गुरुवार, 24 नवंबर 2011

बिखेरिए अक्षरों के मोती


आपके अक्षर कैसे हैं? लोग धीरे-धीरे इस सवाल को भूलते जा रहे हैं। कम्प्यूटर-की बोर्ड पर उँगलियाँ चलाकर चिट्ठी-पत्र टाइप कर लेने और एसएमएस के जरिए लिखित संदेशों का आदान-प्रदान कर लेने के इस युग में अच्छी हस्तलिपि की परवाह छूटती जा रही है। एक समय था जब यह बेहद महत्वपूर्ण बात मानी जाती थी कि आपके अक्षर कैसे हैं? माता-पिता गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को सुंदर लेखन के लिए प्रेरित करते थे। वे इसके लिए बच्चों को दो लाइन, चार लाइन की कॉफी लाकर देते थे। स्कूलों में शिक्षक बताते थे किस अक्षर का नाप क्या होना चाहिए। वे सुंदर ही नहीं, शुद्ध लेखन के पीरियड भी लेते थे, ताकि बच्चों को कॉमा, पूर्ण विराम, मात्राएँ आदि लगाना ठीक से आए। अंग्रेजी की कक्षाओं में छोटी-बड़ी वर्णमाला, कर्सिव राइटिंग आदि का अभ्यास करवाया जाता था। साफ-सुथरे और शुद्ध लेखन के लिए नंबर अलग से मिलते थे। इस माहौल की वजह से उत्साहित बच्चे अक्षर जमा-जमा कर लिखने का प्रयास करते थे। जिसको मोती से अक्षर की उपाधि मिल जाए वह विद्यार्थी फूला नहीं समाता था। आज हर बच्चा इतना तेज दौड़ने को विवश है कि जमाकर लिखने की उसे फुरसत है, ध्यान। शिक्षक को कोर्स पूरा करवाना है, स्कूल का प्रतिशत बढ़वाना है। बच्चे के व्यक्तित्व विकास में स्कूली शिक्षक की भूमिका नगण्य से नगण्यतम होती जा रही है। माँ-बाप भी अब बच्चे की हस्तलिपि सुधारवाना जरूरी नहीं समझते। हाथ से लिखने का काम ही कितना पड़ता है, शायद वे सोचते हैं। मगर, यहीं हम गलत हो जाते हैं। सर्वप्रथम तो भारत में सारी की सारी परीक्षाएँ ऑनलाइन देने का जमाना अभी नहीं आया है। अच्छी हस्तलिपि का परीक्षा में अच्छे नंबर आने से संबंध आज भी है। कॉपी जाँचने वाले शिक्षक पर अच्छी हस्तलिपि का प्रभाव भी होता है और उसकी मगजपच्ची भी कम होती है, पर बात सिर्फ परीक्षा और नंबर की नहीं है। अक्षर सुंदर बनाने से बच्चों का सौंदर्य बोध और कल्पनाशीलता विकसित होती है। सुंदर लेखन अपनी जगह है और मशीनें अपनी जगह। सुंदर लेखन होने का दोष मशीनों को नहीं दिया जा सकता, ही मशीनों की वजह से सुंदर लेखन को निरस्त किया जा सकता है। ये दोनों परस्पर दुश्मन नहीं हैं। उदाहरण है दुनिया में पर्सनल कम्प्यूटर क्रांति के जनक स्टीव जॉब्स। जॉब्स ने अपने करियर के शुरुआती दिनों में केलिग्राफी का कोर्स किया, जो कि कलात्मक-अक्षर-विज्ञान है। अत: उन्होंने जब संसार का पहला पर्सनल कम्प्यूटर एपल मैक बनाया तो उपयोगकर्ताओं के लिए ग्रॉफिक यूजर इंटरफेस बनाई। यानी जो भाषा नहीं जानता वह इमेज के जरिए इसका उपयोग कर सके। बाद में सभी ने यही किया। स्टीव जॉब्स ने सृजन कल्पना के सौंदर्य और कला को तकनीकी से जोड़ने का जादू किया और आधुनिक समय को आई पैड, टेबलेट पीसी, आई पॉड जैसी चीजें दीं। दरअसल, किसी भी व्यक्ति की रचनात्मकता और सौंदर्यबोध का पहला चिन्ह उसकी हस्तलिपि से ही प्रकट होता है।

आप कितने ही तकनीकी निर्भर या तकनीक निष्णात हो जाएँ, हस्तलेखन का अभ्यास कभी--कभी अवश्य किया जाना चाहिए, एक किस्म के व्यायाम की तरह, क्योंकि हाथ से लिखने के लिए जो धीरज चाहिए, वह तेज भागती इस दुनिया में लगभग अनुपलब्ध हैं। आज की दुनिया में हमारा तुरंत किसी से भी संपर्क हो जाता है, हम कहीं भी जल्दी पहुँच जाते हैं। अत: हमारी आदत हो गई है कि सब कुछ तुरंत हो जाए। अपेक्षा अनुसार तुरंत परिणाम मिलने पर हम खिन्ना हो जाते हैं। इससे हड़बड़ाहट, उद्वेग, एंक्जाइटी का रोग विद्यार्थियों में भी बढ़ रहा है। ऐसे में जमा-जमा कर लिखे अक्षरों में कभी कोई संदेश, कोई चिट्ठी लिखना ध्यान करने के बराबर है। इससे एकाग्रता भी बढ़ती है। आखिर तो लिखावट मस्तिष्क के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और शरीर की मांसपेशियों के तादात्म्य की उपज है। इसीलिए लिखावट कई बार मूड भी बताती है। आप उनींदे हैं तो आपके अक्षर 'आँके-बाँके" आएँगे। आप जल्दी में हैं तो घसीटा मारेंगे। आप अनिच्छुक हैं तो आपकी आड़ी-तेड़ी हस्तलिपि यह बता देगी। इसीलिए कई बार मनोवैज्ञानिक ग्राफोलॉजिस्ट की सेवाएँ भी लेते हैं, जो हस्तलिपि के आधार पर आपका आशावाद, निराशावाद, उतावली, धीरज, आपके भावनात्मक उतार-चढ़ाव आदि को तौलता है। हस्तलिपि विशेषज्ञ तो यह दावा भी करते हैं कि हस्तलिपि के जरिए व्यक्तित्व और मूड दोनों सुधारे जा सकते हैं। इन दावों में कितना दम है पता नहीं, मगर इतना तय है कि अच्छी हस्तलिपि इंसान का सौंदर्य बोध, कल्पनाशक्ति, धीरज अवश्य बढ़ाती है। अच्छी लिखावट एक व्यक्ति के सुरुचिपूर्ण व्यक्तित्व का परिचायक तो है ही।

निर्मला भुराड़िया

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

रंग-बिरंगी


एक विवाह का कार्यक्रम चल रहा है। तरह-तरह के जूस और सॉफ्ट ड्रिंक वितरित किए जा रहे हैं। पाइनेपल जूस, मिक्स फ्रूट जूस, ऑरेंज जूस... कोलाज, स्कवेश और सोडा भी हैं। दो-तीन बच्चे वहाँ बैठे हैं। फलों के रस और सोडा की ट्रे आने तक उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। मगर जैसे ही बैरा एक ट्रे में फ्लोरेसेंट फिरोजी, इलेक्ट्रिक ब्लू और मेजेंटा कलर के ड्रिंक लाता है, वानर सेना उधर लपक पड़ती है। बच्चे चटखीले रंगों की और आकर्षित हो गए हैं। आगे यह कि एक बच्चे की दादी माँ भी इलेक्ट्रिक ब्लू ड्रिंक की तरफ आकर्षित हो गई हैं और एक छोटे मुन्नाू को इशारा कर रही हैं कि उनकी तरफ भी यह गहरे, चमकते रंग का द्रव्य भिजवाया जाए। एक पुराने ब्रिटिश सीरियल 'आर यू बीइंग सर्व्ड" में एक उम्रदराज स्त्री का किरदार था, जो बहुत प्रसन्नाचित्त और हँसोड़ होती है। उसके पके बाल हमेशा अलग-अलग रंगों में रंगे होते थे, जो बेहद आकर्षित करते थे। ये रंग उसके उल्लासित किरदार को धार देते थे।

रंगों में इंसान को आकर्षित करने की ऐसी ही ताकत होती है, जिसका उम्र से कोई वास्ता नहीं है। वास्ता है तो आपकी उल्लासित मानसिकता से। रंग जीवन में उल्लास भरते हैं, बोरियत को दूर भगाते हैं। रेतीले राजस्थान में आपको रंग-बिरंगी पगड़ियाँ, लहरदार लुगड़े और छींट के घाघरे पहने लोग मिलेंगे। वे हरियाली और फूलों की कमी को मानो कपड़ों के रंगों से पूरा कर लेते हैं। एमएफ हुसैन ने अपनी फिल्म 'मीनाक्षी" में रेत के टीलों के ब्रैकग्राउंड पर नायिका तब्बू की चुनरियों, ग्रामीणों की पगड़ियों, औरतों की नीली गगरियों के माध्यम से रंगों का प्रयोग इतना सुंदर किया गया है कि हर रील कैनवस बन गई है। यह फिल्म रजतपट पर बनी पैंटिंग्स-सी लगती है। एक अन्य चित्रकार जो आकृति केंद्रित कलाकृति से अधिक रंग निर्भर कृतियाँ बनाते हैं, उनसे मैंने एक बार पूछा था कि यह पेंटिंग्स आप क्या सोचकर बनाते हैं, तो उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी कि किसी कलाकृति के लिए उनकी कल्पना और उनके विचार आकृतियों में आते हैं शब्दों में, वे तो रंगों में आते हैं। अत: उन्हें पता होता है किसके बाद क्या रंग लगाना है कि वे अपने मन की बात अभिव्यक्त कर दें।

सामान्य व्यक्ति भले कैनवस पर सही, मगर कई बार अपने परिधानों में रंगों के माध्यम से अपने आप को अभिव्यक्त करता है। अधिकांश लोगों को खिलते हुए रंग पसंद आते हैं। जिन्हें लाल-हरा पसंद हो वे गुलाबी, पीला या आसमानी चुनते हैं, मगर रंगों की भाषा हर कोई पसंद करता है। मगर एक अजीब-सी परंपरा है, जो अलिखित है पर है जरूर। समाज यह अपेक्षा करता है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़े व्यक्ति हल्के, धूसर रंग पहनना शुरू कर दे! चटख रंग जवानी के साथ ही छोड़ दिए जाएँ। बुजुर्ग महिलाओं के लिए खरीदारी करना हो तो लोग अक्सर डिजाइन में सपाट और रंगों में दबे वस्त्रों की खरीदारी करते हैं। कुछ ऐसी मानसिकता बना ली गई है कि शोख और कलात्मक पैटर्न या डिजाइन वाले वस्त्र पहनना मानो उम्र की गरिमा के खिलाफ हो। इस तथाकथित गरिमा की जिद भारतीय समाज में और बढ़ जाती है यदि स्त्री वैधव्य प्राप्त कर ले। तब तो सफेद और दबे हुए रंग पहनना उसकी नियति बन जाती है। कहीं कहीं भीतर की बात यह है कि समाज स्त्री को केवल उपभोग की वस्तु मानता है। यदि वह समाज के अनुसार पुरुषों को आकर्षित करने की उम्र में या सामाजिक स्थिति (यहाँ पढ़ें वैधव्य) में नहीं है तो उसका अपने मन की तृप्ति के लिए, स्वयं के चाव के लिए, अपनी पसंद की अभिव्यक्ति के लिए सुंदर रंगों के वस्त्र पहनना लगभग अपराध-सा हो जाता है। यही वजह है कि भारतीय समाज में 'बूढ़ा घोड़ा लाल लगाम" या 'शौकीन बूढ़ा टाट की कमीज" जैसी कोई कहावत नहीं है। उम्र और वैवाहिक स्थिति से जुड़े रंगों के बंधन स्त्रियों के लिए अधिक हैं। जबकि रंगों का आशावादी उजास, रंगों का बोरियत भगाने वाला उत्साह, रंगों से मिलने वाला जोश, रंगों से अभिव्यक्त होने वाली गर्मजोशी बढ़ती उम्र में तो और भी जरूरी है। आशा है कि इस कोण से भी हम बात को सोचेंगे।

निर्मला भुराड़िया

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

यह बगावत नहीं यौन ऊर्जा है


स्वप्न विश्लेषक मधु टंडन ने एक अद्भुत किताब लिखी है, ड्रीम्स एंड बियॉन्ड। यह पुस्तक सपनों की बायलॉजी, दुनियाभर की हर संस्कृति में मिलने वाला स्वप्नों का पौराणिक विवेचन, स्वप्न और मनोविज्ञान, स्वप्नों के विश्लेषण आदि कई मुद्दों पर बात करती है। इसमें एक बच्चे से किशोर होते लड़के का स्वप्न और उसका विश्लेषण दिया गया है। स्वप्न काफी लंबा है उसकी व्याख्या और भी लंबी पर सार में कहें तो सपने में स्कूल में कंचे खेलते हुए यह लड़का एक उग्र शेर को देखता है। अचानक पिता स्कूल में जाते हैं। उनके पास बंदूक है। वे लड़के को शेर से बचाने के लिए गोली चलाते हैं जिसे शेर निगल जाता है। पिता-पुत्र अब शेर के पेट में हैं, पिता बेटे की गर्दन पर लगे सिंह दंत को सहलाते हैं। फिर पिता-पुत्र शेर के पेट से निकलकर भारतीय शास्त्रीय नृत्य देखने चले जाते हैं। इस स्वप्न के विश्लेषण का सार यह है कि शेर पुत्र में उपजती यौन ऊर्जा का प्रतीक है जिससे पुत्र उत्साहित भी है पर अचंभित भी, पसोपेश में भी, थोड़ा भयभीत भी। पिता उसकी मदद के लिए आए हैं। वे उसे परिवर्तन को समझने में सहयोग करना चाहते हैं।

हर संस्कृति में तरह-तरह के रस्मो-रिवाज हैं, जो बच्चे से किशोर होते युवक और युवतियों के लिए किए जाते हैं। किशोर या किशोरी इसमें उत्सवमूर्ति होते हैं। जैसे अफ्रीका के एक आदिवासी कबीले में किशोर होती लड़की को परागकणों से स्नान करवाया जाता है। एक अन्य कबीले में लड़के को मुँह पर नकाब पहनाकर, रातभर के लिए एक कमरे में, बैठा दिया जाता है। कहीं स्वीट सिक्सटीन की पार्टी दी जाती है तो कहीं रजस्वला होने पर पुत्री को साड़ी भेंट की जाती है, तो कहीं पुत्र को पवित्र धागा पहनाया जाता है। कई मनोविश्लेषक इन सब रिवाजों में दकियानूसीपन नहीं देखते अपितु वय:संधिकाल के परिवर्तन से समायोजन बैठाने के लिए रचित रिवाज मानते हैं, जो पारंपरिक बुद्धिमत्ता के तहत विकसित हुए होंगे। लेकिन रिवाज जैसे-जैसे पुराने होते चलते हैं उनके भीतर के गहन अर्थ खो जाते हैं, रह जाते हैं महज कर्म-कांड। यही वह समय होता है जब नए जमाने के नए तरीके खोजना होते हैं।

आज हम जिस जमाने में रह रहे हैं और की-बोर्ड पर उँगली रखते ही जितना ज्ञान उपलब्ध है, जितना एक्सपोजर आज के किशोरोंें को है उसके चलते, उन्हें अपने बदलते शरीर से परिचित करवाने की वैसी आवश्यकता नहीं बची जैसी पुराने समय में थी। उन्हें पता होता है कि परिवर्तन तो होंगे और क्या-क्या परिवर्तन होंगे, या हो रहे हैं। लेकिन पता होने के बावजूद बदलते मन और शरीर से सचमुच सामंजस्य बैठाने की बारी आने पर उथल-पुथल तो वय:संधि के मोड़ पर खड़े हर किशोर या किशोरी में होगी ही। आज के जमाने में इनसे पार पाने के लिए रस्मो-रिवाज, आज्ञाकारिता आदि से अधिक उन्हें आवश्यकता होगी माता-पिता से मित्रवत व्यवहार की। पुत्र को पिता बदलती देह-मन की जटिलता से तादात्म्य बैठाने में मदद करे और पुत्रियों को माता, यह वय:संधि की माँग होती है। मगर नए समय में मित्र बने बगैर यह नहीं हो सकता। आज के किशोरों की दुनिया सिर्फ माता-पिता तक ही सीमित नहीं है। दोस्ताना व्यवहार मिलने पर वे माता-पिता के पास बैठेंगे ही नहीं, तो किशोरों के मन को पढ़ने और बाँटने का मौका कैसे मिलेगा? यही नहीं, माता-पिता द्वारा सिर्फ अपनी ही थोपने के बजाए नए जमाने के मनोरंजन, नई तकनीकों, नए चलन में रुचि लेना भी आवश्यक है ताकि बच्चों के लिए उनका साथ प्रासंगिक बना रहे। यह कोरी आज्ञाओं का युग नहीं है आदान-प्रदान का युग है। भावनाओं, संवेदनाओं, संस्कारों, विचारों सभी का आदान-प्रदान तभी संभव है जब नई आँख से चीजों को देखा जाए।

किशोरों को बिगड़े होने का दोष देने के बजाए उनमें हो रहे परिवर्तनों का वैज्ञानिक आधार भी समझा जाए, इसके लिए दुनिया में कई प्रयोग हो रहे हैं। पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने जब किशोरों के मस्तिष्क के चित्र (ब्रेन इमेजिंग) लिए तो यह पाया कि टीनएजर्स के दिमाग में इस अवस्था में कई परिवर्तन होते हैं, क्योंकि उम्र के इस काल में मस्तिष्क अपने आप को पुनर्संयोजित करता है। इस बात की विकासवादी व्याख्या यह है कि इस उम्र में इंसान घर की सुरक्षा से निकलकर बाहर की दुनिया में जाने की तैयारी करता है, अत: प्रकृति उसे जोखिम लेने में सक्षम साहसी बनाती है। मगर यही परिवर्तन किशोरों को दु:साहसी, सनसनीपसंद और बागी भी बनाते हैं। इस समय काम आती है बड़ों की समझ, जो किशोरों को दोष देने के बजाए उनको समझें तो उनका विद्रोह सकारात्मक ऊर्जा और जोश में बदल सकता है।

निर्मला भुराड़िया