मंगलवार, 28 सितंबर 2010

ईश्वरों की दुनिया!

सबकी प्यारी, सबकी दुलारी, खुशमिजाज 'बिटिया' एक विशिष्ट बच्ची है। वह विशिष्ट बच्चों के लिए बने स्पेशल स्कूल में जाती है, जहाँ उसे और उसके जैसे या उससे भी अल्प विकसित बच्चों को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वे शिक्षित हो सकें। अपने छोटे-छोटे काम स्वयं कर सकें। आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन के अलावा इन बच्चों को स्वयं पर गर्व करने के अवसर भी दिए जाते हैं। पिछले दिनों ऐसा ही एक कार्यक्रम था ‍िबटिया के शिक्षण संस्थान में ‍िजसमें विशिष्ट बच्चों को मंच पर अपनी प्रस्तुतियाँ देना थीं। जो बच्चे मंच पर नहीं जा रहे थे, उन्हें दर्शक बनकर रंगारंग कार्यक्रम का आनंद लेना था। बिटिया बहुत खुश थी, क्योंकि उस डांस करना था। उसके मम्मी-पापा भी कार्यक्रम अटैंड करने गए थे, जहाँ वे अन्य विशिष्ट बच्चों के पालकों से भी मिले।

एक पालक ने बताया कि उनके एक नहीं बल्कि दो बच्चे अल्पविकसित रह गए। इन बच्चों में अलग-अलग दौर आते हैं, अलग-अलग मानसिक स्थिति के अनुसार। अत: कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वे बिस्तर में ही पड़े रह जाते हैं। उन्हें नहलाना भी पालकों को ही पड़ता है। ऐसे में, अनजाने में वे मूत्र त्याग आदि भी बिस्तर में ही कर देते हैं। जब ज्यादा बीमार हो तो उन्हें बिस्तर में ही खाना भी खिलाना होता है। हो सकता है शुरू मे इस स्थिति पर पालक खीजे हों। इसे दुर्भाग्य कहकर उन्होंने कोसा हो। पर वे कहते हैं अब अपने दोनों निष्कलुष बच्चों में वे ईश्वर देखते हैं। उनकी सेवा ईश्वर की सेवा मानते हैं। एक और पिता ने बताया कि उसके दो बेटों में एक सामान्य और एक विशिष्ट है। इस धनिक पिता ने आधी संपत्ति अपने सामान्य पुत्र को दे दी, आधी विशिष्ट बेटे और उसक ट्रेनिंग संस्थान में लगाई है। यही नहीं, वे स्वयं भी एक शिक्षक के रूप में अन्य बच्चों को भी ट्रेनिंग देने नियमित नौ से पाँच प्रशिक्षण संस्थान जाते हैं। एक और विशिष्ट युवती का पूरा परिवार ही विशिष्ट बच्चों की ट्रेनिंग, शिक्षण से जुड़ गया है। ये तो वो लोग हैं, जिनके अपने परिजन इस हालात से गुजरे, मगर ऐसे भी शिक्षक, प्रशिक्षक एवं प्रबंधक हैं, जो बगैर किसी वजह स्वप्रेरणा से इस काम से जुड़े हैं।

बिटिया के पापा कहते हैं यही लोग सच्चे संत हैं, क्योंकि इनमें अपार धीरज और ‍िन:स्वार्थता है। दुनियावी फंडों को न समझ पाने वाले बच्चों को सिखाना-समझाना बेहद कठिन कार्य है। लेकिन मूक साधकों ने यह चुनौती ली है। वे यह भी कहते हैं कि और भी कई संस्थानों की आवश्यकता अभी है और इसके लिए सरकार पर निर्भरता या सिर्फ सरकार से ही अपेक्षा करना ठीक नहीं होगा। निजी तौर पर ही, समाज के लिए सचमुच कुछ करने के ‍इच्छुक लोगों को इसके लिए आगे आना होगा। वे स्वयं भी इस तरह की और संस्थाओं का अध्ययन करने गुजरात, मुंबई आदि जगहों पर जा रहे हैं, ताकि मध्यप्रदेश में भी ऐसे और उपक्रम स्थापित किए जा सकें।


यह तो संस्थान स्थापित करने जैसे बड़े प्रयासों की बात हुई। व्यक्तिगत स्तर पर भी कुछ बातें इस सन्दर्भ में गौर करने लायक हैं। जैसे-जैसे समाज में बच्चों को स्टेट सिंबल मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वैसे-वैसे समाज में बच्चों को स्टेटस सिंबल मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वैसे-वैसे विशिष्ट बच्चों की और फजीहत हो रही है।

कुछ माता-पिता ऐसे भी हैं, जो अपने अल्पविकसित बच्चों पर शर्माते हैं। उन्हें अपने साथ कहीं लेकर
आना-जाना तो दूर, उन्हें मेहमान आदि आने पर लगभग छुपाकर रखते हैं। उन्हें घर के दायरे में ही कैद करके रखते हैं। आखिर वे किस दोष की सजा देते हैं इन बच्चों को और स्वयं को? बच्चे का अल्पविकसित होना पालक या बच्चे की गलती तो है नहीं? बिटिया के पापा कहते हैं, 'बल्कि ये बच्चे तो ईश्वर का प्रतिरूप हैं।'


सच्ची बात है ये हमारी सामान्य दुनिया के छल, कपट, राजनीति तो जानते नहीं ना! तो फिर कुदरत की भूल के लिए हम इन निष्कलुष मानवों को सजा क्यों देते हैं?


- निर्मला भुराड़िया

सोमवार, 27 सितंबर 2010

बधाई हो बधाई!

उन्होंने अपने घर कन्या रत्न आने का समाचार दिया तो मैंने कहा- 'बधाई हो!' बधाई को टप्पे के साथ लौटाते हुए उन्होंने रूखे स्वर में कहा- 'ताना तो नहीं मार रहीं, हमको तो लड़के की आस थी।' जाहिर है सहज बधाई को उन्होंने अन्यथा लिया थ। जब आप अपने घर में नवागत के आने का समाचार दे रहे हैं तो कोई बधाई ही कहेगा, 'हाय राम ये क्या हो गया' तो न कहेगा।

अब दूसरा किस्सा। उनके यहाँ पुत्र ही हुआ था, पुत्री नहीं। अत: उत्साह भरे वे सज्जन खुद ही आए थे शुभ समाचार देने। समाचार सुनकर हमने उन्हें जैसे ही कहा, 'बधाई', तो उन्होंने अपनी उल्लासित खींसें निपोरते हुए खीसे में खुसे नोट निकालकर हमारी ओर बढ़ा दिए। 'यह क्या, नोट थोड़े ही माँगे थे, मैंने तो सिर्फ बधाई दी थी।' 'नहीं-नहीं', उन सज्जन की धर्मपत्नी यानी नवजात शिशु की दादी ने नोट वापस करते हुए मेरे खुली हथेलियों की फिर मुट्‍ठी बना दी। मेरी उँगलियों को मोड़कर उनमें नोट पुन: बंद करते हुए उन्होंने कहा, 'अरे रख भी लो, बधाई ऐसे ही दी जाती है।' ना-नुकर के बीच उन्होंने प्रथा की पूरी परिभाषा स्पष्ट की- 'इसे बधाई माँगना कहते हैं। किसी के घर बेटो हो तो अपने वाले बधाई माँगते हैं, तो उन्हें पैसे दिए जाते हैं।' अब इन्हें क्या कहें, यहाँ तो बधाई शब्द का समूचा अर्थ ही बदल गया था।
एक अन्य किस्से में वधू के लिए बरसों खोज-बीन के बाद उनके बेटे की शादी हुई थी। शादी में जाना नहीं हुआ तो घर जाकर नई-नवेली बहू के लिए बधाई दी, 'बधाई, ठीक से सब शादी-ब्याह निपट गया। आपके लड़के के लिए अच्छी लड़की मिल गई।' यहाँ भी लड़की की सास ने बधाई मानो बैरंग लौटा दी यह कहते हुए कि 'अच्छी है कि नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा। अभी तो सब अच्छा ही अच्छा लगता है।'

एक के यहाँ बालक का जन्म हुआ। दूसरे शहर से इस शहर में आने वाले परिचित को पता चला कि उनके यहाँ नया सदस्य आया है, तो वे समय ‍िनकालकर मिलने चले गए और परिवार को बच्चे के जन्म पर बधाई दी। उनके 'बधाई' कहते ही बालक के पिता ने चुटकी ली, 'क्या मुन्ना के अंकलजी, सेंत-मेंत की ही बधाई दे रहे हो मुन्ना को।' सेंत-मेंत से नवजात बच्चे के ‍िपता का तात्पर्य था मेहमान के खाली हाथ आने से। बेचारे मेहमान अपरिचित शहर में जैसे-तैसे वाहन जुगाड़कर बधाई देने आए और पानी-पानी होकर गए।

कितनी सीधी-सादी-सी औपचारिकता है बधाई, जिसका सीधा-साधा-सा उत्तर है धन्यवाद। मगर इस सीधी-सी बात को भी हमने दुनियाभर के रूढ़िवाद, भौतिकवाद में बदलकर महज लेन-देन, दिखावा और झंझट बना लिया है। बधाई और धन्यवाद जैसी अभिव्यक्तियाँ दूसरों की खुशी में खुश होने के लिए और अपनी खुशियों में समाज को शामिल करने के लिए हैं। इनका सबंध न तानों-तस्कों से है, न तोहफों से, न ही हरे-हरे नोटों से।

- निर्मला भुराड़िया
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जैसा आए वैसा

नृत्य और संगीत भारतीय जनजीवन में हमेशा से रचा-बसा रहा है। औरतें घट्‍टी पीसतीं या धान कूटतीं तो भी गाती जाती थीं। ग्वाला सुबह दूध देने निकलता तो गाता। फकीर खंजरी बजाते, बहुरूपिए सिर पर बड़ की डाल रखकर नाचते और भिक्षाटन करते। शादी-ब्याह हो या ‍िशशु जन्मोत्सव या फिर प्रभु कीर्तन ही हो, बगैर ढोल-मंजीरे या थिरकन के हमारे यहाँ कुछ भी पूरा नहीं होता और कल क्यों आज भी पूरा नहीं होता। लेकिन नृत्य-गीत के आनंद में मन की मौज के ऊपर हाल ही के वर्षों में कृत्रिमता हावी हो गई है।

एक मालवी ग्रामीण स्त्री जो अकसर कहा करती थीं, 'बाई ढोलकी बजे तो म्हारा पाँव, रुकी नी सके।' यह स्त्री आज के माहौल में ‍िनर्मुक्त हो नाचने के लिए तरस जाती है। क्योंकि शादी-ब्याह तक में बँधी-बँधाई औपचारिक मंच प्रस्तुतियों के बीच उसे उल्लासित हो नाचने का मौका ही नहीं मिलता। यहाँ तक कि अपने पोते की शादी में ही व नहीं नाच पाई! वजह? इन दिनों शादी-ब्याह का उल्लासित नृत्य-गान भी ‍िकसने कैसे नाचा, किसने कैसी तैयारी की, किसने रिहर्सल पर ‍िकतना वक्त ‍िदया, किसने क्या परिधान पहना, किसने कैसा मंच सजाया, किसने ‍िकतने हजार का घाघरा-चुन्नी पहना जैसी प्रतिस्पर्धाओं में बदल दिया गया है। परफॉरमेंस का तनाव और अपेक्षा शादी से जुड़े नृत्य-गान के उल्लास पर इतनी हावी हो गई है कि उसने नाचने की झक सफेद उमंग को मलिन कर ‍िदया है, एक किस्म की प्रतिस्पर्धा में बदल दिया है।

लेकिन उपरोक्त परिदृश्य के विपरीत अभी एक नजदीक की शादी में बदलाव की मीठी बयार का एक झोंका महसूस किया। उन लोगों ने गीत-संगीत की एक शाम रखी थी लेकिन वह निमंत्रण-पत्र की औपचारिक सूची में नहीं थी। जाहिर है, नाच-गान और उल्लास से भरी यह शाम आमंत्रितों के लिए नहीं बेहद अपने वालों के लिए थी। मंच पर मन का उल्लास प्रकट करने के लिए भी रिश्तेदारों में से चुनकर सधे हुए, गुणवान कलाकारों की ‍िनयुक्ति नाचने-गाने के लिए नहीं की गई थी, बल्कि उन लोगों ने जैसा भी आया वैसा नाचा-गाया, जो दोस्त थे, भावनात्मकता से भरे हुए थे। सारा माहौल 'इमोशनली चार्ज्ड' हो गया। भावनाओं की बाढ़ ने नाचने-गाने का आनंद द्विगुणित कर दिया। तालियों में अश्रुकण भी शामिल हो गए। सारा माहौल उल्लास और अपनत्व से सराबोर हो गया। है न यह आज के जमाने के महिला-संगीत कार्यक्रमों के 'कठपुतली नाचों' से बेहतर! आखिर मंगल उत्सवों का नाच-गान उमंग, उल्लास और गहरी भावनात्मकता की सहज अभिव्यक्ति के लिए है। इसे हम 'तेरी कमीज, मेरी कमीज से उजली क्यों?' में क्यों बदलें?

- निर्मला भुराड़िया

रविवार, 26 सितंबर 2010

'हम दो, हमारे नौ!'

एक मंदिर के सामने एक बच्ची एक पात्र में तेल में भीगी शनिदेव की मूर्ति लेकर खड़ी थी। हर आने-जाने वाले दर्शनार्थी के आगे वह अपना पात्र कर देती थी। जय शनि महाराज, जय शनि भगवान के उद्‍घोष के साथ ही 'पैसा चढ़ाओं' शनि भगवान सब अच्छा करेंगे, जैसा कोई रटा-रटाया वाक्य बोलती थी। मगर कोई पैसा दे तो पात्र वाला हाथ पीछे करके उल्टे हाथ की हथेली आगे कर देती।... लड़की की फ्रॉक फटी और मैली-कुचैली थी, पाँव में चप्पल नहीं थी। तेल प्रेमी ईश्वर के पात्र की उस वाहिका की त्वचा और सिर के बाल इतने रुखे थे ‍िक उन्हें वह लगातार खुजाती थी...! देखकर ऐसा लगा ‍िक इससे पूछा जाए ‍िक तुम कौन हो, कहाँ रहती हो, तुम्हारे माँ-बाप कौन हैं? उससे पूछा- क्यों बच्ची तुम पढ़ने नहीं जाती? उसने कहा, 'ऐं हेंऽऽ मास्टरनी रूपे भोत माँगती हैं।' बच्ची का आशय फीस से था। अच्छा तुम ये शनि महाराज लेकर चलती हो, तुम्हारी माँ क्या करती है? 'अंडे बेचती है' बच्ची ने सपाट सहजात से जवाब ‍िदया। उसे क्या पता कि अंडे बेचने और शनि महाराज को तेल चढ़ाने में कोई विरोधाभास है। उन्हें तो जो मिल जाए वही उनके लिए काम है। अगला प्रश्न, तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं...? खीं-खीं... वह खिसिया कर हँसती है कुछ कहती नहीं। जवाब शायद उसकी ‍िखसियानी हँसी में ही छुपा हैं- ‍िपताजी दारू पीकर घर में दंगा मचाते, धौंस जमाते होंगे और क्या? अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं क्योंकि यह आम ‍िकस्सा है। मगर अगले प्रश्न का जवाब थोड़ा अनुमानित होने के वाबजूद आसमान से धरती पर ‍िगराने वाला है। उससे पूछा- तुम कितने भाई-बहन हो तो उसने बेहिचक बताया 'नौ'। बाप रे! पूरे नौ! अब इस अज्ञान को क्या कहा जाए जिसका ‍िशकार हमारी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा है और हम उन्हें अपनी जनसंख्या मानते भी कहाँ हैं। सिनेमा और प्रचार माध्यमों को सूट-टाई वाले महानगरीय लोगों और लंदन, न्यूयॉर्क में बसे अप्रवासी भारतीयों की ‍िववाहेत्तर संबंधों आदि से उपजी समस्याओं की चिंता है। यह देश, उसके लोग, उनके सुख-दु:ख उनकी योजना में नहीं हैं।



याद ‍कीजिए फिल्म चोरी-चोरी का वह गीत, 'छोटी-सी ये अल्टन-पल्टन फौज है मेरे घर की, साथ हमारे तोप का गोला बात है फिर क्या डर की-ऑल लाइन क्लीयर...' यह ज्यादा बच्चे वाले एक माँ-बाप का मखौल उड़ाने वाला गीत था। माँ-बाप के रूप में जॉनी वॉकर और टुनटुन जैसे समर्थ कलाकारों ने उपहास को बिल्कुल गाढ़ा बनाकर प्रस्तुत किया था। इस तरह और भी ‍िफल्मों में साठ-सत्तर के दशक के आसपास मनोरंज में गूँथकर परिवार नियोजन के संदेश दिए जाते थे। जब तक टी.वी. सिर्फ सरकारी था वहाँ भी परिवार-नियोजन कार्यक्रम योजनाओं का ‍िहस्सा हुआ करता था। प्रचार-माध्यमों के ‍िनजीकरण के बाद भारतवर्ष के लोग उनकी जनता नहीं, उपभोक्ता की श्रेणी में आ गए। अत: परिवार नियोजन संबंधी चेतना के ‍िलए वहाँ कोई जगह नहीं रह गई। जबकि सिनेमा और टेलीविजन गहरा प्रभाव छोड़ने वाले सशक्त माध्यम हैं। लगो इनका जल्दी अनुसरण करते हैं। दृश्य-श्रव्य माध्यम बगैर पढ़ी-लिखी जनता में भी चेतना जगा सकते हैं। पोलियो के ‍निराकरण के ‍िलए जब अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय निवेदन करते हैं तो आम जनता पर इसका असर पड़ता है। यह उन लोगों के ग्लैमर का सकारात्मक उपयोग है। हाल ही में बालिका भ्रूण हत्या के ‍िवरोध में भी ‍अमिताभ की छवि का उपयोग किया गया है। परिवार-नियोजन के लिए भी ऐसा ही कुछ किया जाना चाहिए। यह भारतीय समाज की प्राथमिकता है। क्योंकि अज्ञान और जनसंख्या वृद्धि एक-दूसरे के आरी-बारी आते हैं। एक के साथ दूसरा आता है और अधिक जनसंख्या और गरीबी भी एक ही चक्र में गुँथे हैं। एक के साथ दूसरा है। इस दुष्चक्र को तोड़ना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए। प्रचार माध्यम यह गुहार सुनेंगे तब सुनेंगे। फिलहाल आम मध्यमवर्गीय गृहिणियों को यह जिम्मेदारी लेना चाहिए कि वे अपने संपर्कों में आने वाली निम्न आय वर्ग की बेपढ़ स्त्रियों में चेतना जगाने का प्रयास करें।



-निर्मला भुराड़िया

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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

पिता का अँगूठा!

एक इतालवी फिल्म है 'लाइफ इज ब्यूटीफुल'। फिल्म एक पिता के महान त्याग और बलिदान की कहानी है। नाजी यातना शिविर में एक ‍िपता अपने बच्चे के भोले मन को लगातार दु:ख से कैसे बचाता है और कैसे अंतत: उसकी प्राण रक्षा में स्वयं के प्राणों का उत्सर्ग भी कर देता है। दरअसल पिता के वात्सल्य की कहानियाँ बहुत कम बनती हैं। खासकर जब बात पिता और पुत्र के संबंध की हो तो। शायद इसीलिए ‍िक पिता और पुत्र के बीच का रिश्ता स्नेह संरक्षण के साथ ही अपेक्षा अौर उपेक्षा का भी होता है। पिता अपेक्षा करता है, पुत्र उपेक्षा करता है। इससे एक किस्म का महीन तनाव दोनों के बीच हमेशा बना रहता है। हालाँकि ‍िजंदगी के यातना शिविर से इतालवी फिल्म की तरह ही हर पिता अपने बेटे को बचाए रखने की जुगाड़ हर वक्त करता है। पर कई बार उसका बलिदान बेटे बहुत देर से पहचान पाता है। अक्सर तब, जब वह भी ‍िपता के रूप में अपने पुत्र के समक्ष उपस्थित होता है। ‍िपता का स्नेह कई बार इसलिए भी ‍िदखाई नहीं पड़ता कि जीवन की व्यावहारिकताओं से पुत्र को रूबरू करवाने की जिम्मेदारी भी उसकी होती है। पुत्र इसे पिता की कठोरता के रूप में देखता है। नारियल के खोल के भीतर छुपे नरम वात्सल्य को कई बार वह महसूस नहीं कर पाता।

पिता और पुत्र के बीच वात्सल्य आदि जैसे रस ही नहीं बहते, एक और केमिकल वहाँ स्रावित होने लगता है। वह होता है अहं का कटुरस। हालाँकि संबंधी होने से यह अहं बढ़कर अहंकार के दंभ में परिवर्तित नहीं होता, परन्तु वे एक-दूसरे में प्रतिस्पर्धी को देखने लग सकते हैं। यह कटुता अक्सर जीवन के साथ समाप्त हो जाती है। अकबर और उनके पुत्र जहाँगीर के बारे में कुछ प्रसंग पिछले ‍दिनों पढ़ने में आए। जहाँगीर जिन्हें सलीम के ‍नाम से जाना जाता था। सलीम अकबर के प्रति विद्रोही हो गए थे। वे आगरा पर अधिकार चाहते थे। इलाहाबाद जाकर उन्होंने अपने को सम्राट घोषित कर ‍िदया और अपने नाम के सोने-चाँदी के ‍िसक्के चला ‍िदए। अकबर ने उनसे मिलना चाहा तो सलीम ने कहा- इस शर्त मिलेंगे कि साथ में सलीम की सत्तर हजार की सेना भी हो। अकबर ने इस शर्त से इंकार कर दिया। बाद में किसी वक्त सलीम अकबर के दरबार में आए तो अकबर ने व्यंग्य ‍िकया ‍िक तुम्हारे पास सत्तर हजार की सेना भी थी तो तुम अकेले क्यों आए? फिर उन्होंने सलीम के प्रति वात्सल्य दिखाया, मगर सलीम दंडवत करने को हुए तो थप्पड़ लगा ‍दिया! मगर अकबर की मृत्यु के बहुत बाद लिखी अपनी आत्मकथा में जहाँगीर ने अकबर की बेहद तारीफ की। जहाँगीर ने ‍िलखा, 'अपनी चाल-ढाल में अब्बा साधारण नहीं जान पड़ते थे, ऐसा लगता था खुदा का नूर ही सामने है।' यही नहीं रोजमर्रा के जीवन में भी जहाँगीर अकबर को अक्सर याद करता था। इतिहासकार लिखते हैं, एक बार जहाँगीर के पास काबुल से अनार और बदख्शां से खरबूज आए। फल बहुत ही उत्कृष्ट थे। उन्हें खाते हुए जहाँगीर ने पिता को याद ‍िकया 'उन्हें फलों का बहुत शौक था। ऐसे फल देखकर वे ‍िकतने खुश होते?'

एक और ‍िदलचस्प-सी बात होती है। मध्यवय का होते-होते अक्सर व्यक्ति चाहे-अनचाहे अपने ‍िपता की तरह होने लगता है। पिता की अच्छाइयाँ तो ठीक कई बार उसमें ऐसे गुण भी परिलक्षित होने लगते हैं, जिन्हें वह अपने पिता में नापसंद करता रहा हो। उसके हाव-भाव, आदतें, शरीर की मुद्रा आदि भी जानने वालों को उसके ‍िपता की याद ‍िदलाने लगती है। प्रकृति की क्लोनिंग अद्‍भुत है। पिता तो व्यक्ति के भीतर है। हमेशा जीवित, मौजूदा है। पिता तो व्यक्ति के भीतर है। हमेशा जीवित, मौजूद। शायर निदा फाजली बताते हैं कि उन्हें आराम कुर्सी पर बैठे-बैठे पैर का अंगूठा हिलाने की आदत पड़ गई। उन्होंने एक ‍िदन गौर से सोचा ‍िक ऐसा कौन करता था? उन्हें याद आया ‍िक उनके ‍िपता भी फुरसत के क्षणों में आरामे कुर्सी पर बैठकर अँगूठा हिलाया करते थे! इस बारे में निदा की एक बड़ी अच्छी कविता भी है।

तुम्हारी कब्र पर मैं फातेहा पढ़ने नहीं आया,
मुझे मालूम था तुम मर नहीं सकते,
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसने उड़ाई थी
वो झूठा था।
वो तुम कब थे
कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से ‍िहल के टूटा था।
मेरी आँखें तुम्हारे मंजरों में कैद हैं अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ वो वही है
जो तुम्हारी नेकनामी और बदनामी की दुनिया थी।
कहीं कुछ भी नहीं बदला
तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैं
मैं ‍िलखने के लिए जब भी कलम-कागज उठाता हूँ
तुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हूँ
बदन में मेरे ‍िजतना भी लहू है
वो तुम्हारी लग्जिशों, नाकामियों के साथ बहता है
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जहाँ रहता है
मेरी बीमारियों में तुम, मेरी लाचारियों में तुम
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है
वो झूठा है
तुम्हारी कब्र में मैं दफन हूँ
तुम मुझमें ‍िजंदा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातेहा पढ़ने चले आना।

- निर्मला भुराड़िया
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बुधवार, 22 सितंबर 2010

स्कूल बीमार हैं!

एक नामी-गिरामी अस्पताल से संबंधित एक बात कोई भुक्तभोगी बता रहा था ‍िक वहाँ मरणासन्न मरीजों और ठीक होने की उम्मीद न होने वाली बीमारियों के मरीजों को अधिकांशत: भर्ती नहीं ‍किया जाता! उनकी भर्ती को बहाने बनाकर टाल ‍िदया जाता है। कारण? कारण यह कि इससे अस्पताल का मोरटलिटी रेट अथवा मृत्युदर बढ़ जाती है और प्रतिष्ठा को धब्बा लगता है! है न आश्चर्य की बात। अस्पताल ही गंभीर बीमारों का इलाज न करेगा तो कौन करेगा? और प्रतिष्ठा की यह कौनसी परिभाषा है? गुडविल तो उस अस्पताल की होना चाहिए, जहाँ अच्छे से इलाज किया जाता हो। आँकड़ों पर गुडविल तौलने के परिणाम यही होते हैं।

अस्पताल ही क्यों, हमारे यहाँ के स्कूल भी इस बीमारी से ग्रस्त हैं। वे कागजती गुडविल चाहते हैं जो ‍िसर्फ सर्टिफिकेटों और आँकड़ों पर ‍िनर्भर हो। ठीक अस्पताल की ही तरह कई स्कूलों में पूर्व की कक्षाओं में सामान्य अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को आगे की कक्षाओं में प्रवेश देने पर आनाकानी की जाती है। कारण यह कि अच्छे-अच्छे विद्यार्थियों को ही प्रवेश देंगे तो ‍िरजल्ट अच्छा-अच्छा ही आएगा। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा! सवाल यह है ‍िक क्या ‍िशक्षा और ‍िशक्षक का यह कार्य नहीं है ‍िक वह कमजोर का भी भविष्य सँवारे। बल्कि कमजोर का भविष्य सँवारने पर तो अौर भी अधिक ध्यान दें। मगर यह नहीं होता। कई स्कूलों में यह भी देखा जाता है ‍िक भर्ती की अर्जी देने वाले बच्चे के माँ-बाप ‍िकतने पढ़े हैं? उन्हें कितना आता है। तो क्या जो शिक्षा से वंचित रह गए हैं उनके बच्चे भी ‍िशक्षा से वंचित रहें? यह कौन सी नैतिकता है? लेकिन शिक्षा इन नैतिक दायित्वों से काफी दूर हो गई है। एक आदर्श ध्‍येय से अधिक व्यवसाय हो गई है। अत: आधुनिक विद्यालयीन परिदृश्य में शिक्षा शुद्ध व्यवसायियों के हाथ में खेल रही है। स्कूलों के प्रबंधक सिर्फ व्यवस्था ही नहीं देखते बल्कि स्कूलों के उन दैनंदिन व्यवहारों में भी दखल करते हैं, जो ‍िशक्षकों के हाथ में होना चाहिए। बच्चों के एडमिशन, शिक्षकों आदि की नियुक्ति में भी स्कूल प्रबंधन का एकमेव निर्णय चलता है। यदि ऐसा करने से गुणवत्ता बढ़ती होती तो बात अलग थी। मगर आज परिदृश्य यह है कि ‍नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद, सस्ती राजनीति आदि चलती है। स्कूल परिसरों में छुटभैया नेता घुस आए हैं। जिनकी अर्जियों पर एडमिशन ही नहीं होते, स्कॉलरशिप्स भी मिल जाती है! अन्य फायदे भी उन बच्चों को (प्रकारांतर से उनके माँ-बाप को) दिलवा ‍िदए जाते हैं, जिनकी नेताओं तक पहुँच होती है। वंचित वर्ग के सुपात्र रह जाते हैं, क्योंकि उनका कोई राजनीतिक आका नहीं होता। बेचारे शिक्षक मुँह फाड़े देखते रह जाते हैं, क्योंकि उन्हीं के क्षेत्र में उनकी कोई 'से' नहीं होती। और बच्चे पहला पाठ पढ़ते हैं ‍िक गुरु ब्रह्मा नहीं गुरु बेचारा है! पॉवर और मनी के दबदबे का खेल बच्चा यहीं से देखना शुरू कर देता है और नोटबुक में दर्ज कर लेता है 'स्कूल सरस्वती का मंदिर नहीं है।' दरअसल सरस्वती का मंदिर तो कहीं नहीं है!

गुडविल और आँकड़ों वाली बात पर पुन: लौटें तो प्रबंधकों का शिक्षकों पर यह दबाव भी रहता है कि स्कूल से ज्यादा से ज्यादा बच्चों की मेरिट आना चाहिए। प्रथम श्रेणी पास बच्चों का प्रतिशत फलाँ-फलाँ होना चाहिए। नहीं तो शिक्षकों से तलब किया जाएगा कि ऐसा कैसे हुआ? 'हमने तो आपको सब छूट दे रखी थी।' आशय यह कि टिपाओ चाहे परीक्षा पूर्व पेपर कबाड़ लाओ। येन-केन-प्रकारेण स्कूल का रिजल्ट चमकाओ। स्कूल की पढ़ाई का तरीका, व्यवस्था, अनुशासन, नैतिक शिक्षा, बच्चे का संपूर्ण विकास इसका कोई मतलब नहीं, न ही यह तलब ‍िकया गया है। यहाँ से बच्चे को एक और पाठ ‍िमलता है। बोर्ड परीक्षा में नकल करना बुरी बात नहीं, 'अपने स्कूल' के रिजल्ट का सवाल जो है! (अपनी बारी आए तो गुरुजी खुद यही करते हैं)।

गाँव-कस्बों के स्कूलों में तो 'मास टीपण' अभियान चलता है। गुरुजी ब्लैक बोर्ड पर लिखकर भी ‍िटपा सकते हैं। स्कूलों में बच्चों के सर्वांगीण विकास और नैतिक विकास पर तरह-तरह से कुल्हाड़ियाँ चलती हैं। जैसे झूठी उपस्थिति देना। शिक्षका का कक्षा में जैसे-तैसे कोई-सा भी पाठ निपटाकर बच्चों को अपना मोबाइल नंबर दे देना, ताकि वे उसके प्राइवेट कोचिंग में आकर 'ठीक से' पढ़ें! यानी मक्कारी का लेसन मुफ्त में। ठीक है कि अकादमिक उपलब्धियों का भी महत्व है। मगर क्या इस कीमत पर कि ‍िवद्यार्थी भाषा, गणित, विज्ञान, तर्क में प्रावीण्य को ताक पर रखकर सिर्फ ‍िडग्री और अंक जुटाने में लग जाए? उसके पास किसी कला, ‍िकसी खेल से संबंधित कोई गुण हो तो वह दबा ‍िदया जाए? संस्कृति का रौब मारने वाले भारतवर्ष में ऐसा सांस्कृतिक दमन क्यों? कई देशों में खेल व अन्य गतिविधियों के भी अंक होते हैं। फिर हमारे यहाँ एक विद्यार्थी को संपूर्ण व्यक्ति बनने देने में ये बाधाएँ क्यों? इस बारे में माता-पिता, शिक्षक, प्रबंधक, समाज सभी को विचार करना चाहिए।

- निर्मला भुराड़िया
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सोमवार, 20 सितंबर 2010

राजा भिखारी...!

बचपन में एक चूहे की कविता पढ़ी थी, ‍िजसमें चूहा राजा को ताना मारता है 'राजा भिखारी मेरी टोपी छीन ली।' मगर नए जमाने के कुछ राजा तो ‍िभखारी बनने पर आमादा है, क्योंकि उन्हें ‍िभखारी बनने का शौक चर्राया है। शौकिया भिखारी बनने के वे ‍प्रतिदिन तीन हजार डॉलर यानी तकरीबन सवा लाख रुपए खर्च करते हैं। 'डीलक्स डेप्रिवेशन' यानी विलासी वंचन की कोई एजेंसी पैसे लेकर उनके लिए फटे-टूटे कपड़ों, भिक्षापात्र की व्यवस्था करती है और हाँ उनके लिए किसी गली-कूचे में जगह भी बुक करती है, जहाँ वे कृत्रिम भिखारी बनकर 'देने वाला सिरी भगवान' जैसा ही कुछ गाते हुए घूम सकें। रूस के कई अरबपति मास्को के गली-कूचों में इन दिनों भिखारीपन का आनंद लेते हुए सहर्ष घूम रहे हैं।

यह तो हुई रूस की बात, दुनिया के कई हिस्सों में, खासकर विकसित देशों में 'डीलक्स डेप्रिवेशन स्पा' खुल गए हैं, जहाँ लोग पैसा चुकाकर अपने आपको कष्ट देते हैं। इसमें बर्फ के होटल में ठहरकर ठिठुरने से लेकर स्लम एरिया में ‍िकसी झोपड़पट्‍टी में रात गुजारने तक की बातें शामिल हैं। बॉडी एंड सोल स्पा में रईस लोग तथाकथित फिटनेस वेकेशन पर जाते हैं, जहाँ वे पुराने समय की तरह पड़े रहकर मसाज या फेशियल नहीं करवाते अपितु नए ट्रेंड के अनुसार, नंगे पाँव चलते हैं; इतना कि पैर में छाले पड़ जाएँ, पहाड़ चढ़ते हैं, अलूना खाते हैं। अतिविलासी जीवन जीकर, चक माल खाकर और रोज-रोज पार्टियाँ ले-देकर ये लोग अघा चुके हैं। अति सुख-सुविधा में बोरियत पाकर अब वे आत्म-प्रताड़ना की विधाओं में पैसा डाल रहे हैं। विलासी जीवन और अति तृप्ति के तोड़ के रूप में आत्म-प्रताड़ना व आत्म-वंचन चुन रहे हैं। इसीलिए ये स्पेशल बॉडी एंड सोल स्पा अस्तित्व में आए हैं। सिर्फ शरीर के ‍िलए ‍िफटनेस की बात होती तो वे डाइटिंग और व्यायाम पर ही रुक जाते, पर वे तो अनजाने में ही 'स्वेद-कण' में स्वर्ण ढूँढ रहे हैं।

इन रईसों का मानना है कि ये संघर्षमय छुट्‍टियाँ उन्हें अस्तित्व रक्षा के ‍िलए निरंतर जद्दोजहद करने वाली इंसानी फितरत की याद दिलाती हैं, वो जद्दोजहद जो ‍िक उन्हें यूँ तो करना नहीं पड़ती और अंतत: उनका मखमल ऊब के काँटों से भर जाता है और चुभने लगता है। कुछ डीलक्स डेप्रिवेशन प्रेमी रईसों का यह मानना होता है अपने आपको थोड़ी तकलीफ देने से वे पक्के हो जाते हैं अौर उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। कुछ मानते हैं ‍िक यह सब करके वे अपने भीतर की यात्रा करते हैं। कुछ रईस ऐसे भी होते हैं, जिन्हें 'कुछ' चाहिए होता है, मगर वह 'कुछ' क्या है यह उन्हें जीवन में 'सब-कुछ' पाकर भी नहीं मिलता तो वे 'गँवाने' के कृत्रिम क्षण निर्मित करते हैं, ताकि पुन: ‍िवला‍सिता में लौटने पर उसका भरपूर आनंद ले सकें। कुछ सिर्फ परिवर्तन की खातिर भी यह सब करते हैं।

जो भी हो इससे यह तो स्थापित होता ही है ‍िक जीवन का आनंद अंतत: परिश्रम, संघर्ष और चुनौतियों में है। ‍िजस वक्त दुनिया की सब सुख-सुविधाएँ आपके कदमों में आ जाती हैं, आपको हाथ-पैर हिलाने की भी जरूरत नहीं रह जाती, उस वक्त नींद चली जाती है। अर्थात चुनौतियाँ खत्म और बोरियत शुरू। मगर ये रईस आत्मा की रिक्ती का जो उपचार अभी ढ़ूँढ रहे हैं वह कृत्रिम है, वह आत्मा तक नहीं पहुँच सकता, क्योंकि हमारी सोल सिंथेटिक नहीं है। बजाय इसके यदि ये सचमुच के वंचितों का सामीप प्राप्त करने की कोशिश करें और जनकल्याण की योजनाओं पर अपना समय लगाए तो शायद इन्हें सच्चा सुकून मिले। दुनिया के कई धनी-मानी लोग इस तरह के फाउंडेशन चला रहे हैं। उनकी मिसाल ली जा सकती है।

- निर्मला भुराड़िया
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