
एक बहुसितारा होटल में शादी का कार्यक्रम था। चूँकि ऊँची होटल थी अत: उस होटल में कुछ विदेशी भी ठहरे हुए थे। उन विदेशियों का शादी वालों से कोई दूर का भी लेना-देना नहीं था। पर शादी वालों ने उन्हें अपनी शादी में आमंत्रित कर लिया था। जी नहीं, इसलिए नहीं कि 'होटल-साथी' होने की वजह से उनके प्रति शादी वालों की कोई आत्मीयता उमड़ पड़ी थी। गोरी चमड़ी के प्रति शाश्वत गुलामी के चलते यह भावना जरूर उमड़ पड़ी थी कि विदेशी मेहमानों के आने से शादी की शान बढ़ जाएगी! लोग समझेंगे कि इनकी तो विदेशों में भी जान-पहचान है। लोग ये भी समझ सकते हैं कि शादी वालों का विदेशों में भी व्यापार-व्यवसाय है! जो आप नहीं हैं वह समझाना चाहते हैं तो ऐसे करतब करना पड़ते हैं। शादियों को झूठी शान से जोड़ने के लिए पूर्व में ऐसा भी हुआ है कि किराए पर बाराती बुलाए गए। बड़े-बड़े लोगों से रिश्ता है यह बताने के लिए शादी में भाड़े पर फिल्म स्टार भी बुलाए जाते हैं।
मगर शादियों का बाजारीकरण यहीं नहीं रुका है। बड़े शहरों की शादियों में मेहमान ही नहीं मेजबान भी खरीदे जाने लगे हैं! जी नहीं, रिश्तेदारों और घर के लोगों को ही आंगतुकों का स्वागत करने के लिए पैसे नहीं दिए जा रहे (हालाँकि उसकी भी नौबत आएगी लगता है), मेजबान बनकर स्वागत करने के पैसे दिए जा रहे हैं विदेशियों को! बड़े शहरों की इवेंट मैनेजमेंट कंपनियाँ भाड़े के विदेशी मेजबान ला देती हैं। पैसे लेकर मेजबान आपके द्वार पर हाथ जोड़कर मुस्कराते खड़े हो जाते हैं। अटपटे नमस्कार के साथ वे एइए (आइए) कहना भी सिखाए होते हैं। कॉकटेल पार्टी में वे बार के पार भी हो सकते हैं, भोजन की टेबल पर वे परोसगारी करने वाली घरेलू टीम के साथ भी होते हैं और वरमाला में दोस्तों के झुंड के साथ ताली बजाते हुए भी!
यह सब देखकर ऐसा नहीं लगता कि हम विवाह समारोह की मूल भावनाओं से भटक गए हैं? ये समारोह इसलिए किए जाते हैं कि नए जोड़े का रिश्तेदारों और आत्मीय स्वजनों से परिचय हो सके। और नया जोड़ा अपने वालों के साथ मिलकर नाचे-गाए, खाए-पिए, खुशियाँ मनाए और नए जीवन में प्रवेश करे। मगर यह सब भूलकर आज शादियाँ फिजूल खर्च, झूठी शान और दिखावे की प्रतीक बनकर रह गई हैं। मगर सोचिए जरा क्या ज्यादा तड़क-भड़क से की गई शादी ज्यादा टिकेगी क्या? नहीं न! तो फिर इस सब का क्या आशय?
- निर्मला भुराड़िया