गुरुवार, 7 नवंबर 2013

अब यह न हो शोषक और शोषित का रिश्ता

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एक-दो साल पहले की बात होगी, इंदौर के पास के किसी कस्बे में रहने वाले एक व्यक्ति अपने लिखे एक खंड-काव्य की पाण्डुलिपि लेकर मेरे पास आए, इस आग्रह के साथ कि मैं उस पुस्तक की प्रस्तावना लिख दूं। मैंने उनसे उनके काव्य की विषयवस्तु के बारे में पूछा। तब उन्होंने जो बताया उसके बाद मैंने इंकार कर दिया कि मैं आपकी भावनाओं का आदर करती हूं पर विषयवस्तु से मैं सहमत नहीं हूं अत: मैं प्रस्तावना नहीं लिख पाऊंगी। इस साफ इंकार से उन्हें निश्चित ही बुरा लगा होगा। पर कभी-कभी स्पष्ट कह देना भी अच्छा होता है ताकि शरमा-शरमी में आप सामने वाले व्यक्ति के उस नजरिये को, जो आपको गलत लग रहा है, पुष्ट करने में सहयोग दें। बल्कि हो सके तो साफ बात करके यह बता दें कि आपको इसमें क्या गलत लगा। इससे सामने वाले को भी दूसरे कोण से बात समझने में मदद मिलेगी। यह सज्जन जो खंड-काव्य लाए थे वह मेवाड़ की पन्नाा धाय की कहानी पर था।
हममें से अधिकांश लोग पन्नाा-धाय की कहानी जानते हैं। हममें से कुछ लोगों के कोर्स में 'दीपदान" नामक एकांकी भी था जो यह बताता था कि किस तरह एक बागी, मेवाड़ के राजकुमार उदय का कत्ल करना चाहता था, मगर पन्नाा धाय ने राजकुमार को जूठी पत्तलों के टोकरों में चुपके से रवाना कर दिया और राजकुमार की जगह अपने बेटे चंदन को सुला दिया। बागी आता है, तलवार उठाता है और राजकुमार समझकर धाय-पुत्र चंदन का सिर धड़ से अलग करके चला जाता है। एकांकी का यह दृश्य बेहद हृदय विदारक है, रोंगटे खड़े कर देने वाला है। हम लोगों ने अपने बचपन में इस एकांकी को स्कूली बाल-सभा में मंचित भी किया है। मगर अब बड़े होने पर बात एक भिन्ना कोण से समझ में आती है।
कोई एक बात एक समय-काल-परिस्थिति में प्रसंगवश हो सकती है, मगर जरूरी नहीं कि वह दूसरे समयकाल में जस की तस प्रासंगिक रह जाए। उस समय के मेवाड़ घराने के लिए उन स्थितियों में पन्नाा धाय का बलिदान बहुत महान रहा होगा, मगर आज हम उसका महिमामंडन नहीं कर सकते क्योंकि अब हम एक नई सदी के प्रजातांत्रिक समय में रह रहे हैं। अब कोई भी निष्ठा एक तरफा नहीं हो सकती। निष्ठा को जवाब निष्ठा से देना होगा। अब तो श्रेष्ठिजनों और सामंतों द्वारा पन्नाा धायों का बलिदान चुकाने का समय गया है। अब कोई पन्नाा किसी धनिक मालिक के लिए अपने पुत्र को कुर्बान क्यों करे? और हम ऐसी कुर्बानी को महिमा मंडित क्यों करें? माना कि वात्सल्य भेदभाव नहीं करता पन्नाा के लिए शायद राजकुमार जिसे उन्होंने दूध पिलाया होगा और अपना बेटा बराबर वात्सल्य का अधिकारी रहा होगा। मगर बेटे का बलिदान तो उन्होंने इसलिए किया कि राजा के खून की कीमत उनके खून से ज्यादा थी। राजवंश के खून को बचाना जो था।
अब हम नए समय में रह रहे हैं। एक का खून खून और दूसरे का खून पानी नहीं है। सबका खून एक है। निष्ठा एक अच्छा गुण है। मगर इस गुण की जरूरत तो सबको है श्रेष्ठिजनों को ही क्यों? एक-दूसरे की निष्ठा के सहारे ही हम मजबूत होते हैं। अत: अपने घरेलू मददगारों से निष्ठा की जितनी उम्मीद हमें हैं, उतनी ही निष्ठा उनके और उनके बच्चों के प्रति हमारी भी होना चाहिए। उनके बच्चे जिंदगी की बलि चढ़ जाएं और हम देखते रहें इससे अच्छा है कि हम जिंदगी के ऊंचे शिखरों पर जाने में उनकी मदद करें। सबको शिक्षा का अधिकार है, सबको अच्छे जीवन का अधिकार है। नमक का कर्ज जैसे मुहावरों की अब जरूरत नहीं है। नमक बहुत सस्ता है। अब तो रामू काका के उस स्नेह का कर्ज चुकाने का समय है जो उन्होंने आपको अपने कंधे पर बैठाकर दशहरा दिखाने के वक्त आप पर लुटाया था।


रफ़्तार

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

टर्निंग पॉईंट

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कुछ दिनों पहले हम लोग मध्यप्रदेश के मालवांचल के एक गांव में गए थे, एक पारिवारिक मित्र का खेत देखने। बारिश का मौसम था। चारों और हरियाली थी। हम लोग इस इलाके के प्राकृतिक सौंदर्य की चर्चा कर रहे थे। कभी-कभार कच्ची पगडंडियों पर कोई मोटर साइकल या कोई स्त्री या पुरुष दिख जाता था। कुछ स्त्री-पुरुष खेतों में भी दिखाई दिए थे। स्त्रियां तो लाल-नारंगी चटख रंगों की साड़ियों में थीं। पगडंडी पर इक्की-दुक्की स्त्रियां घूंघट में भी दिखाई दी थी। इस सदी में भी कई स्त्रियां घूंघट में रहने को बाध्य हैं, पर्दा प्रथा अभी पूरी तरह गई नहीं है- इन स्त्रियों को देखकर यह विचार आया। कुछ देर पहले ही खेत-मालिक मित्र ने बताया था कि अपनी किशोरावस्था में जब वे गांव में ही रहते थे, यहां के घर-परिवार और समाज में उन्होंने देखा था कि लोग बात-बात में अपने घर की औरतों पर हाथ उठा देते थे। चूल्हे की लकडी या अन्य किसी चीज से भी ऐसा मारते कि स्त्री घायल हो जाए। और ऐसे दोष लगाकर कि फलां जवाब देती है, मुंह चलाती है, कहना नहीं मानती वगैरह। यानी स्त्री का मूक और आज्ञाकारी होना एक जरूरी चीज थी। जो स्त्रियां परनिर्भर और बगैर पढ़ी-लिखी होती थीं या होती हैं, चाहे वे शहर की हों या गांव की, उनके पास अन्याय का प्रतिकार करने का क्या उपाय है?
खैर! हम खेत पर पहुंचे और सब कुछ चाव से देखा। हरियाली के बीच अपनी तस्वीरें उतारी। फिर मित्र ने कहा खेत के रखवाले रघुनाथ को बुला लें, वो इस इलाके के चप्पे-चप्पे से परिचित हैं आपको आस-पास का इलाका घुमा देंगे। उनसे पूछा कि क्या रघुनाथजी को बुलाने उनके घर जाना होगा? मित्र ने कहा नहीं मोबाईल लगा लेते हैं। मोबाईल की बात सुनकर बहुत आश्चर्य नहीं हुआ। शहरों में भी मोबाईल सर्वव्यापी है। अफसर से लेकर, घरेलू सेवक, दूधवाले, रेहड़ी वाले सबके पास है। सो रखवाले रघुनाथ के पास भी होगा ही। फोन लगाया मगर उठाया रघुनाथ की बेटी ने। उसने कहा हमारी भैंस गुम गई है, तो पिताजी तो भैंस ढूंढ़ने गए हैं। पता नहीं कब तक लौटेंगे।
जब रघुनाथ नहीं मिले तो हम लोगों ने सोचा हम अपनी समझ से और मित्र की किशोरावस्था की यादों के सहारे ही यहां और आसपास के इलाके में भ्रमण कर लेते हैं। इस बीच हमने कई घर, खेत, पगडंडियां, और बसावटें देखीं। लौटते में हम एक कच्चे घर के सामने से गुजरे। दूर से एक लड़की दिख रही थी। मित्र ने आवाज लगाई,'क्यों बेटी, पिताजी गए, भैंस मिल गई?" तो लड़की पास आई। हमने आश्चर्य से देखा लड़की ने बहुत सलीके से शलवार-कमीज पहने थे, करीने से बाल बांधे थे, चप्पल भी पहने थी। वह मालवी बोल रही थी, पर बोली उसकी सलीकेदार थी। हमने बाद में रास्ते में मित्र से कहा कि खेत के रखवाले की बेटी की हमारी कल्पना कुछ और थी। तब मित्र ने बताया कि बच्ची पढ़ी-लिखी है। कॉलेज जाती है। इंदौर में होस्टल में रहकर पढ़ रही है। आज रविवार है इसलिए गांव आई है।
इस परिवर्तन को देखकर किसका मन प्रसन्ना नहीं होगा। कुछ समय पहले गांव में खेतों के रखवाले की लड़की के कॉलेज जाने की किसी ने कल्पना भी की होगी भला? आज इस लड़की पर हाथ उठाने के पहले घर वालों को भी सोचना पड़ेगा। यह टर्निंग पॉईंट है। देश में स्त्रियों की स्थिति में टर्निंग पॉईंट। जब निर्भया वाले प्रकरण में एक हिंसक जबरदस्ती के विरोध में पूरा देश उठ खड़ा हुआ तो यह भी एक टर्निंग पॉईंट था। कल तक बलात्कार की बात छुपाना ही अच्छा समझा जाता था। आज लड़की की मां भी कह रही हैं उसे लड़की का नाम खोलने में कोई गुरेज नहीं है,आखिर उनकी लड़की ने कोई गलत काम नहीं किया है। इस घटना ने लड़कियों की पवित्रता-अपवित्रता को लेकर हमारे सोच में जरा भी परिवर्तन किया तो यह सचमुच बड़ा टर्निंग पॉईंट होगा। तब बलात्कार से कलंकित लड़की नहीं होगी, धब्बा बलात्कारी पर लगेगा। अपवित्र और दूषित वह माना जाएगा जिसने अपराध किया है। टर्निंग पॉईंट आने के बाद भी बदलाव तो धीरे-धीरे होगा, मगर होगा जरूर यह आशा तो हो ही जाती है। अब हम पौराणिक काल से अलग देश-काल में रहते हैं। अब किसी सीता को अग्नि परीक्षा देने की जरूरत नहीं।
निर्मला भुराड़िया

रफ़्तार

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

धर्म और स्त्रियां

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 धर्म क्या है इसकी लंबी-चौड़ी व्याख्या हो सकती है। मनुष्य जीवन में धर्म कब क्यों और कैसे आया होगा इस बारे में भी सिर्फ अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। मगर इतना तय है कि जब दुनिया के झगड़ों-टंटों से घबरा कर इंसान ने शांति चाही होगी तो धर्म अस्तित्व में आया होगा। एक ऐसे एंकर के हाथों अपनी कमान सौंप देना जो सर्वशक्तिमान है, जो सब संभाल लेगा, निश्चित ही एक सुकूनदायी एहसास रहा है और रहेगा। उस सर्वशक्तिमान के प्रति भोला विश्वास रखने वाला व्यक्ति धार्मिक कहलाया। धीरे-धीरे सिर्फ मन:शांति ही नहीं न्यायप्रियता, नैतिकता, कर्त्तव्य परायणता, उदारता आदि भी धार्मिक-गुण माने जाने लगे या कहें भक्ति के साथ ही न्यायप्रिय और नैतिक व्यक्ति धार्मिक भी कहलाने लगा होगा ऐसा अनुमान है। मगर कालांतर में यह प्रक्रिया उल्ट गई और यह समझा जाने लगा कि फलां व्यक्ति धार्मिक है यानी न्यायप्रिय और नैतिक तो होगा ही होगा। यानी धार्मिक होना अच्छा व्यक्ति होने का ठप्पा बन गया। भले वह व्यक्ति अच्छा हो या हो। इस भावना की वजह से ढोंगियों द्वारा धर्म का चोंगा पहनकर ठगने की घटनाएं भी होने लगीं। सोचिए रावण ने साधुवेश धारण किया होता तो क्या सीताजी भिक्षा देने आतीं? अपहरण की वजह लक्ष्मण रेखा लांघना नहीं साधुवेश धारी व्यक्ति पर भोला विश्वास करना था। दुनिया में ऐसा होता रहा है कि बहुरुपिए धार्मिक व्यक्ति का वेश बनाकर विश्वासियों को लूटते आए हैं इसीलिए तो बगुला भगत, मुंह में राम बगल में छुरी, राम-राम जपना पराया माल अपना जैसी कहावतें अस्तित्व में आई हैं। मगर सवाल यह है कि इतना सब होने के बाद भी लोग जागरुक और चौकन्नो क्यों नहीं होना चाहते?
वक्त के साथ दुनिया का रुप-रंग बदलता रहता है। जो चलन कल अच्छा रहा हो वह आज भी उसी के इसी रुप में प्रासंगिक हो यह जरुरी नहीं। समय, काल, स्थान, परिवेश के हिसाब से जीवन को सुंदर और निष्कंटक बनाने के लिए नए-नए  प्रयोग होना चाहिए, नई रीतों का जन्म होना चाहिए,पुरानी को भी जरुरत हो तो खंगाला, परिवर्तित किया जाना चाहिए। मगर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई कोई भी धर्म हो देखा यह गया है कि धर्म के ठेकेदार उसे जड़ता प्रदान करने में सारा जोर लगाए रहते हैं और आम व्यक्ति धर्म में गई किसी बुराई की तरफ ऊंगली उठाने में डरता है क्योंकि वह इस पाप बोध के साथ बड़ा होता है कि यह तो धर्म की निंदा करना हुआ। ठेकेदार उसकी इस भावना को लगातार ब्रेनवॉश करके पोषित करते रहते हैं। इसके बावजूद भी धर्म के घोल में किसी को कोई किरकिरी दिख रही है और वह इस तरफ इशारा करना चाहे तो धर्म के निहित स्वार्थी, अंधविश्वासी, कट्टरपंथी और ठेकेदार तूफान मचा देते हैं। गोया धर्म का दूसरा नाम असहिष्णुता हो।
धर्म ने स्त्रियों को कुछ मुठ्ठी उल्लास, आजादी और थोड़ी मन:शांति भी अवश्य दी है। घर में सीमित स्त्रियों के लिए वार-त्योहार मनाना, मंदिर आदि जाना, उत्सवों में नाचना-गाना, खाना-पीना, सखियों से मिलना जैसे कई मौके धर्म ने हमेशा उपलब्ध कराए हैं। मगर धर्म के नाम पर पाबंदियां भी सबसे ज्यादा स्त्रियों ने ही झेली हैं। लिपि का आविष्कार होने के बावजूद भी लंबे समय तक हमारे यहां धर्म शास्त्रों एवम् अन्य ज्ञान का एक दिमाग से दूसरे दिमाग तक ही हस्तांतरण होता रहा, वह भी एक खास जाति के लोगों के बीच ही। अत: यह ज्ञान स्त्रियों और शूद्रो के बीच पहुंचा, पहुंचने दिया गया। फिर शुरु हुई धर्मशास्त्रों की स्वार्थी व्याख्याएं जिन्होंने स्त्री को दासी बनाकर रखा। किसी भी चीज में ऐसा कह दिया जाता कि यह तो धरमशास्त्र में लिखा है और स्त्री दमन को जायज ठहरा दिया जाता। कारण पूछने की आज्ञा स्त्री को नहीं थी। उसे तो जो कहा गया वो करना था। खुद उसकी भी कंडीशनिंग ऐसी की जाती कि उसे दमन में भी अपनी धार्मिकता और नैतिकता दिखाई देती। जैसे शास्त्रों का हवाला देकर स्त्री के सती होने को महिमामंडित किया जाता था। ताकि उसे लगे वह कोई महान धार्मिक कार्य करने जा रही है और पुरुषों को स्त्री को सती बनाने के लिए इस तरह समझाया जाता था कि इससे उसे स्वर्ग मिलेगा। धर्म के नाम पर एक इंसान को जिंदा जलाने की यह प्रथा लंबी चली और इसे खत्म करने की पहल का धार्मिक कर्मकांडियों ने बहुत विरोध किया था। धर्म के नाम पर बहुत सा भेदभाव आज भी जारी हैजिसे खत्म करना इसलिए मुश्किल होता है चूंकि वह धर्म के नाम पर होता है। एक संप्रदाय में धार्मिक रिवाज के तहत स्त्रियों के जननांग को किया भंग यिा जाता है। धर्म के नाम पर किसी में पर्दा प्रथा है, तो किसी में एक से अधिक पत्नी रखना जायज। एक संप्रदाय विशेष में नन्ही बच्चियां दीक्षा ले लेती हैं। कोई कुछ नहीं कर सकता, बल्कि इस बात का महिमामंडन होता है।
आज स्त्रियां घर से बाहर निकल रही हैं, शिक्षा ले रही हैं, दुनिया को देख समझ रही हैं, उनका एक्सपोजर पहले जितना सीमित नहीं है तो फिर उन्हें अपनी आंखें और दिमाग भी खुला रखना सीखना चाहिए। बात कोई भी हो उसका न्याय और तर्क समझना जरुरी है। चाहे वह धर्म संबंधी बात ही क्यों हो। विश्वास अच्छा है मगर अंधविश्वास नहीं।
निर्मला भुराड़िया

रफ़्तार