शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

सच कह दो और सुखी रहो!

मेरे व्यक्तिगत मेल पर एक युवती का पत्र आया है, जिसके माध्यम से उसने अपनी एक उलझन व्यक्त की है और उलझन का समाधान भी चाहा है। उसके पत्र का सार यह है कि उसकी सगाई हो चुकी है, वह एपिलेप्सी यानी मिर्गी की मरीज है। मिर्गी बिलकुल नियंत्रण में है, बस नियमित दवा लेनी होती है। मगर उसे कोई बीमारी है, यह बात भावी पति व उनके परिवार को पता नहीं है। लड़की के परिवारजनों, परिचितों, मित्रों का कहना है कि शादी तक बीमारी की बात छुपाए रखना चाहिए नहीं तो सगाई टूट जाएगी! शादी के बाद बता दें कि माइग्रेन की दवा चल रही है या पूरी बात भी पता चल जाए तो ‍िफर क्या शादी के बाद तो वो लोग समझौता कर ही लेंगे!

लड़की रिश्तेदारों के इस सुझाव से सहमत नहीं है, मगर शादी करने की इच्छा है अत: थोड़ी डगमग भी है। जहाँ तक सलाह का प्रश्न है तो उसे यही सलाह दी जा सकती है कि वह अपनी आत्मा की आवाज सुने, लालची मन की नहीं और नासमझ रिश्तेदारों की तो बिलकुल भी नहीं, क्योंकि शादी की बुनियाद ही विश्वास पर बनती है, सही तथ्य छुपाकर किसी से जीवनभर का गठबंधन करना छल की श्रेणी में आएगा। यदि वह लड़का सच जानकर भी शादी करना चाहता है तभी वह उपयुक्त पात्र है अन्यथा नहीं। नहीं तो जीवन की राह में कोई और आएगा जो आपको आप जो भी है उसके सहित प्रेम करेगा। क्योंकि प्यार में शर्त, समझौता, सौदा या धोखा कुछ भी ठीक नहीं। जहाँ तक मिर्गी का सवाल है, कोई भी समझदार आदमी समझता है कि अब यह बीमारी कोई कलंक नहीं मानी जाती, बस यह जीवन के समांतर चलने वाली एक उलझन भर है जिससे जू्झते हुए बड़े-बड़े खिलाड़ी तक सफल जीवन जी रहे हैं और खेल जैसी शारीरिक गतिविधि में करियर भी बना रहे हैं। खैर हम मिर्गी की बात एक ओर रखकर इस लड़की के पत्र के बहाने एक अन्य प्रवृत्ति पर चर्चा करें। भारतीयों का एक बड़ा प्रतिशत अरेन्ज्ड शादियाँ करता है। उसमें कुछ मामलों में आय गलत बताने, बीमारी छुपाने जैसी बातों के अलावा अनगिनत छोटे-मोटे छल ‍िकए जाते हैं, जैसे हाइट एक इंच ज्यादा बता देना (कोई इंच टेप से थोड़े नापने वाले हैं!) लड़की की डिग्री गलत बता देना (बस ग्रेजुएशन का फाइनल ही तो नहीं किया है!), दूसरे का बनाया व्यंजन लड़की ने बनाया बता देना (अपने घर जाकर रोटी जलाएगी तब देखेंगे, बता देंगे किचन में पाँव नहीं धरा!), छोटी को दिखाया बड़ी की शादी कर दी (सगाई पश्चात मिलने-जुलने के प्रोग्राम ने इस पर थोड़ी रोक लगाई है)।


ठीक है व्यक्ति उस दिन अपने सर्वश्रेष्ठ का प्रदर्शन करना चाहता है, मगर श्रेष्ठ दिखने के लिए झूठ और उधार का सहारा लेना लिजलिजेपन को जन्म देता है। विवाहरूपी कांट्रेक्ट के सील हो जाने तक हर जानकारी गलत बताना या जानबूझकर अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ छुपाना रिश्ते की बुनियाद ही झूठ पर रखना होगा। सच न बताना छल की श्रेणी में भी आएगा, जिसका पता चलने पर कड़ुवाहट स्वाभाविक है, जबकि सच बताने पर ऐसे ही दरियादिल व्यक्ति से रिश्ता बनने की संभावना होती है साफगोई जिसके दिल को छू जाती हो, जो सच बता देने की हिम्मत की कद्र करना जानता हो। प्रेम भी वही कर सकता है, जो आपको आपकी कमियों सहित चाहता हो, वर्ना.... कम्प्रोमाइज तो है ही पर उसमें क्या दम है? रिश्ता घसीटने के लिए रिश्ता जोड़ने का क्या मतलब?



सच कह देने में व्यक्ति की आजादी भी है। स्वतंत्र किस्म के व्यक्ति अपने सही-गलत दोनों का उत्तरदायित्व खुद लेते हैं। झूठ गुलामी है, जिसे आपने किसी अन्य को प्रसन्न करने के लिए बोला। झूठ में हर वक्त का भय है, पोल खुलने का भय, मीठी परत के कभी भी सरक जाने का भय। आप साफगो हैं तो आप आजाद और मुक्त हैं। परिणाम आप उसी वक्त भुगतने को तैयार हैं, तो परिणाम का भय
पाले रखने का तनाव नहीं। अत: बता देने में मुक्ति है, छुपाने में बोझ। पारदर्शिता इसीलिए अच्छी है।

- निर्मला भुराड़िया
http://www.nirmalabhuradia.com/

सोमवार, 13 सितंबर 2010

थर्ड जेंडर!

आम चुनाव की ‍िरपोर्टिंग का समय था। जिस वार्ड का कवरेज करना था, वहाँ किन्नरों की भी बस्ती है। जी हाँ, ये वे इंसान हैं, जो न पूरी तरह स्त्री न ही पुरुष में विकसित हो पाए। लेकिन प्रकृति के इस दोष की सजा समाज ने इन्हें दी ‍िनष्कासित करके। उस दिन उनके संसार में तनिक झाँकने का मौका मिला तो कुछ किन्नरों से बातचीत की, कुछ उनका जीवन भी देखा। वहाँ एकदम आगे के कमरे में उनकी गुरु बैठी थीं। वे चारपाई पर बैठकर माला फेर रही थीं। एक अन्य कमरे में सिर पर मेहँदी लगाए कुछ किन्नर गपशप कर रहे थे। एक अँधेरा रास्ता ऊपर जाता था, जिसके बीच में एकमजार थी। किन्हीं पूर्व गुरु की। ऊपर पहुँचकर मंदिर जैसा कोई कमरा था, जहाँ कुछ तस्वीरें और मूर्तियाँ रखी थीं। अगरबत्ती जलकर रहस्मयमय वातावरण पैदा कर रही थी। वहाँ किन्नर मालती ने बताया ‍िक उन लोगों में गुरु परंपरा होती है। गुरु ही उनकी सबकुछ होती हैं। उनका आदेश सर्वोपरि होता है। उनका घर देखकर लौटते में ओटले पर किन्नर रेखा और उषा बैठी पैर हिलाती मिलीं। रेखा से जब पूछा ‍िक वह कहाँ की है और यहाँ कैसे आ गई तो उसने कहा- वह राजस्थान के ‍िकसी गाँव की है। तीन महीने की थी तब माँ-बाप ही छोड़ गए। 'आखिर मैं उनके ‍िकस काम की थी?' रेखा शायद आगे की कहानी भी बताना चाहती थी पर पास बैठी ‍िकन्नर उषा ने कोहनी का टरका ‍िदया और फुसफुसाई- 'अखबार वाली है....' यह सुनकर रेखा चुप हो गई और जैसे अपनी ‍िजंदगी की कैफियत-सी देती हुई बोली- 'मैं बहुत खुश हूँ, हम यहाँ मजे से रहते हैं।' पर रेखा के शब्दों के पीछे से छलकती पीड़ा उसके चेहरे पर साफ देखी जा सकती थीं। उसके शब्द बाद में भी ‍िदमाग में गूँजते रहे कि मैं माँ-बाफ के ‍किसी काम की नहीं थी?

'किसी काम की नहीं थी' का क्या मतलब। पहली बात माँ-बाप को वही बच्चे प्यारे होते हैं, जो उनके ‍िकसी काम के होते हैं। दूसरी बात निर्धारित ‍िलंग का न होना मतलब यह नहीं ‍िक व्यक्ति मुख्यधारा का कोई और कार्य नहीं कर सकता। यदि रेखा या कोई और ‍िकन्नर सबके जैसे पढ़ती-लिखती या कोई सामान्य हुनर सीखती तो वह दुनिया का कोई भी सामान्य कार्य कर सकती थी। उसे नाच-गाकर और द्वार-द्वार जाकर लगभग भिक्षा की तरह शगुन माँगने की जरूरत नहीं थी। न ही अपने गाँव और परिवार से बिछुड़ने की यह कोई वजह थी ‍िक वह लड़का या लड़की नहीं है। अत: वह समाज की मुख्यधारा में आखिर क्यों नहीं रह सकती थी? इस सदी में भी हमारे ये नागरिक कबीला बनाकर रहने को ‍िववश होते हैं, क्योंकि बाहरी दुनिया उन्हें अपमान और वंचना ही देती है। उन्हें हँसी और दुत्कार का पात्र बनाती है। वही उनकी जीवन व्यवस्था है अत: वे भी कमाई के लिए कभी-कभार शगुन माँगते-माँगते रुपए ऐंठने या ध्‍यानाकर्षण के लिए फूहड़ हरकत करने पर उतर आते हैं। आखिर अपनी ही तरह के इंसानों को अपने ही समाज में बहिष्कृत, ‍िनष्कासित, अलग-थलग कर देने वाली कुप्रथा कब तक चलेगी। क्यों नहीं वे मुख्यधारा में आ सकते? क्यों नहीं वे समाज में इस तरह घुल-मिल सकते हैं ‍िक उनका व्यक्तिगत शरीर दोष उनका निजी सीक्रेट ही रहे। फिर आज तो इस तरह के ऑपरेशन और हरमोन ट्रीटमेंट भी होने लगे हैं, ‍िजनके जरिए अनिश्चित लिंग को किसी एक ‍िनश्‍चित लिंग तथा स्त्री या पुरुष में बदला जा सकता है। और ये ऑपरेशन सिर्फ विदेशों में ही नहीं होते, भारत में भी होते हैं। यहाँ भी सिर्फ मेट्रोज में नहीं, सामान्य शहरों में भी होते हैं। इस मामले में जानकारी, जागरूकता और जनचेतना का प्रसार होना निहायत जरूरी है।

स्वयं के ही लाभ की बात का विरोध निकन्नरों की बस्ती से आ सकता है। कई बार कुप्रथाओं का शिकार व्यक्ति भी परिवर्तन का ‍िवरोध करता है, क्योंकि चेतना की रोशनी ही उस तक नहीं पहुँची। नतीजतन अँधेरा उसे रास आने लगता है, बल्कि कहें वही अँधेरा गड्‍ढा उसका कम्फर्ट जोन बन जाता है। व्यक्ति पुरानी व्यवस्था की सुविधा का अभ्यस्त हो जाता है और उस व्यवस्था को भंग करने से डरता है। पुरानी व्यवस्था में उसके 'आका' बन चुके लोग भी उस तक रोशनी की किरण नहीं आने देना चाहते, क्योंकि रोशनी पहुँचने के बाद वह उनका गुलाम नहीं रह जाएगा यह डर उन्हें सताता है। जैसा ‍िक देवदासी प्रथा के सन्दर्भ में भी अक्सर होता आया है। किसी निर्धन, अशिक्षित परिवार द्वारा स्वयं ही अपनी कन्या दान में दे दी जाती है, क्योंकि स्वार्थी पुजारी व देह व्यापारी उन्हें समझाकर रखते हैं ‍िक ऐसा करना मंगलमय है। देवदासी बनने की पात्र लड़की शादी करने से रुक जाती है, क्योंकि उनके ‍िदमाग में यह अंधविश्वास कूट-कूटकर भरा गया होता है कि शादी कर लेने से उसके परिवार का अनिष्ट होगा।

दुनिया की अन्य जगहों पर ट्रांसजेंडर लोगों के ड्रेग शो वगैरह होते हैं, छिटपुट घटनाओं की तरह, पर यूँ भारत की तरह अनिश्चित लिंग वाले व्यक्ति समाज से छिटका कर नहीं रखे जाते। नई, मॉडर्न सदी में ठेठ पुरानी इन अमानवीय परंपराओं से पार पाने के बारे में कुछ सोचा जाना चाहिए। मगर इस बारे में कुछ सोचने, समझने, करने की सामाजिक इच्छाशक्ति कहाँ है? समाज और राजनीति ऐसे मुद्दों में उलझी हुई है ‍िक जिसका इंसान के तात्कालिक जीवन से कोई वास्ता ही वहीं है।

- निर्मला भुराड़िया
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रविवार, 12 सितंबर 2010

भोपाल-गंध

दुर्योग से दो और तीन दिसंबर 1984 की दरमियानी रात को हम लोग भोपाल में थे। बंगलोर जाने के लिए सुबह पाँच बजे जीटी एक्सप्रेस पकड़ना थी। पहले स्टेशन के वेटिंग रूम में ही समय काटने का सोचा, फिर लगा कुछ घंटों ही सही ठीक से नींद हो जाए तो अच्छा, अतः होटल पेगोड़ा आ गए। देर रात समय की बात होगी, महसूस हुआ रोशनदान से कोई तीखी गंध कमरे में आ रही है। लगा एक-दो मिनट में सेटल हो जाएगी। लेकिन नहीं हुई। तब सोचा दूसरी दिशा की खिड़की खोलकर साँस लें, शायद इस तरफ तो कुछ जल रहा है। मगर गंध तो उस दिशा में भी थी। धीरे-धीरे साँस लेना मुश्किल होने लगा तो दरवाजा खोला जो सीधे बालकनी में खुलता था। मगर राहत नहीं मिली, दम घोटने वाली हवा तो पूरी फिजाँ में थी। बुरी तरह दम घुट रहा था, साँस लेना मुश्किल था। हम लोगों ने एक अटकल यह लगाई शायद दंगा हो गया हो और पुलिस ने अश्रुगैस छोड़ी हो। पति को अस्थमा की शिकायत है तो एंटी हिस्टेमेनिक दवाएँ साथ रहती हैं। तो हम लोगों ने बाथरूम में जाकर नल के पानी से ही एक-एक एंटी एलर्जिक निगल ली थी ताकि एलर्जिक रिएक्शन से बच सकें। इसके अलावा पानी से खूब मुँह धोया और गीला रुमाल नाक-मुँह पर लपेटा इस तर्क के साथ कि गैस कोई भी हो पानी में घुलनशील होगी। मगर दम घुटना बढ़ता गया तो हमने सामान होटल में ही छोड़ दिया और कमरे का ताला लगाए बगैर ही होटल से निकल आए। यूँ कह सकते हैं कि जान बचाने के लिए भागे। सड़क पर आए तो पता चला कि हम अकेले ही नहीं हैं, चारों तरफ अफरातफरी मची हुई थी। सभी लोग जान बचाने के लिए भाग रहे थे। कोई पैदल, कोई स्कूटर पर, बस, कार जिसको जो भी मिला। बूढ़े, बच्चे, स्त्री, पुरुष, जवान सभी रात के आधे-अधूरे कपड़ों में। कोई दौड़ते-दौड़ते पटरियों पर ही मर गया था, कोई खाँस रहा था, कोई रो रहा था, चिल्ला रहा था। पता नहीं था कि यह गैस क्या है? कहाँ से आ रही है? तो कई बेचारे तो यूनियन कार्बाइड की दिशा में ही भाग रहे थे, मौत के मुँह में जाने के लिए। हम लोगों के पास भी अपना कोई वाहन तो वहाँ नहीं था अतः हम पैदल ही बस स्टैंड पहुँचे। वहाँ भी सभी बसें ड्रायवर सहित भाग चुकी थीं। सौभाग्य से एक बस बच गई थी जिसका ड्रायवर सिख था। उसकी बस स्टार्ट नहीं हो रही थी। हम पाँच-सात लोग थे, उन्होंने धक्का लगाया और जाने कैसे बस स्टार्ट हो गई, हम सब बैठ गए फिर बस ने सीहोर पहुँचकर ही दम लिया। उस बस में भी एक यात्री ने हमारे देखते ही देखते दम तोड़ दिया था। दूसरे दिन मेरी आँखें सूजकर बंद हो गई थीं, रोड भी हाथ पकड़कर क्रास करवाना पड़ा था। छाती में भी दर्द था, महीनों तक जिसका इलाज करवाना पड़ा। पता चला स्टेशन पर तो ताँगे के घोड़े तक मर गए थे, मनुष्य तो मनुष्य यानी हम वेटिंग रूम में रुके होते तो नहीं बचते। सो जान तो बच गई, मगर दिमाग में एक चीज रह गई वह थी "भोपाल की गंध"। उस घटना का यह असर हुआ कि अक्सर फैक्टरियों के प्रदूषकों, सड़क पर पड़े कचरे के ढेर आदि में से ऐसा एहसास होता है गंध आ रही है, वही दमघोंटू, जानलेवा गंध, मन ने जिसका नाम भोपाल-गंध रख दिया है।

भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कचरे के निपटान की बात इंदौर के समीप पीथमपुर में करने की चल रही है। पीथमपुर के आसपास के रहवासी, ग्रामीण, इंदौर के शहरी स्वयंसेवी संगठन आदि इसके खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। नागरिकों की यह जागरूकता और जनकल्याण संघों की यह सकारात्मक आक्रामकता और सक्रियता प्रशंसनीय है। यदि हम जागृत हैं तो हम पर कोई बुरी चीज ऐसे ही नहीं लादी जा सकती। मगर पीथमपुर के भस्मक से उठने वाले संभावित जहरीले धुएँ की तरह और भी चीजें हैं जिनका हम सबको सक्रिय विरोध करना चाहिए। वह है हमारे सभी छोटे-बड़े शहरों में फैला गंदगी का ढेर, जो दिन-रात हमारे आसपास "भोपाल-गंध" उगलता रहता है। हमको बीमार करता रहता है। सभी नागरिकों, नागरिक संघों, रहवासी संघों आदि को यह कचरा, गंदगी न फैलाने, नगरपालिकाओं को कचरा उठवाने, सफाई करवाने में इतनी ही सक्रियता और आक्रामकता दिखाना चाहिए जितनी पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड का कचरा नष्ट करने वाले मामले में दिखाई जा रही है। रोजमर्रा की जिंदगी में हम लोगों द्वारा स्वयं फैलाई जाने वाली और न उठवाई जाने वाली गंदगी कितने बैक्टेरिया, कितनी बीमारियाँ, कितनी जहरीली गैसें धीरे-धीरे, न मालूम तरीके से उगल रही हैं यह मालूम रखना भी जरूरी है। नागरिक कल्याण संघों, गृहिणियों, कॉलोनियों के रहवासियों की सकारात्मक आक्रामक सक्रियता से यह भी संभव है।

- निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

जिओ जिंदगी 'लाइव'!

दुनिया शेर दिल लोगों को पसंद करती है। घिघियाहट तात्कालिक दया जरूर उत्पन्न कर सकती है, लेकिन लोगों का आपके प्रति विश्वास नहीं पैदा कर सकती, न ही आपका खुद के प्रति विश्वास। शायद इसीलिए शेर की प्रवृत्ति में से इस बात को हाईलाइट किया गया है कि 'शेर ‍िकसी और का किया हुआ शिकार नहीं खाता!' यानी जंगल का राजा शेर सिर्फ सत्ता का ही नहीं साहस, स्वाभिमान और स्वावलंबन का भी प्रतीक है। मन ही मन में हर व्यक्ति चाहता है कि वह 'सिंह' हो।

सुनहरे अयालों वाले सिंह और बाघ को भी अमूमन आम आदमी शेर के नाम से ही पुकारता है। वह शेर बन नहीं पाता तो उसको बहुधा प्रतीक के रूप में चुनता है। आप दुनिया के ‍िकसी भी हिस्से में रहते हों इंसानी मनोविज्ञान लगभग एक-सा ही होता है। शायद यही वजह है कि सांस्कृतिक या धार्मिक उत्सवों, जुलूसों, नाटको में 'शेर बनना' या शेर के मुखौटे प्रयुक्त करना पूरी रचनात्मकता के साथ शामिल है।

अमेरिका के फिलाडल्फिया में हर वर्ष 1 जनवरी को 'ममर्स परेड' निकाली जाती है, जिसमें शेर के बड़े-बड़े मुखौटे धारण ‍िकए लोग सड़कों पर नाचते-गाते निकलते हैं। फिलाडल्फिया में यह प्रथा अप्रवासियों के साथ योरप से आई। भारत में भी नृसिंह जयंती जैसे उत्सव होते हैं जिसमें 'आधा सिंह-आधा मनुष्य' रूप वाले 'नृसिंह' ईश्वर के रूप में उपस्थित होते हैं और हिरणाकश्यप नामक राक्षस-राजा से अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा करते हैं। इंदौर के नृसिंह बाजार के नृसिंह मंदिर के ओटले पर हर वर्ष नृसिंह जयंती को इस कथा का नाट्‍यरूप बाकायदा मंचित ‍िकया जाता है। जय नृसिंह के उद्‍घोष के साथ भगवान नृसिंह का जुलूस भी निकाला जाता है। इसी प्रकार मोहर्रम का शेर बनाने की मन्नत भी लेते हैं। लोग अपने बच्चे को मोहर्रम का शेर बनाने की मन्नत भी लेते हैं। उत्तरप्रदेश के बहुरूपिए शरीर पर पीली-काली धारियाँ पेंट करके शेर का रूप धारण करते हैं, फिर कुश्ती भी लड़ते हैं।

दरअसल इन सब बहानों से मनुष्य अपने मनोभावों को अभिव्यक्त करता है। फिर ऐस उत्सव, त्योहारों से उमंग और जोश भी तो बढ़ता है। मिलना-जुलना, सामूहिक रूप से नाचना-गाना भी तो होता है। ऐसे उत्सवों की तैयारी की भी अपनी रचनात्मक सक्रियता होती है। जैसे कि ममर्स परेड के लिए फिलाडल्फिया में लोग महीनों पहले पोशाकें तैयार करना, नृत्य के स्टेप्स सीखना, बैंड के साथ संगीत तैयार करना शुरू कर देते हैं। यही नहीं ऐसी तैयारियों में मानव रिश्तों की ऊष्मा भी होती है। टी.वी., इंटरनेट के जमाने में तो ऐसे सांस्कृतिक उत्सवों का महत्व और बढ़ जाना चाहिए ताकि लोग मशीनों से चिपके रहने के बजाए निकलें, रेडीमेड दृश्य देखने के बजाए दृश्य रचने का आनंद लें और जीवन का 'लाइव' मजा उठाएँ।

- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 8 सितंबर 2010

कॉस्मिक न्यूट्रीशन

एक सज्जन कई साल अमेरिका रहे। अब कुछ समय से भारत के एक महानगर में रह रहे हैं। वहाँ वे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्य करते हैं। सूट-टाई या ब्रांडेड कपड़े पहने जाना एक तरह से उनके आसपास के माहौल का अलिखित ‍िनयम है। पिछले ‍िदनों वे मध्यप्रदेश में अपने गृहनगर आए थे। बातों ही बातों में कहे लगे- 'मुझे तो मोटे ऊन का स्वेटर पहनने की बहुत इच्छा होती है।' इस पर उन्हें सुझाव दिया गया- 'तो वह आप खरीद सकते हैं, बाजार में मिल जाएगा।' इस पर उन सज्जन ने कहा- 'मैं जो चाहता हूँ वह बाजार में कहाँ मिलेगा। मुझे तो वैसा स्वेटर चाहिए जैसा बचपन में होता था माँ के हाथ का थोड़ा ढीला, थोड़ा आड़ा-तेढ़ा बुना हुआ। जिस पर से स्कूल की प्रार्थना सभा में से साथी ऊन खींच-खींचकर कॉपियों में इकट्‍ठा करते थे, एक-दूसरे की स्वेटर पर काँटे वाले बीज फेंका करते थे जो स्वेटर पर चिपक जाते थे...'

खैर यह सज्जन जो कह रहे थे, वह एक भूली हुई मिठास को याद करने से अधिक कुछ नहीं था। मगर एक बात महसूस हुई कि इन ‍िदनों 'मोटा खाओ-मोटा पहनो' जैसी बातें ‍िफर होने लगी हैं। हालाँकि ये बातें सादगी के दृष्टिकोण से न होती हों पर इस दृष्टिकोण से जरूर होने लगी हैं कि लोग अपरिष्कृत चीजों में स्वास्थ्य खोजने लगे हैं। लोग यह महसूस करने लगे हैं, जो कुछ प्रकृति से जुड़ा है वह जीवन को सौंधापन देता है।

इन ‍िदनों ग्लॉसी पत्रिकाओं के स्वास्थ्य स्तंभ ऐसे सुझावों से भरे पड़े हैं, जिनमें लोगों से पॉलिश किया हुआ चावल खाने के बजाए मोटा चावल खाने, परिष्कृत शकर न खाने, मैदे के सफेद ब्रेड के बजाए ब्राउन ब्रेड खाने की अपील की जाती है। जूस और कोल्ड ड्रिंक्स को नकारकर साबुत फलों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। इन्हें 'मूड फूड' बताकर आधुनिक लोगों को बताया जा रहा है, छिलके और लुदगी सहित खाए जाने वाले फल उनके पेट और उनके 'मूड' के लिए ‍िकतने अच्छे हैं। इसी तरह, बाजरा, मक्का, गेहूँ आदि अन्न और दालें आधुनिक पोषण आहारियों की सुझाई 'फूड डायरियों' में सबसे ऊपर हैं। चोकर का 'विटामिन ई' फिल्मी सितारे चेहरे पर भी लगा रहे हैं और खा भी रहे हैं। इसी तरह की एक आधुनिक सौंदर्य-स्वास्थ्य सलाहकार ने तो धूप, हवा, रात्रिकालीन निद्रा को 'कॉस्मिक न्यूट्रीशन' की संज्ञा दी है। बाजार में ऐसे उपकरण भी बहुत आ गए हैं, जिससे व्यायाम करने के लिए कभी आपको घट्‍टी पीसने की एक्टिंग करना होती है, कभी दही बिलौने की तो कभी साइकल चलाने की।

तात्पर्य यही कि 'मोटा खाओ, मोटा पहनो और धमककर काम करो' वाली कहावत किसी भी युग में महत्वपूर्ण रहेगी। भले ही उसे कहने का ढंग और शब्दावली बदल जाए। अति कृत्रिमता और यांत्रिक जीवन की अधिकता अंतत: इंसान को रास नहीं आती। वह फिर अपने ढंग से प्रकृति की नजदीकी में आनंद के तत्व ढ़ूंढने लगता है। भले फिर वह सौंधी मिट्‍टी के खुशबू से बना सेंट खरीदना हो या तारों भरी रात में अलाव के आस-पास नाचना-गाना, कैंपफायर आयोजित करना।

- निर्मला भुराड़िया

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

न ‍िजयो गपागप

भोजन और स्वास्थ्य संबंधी एक किताब में एक दिलचस्प विश्लेषण पढ़ने में आया। इस विश्लेषण के अनुसार मूँगफली के ‍िनकले हुए दाने आपको वह संतुष्टि नहीं देंगे जो संतुष्टि आप मूँगफलियाँ फोड़-फोड़कर दाने निकालकर खाने में पाएँगे। यह सच है, भोजन सिर्फ स्वाद ही नहीं देता मनुष्य की ‍िरक्तता भी भरने का काम करता है। इसीलिए कभी-कभी भूख हो न हो, तब भी खालीपन भरने के लिए लोग आलू चिप्स और सेंव-मिक्स्चर के पैकेट के पैकेट साफ कर जाते हैं। मगर यह भोजन पौष्टिकता नहीं देता ‍िसर्फ कैलरी, मोटापा और बीमारियाँ देता है।

आधुनिक अनुसंधानकर्ताओं का कहना है, जब भोजन के साथ प्रयास जुड़ जाएँ, तो वह भोजन ज्यादा स्वास्थ्यकारी, ज्यादा आनंदकारी हो जाता है। मसलन, वे कहते हैं- गपागप खाई जाने वाली ‍िकसी चीज के बजाए आप संतरा छीलकर खाएँगे तो यह भोजन स्वाद और पौष्टिकता के साथ ही 'स्ट्रेस बस्टर' का भी काम करेगा, क्योंकि यहाँ आपने ‍िदमाग के स्वाद केन्द्र के साथ ही अपने हाथ और मुँह को भी काम में जुटा ‍िलया है। यानी सीधी सी बात यह है कि किसी चीज में हम प्रयास जोड़ लें तो वह रिक्तता भरेगी। बगैर प्रयत्न के ‍िमलने वाली चीजों का कई बार हमारी खुद की ही नजर में कोई महत्व नहीं होता।


अमेरिका के अतिसंपन्न रॉकफेलर परिवार का एक उदाहरण है। इस परिवार के पास अनंत धन-संपत्ति-यश रहा है, लेकिन इस परिवार का एक पुत्र आलीशन जिंदगी के सब ऐशो आराम तजकर एक लातीन अमेरिकी देश के एक पिछड़े कबीले में रहने चला गया था। जहाँ वह कामकाज से भरी दिनचर्या में आनंद पाता था। परिवार ने बहुत समझाया पर वह नहीं माना, क्योंकि उसे उस ऐशो आराम में बहुत ऊब और रिक्तता महसूस हुई जो उसने नहीं कमाया था, क्योंकि अर्जित करने का आनंद तभी आता है, जब आप उसे अपने प्रयास से प्राप्त करते हैं। यदि यह लड़का कबीले की तरफ नहीं जाता तो शायद कोकीन की तरफ जाता, क्योंकि उसके पास कर्म का आनंद और एचीवमेंट का नशा नहीं होता। अत: अतिसुविधामय जीवन की ऊब भरने के लिए कोकीन लगती।


दरअसल, जैसे गपागप खाने वाली चीजों में आधा मजा है, उसी तरह पकापकाया, रेडीमेड जीवन जीने में भी आधा ही मजा है। जीवन का असली मजा है लगे रहने में। कर्मशील व्यक्ति को जिंदगी धूप में बैठकर 'छोड़' खाने की तरह आनंदमयी लगती है।


- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 1 सितंबर 2010

माँ


ब्रह्मांड सुंदरी प्रतियोगिता में भारतीय सुंदरी सुष्मिता सेन से एक सवाल ‍िकया गया था- जीवन का सार क्या है? उन्होंने कहा 'मातृत्व'। और इस जवाब ने उन्हें ताज पहनवा ‍िदया। क्योंकि जवाब सचमुच बहुत सटीक था। हालाँकि मातृत्व का संबंध ऐसे किसी भी तात्कालिक स्वार्थ से नहीं है। मातृत्व नि:स्वार्थता का चरम है। इसीलिए किसी भी इंसान के ‍िलए माँ का प्यार जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपहार है, तो मातृत्व स्वयं स्त्री के ‍िलए भी ईश्वरीय वरदान है, जिसमें वह प्रेम के आध्यात्मिक चरम को पा लेती है। माँ के ‍िलए बच्चा क्या है, अपने ही ‍िजस्म का ‍िहस्सा जो उसे सामने चलते-फिरते ‍िदखता है। अपने ही अस्तित्व का अंश जो उसके सामने है। बच्चे की भूख माँ को लगती है, बच्चे की व्यथा माँ को शूल बनकर चुभती है... यह स्थिति है दूसरे में स्वयं को समझने की। वृहद अर्थों में लागू होने पर यह मानसिकता समस्त इंसानियत को नया आयाम देती है। तब जगत करुणा से ओतप्रोत हो, स्त्री जगत-जननी हो जाती है। ओशो ने एक जगह कहा भी है- 'मातृत्व का कोई संबंध शारीरिक, जैविक उत्पत्ति से नहीं है वरन एक आध्यात्मिक प्रेम से है, एक भाव से है। जिस क्षण तुम किसी दूसरे को अपने जैसा अपना लो, जैसे तुमने उसे जन्म ‍िदया हो...।' सच तो यह है ‍िक ममता का यह बीज पुरुष में भी है। यह है ‍िपतृत्व में मातृत्व की भावना। संसार के असंख्य बच्चों ने अपने ‍िपता में भी यह निश्‍चित ही महसूस किया होगा।

फिलवक्त दुनियावी माँ पर लौटें तो माँ दुनिया का सबसे ‍िन:स्वार्थ रिश्ता है और सर्वाधिक बेतकल्लुफ भी। वह अपने बच्चों से प्रेम की उम्मीद जरूर रखती है लेकिन प्रतिदान की अपेक्षा कभी नहीं। बच्चे जो चाहे करें वह तो उनके ‍िलए करती चलती है। बच्चे भी इस तथ्य को जानते हैं ‍िक माँ के समक्ष उनके समस्त दोष क्षम्य हैं, वे जो भी करें माँ उनकी ही रहेगी। बच्चों की इस बात में माँ की उपेक्षा नहीं प्रेम की पराकाष्ठा है, सर्वाधिक सुरक्षित प्रेम का एहसास है। यह प्रेम प्रियत्व के खो जाने के भय से मुक्त है। इसी में इसकी अलौकिकता है। प्रस्तुत है चंद पंक्तियाँ माँ के बारे में क्योंकि इस ‍िवषय का अंत किसी भी ‍िनष्कर्ष पर नहीं हो सकता है। यह ‍िवषय अनंत है। शब्दों और अभिव्यक्ति की सीमाएँ इसके समक्ष छोटी हैं।

'वह तिल-तिल कर जलती रही
देने को मुझे प्रकाश,
चलती रही सलाइयों सी
बुनने को मेरा अस्तित्व।
तूफानों में डगमगाती कश्ती सम्हालकर
अजेय इच्छाशक्ति की पतवार बनाकर
मुझे पार लगाती रही,
स्वयं ‍िशथिल होकर भी चप्पू चलाती रही।
प्यार का दीपक जलाकर
रातों में जगती रही
देकर के छाँव मुझे
खुद धूप में चलती रही।
काँटों भरी राहों में भी, अँधेरे की बाँहों में भी
ढूँढकर लाती रही वह, मेरे लिए सूरज की ‍िकरण।

- निर्मला भुराड़िया