सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

संगीत का संस्कार

आज की एक सफल गायिका कविता कृष्णमूर्ति मेरे सामने बैठी हैं। बातचीत का ‍िवषय ‍िनश्चित ही संगीत है और बातचीत का यह सिलसिला एक बहुत ही महत्वपूर्ण ‍िबंदु पर पहुँचता है। वह है इन ‍दिनों भारत में जोर पकड़ता रीमिक्स संगीत का गोरखधंधा! रीमिक्स संगीत में यह होता है कि नए-पुराने प्रचलित गीतों के ट्रेक पर नई आवाजें चढ़ा दी जाती हैं या पुराने गीतों में अपने ढंग से मिलावट करके नए रूप में तैयार करके बाजार में जारी कर ‍िदया जाता है। इस गोरखधंधे में कुछ अच्छे गीतों की शुद्धता और नायाब गीत-संगीत इस कदर खो गए हैं ‍िक नई पीढ़ी अच्छी और मौलिक चीज से परिचित ही नहीं है। वह इस चोरी और सीनाजोरी वाली धुनों और गीतों को ही सही समझती है और अपनाती है। इस तरह युवा कुछ बहुत ही उम्दा गीत रचनाओं से वंचित रह जाते हैं।

रीमिक्स, सस्ते गीतों, नकली कैसेटों और भोंडे वीडियो के बढ़ते चलन पर कविताजी ने भी दु:ख प्रकट किया, ‍िकन्तु साथ ही उन्होंने एक और बहुत महत्वपूर्ण बात भी ध्यान दिलाई। कविताजी का कहना है ‍िक व्यवसाय के लिए नई पीढ़ी को यह गलत सौगात देने के लिए गायक, संगीत निर्देशक, निर्माता आदि तो जिम्मेदार हैं ही, लेकिन आज के माता-पिता भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। क्योंकि वे बचपन से ही संगीत संबंधी सुरुचि बच्चों में ‍िवकसित नहीं करते। दक्षिण भारत में अल सबेरे ही घर-घर में सुब्बालक्ष्मी बजती हैं तो नई पीढ़ी उनसे परिचित हुए बगैर नहीं रहती। कविताजी ने उल्टे प्रश्न किया- 'यहाँ ऐसे कितने घर हैं, जहाँ सुबह अच्छा गीत और अच्छा भजन बजता हो अौर चार साल की उम्र में बच्चा उन्हें सुनता आया हो?' कविताजी की बात में दम है। यदि बहुत बचपन से ही हमारे घरों में बच्चे अच्छा संगीत सुनें तो ‍िनश्‍चित ही वे परिष्कृत रुचि के साथ बड़े होंगे। तब रीमिक्स और नकली कैसेट वे सुनेंगे तब भी इसके प्रति रुझान विकसित नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें असली-नकली का भेद स्वयं ही पता होगा।

भारत एक ऐसा देश है, ‍िजसके कण-कण में संगीत बसा है। हमारे जनजीवन में संगीत हर रीति-रिवाज से जुड़ा है। कृष्ण की बाँसुरी हो या सरस्वती की वीणा या सूफी संतों की मजारों पर गाई जाने वाली कव्वालियाँ। बच्चों को सुलाने की लोरियाँ हों या समाजसेवियों की प्रभात फेरियाँ। हर चीज में गीत-संगीत है। शादी-ब्याह में मेहँदी से लेकर बिदाई तक कोई भी रस्म बगैर गीत-संगीत के पूरी नहीं होती। गाँव की औरत घट्‍टी चलाते हुए भी गाती हैं। तो कभी कोई राहगीर नारियल के गोले और घोड़े के बाल से वाद्य बनाकर गाता चलता है। जनजातीय लोग लौकी की तरही और कद्दू का तमूरा बनाकर गा-बजा लेते हैं। भजनों और कीर्तनों में झाँझ-मजीरे बजते हैं। शंख, घड़ियाल और करतल ध्वनि के साथ आरती होती है। अग्नि प्रज्वलित करने और बरखा लाने वाले राग तक हमारे शास्त्रीय संगीत में रहे हैं। ऐसी अमूल्य विरासत हस्तांतरित नहीं हुई तो एक दिन नष्ट हो जाएगी। वैसे भी संगीत एक दिव्य कला है। तो हमारी नई पीढ़ी इसके दिव्य स्वरूप से वंचित क्यो हो? शुद्ध संगीत का यह निर्मल आनंद नई पीढ़ी तक पहुँचे, इसकी ‍िजम्मेदारी समाज और माता-पिता की भी है। कुरुचिपूर्ण सामग्री बेचने में ‍िजनके ‍िनहित स्वार्थ जुड़े हैं, उन्हें दोष देना मुश्किल है और रोकना असंभव। दरअसल संगीत का पहला संस्कार घर से और कच्ची उम्र से ही शुरू होना चाहिए। तभी नई पीढ़ी में अच्छे संगीत का सम्मान करने, उसे ग्रहण करने एवं उसका आनंद उठाने की क्षमता आएगी और यदि बचपन से ही अच्छा संगीत सुना है तो नकली वैसे ही पसंद नहीं आएगा। उसके लिए किसी किस्म की पाबंदी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

यह नहीं कहा जा सकता कि हर कोई पक्के संगीत में ‍िनष्णात हो या शास्त्रीय संगीत की समझ रख पाए, किन्तु कम से कम ऐसा माहौल और ऐसी मानसिकता तो विकसित हो कि युवा पीढ़ी लोकप्रिय संगीत में भी फूहड़ता के बजाए सुरुचि को तरजीह दे।

-निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

डॉक्टर साहब, सुनिए!

इस संसार ने ‍िचकित्सक को सफेद कोट वाले ईश्वर की संज्ञा दी है। चिकित्सा या डॉक्टरी दुनिया का पवित्रतम व्यवसाय है। और क्यों न हो! यह एक ऐसा व्यवसाय है, जिसका इंसानियत से बहुत गहरा ताल्लुक है। यूँ तो सभी इंसानी व्यवसायों और रिश्तों का मूल आधार मानवीयता ही होता है, मनुष्यता और पारस्परिकता के आधार पर ही समाज-रचना हुई है। हममें से जिसको जो आता है, उसे वह समाज को प्रदान करता है- इस तरह समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, बदले में पेट पालन करता है। फिर भी मनुष्य और मानवीयता का ‍िजतना सीधा संबंध चिकित्सा में है, उतना और ‍िकसी बात में नहीं। इंसान छोटो हो या बड़ा, गरीब हो या अमीर, इस देश का हो या उस देश का, स्त्री हो या पुरुष... कुछ भी हो, चिकित्सक की आवश्यकता सभी को पड़ती है। चिकित्सक मनुष्य मात्र के शारीरिक दु:ख-दर्द का ‍िनवारक है, अत: पूजनीय है। मगर कभी-कभी चिकित्सक अपने दर्द निवारक होने की इस अपरिहार्यता को गलत ढंग से भी ले लेता है।

हाल ही की बात है, चौराहे पर बैठकर छिटपुट सामग्री बेचने वाले एक निहायत गरीब बुजुर्ग को एक वाहन टक्कर मार गया। चौराहे के ही कुछ अन्य निम्नवर्गीय व्यक्ति वृद्ध को पास ही के एक चिकित्सक महोदय के पास ले गए। चिकित्सक महोदय ने टाँके लगा ‍िदए और ढाई सौ रुपए माँगे। जब उन्हें पता चला ‍िक इन गरीबों की जेबों में सबके पैसे मिलाकर भी ढाई सौ रुपए नहीं हो रहे हैं, तो वे टाँके खोल देने की धमकी पर उतर आए! ऑपरेशन टेबल पर मरीज छोड़कर पैसे माँगने की घटनाएँ भी होती हैं। इस बातर पर एक चिकित्सक महोदय ने एक बार दलील दी थी ‍िक जब पूरी दुनिया नोट छापने में लगी है तो हमसे ही मानवीयता की अपेक्षा क्यों? हम कोई खैरात बाँटने के लिए डॉक्टर थोड़े ही बने हैं! ये चिकित्सक महोदय अपने सफेद गिरेबाँ में झाँकते तो उन्हें उत्तर स्वमेव मिल जाता। चूँकि वे दुनिया के पवि‍त्रतम व्यवसाय में हैं, चूँकि वे चिकित्सक हैं, इसीलिए मनुष्यता की सर्वाधिक उम्मीद उन्हीं से की जाती है। वर्ना वे एक ऐसे रोबोट से अधिक कुछ नहीं, ‍िजसके भेजे में चिकित्सा संबंधी ज्ञान भर ‍िदया गया है। अत: ज्ञान के साथ मानवीयता का संगम ही एक चिकित्सक को निपुण चिकित्सक बनाता है। बात फीस माफी की नहीं है। चिकित्सक का सहयोगी, धीरजयुक्त, स्नेहदिल व्यवहार भी अपने आप में दवा होता है। ऐसा चिकित्सक मरीज का ‍िदल एवं विश्वास जीतता है और उसकी बीमारी को हराता है।

यह भी सच है ‍िक चिकित्सक भी एक मनुष्य है। उसकी भी अपनी आवश्यकताएँ हैं। उसे भी अपने परिवार को चलाना है और इसी व्यवसाय के जरिए चलाना है, जिस व्यवसाय के लिए लालच और अमानवीयता महादुर्गुण हैं। तो यह वह कैसे करे? इस बात का भी सुंदर-सा जवाब पिछले दिनों एक चिकित्सक महोदय को देखकर ‍िमल गया। ये आदर्श चिकित्सक महोदय आज के जमाने में भी मरीजों से सिर्फ बीस रुपए फीस लेते हैं। मरीजों पर झल्लाते नहीं, शांति से उनकी बात सुनते हैं। मरीज की आधी ‍िचकित्सा तो डॉक्टर साहब ने अपने क्लीनिक की कोई फाइव स्टार साज-सज्जा नहीं की हुई है, सिर्फ यह कि क्लीनिक साफ-सुथरा है, जरूरी उपकरणों से युक्त है। हाँ, एक फ्रेम जरूर डॉक्टर साहब की पीठ की ओर की दीवार पर सजी है, जिस पर लिखा संदेश यहाँ ज्यों का त्यों उद्‍धृत ‍िकया जा रहा है। यह संदेश इस बात का जवाब है कि चिकित्सक अपने परिवार का पेट पालते हुए भी महामानव कैसे बना रह सकता है और कैसे गरीब तबके की सेवा कर सकता है। प्रस्तुत है उक्त संदेश-

'हे प्रभु! वास्तव में यह परिस्थितियों की विडंबना है कि मेरी जीविका दूसरों की बीमारियों पर ‍िनर्भर करती है।

लेकिन फिर भी यह मेरा सौभाग्य है कि आपने मुझे उनके कष्टों का निवारण करने का उत्तम अवसर प्रदान किया है। आपने मुझे यह जिम्मेदारी पूरी करने की योग्यता भी प्रदान की है।

हे प्रभु! मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करें कि मैं इस उद्देश्य को पूरी निष्ठा के साथ पूर्ण कर सकूँ।

वास्तव में तो आप ही कष्टों का निवारण करते हैं तथा सब सुखों के स्रोत हैं, मैं तो केवल एक माध्यम मात्र हूँ।

हे प्रभु! मेरे मरीजों पर दया-दृष्टि बनाए रखें।'

- निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

आज फिर जीने की तमन्ना है यानी... पुनर्अन्वेषण का वक्त

लेखिका शोभा डे की एक किताब आई है- शोभा एट सिक्स्टी। यानी साठ की शोभा। यह कोई संन्यास कथा नहीं है, न ही कोरा अतीत राग, बल्कि लेखिका का कहना है कि यह किताब उन्होंने इसलिए लिखी है कि वे महसूस करती हैं उम्र का यह मोड़ दुनियादारी को सलाम कर निवृत्त हो जाने का नहीं, बल्कि नई ऊर्जा से और अधिक उत्पादक समय गुजारने का है। शोभा कहती है, "पुरुष के लिए साठ का होना वैसी सामाजिक बाधा नहीं होता जैसा औरत के लिए होता आया है। जब स्त्री की बात आती है तो हमारा समाज कुछ ज्यादा ही "एजिस्ट" साबित होता है। उम्र के अनुकूल आचरण के नाम पर समाज स्त्री को एक रूढ़िबद्ध छवि में जीने को मजबूर करता है। शोभा की पुस्तक का कवर ही साठ की स्त्री की इस रूढ़िबद्ध छवि को तोड़ता है। कवर पर शोभा का शोख रंगों और रेशमी परिधान में खुलकर मुस्कुराता, दमकता हुआ ताजा पोर्ट्रेट है।

यह सिर्फ शोभा ही नहीं हैं, साठ के पार या पचास के पार कई स्त्रियाँ अब युवा दमक और युवा ऊर्जा से कुछ नया करने को तत्पर जीवन जी रही हैं। प्रख्यात अदाकारा शबाना आजमी ने हाल ही में अपना साठवाँ जन्म दिन धूमधाम से मनाया। अब तक तो अभिनेत्रियाँ तीसवाँ जन्म दिन भी केक पर बगैर सही संख्या में मोमबत्ती लगाए मनाती रही हैं, मगर शबाना ने अपनी उम्र पर फख्र व्यक्त किया। उम्र का यह फख्र उनके परिधानों में किए जाने वाले प्रयोगों से भी व्यक्त होता है। वे कुछ नई चीजें सीखना चाहती हैं, नए प्रोजेक्ट्स भी करना चाहती हैं। कार्पोरेट जगत की प्रख्यात सीईओ इंदिरा नूयी के अब ओबामा सरकार में पद लेने की संभावना है। यही नहीं, उम्र के इस मोड़ पर उन्होंने अपना कम्पलीट मेक ओवर किया है। कल तक परिधान के मामले में सीमित, संकोची और पारंपरिक इंदिरा नूयी अब चुस्त-दुरुस्त, आधुनिक पोशाखों में कार्पोरेट गलियारों में दिखाई पड़ती हैं। गायिका आशा भोंसले ने कभी किसी भी चीज से हार नहीं मानी, उनमें एक उम्र भी है। सोनिया गाँधी हों या हिलेरी क्लिंटन चुस्त चाल और अनथक कार्य साठ पार की इन स्त्रियों की पहचान है।

सवाल यह उठता है कि पचास पार ही मेकओवर क्यों? तो यह जैविक सत्य है कि इस मोड़ पर आकर कोई भी जीवंत व्यक्तित्व अपना पुनर्अन्वेषण करना चाहता है। महिलाएँ घरेलू मोर्चे पर कई जिम्मेदारियाँ संपन्ना कर चुकी होती हैं और इनसे कमोबेश मुक्त होकर स्वयं की पहचान यात्रा शुरू कर सकती हैं। फिर भारतीय सामाजिक जीवन में इतनी बंदिशें हैं कि महिलाओं को अपनी पसंद का कार्य करने और अपने ढंग से रहने का अधिकार अर्जित करने में इतना समय लग जाता है कि वे उम्र के एक-दूसरे मोड़ तक आ जाती हैं। यहाँ भी समाज बढ़ती उम्र का हवाला देकर उन्हें रोके या उन पर उँगली उठाए तो यह तो अन्याय होगा।

"मैं तो सज गई रे सजना के लिए" फिल्म सौदागर का यह गाना है। समाज स्त्री के लिए यही भोग्या दृष्टि रखता है। सारा श्रृंगार पुरुष को रिझाने के लिए है, यही मान्यता है- चाहे ऊपर से न हो- भीतर ही भीतर तो यही बात है। अपने परिधान या अपने रहन-सहन से एक व्यक्ति अपने आपको अभिव्यक्त करता है, यह बात स्त्रियों के संदर्भ में हम भूल जाते हैं। इसीलिए हमने "बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम" जैसी कहावतों का आविष्कार किया है। बूढ़ा घोड़ा लाल लगाम जैसी कोई कहावत नहीं है। इसीलिए हमने सुहागन और विधवा जैसे शब्द इजाद किए हैं और पति के स्वर्गवासी होने के बाद स्त्री का स्वयं की इच्छा के लिए बिंदी लगाना भी समाज की आँख में खटता है, लेकिन आधुनिक स्त्री बदल रही है। उसका जीवन सोलह से तीस तक ही नहीं है, जो कि सिर्फ एक भोग्या के लिए उपयुक्त काल है। आज स्त्री का जीवन चालीस, पचास, साठ के पार भी है, जिसे वह अपनी मर्जी और अपनी अभिरुचि के अनुसार जीना चाहती है। तब जरूरी नहीं उसके पसंद का गाना "मैं तो सज गई सजना के लिए" हो। उसकी पसंद का गाना यह भी हो सकता है- "काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल, आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है।"

- निर्मला भुराड़िया

खीर का कटोरा!

पंडितजी की खीर का कटोरा उस परिवार में पहले अलग ही रखा जाता था, क्योंकि छोटी कटोरी से पंडितजी का काम नहीं चलता था। अत: वह बड़ा कटोरा उन्हीं के लिए रखा गया था, जो श्राद्ध-पक्ष में ‍िनकाला जाता था। इस बड़े कटोरे में खीर प्राप्त कर लेने के बावजूद यदि थोड़ा आग्रह-मनुहार किया जाए- जो कि परंपरा के अनुसार किया ही जाता था- तो पंडितजी थोड़ी और खीर ग्रहण कर ही लेते थे। मगर जब पिछली बार पंडितजी उस परिवार में आए तो उन्होंने 'थोड़ा-और' का आग्रह नहीं स्वीकारा। कहने लगे, 'जजमान अब हमारी अवस्था हो गई है। अब हम उस तरह नहीं खा-पी सकते।' जजमान ने अब पंडितजी के साथ आए उनके पुत्र की ओर मनुहारपूर्वक रुख किया। उसने कुछ कहा नहीं, बस संकोचपूर्वक अपनी हथेली खीर की कटोरी पर रख दी ताकि अब और न परोसी जाए। उसे मौन देख पंडितजी ने ही कहा- 'भई, हम तो साइकल पर आते थे तो सब पचा लेते थे पर अब इसके पास तो मोपेड है.... फिर यह शर्माता भी है। हम बड़ी मुश्किल से इसे यहाँ लाए हैं....।' असल बात भी पंडितजी ने साइकल वाली बात के पीछे-पीछ बता ही दी थी। सच ही है, वर्ण व्यवस्था के हिसाब से जब कर्म विभाजन नहीं है, जब व्यक्ति आधुनिक शिक्षा प्राप्त है और अनी रोटी (या खीर-पूरी) खुद कमा सकता है, तो यह अब पूरी तौर पर संभव है कि जजमान के यहाँ सिर्फ किसी एक खास जाति का होने की वजह से श्राद्ध-जीमने जाना उसे सहज न लगे। एक तो किसी के यहाँ भोजन पर जाना फिर 'ब्राह्मण: भोजन: प्रिया:' या भोजन-भट्‍ट जैसी उपाधि पाना किसे रुचेगा? जाहिर है श्राद्ध में 'जीमने' के लिए इस खास जाति के उम्मीदवार अब कम हो गए हैं। लेकिन कर्मकांडों के पूर्ववत चलने की वजह से श्राद्ध-पक्ष में उनकी डिमांड अब भी काफी है। नतीजा? अखबारों में इस तरह के विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं कि 'श्राद्ध-पक्ष में ‍िजमाने को 'इतने-इतने' बटुक उपलब्ध हैं- भोजन कराना है तो फलाँ-फलाँ नम्बर पर, फलाँ-फलाँ संस्था से सम्पर्क करें।'

कितने लोग हैं जिन्होंने ऐसी सूचनाओं में छुपी विडम्बना और हास्यास्पदता को पकड़ लिया होगा? अगर पकड़ लिया है तो फिर इसका इलाज भी जरूरी है। अब समय बदल गया है। अब 'एक साहूकार के सात बेटे थे' और 'एक गाँव में एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था' जैसी कहानियाँ अति-प्राचीनकाल के घेरे में आती हैं। अब न साहूकार के सात बेटे हैं न ब्राह्मण के साथ दारिद्रय शब्द पूँछ की तरह लगा है या जोंक की तरह ‍िचपटा है। क्योंकि अब यह नहीं है कि ब्राह्मण आदमी केवल ज्ञानार्जन ही करेगा या रीति-रिवाज ही सम्पन्न कराएगा। वह अपने नैसर्गिक रुझान के अनुसार कोई अन्य व्यवसाय भी चुन सकता है। फिर समाज द्वारा अपने पुरखों की स्मृति में ‍िजमाने के लिए 'ब्राह्मण' को ही ढूँढ निकालने और जिमाने की जिद क्यों? ऐसे और भी वंचित हमारे वर्तमान सामाजिक परिवेश में हो सकते हैं, जिन्हें प्रेमपूर्वक भोजन उपलब्ध कराने पर आपके पुरखों की आत्मा के साथ ही साथ उस वंचित की स्वयं की आत्मा भी तृप्त होगी!

-निर्मला भुराड़िया

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

नेताजी यानी कानून को ठेंगा!

एक छुटभैए नेताजी के घर कोई समारोह था। समारोह करने के लिए उन्होंने कोई विशेष स्थल किराए पर नहीं लिया। वैसे लेते भी तो उनसे किराया माँगने की हिम्मत कौन करता? यह उनकी 'जनसेवक' होने की धाक ही है, ‍िजसकी वजह से वे जनता के इस्तेमाल के लिए निश्चित सुविधाओं का इस्तेमाल स्वयं करते हैं, वह भी 'फ्री फंड' और मूँछों पर ताव देते हुए। खैर, फिलहाल तो वे इतनी-सी असुविधा भी नहीं उठाना चाहते थे ‍िक किसी आयोजन स्थल तक भी समारोह का लवाजमा ले जाएँ। सो उन्होंने अपने भव्य बंगले के सामने से गुजरने वाली रोड पर ही तंबू ठोक लिया। वह भी पूरी रोड पर इस तरह कि चौपहिया, दुपहिया वाहन तो क्या पैदल आदमी भी वहाँ से न गुजर पाए। उसके बाद वहाँ खाने-पीने स्टॉल, कुर्सियाँ, भकाभक रोशनी लगाई गई और हाँ, फुल आवाज में लाउड स्पीकर भी। राहगीरों को और कॉलोनी के अन्य नागरिकों को इससे खासी असुविधा हुई। मगर उनके 'नेता' होने की वजह से उनके तंबू ठोंकने और कानफोड़ू भोंगा बजाने के इस विशेषाधिकार को कोई माई का लाल चुनौती नहीं दे सकता था। देता भी तो क्या कर लेता, कानून तो वे अपनी जेब में रखते हैं। जो काम सीधे रास्ते होता है उसे भी कानून तोड़कर करने से ही उनकी महत्ता बढ़ती है! आखिर पता तो चले उनके पास पॉवर है। वैसे भी सीधे रास्ते काम करना, लाइन में लगना, समारोहों में समय पर पहुँचना, अपने पैसे से टिकट खरीदकर कोई कार्यक्रम देखना, छोटे-मोटे टैक्स देना आदि-इत्यादि कानून-अनुशासन का कोई भी काम नेता तो क्या देश के ‍िकसी भी वीआईपी के लिए शान के खिलाफ है- ऐसी लगभग मान्यता ही बन गई है। आप वीआईपी हैं यानी आप कानून तोड़ने का जीता-जागता लाइसेंस हैं!

कोई भी कहेगा इसमें जनता का क्या दोष? तो ठीक है इस पर हमारा बस नहीं ‍िक सही लोगों को ही वोट दें। अक्सर विकल्प नहीं होता और हमें नागनाथ और साँपनाथ में से एक को चुनना होता है। मगर वोट देने की बेचारगी छोड़ दें तो हम आगे होकर नेताओं का जरूरत से ज्यादा महिमा मंडन करते हैं। उनके कानून तोड़ने पर ऐतराज की बात तो दूर, हमें जब पिछले दरवाजे का कोई काम करना होता है, तो हम नेताओं को ही ढ़ूँढ़ते हैं। उनसे उनके विशेषाधिकारों का इस्तेमाल अपने हक में करवाने में पीछे नहीं हटते। बड़ी बातें छोड़ें तो भी कई छोटे-छोटे उदाहरण हमारे आसपास घटित होते हैं। जैसे होली के दिन कुछ लड़के एक पार्क में पेड़ पर कुछ शाखाओं पर कुल्हाड़ी चला रहे थे। उन्हें जब टोका ‍िक लकड़ी काटना ठीक नहीं है, तो उन लड़कों ने स्थानीय पार्षद के घर की तरफ उँगली उठाकर बड़ी ढिटाई से उत्तर दिया 'उन अंकल' से पूछ लिया है। गोया 'जनसेवक' से पूछने के बाद कानून तोड़ना गैरकानूनी नहीं रह जाता!

इसी तरह एक कवयित्री कुछ दिनों पूर्व आईं। उन्हें अपने संग्रह का विमोचन करवाने के लिए कोई 'नेता ही' चाहिए था। भले फिर वह किसी भी पार्टी का हो, किसी भी विचारधारा का हो, साहित्य समझता हो, न समझता हो। बस दबदबे वाला हो। इन ‍िदनों किताबों का विमोचन हो, पुस्तक प्रदर्शनी, पेंटिंग एक्जीबीशन या ब्यूटी पार्लर का उद्‍घाटन, लोग नेताओं को ही बुलाना पसंद करते हैं। अब नेताओं के ‍िजम्मे परियोजनाओं के ‍िशलान्यास करना और रोता पत्थर छोड़ देना ही नहीं रह गया है। जहाँ जनता उन्हें महिमा मंडित नहीं करती वहाँ वे स्वयं को महिमा मंडित कर लेते हैं- पार्टी फंड से! जो निर्माण कार्य उनके कर्तव्यों में आते हैं और जो उन्हें करना ही चाहिए उनके श्रेय के भी खूब गाजे-बाजे होते हैं, हाथ जोड़े मुख-मुद्राओं के पोस्टर लगते हैं। नेताओं द्वारा कानून तोड़ना एक सामाजिक परंपरा बन चुकी हैं।

- निर्मला भुराड़िया

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

असोका तो फैसन है!

एक श्रीमान हैं। उम्र लगभग पचास के आसपास। वैसे तो साधारण आदमी हैं पर अपने उच्चारण और अटपटे वाक्य विन्यास के लिए (कु) ख्यात हैं। बेचारे गाहे-बाहे अपने ही बच्चों की हँसी के पात्र भी बनते हैं। क्योंकि बोलते हुए वे सारे 'श' को 'स' बना डालते हैं। शशि उनके लिए 'ससि' है। सुशीला, श्यामा क्रमश: सुसीला, स्यामा! उनके घर में एक स्वीटी भी है, जिसे श्रीमानजी भरसक प्रयास करने के बाद भी 'सीटी' ही उच्चार पाते हैं। श्रीमानजी को हर बात का हिन्दी-अँगरेजी साथ बोलने की आदत है। मसलन वे 'सुबह मार्निंग वॉक' पर जाते हैं। उनके सिर में हेडेक होता है! बात के अंत में वे कहते हैं 'खैर, एनी वे'। मेहमान की आवभगत में वे पूछते हैं, 'आपके लिए फल-फ्रूट लाऊँ?'

सच में इन श्रीमानजी को किसी अच्छी वाग्मिता कक्षा की सख्त जरूरत है। या चाहें तो वे अपने बाल-बच्चों के सुझावों पर ध्यान देकर ही अपनी बोली की फूहड़ता सुधार सकते हैं। वैसे ये श्रीमानजी अपने किस्म के अकेले नहीं हैं। इस तरह के श्रीमानजी और श्रीमतीजी हमारे आसपास और भी हैं, जिनकी अटपटी बोली पर कटाक्ष करने में मालवा, निमाड़ के कई व्यंग्यकार हाथ साफ कर चुके हैं। व्यंग्य लेखक तो व्यंग्य लेखक, आम आदमी भी इनके शब्दों और वाक्यों को पकड़कर हँसने से नहीं चूकता। क्योंकि इनकी मजेदार भूलें स्पष्ट नजर आती हैं। मगर आप मानें या न मानें, श्रीमानजी वाली बीमारी ग्राम्य और कस्बाई परिवेश से आगे बढ़कर महानगरीय, फैशनपरस्त लोगों में भी मौजूद है। आजकल फिल्मकारों में एक नया ट्रेंड चला है। फिल्म के हिन्दी नाम के साथ उस नाम के अँगरेजी अनुवाद का पुछल्ला लगाने का। जाल-द-ट्रेप, धुंध-द फॉग, सन्नाटा-द सायलेंस, तलाश-द हंट, बाज-ए बर्ड इन डेंजर।

है न मजेदार बात। गोया अनुवाद न किया तो दर्शक को समझ ही नहीं आएगा कि ये 'जाल' क्या बला है। और यह परंपरा लगभग रू‍ढ़ि का रूप धारण कर चुकी है। इसके अतिरिक्त फिल्म वालों ने अशोक को 'असोका' बना ‍िदया। इनके भाई-बंध, जोड़ीदारों, बिरादरों यानी अन्य फैशनपरस्त शहरियों ने वात, पित्त, कफ को 'वाटा, पिटा, कफा' बना ‍िदया है। बुद्ध को बुद्धा, राम को रामा, महावीर को महावीरा तो ये वीर कभी के बना चुके हैं। मगर श्रीमानजी पर जैसे हम हँसते हैं, इन पर हँसने का साहस हममें नहीं है। जब उसी बात के लिए श्रीमानजी हँसी के पात्र हैं, तो ये 'श्रीमंत' क्यों नहीं? सच तो यह है कि हमारी गुलाम मानसिकता हमें चमकते लोगों की फूहड़ताओं पर सवाल उठाने से रोकती है।

जिन लोगों में तर्क, मौलिकता और कल्पना शक्ति का जर्बदस्त अभाव है, वे भौड़ें, नकलची और भेड़ वृत्ति अपनाने वाले रू‍ढ़िवादी सुरुचि संपन्नों को जमात में क्यों माने जाएँ? मगर यह भी हो रहा है। हम किसी और की भाषा का इस्तेमाल करें और उसका गलत उच्चारण करें तो गँवार माने जाएँगे। जाहिर है हम जॉन को जान नहीं कहेंगे। मगर हमारी भाषा का गलत उच्चारण करने वाले उल्टे आधुनिक माने जाते हैं। 'बुद्ध' को 'बुद्धा' कहने वाला अपने आप को आधुनिक समझता है।

- निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

विरासत में दंभ?

दुनिया के सबसे बड़े रईसों में से एक वॉरेन बफेट ने हाल ही में कहा- "दौलतमंद पालकों को अपने बच्चों के लिए उतना ही पैसा छोड़ना चाहिए, जिससे कि वे अपनी योग्यता का कार्य अच्छे से कर सकें, मगर इतना नहीं छोड़ना चाहिए कि वे कुछ कार्य ही न करें।" बफेट के ही नजदीकी एक अन्य अमेरिकी कॉर्पोरेट बिल गेट्स ने भी हाल ही में घोषणा की है कि वे अपनी अथाह, अकूत दौलत में से सिर्फ उतना ही अपने बच्चों को देंगे जितने से उनका जीवन सुगम रहे, बाकी राशि वे दान कार्यों में लगाएँगे। वॉरेन बफेट और बिल गेट्स की ये बातें सिर्फ बातें नहीं हैं। ये लोग स्वयं सादगी से रहकर वंचितों और बीमारों के लिए बहुत कार्य कर रहे हैं। इनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है, अतः ये जो कह रहे हैं वे करेंगे भी इसका भरोसा है।

भारत में यह दार्शनिक कथन सदियों से चल रहा है, "पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय।" भारतीय परंपरा में दान की महिमा भी काफी है। कुछ भारतीय रईस भी ऐसे हैं जो थोड़ी-बहुत या काफी कुछ चैरिटी करते हैं। मगर भारतीय रईसों का मुख्य लक्षण दिखावा है। चलिए ठीक है सादगी करने का माद्दा और सादगी का आत्मविश्वास भी हरेक के पास नहीं होता सो रईस अपनी सुख-सुविधा पर खर्च करते हैं। बात यहीं तक होती तो भी ठीक था। भारतीय अमीर व्यक्ति यह दिखाने पर बहुत खर्च करते हैं कि वे अमीर हैं! भारतीय और अप्रवासी भारतीय रईसों की जीवनशैली बेहद आडंबर मंडित है और वे अपनी संततियों को न सिर्फ अपनी सारी संपत्ति वैसी की वैसी देते हैं, बल्कि वे अपने राजकुमारों को फूहड़ दिखावा, दौलत का अहंकार, प्रदर्शन भी विरासत में देते हैं। अपनी कार्पोरेट गद्दी तो देते ही देते हैं। टाटा जैसे उदाहरण कम ही हैं, हालाँकि वे विवाहित नहीं हैं, उनकी संतानें भी नहीं हैं, मगर उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के चयन के लिए एक समिति बनाई है, जिसमें वे स्वयं नहीं हैं। यानी वे अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसी को थोपना भी नहीं चाहते। इसके ठीक उलट हाल है देश के राजनेताओं का। कहने को तो देश में प्रजातंत्र है, नेता जनता द्वारा चुने हुए जनता के सेवक हैं, मगर जैसे हाल ही में लालूप्रसाद यादव ने अपने बेटे की "ताजपोशी" की है, वैसे ही तमाम राजनेता जो चाहे किसी भी दल के हों, उत्तराधिकार में देश की गद्दियाँ अपने-अपने परिजनों को पूरी बेशर्मी से सौंप रहे हैं। अब क्या आशा करें? स्वयं की संपत्ति तो छोड़िए, वे तो देश को ही अपनी निजी संपत्ति मानकर व्यवहार कर रहे हैं।

बेतहाशा दौलत वालों को तो छोड़िए हमारे यहाँ सामान्य रईस भी अपने धन के उपयोग से भी ज्यादा उसके फूहड़ प्रदर्शन में यकीन रखता है। ऐसे ही एक अच्छे पैसे वाले के यहाँ कृष्ण-जन्म उत्सव मनाया जा रहा था। बैंडबाजे, कृष्ण की मूर्ति के लिए रेशम के वस्त्र, चाँदी की बाँसुरी, असली रत्नों के गहने तो थे ही, उन्होंने उत्सव के बाद काजू वर्षा की। गृहस्वामी ने कृष्ण रूप में सजे अपने पाँच वर्षीय पुत्र को गोद में लिया, एक बड़े बर्तन में काजू, किशमिश, मखाने लिए और गोदी में चढ़े अपने पुत्र के हाथों व स्वयं मेवे उछाले और बिखेरे। वे मेवे आने-जाने वालों के पाँव में आते रहे। एक अतिथि ने ऐतराज किया पर वे माने नहीं। इन्हीं सज्जन की सदा हीरों से लदी रहने वाली धर्मपत्नी अपने घरेलू सेवक की बच्ची को कभी काजू का एक टुकड़ा नहीं देती। यह कैसा धर्म उत्सव है जिसमें मानव धर्म ही नहीं। लोगों को खाने को नहीं और बेशकीमती खाद्य पैरों तले कुचलने को फेंका गया, सिर्फ यह दिखाने के लिए कि देखो हमारे पास इतना है कि हम खा ही नहीं फेंक भी सकते हैं। गोद में चढ़े नन्हे पुत्र ने विरासत में क्या यही पारंपरिक दंभ और दिखावा नहीं लिया होगा?

- निर्मला भुराड़िया