकि हमारे पास राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए कोई विकल्प नहीं है, जब यह शब्द अवतरित हुए तब शायद यह नहीं सोचा गया कि कोई महिला भी कभी ऐसे पद को सुशोभित करेगी। जो भी हो अब इसी को जेंडर न्यूट्रल शब्द की तरह चलाया जा सकता है और चलाया जा भी रहा है। लेकिन, एक चीज है जो अब चलाई नहीं जा सकती या चलने नहीं दी जाना चाहिए। वह है महिला के लिए विशेष तौर पर गढ़े गए आपत्तिजनक, पूर्वाग्रहयुक्त विशेषण। आप जेंडर न्यूट्रल हों यह तो बाद की बात है। पहले इतने सभ्य और सुसंस्कृत तो हों कि भाषा में शालीनता की सीमा न लाँघें, स्त्री को कमतर, बदतर समझना छोड़ें। औरत को कुछ भी कह लो, क्या कर लेगी यह सोचने वालों को सही सबक देने का समय अब आ गया है।

- निर्मला भुराड़िया

2 टिप्‍पणियां:

  1. निर्मलाजी आप जैसी समर्थ शब्द-साधक के ब्लॉग की दुनिया में प्रवेश करने की सूचना मिलते ही यही मिसरा मेरे ज़हन में आया..बहुत देर कर दी हुज़ूर आते आते !आपने अनेक विषयों पर निरंतर और सार्थक लेखन किया है और मुझे पूरा विश्वास है कि आपका क़लम हिन्दी को और विस्तार देगा.

    अब विभूति नारायण प्रकरण पर...मुझे अब लगने लगा है कि यह पूरा विषय एक तयशुदा पब्लिसिटी स्टंट का हिस्सा है..और इससे पत्रिका की बिक्री में निश्चित रूप से बढ़ोत्तरी हुई होगी. क्योंकि मैंरे पास एक दिन ऐसे व्यक्ति का फ़ोन आया जिसका साहित्य तो दूर अख़बार पढ़ने से भी कोई वास्ता नहीं, लेकिन जनाब मुझसे तफ़तीश कर रहे थे कि यार ये छिनाल वाला ज्ञानोदय कहाँ मिलेगा...छपे हुए माध्यम में इस तरह के शब्द के प्रकाशन के पीछे से जीवन के ऐसे तमाम पुरूष एकाधिकार क्षेत्रों में क़ामयाब होती महिलाओं के प्रति निर्लज्य ईर्ष्या के भाव की सड़ांध मार रही है ....क्या कहें...सबको सन्मति दे भगवान....

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  2. प्रिय दीदी,
    (संजय भाई के पहले पैराग्राफ से सहमत हूँ.)
    ब्लॉग-लेखन बिलाशक आज बेहद सशक्त जरिया है विचारों के आदान-प्रदान का. आप इससे वाकिफ ही हैं..
    लेकिन अभी मैं एक दूसरी बात कहना चाहता हूँ...
    --ब्लॉग की दुनिया में विकट समस्या इस वक्त विचारों की नहीं, निरंतरता की है. कई कई कारणों से लोग ब्लॉग लेखन में लम्बा-लम्बा गेप देकर चलते हैं और बात बिगड़ जाती है. ब्लॉग लेखन को ऊर्जा अधिक से अधिक टिप्पड़ियों से मिलती है..... और टिप्पड़ियां मिलती हैं लोगों की सतत आवाजाही से. एक बार कोई सटीक लेख पढने के बाद पाठक उस राइटर को जल्दी जल्दी फोलो करते हैं. ..और-और पढना चाहते हैं. ....लेकिन दो या तीन बार में कुछ नया न मिलने पर पाठक मुंह मोड़ लेते हैं. अमिताभ बच्चन को भी अपने ब्लॉग पर
    लगभग प्रतिदिन हाजिरी देनी होती है तब मिलते हैं पढने वाले... कहना ये कि अनियमितता का अब कोई भविष्य नहीं.

    आपसे ये सब इसलिए कह रहा हूँ. ....ब्लॉग की असफलता का ये बड़ा कारण है.

    प्रिय दीदी, ब्लॉग लेखन को आप वाकई एन्जॉय करें. रचनात्मक उत्साह बरक़रार रहे...
    ...देश दुनिया में बहुत सारे पाठक आपके बनें...ऐसी मेरी कामना है...

    (प्रसार भी बेहद ज़रूरी है.....उचित लगे तो आपके कॉलम के साथ ब्लॉग का लिंक देना शुरू करें.)

    पुनश्च : वापसी पर आपसे संपर्क करूँगा.

    आपका
    अवधेश प्रताप सिंह

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