शनिवार, 3 जुलाई 2010

चोगा और चंदन के स्पॉन्सर हैं सेठ दारूवाला!

अपनी बात
रामचरित मानस जैसे कालजयी ग्रंथ के रचयिता तुलसीदास संत परंपरा के कवि माने जाते हैं। संत यानी वो जो दुनियावी लोभ-लालच-कीर्ति कामना से परे हो। अत: कवि तुलसीदास को जब तत्कालीन राजदरबार से बुलावा आया तो उन्होंने यह कह जाने से इंकार किया-'हम चाकर रघुबीर के पट्‍यौ लिख्यौ दरबार, तुलसी अब का होहिंगे नर के मनसबदार?' अकबर के समय में श्रीधर नामक एक कवि हुए। उनका भी यही कहना रहा कि साधुजन यदि राजदरबारों में हाजिरी देने जाते हैं, तो वे सम्मान, पैसा आदि के लोभ से ही जाते हैं,

'राजदुआरे साधुजन, तीनि वस्तु को जाएँ, कै मीठा, कै मान को, कै माया की चाय। और कवि कुम्भनदास ने तो सीधे ही घोषित कर दिया था, 'संतन को सीकरी सो का काम?'

मगर इन दिनों लगता हैं संतन को सीकरी से कु छ ज्यादा ही काम हो गया है। प्रचार की भूख, धन की लालसा, ग्लैमर का मोह, राज्यसत्ता से संपर्क, धनपतियों के सान्निध्य का शौक आज के तथाकथित संतों की पहचान हो गई है। चलिए चलें कुछ सच्चे उदाहरणों पर।

एक संतजी की गद्दी पर उस दिन एक मीडिया मालिक पधारे थे और आकर सीधे संतजी की चरणों वाली तरफ नीचे बैठे थे। इतने बड़े (!) आदमी को द्वार पर आए देख संतजी बेहद गद्‍गद्‍ थे और गद्‍गद्‍ावस्था में मीडिया मालिक से बोले, 'आपने तो श्रीमान चमत्कार कर दिया। आपके द्वारा जगह देने से बहुत फर्क पड़ा। जहाँ पहले पचास लोग हमें सुनने आते थे, अब हजारों लोग आते हैं।' अब क्या कहें इस बात पर कपड़े छूटे पर काउंटिंग नहीं छूटी। एक और संतजी का उदाहरण हैं। सिंहस्थ का समय है, तपती गर्मी में उनसे मिलने के लिए सैकड़ों श्रद्धालु बैठे हैं, इंतजार कर रहे हैं। इतने में सायरन बजाते हुए किसी राजनेता का काफिला आता हैं। संतजी आम जनता को अपने चेले द्वारा खदेड़वा कर राजनेता और उनके चमचों को पंडाल के अपने कक्ष में बुलाते हैं। यही नहीं राजनेता का स्वस्थि वाचन/प्रशस्ति वाचन भी करते हैं, आशीर्वाद देते हैं, बाहर तक छोड़ने आते हैं। राजनेता के जाने का बाद आम जनता के लिए दर्शन पुन: खुलते हैं। लोग एक-एक कर आते हैं। एक स्त्री भीतर जाने की कोशिश करती हैं तो रोक दी जाती है। तब वह बताती है कि वह फलाँ उद्योगपति की पत्नी है। संतजी खींसे निपोर देते हैं, 'अरे भाभीजी आपको पहले बताना था न, इतनी देर से धूप में खड़ी हैं।' इस तरह के संतजियों और उनकी कथाओं को काले पैसे वाले भी आराम से स्पॉन्सर करते हैं। उनके लिए हवाई यात्राओं, लक्जरी गृहों, डीलक्स गाड़‍ियों, बुलेट प्रूफ मंच आदि का इंतजाम वही करते हैं। संतजी कभी नहीं पूछते कि कथा में लगने वाला पैसा कहाँ से आया। धीरे-धीरे संत स्वयं इतने अमीर हो जाते हैं कि ऐसी हर लक्जरी स्वयं के बल पर अफोर्ड करते हैं। कथा करने से लेकर मीडिया में एयरटाइम लेने तक का मीडिया एण्ड मार्केटिंग अरेंजमेंट और धन इनके पास होता है।

संतजी की बातों से प्रभावित हो एक अमीर श्रद्धालु ने उन्हें अपने निवास पर आगमन का न्योता दिया। संतजी ने खट से इंगित किया- 'फाइनेंस इत्यादि हमारी धर्मपत्नी देखती हैं, हमारी डायरी भी उन्हीं के पास रहती है, आप उन्हीं से अपॉइंटमेंट ले लें।' एक और संतजी हैं, उनके डेरे पर जाओ तो संतजी के दर्शन करके निकलने के बाद प्रसाद की एक-एक पुड़‍िया हर श्रद्धालु को दी जाती है और हर पुड़‍िया में से संतजी का स्वयं का एक-एक फोटो भी निकलता है। जिन्हें निर्विकार होना चाहिए उनकी लिप्तता और प्रचारप्रियता का आलम यह है। इस तरह के संत धार्मिक दिखने (होने के लिए नहीं) के लिए मेकअप भी पूरा करते हैं। आप यह कह सकते हैं कि आज आलम यह, कि गेरुआ साधुत्व का प्रतीक होने के बजाए गेरुआ वस्त्र संतों की वर्दी हो चला है। एक संतजी को कंकु के तिलक के बजाए लिपस्टिक का तिलक लगाना बेहतर लगता है, क्योंकि वह ज्यादा ग्लॉसी होता है। तो ऐसे भी संत हैं जो भाल पर वृंदावन की मिट्‍टी का अपियरेंस देने के लिए पीले पेन केक का इस्तेमाल करते हैं। कोई सिर के पीछे आभामंडल का आभास देने के लिए सूर्य डिजाइन करवाता है, तो कोई परदे पर चक्र। धर्म के नाम पर पूरा मेलोड्रामा, नाटक, फेंसी ड्रेस किया जाता हैं। ये बातें बढ़ती जाएँ तो समाज का नुकसान ही है। क्योंकि धर्म के नाम पर कर्म के बजाए आडंबर बढ़ रहा है। धर्म के नाम पर सादगी के बजाए, लालच, प्रचार की कामना, राजसत्ता की लालसा बढ़ रही है। ये ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं कि आम लोगों द्वारा इन पर उँगली रखी जाना आवश्यक है। ऐसा करना धर्म की निंदा नहीं होगी, न ही द्विजद्रोह होगा, बल्कि यह सकारात्मक समीक्षा होगी, जो आम आदमी का कर्तव्य भी है और अधिकार भी। इसमें कोई पाप बोध मानने की बात नहीं है। हममें से कई लोग ये बातें समझते हैं पर आँखों देखी मक्खी इसलिए निगलते रहते हैं कि वे डरते हैं कि उनका कुछ कहना कहीं धर्म की निंदा की श्रेणी में तो नहीं आ जाएगा? जबकि अधिकांश लोग अंधदृष्टि ही रखते हैं- ये लोग 'धर्म में तर्क नहीं' मत के गामी होते हैं अत: बात का परिप्रेक्ष्य समझने के बजाए अंधानुसरण ही करते हैं। आखिर आम जनता को ऐसे संतों (?) के दर्शन के लिए जाना ही क्यों चाहिए जिनके भगवान नेता और धनपति हैं। कुछ संतजी तो बाकायता फीता काटने, विमोचन करने, प्रोडक्ट लॉन्च करने भी जाते हैं। संत और प्रचार तंत्र का भला क्या रिश्ता? क्या कभी इस विडंबना पर हमने ध्यान दिया है?

- निर्मला भुराड़‍िया

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

सत्य को धूप, दीप, नैवेद्य?

अपनी बात
पिछले दिनों संसद में राहुल गाँधी ने कलावती नामक किसी स्त्री का जिक्र किया था। वे कलाबती की दयनीय स्थिति और संघर्ष के बारे में बता रहे थे। चूँकि जिक्र श्री गाँधी ने किया था, वह भी संसद में, अत: कलावती प्रसिद्ध हो गईं। कलावती नाम लोगों की जुबान पर चढ़ गया। कलावती की चर्चा के चलते एक अन्य ही कलावती ध्यान में आ गई। सत्यनारायण कथा की 'कलावती कन्या' और इस बहाने ध्यान आया सत्यनारायण व्रत-कथा का पूरा किस्सा। बचपन से ही लगता रहा है कि पूजा-पाठ के इस उपक्रम की विवेचना जरूरी है। उसके पहले एक झलक इस बात की कि कथा आखिर क्या है?

संक्षेप में बात यह है‍ कि कथा में एक व्यापारी है। उसे संतान नहीं है। वह सत्यनारायण देव से वादा करता है, या कहें संकल्प करता है कि संतान होने पर वह व्रत-पूजा करेगा, दान-धर्म करेगा। संयोग की बात है कि उसके घर संतान भी होती है। कथा के शब्द हैं, 'उसके घर कन्या रूपी रत्न उत्पन्न हुआ।' यह एक ध्यान देने योग्य व खुशी की बात है। उस प्राचीनकालीन कथा में कन्या रूपी रत्न जैसे शब्दों का प्रयोग है, जो कि आज की भ्रूण हत्या वाली मानसिकता से बेहतर है। सो उस कन्या का नाम कलावती रखा गया। संतान पाने की खुशी में व्यापारी संकल्प भूल गया। पत्नी ने याद दिलाया तो उसने टाल दिया कि कलावती के विवाह पर संकल्प पूरा करूँगा, मगर उसके विवाह पर भी वह संकल्प पूरा करना टाल गया। अत: सत्यनारायण भगवान (!) रुष्ट हो गए। तरह-तरह का अनिष्ट हुआ,जिससे व्यापारी को अंतत: एहसास हुआ कि उसे झूठा वादा नहीं करना चाहिए था। संकल्प निभाना चाहिए था।

दरअसल, उपरोक्त कथा तो महज एक दृष्टांत है, जो शायद इसलिए रचा गया होगा कि साधारण व्यक्ति को यह बात समझाई जा सके कि संकल्प का क्या महत्व है,किया वादा निभाना भी एक किस्म का 'सच' है। सत्यनारायण भी दरअसल 'सत्य' यानी सच है, मगर हमने नारायण लगाकर उसका नाम करण कर दिया। सत्य को एक मूल्य से एक व्यक्ति बना दिया। हो सकता है कि आरंभ में 'सत्य' की पूजा का मकसद सत्य के प्रति आग्रह रखने से रहा हो, ताकि अच्छे मूल्यों के प्रति आग्रह का वातावरण परिवार में बने, समाज में सच एक परंपरा के रूप में स्थापित हो। यह विचार प्रबल हो कि झूठ, फरेब, वादाखिलाफी से अंतत: अनिष्ट ही होता है। भारतीय संस्कृति में कहा भी जाता है सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् यानी ईश्वर सत्य है, सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है। सत्य नामक मूल्य ही ईश्वर है और उसका पालन करने से जीवन सुंदर बनता है, मगर जैसे कि हमारी आदत है हर अच्छे विचार और परंपरा को शुद्ध कर्मकांड में बदल लेते है। सो हमने 'सत्य' के प्रति आग्रह को भी केवल और केवल कर्मकांड में बदल लिया। उसके पीछे की भावना से हमारा कोई लेना-देना ही नहीं है। इसी कड़ी में संसद में 'कलावती' का जिक्र तो हुआ, मगर विश्वास को विश्वासनारायण बना लिया गया और विश्वासनारायण को तरह-तरह का कंकू-चावल और करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाया गया। विश्वास मत प्रकरण से राजनेताओं के चरित्र पर विश्वास और कम हुआ। जनता के विश्वास को धोखा मिला। नेतागण लोकतंत्र के मंदिर संसद में खड़े होकर सरेआम झूठ भी बोलते हैं। बिक भी जाते हैं,बदल भी जाते हैं।

यह भाँग तो पूरे कुएँ में पड़ी है। हमारे यहाँ देश के कर्णधारों की शिक्षा की बुनियाद झूठ पर पड़ती है। बात झूठे बर्थ सर्टिफिकेट से शुरू होती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों की कोचिंग इंस्टीट्‍यूट ही रेग्यूलर स्कूल की झूठी अटेंडेंस दिलवाते हैं। तरह-तरह के झूठे सर्टिफिकेट बाजार में बिकते हैं। अरेंज शादियों में व्यक्ति के गुणों के बारे में तरह-तरह के झूठे बोले जाते हैं और जिंदगी भर के धोखे दिए जाते हैं। भारतीय जनजीवन में झूठ कितना रच-पग गया है, इसकी मिसालें दी जाएँ तो स्थान कम पड़ेगा। मूल बात यह है कि सत्य को सत्यनारायण बनाकर पूजा-पाठ करने की बजाय,हम सचमुच सत्य के प्रति आग्रह रखें तभी देश और समाज अनिष्ट से बचेगा। सत्यनारायण की कथा को पीड़ा-नाशक कहा गया है। दरअसल सत्य की साधना पीड़ा-नाशक और मोक्षदायिनी है। ऊपर से चाहे यह दिखाई न दे, पर यह 'सत्य' है।
- ‍निर्मला भुराड़‍िया

बुधवार, 30 जून 2010

बच्चों की दीक्षा क्यों?

दुनिया में जब लोकतंत्रों का आगमन नहीं हुआ था तब राजाओं और धर्मगुरुओं का आज्ञातंत्र चलता था। इनकी आज्ञा ही कानून होती थी, भले फिर वह सही हो या गलत। उनसे असहमति या उनका विरोध करने का तो सवाल ही नहीं था। और तर्क? उसके लिए तो जगह ही नहीं थी। राजाज्ञा से तथाकथित अपराधी को जिंदा जला देना, चोरी करने का शुबहा होने पर हाथ काट देना, सिर धड़ से अलग कर देना आदि बर्बर सजाएँ देना आम बात थी। धार्मिक कट्‌टरताओं के चलते सही बात कहने वाले को जहर का प्याला पीना होता था। धर्मगुरुओं के खिलाफ जाकर पृथ्वी गोल है चपटी नहीं कहने वाले का भी यही हश्र हुआ। उन्हीं बर्बर युगों में भारत में सती प्रथा भी थी। मगर उस युग में धर्मांधता, कट्‌टरपन, तानाशाहियों, बंद समाज के चलते भी राजा राममोहन राय जैसे लोगों ने सती प्रथा का विरोध किया। असके लिए उनके असीम साहस की प्रशंसा की जाना चाहिए। क्योंकि हममें से अधिकांश तो इक्कीसवीं सदी के अपेक्षाकृत शिक्षित, स्वतंत्र समाज में भी कुप्रथाओं का विरोध करने से डरते हैं। धार्मिक कट्‌टरता के खिलाफ आवाज उठाने में घबराते हैं। यह तो उन लोगों की बात हुई जो तर्कों को समझते हैं फिर भी आवाज नहीं उठाते, मगर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो स्वयं ही अंधश्रद्धा से ग्रस्त हैं। यह भय उन्हें कुप्रथाओं संबंधी किसी भी विवेचना से रोकता है कि कहीं यह धर्म की आलोचना तो नहीं होगी! ऐसा सोचना धार्मिक प्रवृत्ति नहीं पापबोध है, क्योंकि कुप्रथाओं की ओर इंगित करना आलोचना नहीं विवेचना है। और धर्म हो या दुनिया की कोई भी चीज वह समय-सपेक्ष है। नए समय के सन्दर्भों में पुरानी चीजें भी पुनर्व्याख्या चाहती है। जब पुरानी चीजें आडम्बर, पाखंड और कुप्रथाओं का रूप ले चुकी हैं तो उन्हें बदल डालने में या नए सिरे से समझने में कोई आपत्ती नहीं है।

इसी सन्दर्भ में कुछ समय पहले घटी एक घटना की ओर ध्यान जाता है। रिद्धिश्री नामक जैन साध्वी बड़े नाटकीय तरीके से गायब हुईं। समाज ने इस घटना को धर्म के लिए कलंक माना। रिद्धिश्री उर्फ समता के सन्दर्भ में अपमानजनक शब्दों में बातें की जाने लगीं। शब्दावली यूँ बदली किवे रिद्धिश्री से सीधे आरोपी हो गईं। ठीक है एक पूज्य व्यक्ति का यह आचरण समाज की नजर में कलंक हो सकता है। लेकिन क्या किसी ने सोचा कि एक युवा स्त्री को प्रेमी के साथ घर बसा लेने जैसी सामान्य इच्छा के लिए ऐसा नाटक क्यों करना पड़ा? उसका अपराध यह था कि वह सांसारिक जीवन में लौटना चाहती थी और उसे अनुमति नहीं मिली, क्योंकि यह धर्मसम्मत नहीं था। मगर जब एक चौदह वर्ष की अवयस्क बालिका को दीक्षा दे दी गई थी, तो क्या वह कदम 'मानवधर्म सम्मत' था? अब वह वयस्क होने के पश्चात, अपनी खुद की समझ विकसित होने के पश्चात स्वनिर्णय से स्वइच्छा का जीवन जीना चाहती है, तो वापसी के द्वार पर लौह कपाट बंद हैं। यह तो कैद हुई धर्म कहाँ हुआ! और जो नाटक हुआ वह धर्म की मर्यादा तोड़ने का परिणाम नहीं बाल दीक्षा जैसी कुप्रथा का परिणाम माना जाना चाहिए। कहते हैं मोह के बाद मोहभंग आता है फिर आता है वीतराग। तब इंसान चाहे तो स्वेच्छा से किसी भी प्रकार की दीक्षा ले सकता है। अपने जीवन के साथ कोई भी प्रयोग कर सकता है। (हालाँकि प्रयोग सफल न होने पर पीछे लौटने के दरवाजे तो उसके लिए भी खुले होने चाहिए) खैर! बात है बच्चों की।

जैन धर्म में दीक्षा के बाद का जीवन बेहद कठिन है। कई बार बच्चे यह समझे बगैर दीक्षा ले लेते हैं। 1987 में इंदौर में एक पूर्व जैन साध्वी इंदुप्रभा अपना साध्वी जीवन छोड़कर ग्राम दूधिया के श्री राधेश्याम के साथ चली गई थी। इंदुप्रभा ने उस वक्त जो बयान दिया था वह आज भी गौर करने लायक है। उन्होंने कहा था, "मैं दुल्हन की तरह सजने की लालसा में साध्वी बनी थी। तब दीक्षा की कठोरता आदि के बारे में कुछ मालूम नहीं था। न ही दीक्षा की गूढ़ता के बारे में समझती थी। दुल्हन की तरह सजकर शोभायात्रा निकाले जाने की उमंग में मैं साध्वी बन गई।" उल्लेखनीय है कि दीक्षा पूर्व व्यक्ति को सजाया जाता है, गाजे-बाजे से, धूम-धाम से शोभायात्रा निकाली जाती है। बड़े-बड़े लोग आकर चरण वंदना करते हैं। हालॉंकि यह वीतराग के पहले का आखिरी मोह होता है इसलिए ऐसा किया जाता है। मगर बच्चों को सिर्फ महिमामंडन दिखता है इसके आगे के बारे में वह जानता भी है तो समझता नहीं।
बात सिर्फ इतनी भर भी नहीं है कि बच्चे या बच्चियॉं भव्यता से मोहित होकर दीक्षा ले लेते हैं। बाल दीक्षा थोपा-थोपी और "धार्मिकों (?) की राजनीति" के कुत्सित घेरे में भी चली गई है। जिस पर मुँह खोलने से भी लोग डरते हैं। पीछे वही डर "धर्म" (?) के खिलाफ कैसे बोलें। या फिर है कि जिस पर धर्म का ठप्पा लगा है वह सब अच्छा ही है। आँख मूँदकर उसे मान लो। लोगों की ऐसी ही धर्मंधता और भय के चलते आचार्य लोग राजनीति करने लगे हैं। 1998 में आचार्यों में से ही एक यति श्री विनयसागरजी महाराज ने इस ओर इंगित किया था। उन्होंने कहा था, "श्वेताम्बर जैन समाज के विभिन्न गच्छों के आचार्यों में अपनी शिष्य संख्या बढ़ाने के लिए चलने वाली होड़ में बाल दीक्षाएँ बढ़ रही हैं।" यानी धर्मगुरुओं में भी अहंकार और गलाकाट प्रतिस्पर्धा है कि किसने कितने शिष्य बनाए। इस प्रतिस्पर्धा की बलि चढ़ते हैं मासूम। क्योंकि उनके दिमाग में बाद डाल देना और उन्हें राजी करना अपेक्षाकृत अधिक आसान है।

बाल दीक्षा के और भी कारण हैं, जो कि सचमुच दिल दहला देने वाले हैं। ऐसे उदाहरण भी हुए हैं जहॉं दो बेटियों वाले गरीब पिता ने सोचा एक को तो दीक्षा दिला दें तो मिले दहेज से मुक्ति- महिमामंडन का महिमामंडन।

और ये कोरे इल्जाम नहीं हैं। जीते-जागते प्रकरण हैं। बस यही कि जब कोई सबूत सामने लाए जाने की कोशिश हो तो कुछ धार्मिक आचार्य और तथाकथित आस्था पर कोई सवाल न करने के पक्षधर अंधश्रद्धालु बिगड़ जाते हैं। मीडिया तक में इन मामलों की विवेचना को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप माना जाता है। कुप्रथाओं पर चोट को धर्म की निंदा समझकर लोग कानों परहाथ रख लेते हैं या बोलने वाले का मुँह तोड़ देने की धमकी देते हैं। नतीजा जबरिया दीक्षाएँ भी हो जाती हैं पर जनता में और मीडिया में धुआँधार मुद्दा नहीं बनता। न सिर्फ यह कि स्वस्थ बहस नहीं हो पाती, हम अत्याचार देखते रह जाते हैं। 1994 की ही एक खबर है कि राजस्थान में एक नाबालिग लड़की को उसकी मॉं की इच्छा के खिलाफ जबरन साध्वी बनाए जाने पर लड़की की मॉं ने बीस हजार लोगों के समक्ष मिट्‌टी का तेल छिड़क कर आग लगा ली थी तथा प्रशासनिक अधिकारी मूकदर्शक बने रहे। उस वक्त राज्यसभा में शून्यकाल में जनता दल की कमला सिन्हा ने यह मामला उठाया था। जाहिर है बात आगे बढ़ी नहीं। क्योंकि राजनेता धर्म-संप्रदाओं, जातियों के थोकबंद वोट बैंकों से डरते हैं और मीडिया विज्ञापनदाताओं से!

और कुप्रथा की चपेट में आए व्यक्ति को न कोई रास्ता मिलता है न मददगार, क्योंकि बागड़ें खुद खेत का रही हैं। फिर रास्ता क्या? देखिए- 1994 में ही नासिक में जैन साध्वी श्रीयशजी ने आत्महत्या कर ली थी। शव के पास पत्र पड़ा था जिसमें लिखा था, "इस जिंदगी से तो मौत भली।"

ऐसे ही वाकयों के चलते कुछ लोग बाल दीक्षा को कुप्रथा मानकर इसके खिलाफ आगे भी आए हैं। उन लोगों के जिक्र से शायद आमजन को इस बारे में कुछ हौसला मिले या अपनी राय प्रकट करने की प्रेरणा मिले। तकरीबन पॉंच-छः साल पहले उस समय आत्मवल्लभ जैन श्वेतांबर संघ के अध्यक्ष श्री देवेन यशवंत ने बेबाकी है कहा था, "गरीबी और आचार्यों की गुटबाजी दो ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से जैन धर्म में दीक्षा के लिए वैराग्यभाव परिपक्वता की शर्त का पालन नहीं किया जा रहा।" कुछ लोगों ने तो बाल दीक्षा की प्रवृत्ति के खिलाफ न्यायालयों में याचिकाएँ भी दायर कीं।

1987 में दिल्ली के एक वकील ने जैन समाज के अंतर्गत बाल दीक्षा रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार व मध्यप्रदेश सरकार सहित अनेक राज्य सरकारों के खिलाफ याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था, "नाबालिग बच्चों को दीक्षा दिलाना न केवल संविधान व राष्ट्रीय शिशु नीति के खिलाफ है बल्कि इससे मानव अधिकार घोषणा पत्र का भी हनन होता है।" याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया था कि लड़कों से ज्यादा नाबालिग लड़कियों को इसलिए दीक्षा दिलाई जाती है कि उनके माता-पिता शादी के लिए दहेज की मॉंग पूरी करने में असमर्थ होते हैं। 1998 में भी राजस्थान उच्च न्यायालय में राकेश शर्मा नामक एक व्यक्ति ने एक याचिका दायर की थी। जैन समाज ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था - "दीक्षा शास्त्रोक्त है।" याचिकाकर्ता ने अंततः अपनी याचिका वापस ले ली थी। लेकिन 2004 में नौ वर्षीय प्रियाल बगरीचा उर्फ प्रीतवर्षा श्रीजी के मामले में वकील रवीन्द्र पारीख ने एक अनूठी पहल की थी। उन्होंने अपनी याचिका में बच्ची का अभिभावक बनने की गुजारिश की। उनका कहना था, "बाल दीक्षा बच्चों से संपत्ति का अधिकार छीन लेती है इसलिए प्रियाल को सुरक्षा देने के लिए मैं एक कल्याण ट्रस्ट बनाना चाहता हूँ।"

खैर संपत्ति का अधिकार तो क्या फिलहाल तो इन बच्चों का सामान्य मानव अधिकार ही सामने हैं। एक तो यह कि उस जीवन को आजमा लेने के बाद वापस लौटने का अधिकार नहीं। केशलोचन जैसी धार्मिक पद्धतियॉं हैं, जिसमें सारे बाल खींचकर तोड़े जाते हैं, बच्चे को लहूलुहान करके मुंडाई की जाती है। ऐसी और भी कई पद्धतियॉं उस जीवन में शामिल हैं जिनका विस्तार से विवरण यहॉं संभव नहीं है। पर यह तय है कि ये सब झेलने वाला नासमझ, अवयस्क बच्चा हो तो ये बातें क्रूरता की श्रेणी में आ जाती हैं। अब वह समय आ गया है जब हमें "भारतीय समाज" से जुड़ी ऐसी प्रथाओं की पुनर्विवेचना करना चाहिए।
- निर्मला भुराडि़या