शनिवार, 10 जुलाई 2010

चित्रगुप्त की पर्यावरण डायरी

अपनी बात

कोई भी संस्थान, घटना या उत्पाद कितनी ग्रीन हाऊस गैसेस वातावरण में उत्सर्जित करता है उसे उसका कार्बन फुटप्रिंट कहा जाता है। आम लोग सिर्फ कार्बनडाई ऑक्साइड कहकर भी काम चला लेते हैं। तात्पर्य प्रदूषण फैलाने वाली सभी गैसों से होता है। यानी ‍िकसी व्यक्ति, संस्थान या देश द्वारा ‍िजतना प्रदूषण फैलाया गया वह उसका कार्बन फुटप्रिंट है, पीछे छोड़े गए प्रदूषण की 'पदछाप' है। कार्बन फुटप्रिंट को घटाने के लिए वनों की रक्षा करने, नए पेड़ लगाने, पुराने पेड़ बचाने, सर्य और हवा से प्राप्त प्राकृतिक ऊर्जा के प्रयोग आदि पर इन दिनों बहुत जोर ‍िदया जा रहा है। ‍िदन-प्रतिदिन गर्माती धरती ने दुनियाभर में पारिस्थितिकी जानकारों और पर्यावरण प्रेमियों को चौकस कर ‍िदया है, कुछ हद तक आम लोगों को भी क्योंकि परिणाम तो सभी को भुगतना है सिर्प विशेषज्ञों को नहीं। हाँ विशेषज्ञों का काम आम लोगों को वस्तुस्थिति समझना है जो ‍िक वे अपने-अपने तरीके से कर ही रहे हैं।

भारत में जल, वृक्ष, वन आदि के प्रति प्रेम और संरक्षण धर्म के माध्यम से और संस्कृति में गूँथकर समझाया गया। इस वजह से वृक्ष आम पुरुष ही नहीं आम स्त्री के लिए भी आदरणीय रहे। वे उन्हें सींचती-पूजती भी रहीं। प्राचीन पारंपरिक भारतीय जीवन में तो जीवन की चार में से दो अवस्थाएँ ही वनों में बिताने की कल्पना है। ब्रह्मचर्य यानी प्रकृति के गोद में बसे गुरु आश्रम में शिक्षा-दीक्षा और वानप्रस्थ तो नाम से ही स्पष्ट है। पुराणों में अपने व्यक्तिगत बागीचे में पंचवटी लगाने को भी स्वर्ग के समान कहा गया है। पंचवटी के पाँच पेड़ बताए गए हैं- पीपल, बरगद, बिल्व पत्र, अमालका व अशोक। ये पाँचों पेड़ फलदार और छायादार हैं। अग्निपुराण में वृक्षारोपण व वृक्ष रक्षा को आत्मा का उद्धारक बताया गया है। श्रीमद्‍ भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने अश्वत्थ यानी पीपल की महिमा बताई है। बुद्ध की माँ ने साल वृक्ष की डाली पकड़े-पकड़े बुद्ध को जन्म दिया, तो बुद्ध ने बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया। सीता ने अशोक वृक्ष के नीचे विरह के दिन काटे तो बुद्ध की माँ को अशोक वृक्ष के नीचे यह इलहाम हुआ ‍िक वे एक महान संतान को जन्म देने वाली हैं। दक्षिण के कई गाँवों में बरगद ग्राम-रक्षक माना जाता रहा है।

तात्पर्य यही कि भारतीय पारंपरिकता में वृक्षों की महिमा कई तरीकों से बताई गई है, जरूरत पड़ने पर वृक्ष विशेष का नाम लेकर भी। जल स्रोत भी इसी तरह हमेशा से पूजित रहे हैं। ऋषि-मुनियों ने आम व्यक्ति को भले पुण्य के नाम से ही सही जल, प्रकृति और वृक्ष से हमेशा जोड़ा।

अब हम एक अलग ही युग में हैं। यह मशीनों का युग है, रफ्तार का युग है। इस युग में हम विकास के नाम पर हजारों वृक्षों की बलि ले रहे हैं, वनों को साफ किया जा रहा है, जल को प्रदूषित किया जा रहा है। मनुष्य जो कर रहा है वह उसे भरना भी पड़ेगा। भारतीय दर्शन में इसे कर्म और कर्मफल कहा जाता है। इसी तर्ज पर, कार्बन-फुटप्रिंट के आधार पर हम नए शब्द को ईजाद कर सकते हैं- 'कार्बन-कर्मा'। इस कार्बन-कर्मा का हिसाब-किताब यह है कि आप पेड़ काटते हैं, प्रदूषण फैलाते हैं, पर्यावरण को दूषित करने की जो भी हरकत करते हैं तो आप 'कार्बन-पाप' करते हैं। आप पेड़ लगाते हैं, पेड़ सींचते हैं, पेड़ों की रक्षा करते हैं, जल और ऊर्जा की बचत करते हैं तो आप कार्बन-पुण्य करते हैं। तो बस जल्दी से आप मन ही मन एक 'चित्रगुप्त-डायरी' बना डालिए और उसमें अपने कार्बन-कर्मों का ब्योरा रखिए। अपने कार्बन-पाप और कार्बन-पुण्य के हिसाब से आपको 'कार्बन क्रेडिट' अर्थात कार्बन-कर्मफल प्राप्त हो जाएगा।

चलते-चलते : कार्बन-पुण्य का एक उदाहरण-उत्तराखंड में विदा होती बेटी जब मायका छोड़कर जाती है तो घर छोड़ने के पूर्व एक पौधा रोपती है। बाद में बेटी का परिवार उसकी अमानत समझकर पेड़ को सींचता, संरक्षित करता है। 1995 में कल्याणसिंह नामक एक व्यक्ति ने यह विचार दिया। तब से यह रस्म-सी बन गई।

- निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

आगाह करे ओसामा

अपनी बात

निर्देशक सिद्दीक बरमाक ने अफगानिस्तान के उस समय के हालात पर एक फिल्म बनाई है, जब अफगानिस्तान पर तालिबान कट्‍टरपंथियों ने कब्जा कर रखा था। पूरी तरह अफगानिस्तान के असल लोकेशन पर शूट की गई फिल्म 'ओसामा'में हम उन हालात से पर्दे पर रूबरू होते हैं जो हमने अक्सर पढ़े-सुने थे। कैमरा तालिबान कब्जे के उस काल में ले जाता है, जो कि हमारे बहुत नजदीक का अतीत है, जहाँ औरतों के घर से बाहर निकलने पर बंदिश है। बाहर जाना हो तो पिता, भाई, पुत्र, पति जैसा कोई नजदीकी रिश्तेदार साथ में होना आवश्यक है। औरतों के घर के बाहर कार्य करने पर बंदिश है। औरतों के ऐसे किसी भी पुरुष से बात करना वर्जित है जो उनका संबंधी न हो। औरतों के लिए जरूरी है कि वे सिर से पाँव तक बुरके में कैद हों। उनके नाखून तक न दिखें। फ्रेम-दर-फ्रेम ये हालात स्पष्ट होते हैं, ये बंदिशें दिखती हैं और इनके उल्लंघन के लिए तय क्रूर सजाएँ भी। चूहादानी जैसे पिंजरों में कैद कर ले जाई जातीं बुर्कानशीं औरतें, ढोरों की तरह हाँककर तालिबान बनने का प्रशिक्षण देने ले जाए जाते लड़के। धार्मिक स्कूल में धर्म की आड़ में किशोरों का ब्रेनवॉश आदि।

किशोर सुलभ नटखटपन में पेड़ पर चढ़कर खेलने वाले बच्चे को अंधे कुएँ में गिर्री से लटकाने की क्रूर सजा आदि दिल को चीरती है। उन‍ दिनों तालिबान में अफगानिस्तान में कुफ्र कहकर नाचने-गाने पर भी पाबंदी लगा रखी थी। अत: एक दृश्य यूँ आता है। एक घर में स्त्रियाँ शादी का नाच-गानाकर रही हैं, खा-पी रही हैं। भनक लगने पर एक तालिबानी आ जाता है कड़क स्वर में पूछता है कि यहाँ क्या चल रहा है। घर का एक पुरुष दरवाजा खोलकर जवाब देता है घर में मौत हो गई है। इस बीच सभी औरतों ने फुर्ती से बुरका डाल लिया है, ढोल-मंजीरे बंद कर वे समूह में रोने बैठ गई हैं। उन्हें मातम मनाते देख संतुष्ट तालिबान चला गया है।

उपरोक्त हालात में फिल्म की बारह वर्षीय नायिका, उसकी माँ, उसकी नानी भूखे मर रहे हैं, क्योंकि उनके घर में कोई पुरुष नहीं है। सब युद्ध में मर गए। उधर औरतों का कुछ भी करना मना है। ऐसे में बच्ची, लड़के (ओसामा) का वेश धरकर चाय की गुमटी पर काम करने जाती है ताकि पारिश्रमिक के तौर पर शाम को 'रोटी' ला सके। बच्चा बनी बच्ची के तौर-तरीकों को तालिबान शंकास्पद निगाहों से तो देख ही रहे होते हैं कि एक दिन राज खुल भी जाता है। तालिबान की नजर में लकड़ी से बहुत बड़ा अपराध हो गया है और बारह साल की बच्ची तीसरी पत्नी के तौर पर सत्तर साल के मुल्ला को सौंप दी जाती है। तालिबान की नजर में यह न्याय हैं। पुरुष का बुढ़ापे में तीसरी शादी करना भी धर्मोचित है, स्त्री का रोजगार के लिए घर से बाहर निकलना भी गुनाह!

इस फिल्म के बहाने कट्‍टरपंथ की क्रूरताओं पर नजर डाली जा सकती है। यह किसी एक ही धर्म की बात नहीं है। एक खास प्रकार की जड़, निष्‍ठुर, स्वार्थी मानसिकता की भी बात है, जो इस काल में एक धर्म में चाहे ज्यादा दिखाई पड़ रही हो पर बाकी भी इससे अछूते नहीं हैं। कट्‍टरपंथी जहाँ भी जिस भी धर्म में या जिस भी समाज में हैं वे अपने स्वार्थों के लिए धर्म की ऊलजलूल और अपने स्वार्थ की सिद्धि करने वाली व्याख्याएँ कर रहे हैं। संस्कृति, परंपरा और मर्यादा की दुहाइयाँ देकर अपना उल्लू साध रहे हैं। अत: 'ओसामा' जैसी फिल्में कट्‍टरपंथ का हश्र क्या होता है, कट्‍टरपंथ के बीच आम ना‍गरिक की क्या स्थिति होती है, इस बात के प्रति आगाह करती है। जब रूढ़िवाद और कट्‍टरपंथ धीरे-धीरे आम लोगों को अपनी गिरफ्‍त में ले रहा हो तब पता नहीं चलता। अजगर के पेट में चले जाने के बाद पता चल भी जाए तो कुछ हो नहीं सकता। मगर अक्सर हम धीरे-धीरे बढ़ रहे, आहिस्ता-अहिस्ता अपनी चपेट में ले रहे रूढ़िवाद का विरोध करने के बजाय उल्टे उसमें बहने लगते हैं। उधर हरियाणा में गोत्र के नाम पर जाति पंचायतों ने खून-खराबाकिया और इधर एक टीवी सीरियल के विज्ञापन में शादी के लिए उम्र, कद, जाति के साथ ही 'गोत्र' शब्द भी जोर-शोर से चमकने लगा! या यूँ कहें कि विशेष तौर पर जोड़ लिया गया। यह गलत प्रवृत्तियों और कट्‍टरपंथ को बढ़ावा देना नहीं तो और क्या है? आज के जमाने की पढ़ी-लिखी भारतीय स्त्रियों को और सामाजिक तौर पर जागरूक पुरुषों को ऐसी बातों का विरोध करना चाहिए, न‍ कि रूढ़िवाद में और लिप्त होना चाहिए। आम आदमी को क्रमश: चाशनी में लपेटते हुए चढ़े बिना रूढ़िवाद चरम पर नहीं पहुँच सकता।

- निर्मला भुराड़िया

जब धर्मालु हो जाएँ झगड़ालू!

अपनी बात

इंदौर का एक मंदिर, जो मनौतियों के लिए बहुत प्रसिद्ध है, वहाँ लोग मनौती पूरी होने के लिए धार्ग, नारियल आदि बाँधते हैं। और भी तरह-तरह के टोटके करने वालों की इस मंदिर में भीड़ रहती है, जिनके तहत कोई दीवार पर लड्‍डू चिपका देता है तो कोई दीवार पर उलटा सातिया मांड देता है, तो कोई दीवार पर गोबर लगाकर उस पर प्रसाद चिपका देता है! ढेर सारे लोग जब मंदिर की दीवार के साथ यह सुलूक करते होंगे तो दीवार, गलियारे आदि में गंदगी का क्या आलम होता होगा- इसकी कल्पना की जा सकती है। फफूँद और मक्खियों का साम्राज्य, गंदगी की चिपचिप,मुट्‍ठियों में बंद प्रसाद के संग मिला पसीना, कटे नारियल के सिर,कहीं किन्हीं भगवानजी का अभिषेक हुआ हो तो दही, शहद, आम्ररस आदि-इत्यादि पैरों में आते खाद्य पदार्थ! क्या यह पूजा स्थल कहाए? मंदिर के बाहर बिकने वाले प्रसाद की दुकानों में भी पहले बासी, फफूँद लगा,भगवान के यहाँ से घूमकर पुन: दुकान में आया, बदबू वाला प्रसाद भी पाया गया। इन्हीं सब बातों के मद्देनजर प्रशासन ने मंदिर की दीवार पर लड्‍डू, गोबर इत्यादि लगाने पर रोक लगा दी। और लीजिए धर्मालु (?) झगड़ालू हो गए, प्रतिबंध हटाने के लिए धर्म की दुहाई देने लगे। यह दोष देने लगे कि धर्म के काम पर रोक लगाई जा रही है!

सवाल यह उठता है कि धर्म के नाम पर कब तक हम पाखंड और कर्मकांड को प्रश्रय देंगे? धार्मिक शुचिता के नाम पर हम दुनियाभर की छूत-छात पालते रहे हैं, मगर जब असल हाईजीन,असल पवित्रता का सवाल आता है, तो धर्म और रीति-रिवाज के नाम पर हम गंदगी का साम्राज्य फैला देते हैं। गंगा जैसी जीवनदायिनी नदी में लोग अधजली लाशें और मुर्दे बहा देते हैं। वो मुर्दे फूलकर सतह पर आ जाते हैं। उसी पानी में लोग किनारे पर कपड़े धोते हैं, पशुओं को नहलाते हैं, खुद भी पवित्र (!) डुबकी लगा लेते हैं। ठीक है जब ‍नदियाँ कलकल बहती थीं तो स्वच्छ-पवित्र भी होती थीं। लोग पानी में जाकर मृत व्यक्ति का 'जलदाग' करते थे तो देखते ही देखते मरगमच्छ मृत शरीर को ले जाते थे। एक किस्म का प्राकृतिक एवं पर्यावरण संतुलन था। मगर अब जबकि हमारे द्वारा की गई घोर अस्वच्छता और प्रदूषण के कारण छोटी-बड़ी नदियाँ मैली हो गई हैं तब उनमें क्या फूल सिरान और क्या मुर्दा बहाना? पवित्रता का मतलब ही बहाव है, यदि धर्म की रीतियाँ जमाने के प्रवाह में नई नहीं हुई हैं तो वे सड़ांध ही मारेंगी, दीवार पर चिपके मनौती के लड्‍डू की तरह! धर्म के नाम पर सड़ी-गली प्रथाओं से चिपके रहना कौन-सा धर्म है? यह तो अधर्म है, अपवित्रता है, हठ है, कूड़मगज भीरूता है।

प्रशासन यदि स्वच्छता की दिशा में कोई कदम उठाता है तो हमें विरोध करने के बजाय उसका समर्थन करना चाहिए। पूजा स्थल पवित्रता और शांति के स्थान होना चाहिए या गंदगी और स्वार्थप्रियता के? मगर हमारे यहाँ तो रिश्वत का पहला पाठ ही यहीं से शुरू हो जाता है कि हे भगवान,तू मेरा फलाँ-फलाँ काम करा देना तो मैं तुझे फलाँ-फलाँ राशि का प्रसाद चढ़ाऊँगा!
- निर्मला भुराड़िया

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

पवित्र गाय नाली में प्यास बुझाय!

अपनी बात

मध्यप्रदेश के एक शहर की एक कॉलोनी का नजारा करें। कॉलोनी के अधिकांश मकान बहुमंजिला हैं। एक प्लॉट खाली पड़ा है। वह खाली प्लॉट पूरी कॉलोनी का कचरा घर है। यह सुअर और आवारा कुत्तों का भी घर है। रात घिरते न घिरते एक और किस्म के प्राणी, झुंडों में, कॉलोनी में आ जाते हैं। यह हैं गायें। कॉलोनी के ही एक कोने में इन गाय पालकों के घर हैं। तो सांस्कृतिक भाषा में तो यह कहना चाहिए कि गोधूलि बेला (!) में गायें चरकर घर लौटती हैं, पर घर की बजाय वे आसपास की सड़कों पर खड़ी हो जाती हैं। सारी सड़क को गोबरमय कर देती हैं। ऊपर से बारिश हो जाए तो अजीब-सी गंध से पूरी कॉलोनी का सिर गंधाता है। कॉलोनी के लोग परेशान हो जाते हैं, पर कौन बोले? क्योंकि ये गैयाएँ किन्हीं छुटभैए नेता की अमानत हैं। वही गोपालक नेता, जिनके घर इस कॉलोनी के किनारे बने हैं। ये अमानत उनके घर दूध दुहने के लिए ले जाई जाती हैं फिर दिन में शहर में चरने एवं रात में कॉलोनी में विश्राम करने के लिए सड़कों पर छोड़ दी जाती हैं। पर, शहर में चूँकि खेत, खलिहान, चारागाह आदि तो हैं नहीं,अत: ये गाएँ कागज, प्लास्टिक, खाद्य-अखाद्य न जाने क्या-क्या चर कर घर लौटती हैं। आश्चर्य होता है कि यह सब चर कर गाय किस प्रकार का दूध देती होगी और यह दूध पी कैसे लिया जाता होगा? कॉलोनी की सड़क, प्लॉट, पशुओं आदि-इत्यादि को देखो तो एहसास होता है हम लोग कितने घृणित रूप से अस्वच्छ हैं!

इन आवारा गायों के खिलाफ कभी कोई अभियान सफल नहीं हो पाया। उसकी दो वजहें हैं। एक तो यह कि गोपालक राजनीतिक लोग हैं। वो कितनी भी गंदगी करें, उस गंदगी को हटाया नहीं जा सकता। उनकी गलत-सलत बातें भी उनकी पॉवरफुल मूँछों से बँध कर सुरक्षित हैं। दूसरी बात यह कि पॉवरफुल की मूँछ से गाय बाँध कर, गाय की पूँछ से हमने पवित्रता बाँध दी है। एक तोराजनीतिक ऊपर से पवित्र यानी गाय से संबंधित किसी भी बुराई की ओर ध्यान नहीं दिलाया जा सकता। 'पवित्र गाय' का धार्मिक विशेषण देकर उसके साथ खासी संवेदनशीलता को नत्थी कर दिया है। इतना कि 'गाय' का नाम लो तो दंगे हो सकते हैं। या जिनकी दंगा कराने की इच्छा हो वो 'पवित्र गाय' के बहाने दंगा भड़का सकते हैं। गाय के दूध के साथ ही गाय के साथ जुड़ी धार्मिक संवेदना को भी दुहते हैं। अत: जरूरी है कि यह भी देखा जाए कि गाय को पवित्र मानकर गाय के नाम पर दुनियाभर की माथा-पच्ची करने वाले स्वयं गाय के साथ क्या करते हैं? चलिए देखते हैं।

यह सभी जानते हैं कि दूध बछड़े के लिए होता है, उसे पीते हम हैं। खैर इस बात के भी अपने तर्क हैं कि बछड़े को पहले पिलाकर बचा हुआ दूध निकालते हैं या सृष्‍टि का भोजन चक्र ही ऐसा है कि हर प्राणी एक-दूसरे पर निर्भर है। यहाँ तक ठीक है, बिलकुल ठीक! लेकिन पिछले दिनों एक अजीब वाकया मालूम हुआ। एक गाय का बछड़ा मर गया था। गाय बछड़े की ममता में ही दूध देती है। बछड़े की मौत पर गाय दूध देना बंद न करे अत: एक गोपालक ने मृत बछड़े की खाल में रुई भर दी है। दूध दुहने के समय पर मृत बछड़े को गाय के समीप रख दिया जाता है। वह उसे चाटती है तो दूध उतरता है। गाय को दुह कर मरे हुए बछड़े को हटा लिया जाता है! इसी तरह घरों में आपको यह दृश्य दिखेगा कि थोड़ी देर पहले रोटी खानेवाली गाय थोड़ी देर बाद डंडा खाती है। पुण्य की आशा में रोटी खिलाई, पुण्य-वुण्य शायद मिल गया तो अब पवित्र गाय यहाँ-वहाँ मुँह मारने वाली आवारा गाय में तब्दील हो गई, सो इसे हकाला जा सकता है। गोवर्धन पूजा के दिन सजी-धजी गाय की पूजा करने के बाद भी 'हट्‍-हट्‍, जा यहाँ से' का मंत्र, डंडाध्वनि के साथ पढ़ने का पुराना रिवाज है, मगर यूँ कि हम हमारी पवित्र गाय के साथ कुछ भी करें,पर आप कुछ न कहो। गोमूत्र चिकित्सा पर कभी आप सवाल उठा दीजिए। लोग पवित्रता का हवाला देते हुए आपके पीछे पड़ जाएँगे। दुनिया में किसी भी औषधि के गुण-दोषों दोनों पर विचार किया जा सकता है,पर गोमूत्र में पस सेल्स भी हो सकते हैं, इस आशंका पर आपको चुप्पी साधना होगी, क्योंकि गोमूत्र के बारे में तो शुभ-शुभ ही बोलना है। गुण गा सकते हैं तो गाइए नहीं तो चुप रहिए। गोमूत्र व्यवसायी आमजन की इस धर्मभीरूता का बहुत फायदा उठाते हैं।

समयानुसार चीजों की पुनर्व्याख्या न करने के कारण और भी विसंगतियाँ होती हैं। जैसे किसी ज्योतिषी ने बताया कि गाय को चारा खिलाओ पुण्य मिलेगा, तो इन पुण्याकांक्षियों के लिए व्यवस्था आपको शहर में कहीं न कहीं मिल जाएगी। जहाँ एक व्यक्ति ढेर-साचारा लिए बैठा होगा,पास में उसी की गाय बँधी होगी। पुण्याकांक्षी जाएगा, चारेवाले से चारा खरीदेगा और पास खड़ी उसी की गाय को खिला देगा। लीजिए मिल गया रेडीमेड पुण्य (ज्योतिषियों के बढ़ते प्रभाव को देखकर संदेह है कि आधुनिक मॉल्स में ही कहीं पुण्याकांक्षियों के लिए चारा सेंटर न खुल जाएँ, जहाँ अमेरिकी काऊ बॉय के ड्रेसअप में गोपालक गाय के संग खड़े हों!)। अच्छा पता है, यह 'सौभाग्य' से प्राप्त हुआ चारा खाकर पवित्र गौमाता प्यास बुझाने कहाँ जाएँगी? बताने के लिए कोई इनाम नहीं है। मूत्रालयों की सड़क किनारे के गड्‍ढों में आपने मानव-मूत्र के पोखरों में मुँह डाले खड़ी गायों को देखा होगा! क्या इससे गाय की पवित्रता खंडित नहीं होती? क्या सही आलोचनाओं से ही गाय की पवित्रता खंडित होती है?

- निर्मला भुराड़‍िया

संतों की तू-तू, मैं-मैं धर्मालुओं की रोटा-पानी!

अपनी बात

एक प्रसि‍द्ध संतजी (?) का बेटा भी संतगिरी में आ गया है गोया यह कोई पुश्तैनी व्यवसाय हो! वैसे है तो व्यवसायही जिसमें अपार धन और शोहरत है। संत होने के लिए छोड़ना भी कुछ नहीं है सुख-सुविधा, आडंबर, अहंकार कुछ भी नहीं। उल्टे लोग पैर छू-छूकर अहंकार को पोषित करेंगे, तृप्त करेंगे। जिन समाजों के संतों ने विलास के साधन छोड़े,अहंकार तो उन्होंने भी नहीं छोड़े हैं। पिछले दिनों ही संतों की तू-तू, मैं-मैं हो गई थी इस बातर पर कि कौन ऊँचे पाटे पर बैठा, कौन नीचे पर। एक संत ने दूसरे संत पर करोड़ों रुपए जुटाने की मंशा का आरोप लगाया। कोई संत गुस्से में समारोह छोड़ गए, तो कोई रूठ गए इस बात पर कि फलाँ विधि से मूर्ति का अभिषेक क्यों नहीं हुआ। संतों की यह लट्‍ठम-लट्‍ठा और धर्मालुओं के कर्मकांड देखकर तो ऐसा लगता है समाज में कोई समस्या ही नहीं रह गई और समय काटने के लिए बच्चों की रोटा-पानी की तरह बड़े लोग धर्म-धर्म खेल रहे हैं। उक्त आयोजनों में कर्मकांड में शामिल होने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होते हैं, जो अपनी संवेदना और आँसू पत्थरों पर खर्च करते हैं। अखबारों में पंक्तियाँ होती हैं- अभिषक देखकर हजारों की आँखें धन्य हो गईं, नम हो गईं। जनता तो जनता,नेताओं के कर्मकांडी होने का यह आलम है कि पिछले दिनों गाँधीजी की मूर्ति को भी दूध से धो दिया। खुद दूध के धुले बनने पर शायद ही किसी ने ध्‍यान दिया हो।

चलिए अब एक दूसरे प्रकरण की तरफ आएँ जो इससे बिलकुल ही अलग दुनिया का है, भले ही उनके बाशिंदे एक ही देश के हों। किस्सा यूँ है कि गाँव की एक स्त्री बच्चादानी निकलवाने का ऑपरेशन करवाने इंदौर आई थी। यह तय था कि किस अस्पताल में उसका युटेरस निकाला जाएगा, कौन डॉक्टर ऑपरेशन करेगा, गाँव के डॉक्टर ने ही उसे बताकर भेजा था कि फलाँ अस्पताल में फलाँ डॉक्टर के पास ही जाना है। किस्मत से स्त्री के पति को एक पढ़ा-लिखा,संवेदनशील शहरी मिल गया। उस शहरी को दाल में कुछ काला लगा तो उसने उन ग्रामीणों को, जो ऑपरेशन के लिए काफी रकम जुटाकर आए थे, अपने एक मित्र चिकित्सक के पास भेजा। मित्र चिकित्सक ने जाँच करवाई तो पता चला युटेरस निकालने की कतई आवश्यकता नहीं थी। इन चिकित्सक महोदय ने मानवीयता बरतते हुए ईमानदारी से बता दिया कि ऑपरेशन की रिकमेंड फिजूल थी। ग्रामीणों से और बात करने पर पता चला कि यह एक केस नहीं है, गाँव का चिकित्सक, शहर के चिकित्सक से मिला हुआ है और गाँव में कई महिलाओं को बिना बात ही ऑपरेशन रिकमेंड करता है। बाईस-पच्चीस साल की युवतियों की कोख भी इस तरह निकलवाई जा चुकी है।

यह तो सिर्फ एक किस्म का ही उदाहरण है। निर्धनों, अर्द्धशिक्षितों, अशिक्षितों, ग्रामीणों के स्वास्थ्य चेतना का अभाव है। इस बारे में चेतना अभियान चलाना अन्य शहरी, शिक्षित नागरिकों के एजेंडा पर नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, पानी ये सब तो कोरे शब्द रह गए हैं,जो चुनावी, राजनीतिक नारों के रूप में ही काम आते हैं। समृद्ध, संपन्नजन चाहें वे नागरिक हों या नेता धर्म की जय करने में लगे हैं। मानव धर्म की जय करने में न उनकी रुचि है, न फुर्सत।

- निर्मला भुराड़‍िया

सोमवार, 5 जुलाई 2010

जरा सोच-समझकर बोलना महाराज!

अपनी बात

योरपीय संघ में भविष्यवाणी करने वाले लोग उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के दायरे में आ जाएँगे। इससे उन्हें अपने कथन की जिम्मेदारी भी लेना होगी। किसी का दावा गलत निकला तो जजमान कोर्ट में भी जा सकेगा! भारत में यह दिन दूर है। या कहें दूर-दूर तक ऐसी कोई योजना नहीं है कि 'फेंक-फाँक' को व्यवसाय बनाने वाले बाज आएँ। अत: हमारे यहाँ अटकल बाजी को बाजार बनाने वालों की जमात मौजूद है। वो भी कई रूपों में। कोई कपाल पर भविष्य पढ़ता है, कोई हथेली में, कोई कुंडली में, तो कोई लक्षणों में। भारतीय पद्धतियों के साथ ही,हमारे यहाँ भविष्य आकलन की कई विदेशी पद्धतियाँ भी चल पड़ी हैं। टैरट कार्ड, फेंगशुई, रुन्स, क्रिस्टल बॉल वगैरह-वगैरह। यह सिर्फ मन बहलाव का ही साधन होता तो भी समझ लिया जाता कि भई ठीक है, अपनी-अपनी मान्यता या समझ है। परंतु फेंक-फाँक अधिकाधिक भारतीयों को निकम्मा बना रही है और भाग्य-निर्भर भी। इससे भी बड़ी मुश्किल तो यह है कि भविष्य बताने, फिर उसे तथाकथित रूप से सुधारने का व्यवसाय ठगी का एक बहुत बड़ा जाल बन गया है। तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ, समस्या उपाय के समाधान के नाम पर लोग समय, पैसा और अपनी मानसिकता जमकर खराब कर रहे हैं। व्यवसायी ठग तरह-तरह के रूपों में आते हैं। कोई शनि महाराज के काले कपड़े पहनकर शनि की दशा ठीक करने का दावा करता है, तो कोई पाठ बिठाने का पैसा लेता है। नारियल, अगरबत्ती भी खुद ही बेच देता है। बड़े-बड़े पंडित टेलीविजन में एयरटाइम पा गए हैं या ज्योतिष की फाइव स्टार दुकानों में सेलिब्रिटीज का भाग्य बाँचते हैं। निश्‍चित ही वे केवल भाग बाँचकर नहीं रह जाते, 'स्टार' उनका स्थायी 'कस्टमर' हो जाता है और दाएँ मुड़ना भाग्य के लिए अच्छा है कि बाएँ मुड़ना उनसे पूछकर ही मुड़ता है। ये 'गद्‍गद्‍ गुरु' जगत गुरु की पदवी भी ऑटोमेटिक ही पा जाते हैं साथ ही भोली जनता की भी श्रद्धा के केन्द्र हो जाते हैं, क्योंकि वे उनके रोल मॉडल के भी गुरु हैं। अत: बीच के दौर में पुरातनपंथी मानी जाने वाली यह विधा अब आधुनिक (?) मानी जाने लगी है। और चिकने पन्ने वाली अँगरेजी पत्रिकाओं से लेकर टीवी चैनल और अखबारों तक सारे माध्यम भाँति-भाँति के भविष्य वक्ताओं और भाँति-भाँति के भविष्यवाणी के तरीकों से भरे पड़े हैं, जिनमें यह तक बताया जाता है कि किसी राशि के व्यक्ति को क्या खाना चाहिए, कौन से रंग के वस्त्र पहनना चाहिए। शायद वे थोड़े दिन में यह भी बताने लगें कि किस राशि के व्यक्ति को किस डिजाइनर का डिजाइन किया वस्त्र पहनना शुभ रहेगा। तब शायद डिजाइनरों से भी उनका कमीशन बँध जाए!

कोई यह पूछ सकता है कि इसमें क्या नुकसान है? नुकसान यह है कि हम चिंतकों और समाज सुधारकों के बजाय बहुरूपियों और धंधेबाजों में गुरु और मार्गदर्शक ढूँढने लगे हैं। वे भी आपको ऐसी स्थिति में पकड़ते हैं, जब आप 'मरता क्या न करता' वाले हालात में होते हैं और ग्रहदशा ठीक करने के नाम पर कुछ भी पैसा खर्च करते हैं। बाबाओं और तांत्रिकों के चक्कर में आकर लोग कुछ भी ऊलजलूल, उल्टा-सीधा करने को तैयार हो जाते हैं। बच्चों की बलि देने के किस्से भी हिन्दुस्तान में होते हैं, सिर्फ इसलिए कि किसी तांत्रिक ने बता दिया था। चौराहे पर टोटके रखना, कुत्ते को इमरती खिलाना,किसी का कुछ बिगाड़ने के लिए मूठ रखवाना जैसे अजीब और ईर्ष्यालु धंधे भी लोग इसी वजह से करते हैं। और सच तो यह है कि अपना भविष्य सुधारने के लिए कर्म करने के बजाय इन्हीं सब गोरखधंधों में लग जाते हैं। और हाँ, अपना अच्छा करने से ज्यादा चिंता इन्हें दूसरों का बुरा करने की होती है। यह सब अंधविश्वास, असुरक्षित मानसिकता, निकम्मेपन, मूर्खता, ठगी का एक ऐसा जाल है, जिसे तोड़ना आवश्यक है। तो क्यों न पहली कड़ी में इन तथाकथित भविष्य वक्ताओं को ही लाया जाए,जिन्हें बोलने के पहले दस बार सोचना पड़े कि वे क्या बोल रहे हैं? जनता को तो भ्रमित मनोवस्था से निकलने की आवश्यकता है ही। हिन्दुस्तान को इस वक्त ज्ञान व जागरूकता की आवश्यकता है, अंधविश्वास या भाग्य निर्भरता की नहीं। हमारा मूलमंत्र 'खुद पर भरोसा है' होना चाहिए 'पता नहीं भाग में क्या बदा है' होने की बजाय। हमें असुरक्षा की धुक-धुक नहीं, आत्मविश्वास की ऊर्जा चाहिए। समस्या समाधान की दिशा में कर्म ही काम आता है।

- निर्मला भुराड़‍िया

रविवार, 4 जुलाई 2010

क्यों रोते हो भगवानजी?

अपनी बात

एक स्त्री ने छू दिया... और हनुमानजी रो पड़े। रोते हुए हनुमानजी को दिखाने के लिए टीवी चैनल पिल पड़े। 'चमत्कार, चमत्कार', भावविभोर दर्शक दीदे फाड़-फाड़कर टीआरपी (दर्शक संख्या की रेटिंग) बढ़ाने लगे। कुछ काम-धाम छोड़कर पूजा-पाठ में मगन हो गए, तो कुछ रोते भगवानजी को देखने के लिए भीड़ लगाने लगे, धक्का-मुक्की करने लगे। भारत में इन दिनों यह 'ऊलजलूल डॉट कॉम' बहुत चल रहा है। कुछ कह भी नहीं सकते भगवान की, धर्म की निंदा कर दी कहकर तथाकथित श्रद्धालु, धार्मिक आपके गले पड़ जाएँगे। जबकि उनके लगे तो हमको पड़ना चाहिए कि भैया आपकी आस्था की रक्षा तो इसमें है किआपको रोना आए तो आपके भगवानजी आपको बल दें, न कि खुद रो पड़ें। मगर इधर धर्म का काम आस्था बढ़ाना है कहाँ? धर्म की ड्‍यूटी मजमा जुटाने,भोले धर्मालुओं को प्रवचन की अफीम खिलाकर दुनिया के गुलगपाड़ों से दूर रखने की हो गई है, ताकि उन्हें न्याय की माँग, सामाजिक जागरूकता से दूर रखा जा सके। इसलिए सिर्फ हनुमानजी ही नहीं रोते, कभी कोई चरण पादुका अपने आप चल पड़ती है, कभी कोई नागिन प्रकट हो जाती है। 'दु:खों की खान है भौतिक सुख' कहने वाले प्रवचनकार करोड़पतियों की जीवन शैली जीते हैं। भरपूर सुख-संपदा जुटाते हैं। चूँकि हम धर्म का मामला हो तो जायज (नाजायज) मुद्दों में भी ऐतराज नहीं उठाते। धर्म शब्द आगे जुड़ गया हो तो गलत बात की निंदा से भी डरते हैं। अत: धरम के नाम पर बुरे करम करने वालों को हरी झंडी मिल जाती है। आप ऐसे लोगों के हौंसले देखिए, तिरुपति में एक व्यक्ति भगवान को पचास लाख रुपए के नकली नोट चढ़ा गया! क्या कहें गुरु, भगवान को ही चला रहे हो? सच तो यह है जब हम वंचित को उपेक्षित कर भगवान को दूध-स्नान करवा रहे होते हैं तब हम भी भगवान को चला रहे होते हैं।

यह ठीक है कि इंसान जब-जब हार जाता है, अपनी दुनियावी शक्तियों के जरिए दु:खों से पार नहीं पा सकता, तब वह उच्च शक्तियों की शरण में जाकर राहत महसूस करता है। कहीं कोई है,जो न्याय का पक्ष लेगा, दर्द से उसका त्राण करेगा यह बात उसे साहस देती है। यह एक सकारात्मक आस्था हो सकती है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। धर्म विश्वास के बजाय अंधविश्वास में तब्दील हो जाता है। हम यह सोचने लगते हैं धर्म एक शॉर्टकट है, जिसकेजरिए बगैर किए ही सब-कुछ हो जाएगा। चमत्कारों पर भरोसा, अकर्मण्यता का स्वीकार, चुनौतियों से पलायन, ऊपरी शक्तियों पर दैनंदिन निर्भरता, जीवन संघर्ष से बचने के लिए धर्म कीरेत में मुँह छुपाने का शुतुरमुर्गीपन इत्यादि बढ़ाने के लिए हमारे पास रूढ़‍िवादी, कट्‍टरपंथी,निहित स्वार्थी बैक्टीरियाओं की पूरी फौज तैयार है, जो भोले-भाले लोगों को संक्रमित कर अपनी कॉलोनी बढ़ा रहे हैं। और इन भोले लोगों में स्त्रियों की संख्या अधिक है। क्योंकि इक्कीसवीं सदी में भी उन्होंने अपने जागरूकता का घेरा सीमित रखा है। जिसमें कामकाजी और डिग्रीधारी स्त्रियाँ भी शामिल हैं, इस बात का बुरा माने बगैर वे डिग्रियों के साथ ही चेतना, ज्ञान और सामान्य जागरूकता भी बढ़ाएँ तो समाज के पुनर्निर्माण में बेहद मददगार हो सकती हैं। क्योंकि माहौल ऐसा हो गया है कि कर्म पर विश्वास, मानवता पर विश्वास, इंसानी क्षमताओं पर विश्वास घटाने के लिए हम हर चोट कर रहे हैं। प्रयत्न के ऊपर चमत्कारों को तरजीह, मनोबल के ऊपर बाहरी शक्तियाँ जुझारूपन के ऊपर पलायन... शायद यही देखकर हनुमानजी को रोना आ गया! उन्हें पता है इंसान कुछ करता-धरता तो है नहीं, 'सुनियो अरज हमारी' कहता अभी इधर ही आ धमकेगा!

- निर्मला भुराड़‍िया