गुरुवार, 12 अगस्त 2010

चश्मे वाली!

'चश्मा?'
जैसे ही लड़की चाय की ट्रे केसाथ कमरे में प्रवेश करती है, उसे देखने आए लड़के वाले चौंकते हैं उसकी आँखों पर चश्मा देखकर! जाहिर है वे चश्मा देखकर लड़की को रिजेक्ट करने के मूड में हैं। लड़की की आँख पर चश्मा उनकी नजर में भारी अवगुण है!

मगर लड़की बेहद स्वाभिमानी, स्वावलंबी और आत्मविश्वासी है। चूँकि उसके नकली अवगुण पर लड़के वाले इसलिए खुलकर अपमानजनक ढंग से आपेक्ष कर रहे हैं कि वे लड़के वाले हैं और इस नाते खुद को बड़ा मान रहे हैं अत: वह इस झूठे आक्षेप को गर्दन झुकाकर स्वीकार नहीं करती। वह तड़ातड़ लड़के की पोल खोलनी शुरू कर देती है कि कैसे बह परीक्षा में नकल करता था, लड़कियों को छेड़ता था। और होस्टल के चक्कर काटते हुए पिटा भी था।

लड़की की बातें इतनी सत्य थीं कि चारित्रिक रूप से ढुलमुल मगर दब्बू लड़का इसके अलावा और कुछ बोल ही नहीं पा रहा था ‍िक 'बाबूजी घर चलिए', 'बाबूजी घर चलिए।' इस नाटक में लड़का बने पात्र की पीठ थोड़ी झुकी हुई भी बताई गई थी यानी लड़का सीधा तनकर नहीं बैठा था। उसका यह झुककर बैठना बड़ा प्रतीकात्मक था। प्रतीक यह कि लड़का स्वभाव व गुणों से रीढ़वाला नहीं था और लड़की चश्माधारिणी थी तो क्या हुआ बुद्धिमान और साहसी थी।

स्कूल में 'रीढ़ की हड्‍डी' एकांकी हमें कोर्स में चलता था। मगर हमारी शिक्षिकाएँ हमसे इन तरह के कोर्स के नाटक व स्कूल की लाइब्रेरी से अन्य कई कहानियों पर आधारित नाटक तैयार करवाती थीं, हर शनिवार प्रार्थना हॉल में होने वाली बालसभा में मंचित करने के लिए। यह नाटक मैडम श्रीमती उषा चौकसे ने तैयार करवाया था। उषाजी हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार हरिकृष्ण प्रेमी की सुपुत्री तो हैं ही साथ ही उन्होंने अँगरेजी साहित्य में भी मास्टर्स डिग्री ली है। अत: वे हमें हिन्दी और अँगरेजी दोनों ही पढ़ाती थीं और पाठ्‍येतर गतिविधियों में भाग लेने को भी प्रोत्साहित करती थीं। नाटक में झुककर बैठने वाले लड़के का रोल मेरी मौसेरी बहन शीला दीदी ने किया था। लड़के का रोल करने के लिए उन्होंने अपनी लंबी चोटी गर्दन की तरफ से कोट में डालकर छुपाई थी, जिससे रीढ़ के झुके होने का आभास और भी प्रबल होता था।

हम लोग दीदी को इस बात के लिए अब भी कभी-कभी चिढ़ा देते हैं। खैर! यह नाटक और भी बातों के लिए याद आता है, जैसे 'चश्मा?' लड़की के चेहरे पर चश्मा देखकर विवाहाकांक्षियों का वैसे ही चौंकना। चाहे वे मन ही मन चौंकें या ऊपर से।

समझ नहीं आता लड़के और लड़की के बीच होने वाले भेदभावों की अनंत कड़ियों में यह मुआ चश्मा अब तक क्यों शामिल है। लड़के के चेहरे पर चश्मा हो तो खास गौर नहीं किया जाना और लड़की के चेहरे पर चश्मे को बदसूरती में गिना जाना निश्चित ही लैंगिक भेदभाव की श्रेणी में आता है। आज भी खूबसूरत मॉडल मोना को बदसूरत लड़की से खूबसूरत लड़की में तब्दील किया गया था तो चश्मा उतारकर ही किया गया था! इस चश्मापुराण का नतीजा यह होता है कि आज भी चश्मा पहनने वाली किशोरी जब शादी की उम्र में कदम रखती है तो माँ-बाप को चिंता सताने लगती है कि अरे! हमारी बेटी तो चश्मे वाली है। कुछ माँ-बाप यह भी सोचने लगते हैं- लड़की को कांटेक्ट लैंस लगवा देंगे। यह सोचे बगैर कि यह एक ऐसा विकल्प है जो जरूरी नहीं कि सबको सूट करे। और सूट न करे तो ‍िफर यह फैशन नहीं मजबूरी हो जाती है। हमारा समाज अपनी बच्चियों को 'लड़की होने' की इन मजबूरियों से कब मुक्त करेगा?

दरअसल विकल्प है सोच का बदलना। चश्मा कोई हौवा नहीं है, न ही बदसूरती का प्रतीक। बस इतना अवश्य किया जा सकता है कि अपने एस्थेटिक सेंस, अपने सौंदर्यबोध का उपयोग करते हुए कोई प्यारी सी फ्रेम सिलेक्ट कर ली जाए, जो आपके व्यक्तित्व पर फबती है। फिर वैसे ही आत्मविश्वास से उसे पहना जाए जैसे आप घड़ी पहनती हैं या अपना पसंदीदा पर्स डुलाती पार्टियों में ‍िशरकत करती हैं। और सच कहें तो अपनी बच्चियों को भी यह बताएँ कि आत्मविश्वास से सुंदर कोई गहना दुनिया में नहीं है।

- निर्मला भुराड़िया

1 टिप्पणी:

  1. ठीक वैसे ही जैसे तमाम ऊँचे लफ्जों के बीच भी बकोल फेयर एंड लवली .....आपकी सफलता का रास्ता जैसे गोरेपन की सीडियो से होकर जाना है.....ओर कमाल देखिये .करोडो का टर्न ओवर है

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