शनिवार, 11 अप्रैल 2015

जिम्मेदार कौन?

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मैं एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जानती हूं, जिन्होंने अपने बेटे की अकाल मृत्यु हो जाने पर अपनी सद्यविधवा बहू का मुंह देखना बंद कर दिया था। बहू सामने पड़ जाती तो वे पलटकर चले जाते। ऐसा वे इसलिए कर रहे थे कि उन्हें लगा कि बहू अपशगुनी है और उसकी किस्मत से ही उनका बेटा चला गया।

अंधविश्वास ने इन ससुर महोदय को इतना क्रूर बना दिया था कि वे समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा करके वे अपनी पहले से ही दु:खी पुत्रवधु के दु:ख को और बढ़ा रहे हैं। या शायद वे उसे दु:खी करके ही खुश हो रहे हों क्योंकि अंधविश्वास की जीत हमेशा से ही हृदय की कोमलता और सहज करुणा पर होती आई है।

अंधविश्वास की रौ में आदमी अच्छा-बुरा भी भूल जाता है। अब इन्हीं ससुर महोदय के बारे में सोचिए। ये मान रहे थे कि बहू के दुर्भाग्य से उनका बेटा गया, मगर वे ये नहीं देख पा रहे थे कि यह उनका स्वयं का भी तो दुर्भाग्य था। तो क्या वे स्वयं अपशगुनी हो गए थे? नहीं, न। मगर कुछ लोगों की आदत होती है, अपनी तोहमतें वे हमेशा दूसरों के सिर ही थोपते हैं।

एक और व्यक्ति थे। उनके दो बेटे थे। बाद में दो बेटियां हुईं। सज्जन व्यापारी थे। जब पहली बेटी हुई, उस वक्त उनको व्यापार में घाटा लग गया था। उन्होंने इसे बेटी के इस जन्म और उसके अपने लिए अशुभ होने से जोड़ लिया।

दो साल बाद दूसरी कन्या हुई। संयोग कुछ ऐसा बैठा कि छोटी बेटी के जन्म के समय काल में उनको व्यापार में फायदा हुआ। इसे भी उन्होंने इस बेटी के अपने लिए शुभ होने से जोड़ लिया और इस बेटी पर प्रसन्न हो गए। अपनी खुद ही की दो बेटियां, मगर एक पर वे हमेशा चिड़चिड़ाते रहे, रूखा व्यवहार करते रहे और दूसरी पर हमेशा लाड़-प्यार लुटाते रहे। एक-दो दिन नहीं पूरे जीवनभर उन्होंने अपनी दोनों कन्याओं के बीच सिर्फ इस वजह से भेदभाव किया कि दोनों के जन्म के शगुन अलग-अलग थे!

हमारे समाज में सदियों से यह चला आया है और आज भी चल रहा है कि हम किसी और के दुर्भाग्य में उसका सहारा बनने, उसके प्रति इंसानियत का भाव रखने के बजाए, अपने अंधविश्वासों के चलते, उस इंसान का अपमान करते हैं। कई लोग हैं जो किसी विधवा, अपंग, एक आंख वाले व्यक्ति आदि को अपशगुनी मानते हैं। और कई लोग तो मुंह पर ही उनका अपमान कर देते हैं कि उनके सामने आने से काम बिगड़ गया। विधवा स्त्रियों को लोग मंगल कार्यों जैसे शादी-विवाह आदि में शामिल नहीं होने देते, खासकर जब मांगलिक रस्में हो रही हों। यह अपमानजनक और अन्यायपूर्ण दोनों ही है।

आज भी भारत के कई गांवों में, जिनमें बिहार, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ असम, आंध्र, पश्चिम बंगाल आदि कई राज्य शामिल हैं, औरतें डायन बताकर मार दी जाती हैं। चालाक महाबली यह सब किसी स्त्री की संपत्ति हड़प करने के लिए करते हैं। मगर इस षड्यंत्र में उनको गांव वालों का साथ प्रचलित अंधविश्वासों के चलते मिल जाता है और वे षड्यंत्रकारी डायन के नाम पर सरेआम कत्ल करके भी बच निकलते हैं। किसी के यहां कोई बच्चा मर गया, गांव में किसी बीमारी का प्रकोप या कोई और बात हो गई तो चिह्नित स्त्री को डायन या टोनही बताकर इस दुर्भाग्य के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता और उसे प्रताड़ित करने के बाद अंतत: मार दिया जाता है।

मगर सिर्फ ग्रामीण ही नहीं, हम शहरों में रहने वाले, कहने को पढ़े-लिखे, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग भी कम अंधविश्वासी नहीं हैं। पनौती जैसे शब्दों का इस्तेमाल तथाकथित आधुनिक लोग भी करते हैं और हार का विश्लेषण करने और जिम्मेदारी लेने या उसे खेल भावना से स्वीकार करने के बजाए ठीकरा किसी तथाकथित 'अपशगुनी" के सिर फोड़ने में यकीन करते हैं। न सिर्फ यकीन करते हैं बल्कि पूरी बेशर्मी से इसे घोषित करते हैं। जैसे कि अभी क्रिकेट वर्ल्ड कप वाले मामले में हुआ। लोगों ने विराट कोहली की मित्र अनुष्का शर्मा को भारत की हार के लिए जिम्मेदार बना दिया! यह दु:खद ही नहीं आश्चर्यजनक भी है। आखिर हम कब अपने ही बनाए अंधेरों से बाहर निकलेंगे?
-निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 19 मार्च 2015

भारत की बेटियां चाहें बंदिश नहीं, बंदोबस्त सुरक्षा का

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इन दिनों 'इंडियाज डॉटर'  नामक एक डॉक्यूमेंट्री बहस का केन्द्र बनी हुई है। यह वृत्तचित्र दिल्ली में हुए निर्भया बलात्कार कांड के बारे में है, जिसने पूरे देश को हिला दिया था, जिसके खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए थे। इसे एक ब्रितानी फिल्मकार लेसली उडविन ने बनाया है। इस डॉक्यूमेंट्री पर भारत में प्रतिबंध लगा दिया गया है। हालांकि यूनाइटेड किंगडम में एवं अन्य देशों में इसे दिखा दिया गया और दिखाया जा रहा है।


इस वृत्तचित्र में उस कांड के एक बलात्कारी मुकेश सिंह से बातचीत है, जिसमें वह पूरी बेशर्मी से यह कहता हुआ पाया गया है कि हमारे द्वारा बलात्कार की चेष्टा के समय लड़की अपने बचाव में लड़ी न होती, खामोशी से खुद को हमें सौंप देती तो हम भी 'अपना काम" करके उसे बस से उतार देते। बलात्कारी यहीं नहीं रुका, उसने यह नैतिक शिक्षा भी दे डाली कि एक अच्छी लड़की रात को नौ बजे घर से बाहर नहीं घूमती। बलात्कारी के वकीलों ने भी यही कहा कि लड़की शिकार नहीं बल्कि आमंत्रणकारी है। इस तरह के बयानों से हमारे यहां के लोग स्तब्ध नहीं होंगे क्योंकि वे अपने नेताओं, तथाकथित आध्यात्मिक गुरुओं, पुलिस, खाप पंचायतों और कई आम पुरुषों के मुंह से ऐसी बातें सुनते आए हैं। फिर भी डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध तो लगा दिया गया है और गुस्सा भी प्रदर्शित किया गया है।

इस बारे में लेखक व सांसद श्री जावेद अख्तर ने जो कहा वह गौर करने लायक है। जावेदजी कहते हैं, 'गुस्सा इस बात पर है कि उस आदमी का इंटरव्यू क्यों हुआ? गुस्सा इस बात पर है कि उस आदमी ने इतनी गलत बातें क्यों कीं? गुस्सा इस बात पर है कि ये दुनिया को क्यों बताया जा रहा है कि रेपिस्ट इतनी गंदी बातें कर रहा है; पर सर, ऐसी बातें तो मैं इस हाउस (संसद) में सुन चुका हूं कि अगर एक औरत इस तरह के कपड़े पहनेगी, अगर रात को सड़क पर घूमेगी तो वो ट्रबल इनवाइट कर रही होगी।'  श्री अख्तर ने आगे यह भी कहा, 'अच्छा हुआ कि यह डॉक्यूमेंट्री बनी, इसलिए कि हिन्दुस्तान के करोड़ों आदमियों को मालूम हुआ कि वे किसी रेपिस्ट की तरह सोचते हैं। अगर ये गंदा लग रहा है तो उन्हें अपनी सोच बदलना चाहिए।'

एक हिंदुस्तानी बंदे हरविंदर सिंह ने लेसली के जवाब में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है- 'यूनाइटेड किंगडम्स डॉटर्स"। यह भी सही है कि बलात्कार सभी जगह होता है। पर हमें तो फिलहाल अपने दाग देखने हैं क्योंकि हमारे कपड़े तो हमें ही धोना है। 'इंडियाज डॉटर' पर प्रतिबंध लगना चाहिए या नहीं, इसके अपने-अपने कारण हो सकते हैं। दोनों ही पक्षों के कुछ तर्क सही हो सकते हैं। मगर यहां हम इसकी चर्चा नहीं कर रहे।

बात है कि क्या बलात्कार की वजह कपड़े होते हैं? क्या लड़कियों की आजादी पर बंदिश लगाने से मामला हल हो जाएगा? तो कहा जा सकता है ऐसा बिल्कुल नहीं है। बलात्कार पहले भी होते थे, जब औरतें घर की चारदीवारी में कैद होती थीं। घर के बाहर घूंघट रखती थीं या बुर्का पहनती थीं। उसे छलने वाले अक्सर अपने ही होते थे, जिनकी वे घर की झूठी इज्जत के डर से शिकायत भी नहीं कर सकती थीं।

आज भी जो स्त्रियां सिर्फ घरों में रहती हैं वे क्या महफूज हैं? दो, चार, छ:, चौदह साल की बच्चियों के साथ बलात्कार हो जाते हैं, क्या वे इन राक्षसों को आमंत्रित करती हैं? हमारे यहां किसी स्त्री को किसी तथाकथित अपराध की सजा देने के लिए पंचायतों के आदेश पर भी सामूहिक बलात्कार हुए हैं। इस नृशंसता का स्त्री के कपड़ों से क्या संबंध? बलशाली लोग उसे घर से उठाकर भी ले जा सकते हैं। किसी पुरुष रिश्तेदार से कोई गलती होने पर उसकी मां, बहन, बेटी, पत्नी पर बलात्कार की घटनाएं भी होती हैं। कभी-कभी किसी स्वावलंबी, निर्णयक्षम स्त्री को दबाने और उसकी औकात दिखाने के लिए भी उस पर बलात्कार किया जाता है।

नारीद्वेषी पुरुषप्रधानता चाहती है कि स्त्री दबकर रहे, उनकी पाबंदी में रहे। ऐसे मामलों में भी स्त्री को कुचलने के लिए, उसका मान मर्दन करने के लिए बलात्कार जैसा कदम तक उठा लिया जाता है। सेना, पुलिस, दंगाई ये सब अराजकता के वक्त में स्त्रियों पर बलात्कार करने से नहीं चूकते। यह भारत ही नहीं, सब जगह होता है। योरप में युद्धकाल में क्या-क्या नहीं हुआ। मंटो की कहानी 'खोल दो' इस तरह की मानसिकता का बहुत उपयुक्त उदाहरण है। यानी अधिकांश मामलों में किसी खास पुरुष का दंभ, विकृत मानसिकता या समाज में उत्पन्न हुई अराजकता बलात्कार का कारण बनती है। फिर स्त्री की आजादी को दोष क्यों देना।

पुराने समय में चालीस साल के आदमी की शादी चौदह साल की बच्ची से भी आसानी से कर दी जाती थी। यह वैवाहिक बलात्कार तो स्त्रियों की परनिर्भर, गुलाम वाली स्थिति की वजह से होता था। विधवाओं के सिर मुंड़ाने और श्रृंगारहीन रहने वाले समयों में क्या उनका शोषण नहीं होता था? आकर्षित न करने के भरसक प्रयास के बावजूद भी कहीं न कहीं कोई भेड़िया उन्हें दबोचने को तैयार रहता था। तो इसके लिए जिम्मेदार तो भेड़िए की वृत्ति ही थी। उस पर नजर रखना और अंकुश रखना जरूरी था, न कि स्त्री को सती बना कर जला देना। पर एक समय पर सती प्रथा के पक्ष में भी ऐसी ही बातें की जाती थी जैसे आज औरत के कपड़ों और आजादी को लेकर दक्षिण एशियाई मुल्कों में की जाती है।

यह  भी एक गलतफहमी है कि आज बलात्कार बढ़ गए हैं। अब वे प्रकाश में आने लगे हैं क्योंकि आज की शिक्षा और स्वावलंबन की ओर बढ़ रही स्त्री को अपने न किए अपराध की झूठी शर्म नहीं, न्याय चाहिए। निर्भया कांड में जिस तरह समाज और मीडिया ने साथ दिया, उससे भी नजरिया बदला है और लड़कियां छुपने के बजाए सामने आने लगी हैं।

युद्ध, दंगे आदि के समय बलात्कार बहुत होते हैं। यानी अमूमन अराजकता इसके लिए जिम्मेदार होती है। शर्म की बात तो यह है कि हमारे यहां सदा यानी रोजमर्रा में ही ऐसी अराजकता की स्थिति रहती है। स्त्रियां पुलिस के साए में महफूज होने के बजाए वर्दी से डरती हैं, क्यों? यह सब जानते हैं।

इन स्थितियों से बचने के लिए स्त्री की आजादी पर प्रतिबंध नहीं, अराजकता का जाना और समाज में कानून, व्यवस्था का आना और राष्ट्रीय सुरक्षा का इंतजाम होना जरूरी है। भारत सरकार ने दस अरब का निर्भया फंड भी बनाया है जो कि महिलाओं के सशक्तिकरण और सुरक्षा के लिए है। इस योजना पर सचमुच काम हो और फंड का सही और योजनाबद्ध तरीके से उपयोग हो तो स्त्री की आजादी की बलि लिए बगैर उसे सुरक्षित बनाया जा सकता है। मगर पहली बात यह है कि हम अपना सोच तो बदलें। व्यवहार भी तभी बदलेगा।
- निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 12 मार्च 2015

आत्मा सोई हो तो धर्म कैसे जागे?

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ईश्वर एक विश्वास है जिसके सहारे अधिकांश लोग जीते हैं। हम से ऊपर कोई है, यह अवधारणा इंसान के अहं को गलाती है। धर्म पहले-पहल अस्तित्व में क्यों आया होगा?  शांति और करुणा के लिए ही न! भक्ति सिर्फ समर्पण का दूसरा रूप ही रहा होगा। पूजा और ध्यान निश्चित ही दिव्य आभास को पाने के मार्ग रहे होंगे। मगर आज क्या मनुष्य शर्तिया यह कह सकता है कि धर्म सिर्फ और सिर्फ हमारी आत्मा के सुकून के लिए है? नहीं। धर्म में दुनियाभर की राजनीति घुस आई है; भक्ति में पाखंड, पूजा में अंधविश्वास, कर्मकांडों का ऐसा बोलबाला है कि इसमें अध्यात्म ढूंढना मुश्किल काम हो गया है। बहुत थोड़े लोग हैं जो आध्यात्मिक आनंद में अपनी पूजा, अपना ईश्वर और मनुष्यता में अपना धर्म देख पाते हैं। जो अपने को आस्तिक कहते हैं, उनमें ईश्वर के प्रति प्रेम के बजाय एक अज्ञात सत्ता के प्रति भय अधिक दिखाई देता है। लगता है लोग 'विश्वास ही है आस्था का आधार' के बजाय, 'भय बिनु होय न प्रीति' के हामी  हैं।
वैसे तो अपने आसपास फैली अंधश्रद्धा,  रूढ़िवाद, कर्मकांड के हम रोज किसी न किसी रूप में दर्शन करते ही रहते हैं मगर फिलहाल उपरोक्त विचार आए एक मंदिर में घी के चढ़ावे वाला समाचार पढ़कर। इस मंदिर में अखंड ज्योति जलती है, इस हेतु भक्तों ने इतना घी चढ़ाया है और चढ़ा रहे हैं कि यहां घी के कुएं बनाने पड़े। और अब शुद्ध घी से नौ कुएं भर गए हैं! शुद्ध घी...! भारतीय परंपरा में इसे स्वाद और पौष्टिकता का राजा माना गया है। मगर यह दिव्य आहार निम्न आर्य वर्ग तो छोड़ो मध्यमवर्ग को भी सीधे से कहां नसीब होता है। आज के जमाने में जलेबियां और पूरियां तक तेल की खाकर लोग संतोष कर लेते हैं। मगर इलेक्ट्रिसिटी के जमाने में भी मंदिर में दिए जलाए जाते हैं, वह भी शुद्ध घी के। प्रथा में परिवर्तन करने से लोग डरते हैं, क्योंकि वे धार्मिक नहीं धर्मभीरू होते हैं। सही और तार्किक कदम भी नहीं उठाते क्योंकि अनिष्ट की आशंका से डरते हैं। जबकि समय-समय पर नई स्थितियों के अनुसार बदलाव हर रूढ़ हो चुकी चीज में होना चाहिए, चाहे वह धर्म से जुड़ी  हुई ही क्यों न हो। मगर जो कट्टरपंथी हैं, वे धर्म के नाम पर कुछ नहीं सुनना चाहते, बदलाव तो दूर की बात है। हो सकता है हिन्दुस्तान में किसी वक्त घी-दूध की नदियां बहती हों। तब ऐसी कोई प्रथाएं विकसित हुई हों। मगर आज भी मूर्तियों पर दूध बहाया जाता है और मंदिर के बाहर बैठा नन्हा ईश्वर बिलखता है। एक पर्वत की परिक्रमा लोग दूध की धार बहाते हुए करते हैं, इतना कि परिक्रमा पथ पर दूध का कीच हो जाता है। क्या आपका ईश्वर इससे खुश होता होगा? जरा सोचकर देखिए। गर्मियां आ रही हैं नींबू महंगे हो जाएंगे, मगर क्या व्यापारीगण अपनी दुकानों के आगे नींबू मिर्ची के टोटके लगाना बंद कर देंगे? खाने वाले को चाहे चीजें न मिले, मगर हमारा अंधविश्वास दिन ब दिन और पुष्ट होता रहे, यही व्यवस्था हम निभाते हैं।
कुछ दिनों पहले ही एक खबर पढ़ी थी कि मुरैना के एक कस्बे में एक दूध-फैक्टरी पर छापा मारा गया। वहां नकली दूध बन रहा ता। नकली भी ऐसा कि पढ़कर आपकी सांसें ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह जाएं। यहां दूध के नाम पर जहर बनाया, बेचा और पिलाया जा रहा था। फैक्टरी में ग्लूकोज पॉवडर में टॉयलेट क्लीनर, साइट्रिक एसिड व हाइड्रोजन पेरॉक्साइड आदि मिलाकर दूध के रंग का द्रव्य बनाया जा रहा था और उसे दूध कहकर बेचा जा रहा था! ऐसा दूध बनाने-बेचने वालों की आत्मा जाने कैसे ऐसा करने की गवाही देती है। क्या उन्हें इस दूध का सेवन करने वाले हजारों अनजान बच्चों के स्वास्थ्य के लिए डर नहीं लगता? नहीं, क्योंकि हममें से कई हैं जो व्यावहारिक जीवन में इंसान के प्रति बड़ी से बड़ी गलती करते हुए भी नहीं डरते, मगर मामला तथाकथित धर्म का हो तो पाषाण प्रतिमा के प्रति भी गलती करने से डरते हैं।
ऊपर शुद्ध घी के जिन कुंओं का वर्णन हुआ है, वहां नौ-नौ कुएं भर घी में भी न कोई मिलावट, न बेईमानी, न कोई चोरी होती है क्योंकि लोग मानते हैं कि घी के चढ़ावे में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी करने पर उन्हें श्राप लगता है। कुष्ठ, चर्म रोग आदि बीमारियां हो जाती हैं। मगर असल जीवन में बेईमानी करने में उन्हें डर नहीं लगता। खूब मजे से चोरी, भ्रष्टाचार, मिलावट होता है और किसी श्राप का डर नहीं लगता क्योंकि हमने आम जीवन की संवेदना और मनुष्यता को धर्म के दायरे से बाहर खदेड़ दिया है।
-निर्मला भुराड़िया

बुधवार, 7 जनवरी 2015

कराची से संदेश है- हिरानी साहब डटे रहें!

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निर्देशक राजकुमार हिरानी कृत फिल्म 'पीके' ने इन दिनों काफी हलचल मचा रखी है बॉक्स ऑफिस पर भी और कुछ लोगों के दिमागों में भी। वे दिमाग चूंकि दायरे में तंग हैं, अत: यह हलचल उनके सिरों को फोड़ कर बाहर आ रही है और लाठियां लेकर तोड़-फोड़ मचा रही है? ऐसा क्या है फिल्म में कि दर्शक तो हाल में बैठे हिलक-हिलक कर तालियां बजा रहे हैं मगर चंद अन्य लोग तक-तक कर गालियां दे रहे हैं? फिल्म को सराहने वाला आम दर्शक है। वह उसे इसलिए सराह रहा है कि आम आदमी अपनी साधारण समझ से भी यह देख पा रहा है कि फिल्म में धर्म के नाम पर फैले पाखंड को उजागर किया गया है। फिल्म को कोसने वाला खास आदमी है। वो खास आदमी जो सोचता है कि धर्म पर उसका कॉपीराइट है। अत: वह अपनी 'खास समझ' के चलते यह नहीं देख पा रहा है कि फिल्म धर्म पर नहीं, धर्म के नाम पर हो रही विसंगतियों, कुरीतियों और पाखंड पर चोट करती है। वह यह भी नहीं देख पा रहा है कि इसमें किसी खास धर्म को नहीं बल्कि सभी धर्मों को लपेटा गया है। वैसे वो खास आदमी देख भी क्या पाएगा जिसने विरोध करने के पहले फिल्म ही नहीं देखी होगी! जी हां विरोध करने वाले इन खास मनुष्यों में से अधिकांश ने फिल्म नहीं देखी है, वे सिर्फ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर विरोध कर रहे हैं, या शायद सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि जहां धर्म का नाम आ जाए, वहां लाठियां भांजना इन्हें जरूरी लगता है। ये लाठीभांजू खास आदमी हर धर्म में हैं, किसी एक धर्म में नहीं। इनकी संकीर्णता धर्मनिरपेक्ष है। इनकी कट्टरता का एक ही धर्म है- 'कट्टरता।' इस मायने में ये बंटे हुए नहीं मालूम होते, एक ही थैली के चट्टे-बट्टे लगते हैं।
फिल्म बगैर देखे विरोध करने वालों के कुछ मुगालते साफ कर दिए जाने चाहिए। जैसे यह कि यह फिल्म हिन्दू धर्म का विरोध करती है। तो पहली बात तो यह किसी भी धर्म का विरोध नहीं करती। हां धर्म के नाम पर पनपी कुरीतियों पर जरूर चोट करती है, मगर सिर्फ हिन्दु धर्म की कुरीतियों पर ही नहीं, हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई सभी की विसंगतियां इसके व्यंग्यबाणों के निशाने पर हैं। उदाहरण के तौर पर वह दृश्‍य जिसमें यह बताया जाता है कि कुछ भी शाश्वत सत्य नहीं, सब की अलग-अलग मान्यताएं हैं, उसी के आधार पर हरेक का सच बदल जाता है। इसमें नायक को एक सफेद साड़ी वाली स्त्री मिलती है तो बताया जाता है कि वह विधवा है। वह चर्च के द्वार पर सफेद ड्रेस पहने दुल्हन को देखता है तो पूछता है आप विधवा हैं तो चांटा खाता है और उसे कहा जाता है शोक का रंग तो काला होता है। तभी उसे काले बुर्के में तीन स्त्रियां दिखती हैं। वह उनसे पूछता है, 'क्या आपके पति मर गए हैं', इस पर एक आदमी बल्लियां चमकाते हुए आगे आता है, 'मैं हूं इनका पति!' यहां एक आदमी की तीन पत्नियां होने पर तंज किया गया है। हम सब जानते हैं कि यह तंज किस समुदाय पर हुआ। विरोधियों को एक शिकायत और है कि फिल्म में ईश्वर और धर्म का अपमान किया गया है। मगर हम अपनी संकीर्णता परे रखकर देखें तो पता चलेगा कि ऐसा नहीं है। नायक कहता है उसे ईश्वर पर विश्वास है। साथ ही वह एक कमर्शियल टाइप बाबा की ओर इशारा करके कहता है, मैं ईश्वर को मानता हूं मगर उस ईश्वर को जिसने मुझे बनाया है, उस ईश्वर को नहीं जिसे इन्होंने बनाया है। एक दृश्य में अंतरिक्ष से आया भोला नायक एक नवजात, वस्त्रहीन बच्चे को उठाकर उलट-पलट कर देखता है कि क्या इस पर कोई ठप्पा लगा है जिससे पता चलता हो कि यह किस धर्म का है? इसी तरह के हल्के-फुल्के अंदाज में फिल्माए गए दृश्यों से इस फिल्म में गहरे संदेश दिए गए हैं।
धरती पर, मनुष्यों में धर्म की अवधारणा क्यों आई होगी? निश्चित ही मानसिक शांति के लिए। निश्चित ही दया, करुणा, धीरज, सहिष्णुता, सेवा, सहायता, मनुष्यता जैसे सदगुणों के लिए।
 मगर धीरे-धीरे धर्म के नाम पर हिंसा और असहिष्णुता ही प्रबल हो गई। धर्म की मूल प्रकृति तो छूट ही गई। राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, पैगम्बर मुहम्मद, नानक, ईसा सभी अपने-अपने जमाने के सुधारवादी थे। मगर इनके ही चेले आज अपने जमाने में पनपी कुरीतियों पर चोट नहीं करने देते। निहित स्वार्थी पाखंडों को उजागर नहीं करने देते क्योंकि यह बना रहे तो कुछ की दुकान चलेगी और कुछ की राजनीति। कट्टरपंथियों के भेजे से टकराकर हर तर्क लौट आता है और संकीर्ण सोच वाला व्यक्ति तर्क जैसी चीजों के लिए अपने दिमाग में जगह ही नहीं रखता।
सोशल मीडिया पर संकीर्णतावादियों का एक नारा लगातार चल रहा है- 'कराची में पीके बनाओ तो जानें।' तो जवाब यह है कि भई कराची में क्यों बनाएं हम? हमें तो गर्व है कि हम एक प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष देश के वासी हैं और इसीलिए चंद लोगों के लाख विरोध के बावजूद हम ऐसी फिल्में बना और चला पा रहे हैं। पाकिस्तानी, बीबीसी संवाददाता, वुसुतुल्लाह खान ने कराची में यह फिल्म देखी और अपने ब्लॉग में लिखा, 'पीके देखनी है तो उसके मैसेज पर ध्यान दें। यानी असली भगवान या खुदा की लोकप्रियता को कैश कराने के लिए जिन पुरोहितों और मौलावियों ने फ्रंट कंपनियां खोलकर 'यहां असली खुदा और भगवान मिलता है' का बोर्ड लगा रखा है उनसे बचें।' वुसुतुल्लाह कहते हैं जब शो खत्म हुआ तो भी तो मैंने कई दर्शकों को यह कहते सुना, '...ईमान से... हमारा मौलवी भी तो यही कर रहा है...।' वुसुतुल्लाह आगे कहते हैं, 'हिरानी साहब, आप डटे रहें, आपका हौसला बंटते-बंटते एक दिन यहां (पाकिस्तान)  भी पहुंच ही जाएगा।'
-निर्मला भुराड़िया


बुधवार, 3 दिसंबर 2014

पाकिस्तान की सौतनें

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फिल्म बॉबी में एक गीत है- ''झूठ बोले कव्वा काटे, काले कव्वे से डरियो, मैं मायके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो।" इस गाने में मर्द तरह-तरह की धमकियां देकर औरत को मायके जाने से रोकता है। मैं ये करूंगा तुम देखती रहियो, मैं वो करूंगा तुम देखती रहियो, वगैरह। मगर नायिका किसी धमकी से डरती ही नहीं, बल्कि नायक को माकूल जवाब देती है। मगर जैसे ही वह इस धमकी पर आता है, 'मैं तेरी सौतन लाऊंगा, तुम देखती रहियो", तो अचानक गाने की धुन बदल जाती है। नायिका नायक के पैरों में बैठकर माफी मांगती सी कहती है, 'तू दूजा ब्याह रचाएगा, हाय मेरी सौतन लाएगा, मैं मायके नहीं जाऊंगी, मैं मायके नहीं जाऊंगी।" विट्ठल भाई पटेल का लिखा यह गीत एक प्रचलित लोकगीत पर आधारित है, अत: इसमें उस समय के भारतीय समाज के एक तीखे सच की झलक है। हमारे यहां बादशाहों के ही नहीं सभी राजाओं के भी हरम रहे हैं। सेठ-साहूकारों की एक से अधिक पत्नियां रही हैं। औरत विधवा हो जाए तो जीवनभर हंसना-बोलना भी मना हो जाना और पुरुष विधुर हो जाए तो चाहे तो महीने भर में ही दूसरी बीवी लाने का हक रखना। वह भी कुंवारी और उम्र में अपने से आधी-पौनी! एक स्त्री के रहते हुए दूसरी से संबंध रखना, वह भी हक के साथ और विवाहित पत्नी के पास रोने-बिसुरने और स्वीकार कर लेने के अलावा कोई चारा न था। विरोध करने का तो सवाल ही कहां उठता था। मगर भारत में यह स्थिति काफी कुछ बदली है। भारत के एक बड़े समुदाय की स्त्रियों के पास यह कानूनी हक है कि उनका पति एक साथ दो पत्नियां न रखे। वे चाहें तो शिकायत कर सकती हैं। दूसरा, अब अधिक से अधिक स्त्रियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हो रही हैं अत: विरोध करने की ताकत उनके पास है।
इन दिनों जिंदगी चैनल पर लोकप्रिय पाकिस्तानी सीरियल आ रहे हैं। वे बड़ी खूबसूरती से बनाए गए हैं। हमारे यहां के धारावाहिकों की तुलना में वे काफी बेहतर हैं। उसकी कई वजहें हैं। हमारे यहां के सीरियल, विज्ञापन मिलते जाने के साथ ही, चबाई हुई चुइंगम की तरह लंबे खींचे जाते हैं, कहानी क्या से क्या बना दी जाती है। कहानियां और पात्र अतिशयोक्तिपूर्ण और नाटकीय होते हैं, असल जीवन का प्रतिबिंब नहीं होते। अत: यह छोटे पर्दे पर लिखा साहित्य नहीं टाइम स्लॉट में भरा जाने वाला बेतुका कचरा अधिक होता है। वहीं पाकिस्तानी धारावाहिक निश्चित एपिसोड तय करके बनाए होते हैं जैसे तेईस या छब्बीस। कहानीकार ने जो लिखी वही कहानी होती है। पाकिस्तान का वर्तमान समाज, उसका व्यवहार, उसके चलन, किरदारों का मनोविज्ञान आदि बड़ी सूक्ष्मता से इन धारावाहिकों में उकेरा जाता है। इसके साथ ही आप रूबरू होते हैं पाकिस्तान की औरतों की स्थिति से। वहां पुरुष एक से अधिक शादी करने का कानूनी हक रखता है सो उनकी भाषा में कहें तो वह कभी भी 'पत्नी पर सौत बैठा सकता है।" छोटी-मोटी गलती पर आदमी पत्नी को धमकी देता है कि वह उसे छोड़ देगा, क्योंकि वहां एकतरफा तलाक भी हो जाता है। आदमी जब चाहे तलाक दे देता है, मुंह से बोलकर या तलाकनामा भेजकर। वहां औरत को इसे मंजूर न करने का अधिकार नहीं है। अक्सर स्त्री पात्र गिड़गिड़ाती हुई मिलती है कि मुझे छोड़ना मत, मैं कहां जाऊंगी? वैसे एक को छोड़े बगैर भी दूसरी स्त्री तो लाई ही जा सकती है। इस नाइंसाफी के बाद भी स्त्री का दर्द समझने के बजाय उसके द्वारा सौतन से बहनापा रखने की उम्मीद की जाती है। ग्लानि महसूस करना तो दूर पुरुषों की तरफ से जुमले उछाले जाते हैं कि दूसरी शादी करना कोई गुनाह नहीं! ठीक है कि आपने कानून ऐसे गढ़ रखे हैं कि पुरुषों को विशेष छूट मिल जाए, मगर भावनाओं का क्या किया जाए? कानूनी तौर पर कितना ही जायज हो, पति द्वारा दूसरी औरत लाने पर बीवी को गहरी भावनात्मक ठेस तो पहुंचती ही है। उधर जो दूसरी बीवी बनकर आती है उसके लिए भी कम मुसीबत नहीं होती क्योंकि वहां अक्सर कोई औरत दूसरी औरत इसलिए बनती है कि पाकिस्तानी समाज में अकेली औरत का न कोई मुकाम है न कोई आर्थिक-आत्मनिर्भरता। उसे आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा के लिए शादी ही करना होती है। फिर चाहे उसे छत देने वाला पुरुष पहले से विवाहित या उम्र में उससे दुगुना हो। आत्मनिर्भर सिंगल वुमन की अवधारणा वहां काम करती दिखाई नहीं देती। मर्द आधारित समाज व्यवस्था आमतौर पर स्त्री को कम-पढ़ा लिखा और आर्थिक आत्मनिर्भरता से वंचित रखती है। औरत को गुलाम बनाए रखने की यह साजिश काम कर जाती है जब अपने से आधी उम्र की लड़की से शादी करके पुरुष ऊपर से एहसान जताता है, अपनी महानता का गुणगान करता है कि उसने तो एक लड़की को आसरा दिया है और पहली बीवी इतनी संगदिल है कि 'उस बेचारी" के प्रति रुखाई बरतती है! यानी जो छली जाती है वह तो औरत ही होती है चाहे ये हो चाहे वो। इन सीरियलों में पुरुष को सही साबित करने के लिए पहली पत्नी बुरे स्वभाव की और बाद वाली पत्नी सही बताई जाती है, ताकि कानूनी रूप से जायज दूसरी शादी को भावनात्मक और सामाजिक रूप से भी जायज बताने का षड्यंत्र जारी रखा जा सके। पाकिस्तान के लगभग सभी सीरियल सौतनों से भरे पड़े हैं क्योंकि उनके समाज का सच भी यही है। इन सीरियलों के बहाने पाकिस्तान के समाज को भीतर से देखने का मौका मिल रहा है। पाकिस्तान की आम स्त्री हर पल असुरक्षा में जीती है। आत्मनिर्भर स्त्रियां भी वहां हैं मगर हमारे यहां से बहुत कम क्योंकि उस समाज का मिट्टी पानी उन्हें फलने-फूलने की इजाजत नहीं देता। इन स्त्रियों को देखकर प्रसिद्ध गीतकार साहिर लुधियानवी के एक गीत 'औरत ने जनम दिया मर्दों को..." का एक हिस्सा याद आता है-
'मर्दों के लिए हर जुल्म रवां, औरत के लिए रोना भी खता
मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता
मर्दों के लिए हर ऐश का हक, औरत के लिए जीना भी सजा।"
-देखना है अब कौन-सी मलाला पाकिस्तान की स्त्रियों को सौतनों से छुटकारा दिलाने आती है।
-निर्मला भुराड़िया

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

इश्‍क, ममता और धोखा

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जब आप सोचते हैं 'मां' तो आपके जेहन में सिर्फ अपनी मां की छवि ही नहीं उभरती बल्कि उसका निस्‍वार्थ प्रेम, अगाध ममता, नन्‍हे-नन्‍हे मगर बेशकीमती त्‍याग जैसी बातें भी मूर्त रूप में आ जाती हैं, आकार लेने लगती हैं। इंसान कितना भी बड़ा हो जाए, चोट लगने पर मुंह से सबसे पहले 'उई मां' ही निकलता है। मां का अर्थ ही होता है सुरक्षा। मां का प्‍यार व्‍यक्ति को गहरी भावनात्‍मक सुरक्षा देता है। मां यानी विश्‍वास। वह हर कीमत पर अपनी औलाद के विश्‍वास की रक्षा करती है। यदि आपने उससे कुछ गोपनीय बांटा है, तो वह उसे कभी किसी से नहीं कहेगी, भले ही वह गरल हो, तो वह उसे गले में रख लेगी, नीलकंठ हो जाएगी मगर उगलेगी कभी नहीं। मां से बड़ा विश्‍वासपात्र कोई नहीं होता। नन्‍हा बच्‍चा भी अपनी दैनंदिन की हर चखर-चखर मां से ही करता है। मगर कभी मां ही मन को चोट पहुंचाए तो?

     हाल ही में एक फिल्‍म देखी 'हैदर।' यह फिल्‍म शेक्‍सपीयर के प्रसिद्ध नाटक 'हेमलेट' पर आधारित है। नाटक में हेमलेट डेनमार्क का राजकुमार था। यहां हैदर आतंकवाद से ग्रसित कश्‍मीर का एक बेटा। लेकिन अलग पृष्‍ठभूमि के बावजूद फिल्‍म की कहानी वही है, जो हेमलेट की थी। प्रिंस हेमलेट अपने पिता (किंग हेमलेट) से अथाह प्रेम करता है। मगर किंग की हत्‍या हो जाती है। इसके तुरंत बाद किंग की पत्‍नी यानी प्रिंस हेमलेट की मां किंग के भाई क्‍लॉडियस से शादी कर लेती है जो कि नया राजा बन गया है। पिता का भूत प्रिंस हेमलेट को बताता है कि उसकी यानी किंग की हत्‍या उसके भाई क्‍लॉडियस ने ही की थी। अपने प्रिय पिता के हत्‍यारे के साथ मां की मुहब्‍बत प्रिंस हेमलेट के दिमाग को इतना उलझा देती है कि वह दिमागी संतुलन खो बैठता है। हैदर के साथ भी यही होता है। पिता के गायब होने के तुरंत बाद जब वह घर लौटता है तो अपनी मां को चाचा के साथ हंसते और गाते, बेहद प्रसन्‍न पाता है। उसे षड्यंत्र की बू आती है और शक होता है कि उसके पिता के गायब होने में चाचा के साथ मां भी शामिल है। वह इस दिल तोड़ देने वाले और मनावैज्ञानिक तौर पर निचोड़ देने वाले एहसास से लड़ ही रहा होता है कि रूहदार नामक व्‍यक्ति (यहां भूत के बजाय पिता का सहबंदी) बताता है कि हैदर का पिता मार दिया गया है और उसका मुखबिर और प्रकारांतर से उसका कातिल उसका चाचा ही है। हैदर दुख से पगला जाता है। एक तो प्रिय पिता के कत्‍ल का दुख, लेकिन उससे भी बड़ा दुख यह प्रतीति कि मां भी इसमें शामिल रही।
     चार सौ साल पहले लिखा गया नाटक आज भी प्रासंगिक है, क्‍योंकि इंसानी मनोविज्ञान वेसा ही दुरूह और जटिल है, जैसा पहले था। कभी-कभी इंसान एक ही व्‍यक्ति के प्रति प्रेम और नफरत के हिंडोले में झूलता है। हेमलेट के साथ भी यही कशमकश है। जो उसकी मां है, वही पिता के कातिल की प्रेयसी भी। अब इंसान का दिमाग क्‍या करे? प्‍यार या नफरत? दोनों एक साथ हो नहीं सकते। अत: संतुलन बिगड़ जाता है। हैदर की त्रासदी तो इससे भी आगे है। मां का अर्थ होता है विश्‍वास। तो जब मां ही धोखा दे दे तो क्‍या हो? आदमी डिसफंक्‍शनल हो ही जाएगा। वहीं हैदर की मां की त्रासदी यह है कि उसने पति के कातिल से मुहब्‍बत जरूर की है मगर पति का कत्‍ल नहीं किया है। वह अनजाने में मोहरा बनी है। वह प्रेमी से इश्‍क जरूर करती है, मगर बेटे को भी बहुत चाहती है, खुद से और प्रेमी से भी ज्‍यादा, मगर शक से बौराए बेटे को यकीन दिलाने में नाकामयाब रहती है।
     रिश्‍तों की ये गुत्थियां पहले भी थीं, अब भी हैं। धोखे तो बहुत से होते हैं दुनिया में, मगर जब कोई अपना ही विश्‍वास की कसौटी पर खोटा निकल जाए तो वही भावनात्‍मक त्रासदी होती है जो हैदर उर्फ हेमलेट के साथ हुई थी। 
                                                                  -निर्मला भुराड़िया 

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

शुभ संकेत

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शुभ संकेत

आज बॉक्सर मेरी कॉम को कौन नहीं जानता। अब तो उनकी जीवनी पर फिल्म भी बन कर रिलीज हो चुकी है। इससे हम बॉक्सिंग के क्षेत्र में उनकी उपलब्ध्ाियों के बारे में ही नहीं उनके जीवन के अन्य पहलुओं के बारे में भी जान रहे हैं। बॉक्सिंग को लेकर उनका नैसर्गिक रुझान, उनकी प्रतिभा, उनकी लगन, बल्कि यूं कहें कि उनका जुनून सब कुछ बेहद प्रेरणादायी है। साथ ही उनका संघर्ष, हवा के खिलाफ टिके रह कर जो ठान लिया वह कर गुजरने का माद्दा भी जानने लायक है। इससे संघर्ष कर रहे अन्य लोगों को भी बल मिलता है। मगर मेरी कॉम के संघर्ष, जुनून और सफलता की इस कहानी में सर्वाध्ािक उल्लेखनीय और प्रेरणादायक कोई बात है तो वह है उनके पति द्वारा अतुलनीय सहयोग की गाथा। हालांकि फिल्म माध्यम में तथ्यों को थोड़ा उभार कर बताना होता है, मगर आखिर तो यह एक जीवनी ही है और सत्य के आध्ाार पर ही बुनी गई है, अत: ये सच है कि मेरी कॉम की सफलता में उनके पति का बहुत बड़ा हाथ है। यूं विवाह के पूर्व ही मेरी की मेहनत ने रंग दिखाना शुरू कर दिया था पर साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि ओलिम्पिक के मैडल सहित, मेरी कॉम की बहुत सी बड़ी सफलताएं शादी और बच्चे होने के बाद की हैं। एक खिलाड़ी महिला के लिए यह कैसी कठिन चुनौती है, यह समझा जा सकता है। मेरी के पति स्वयं एक फुटबॉल खिलाड़ी हैं, मगर मेरी की तूफानी प्रतिभा और बॉक्सिंग के प्रति जबरदस्त पैशन को समझते हुए उन्होंने अपना कैरियर छोड़कर घर और बच्चों को सम्हाला और मेरी को अपने उच्चतम मुकाम पर पहुंचने देने के लिए राह बनाई। वह भी साध्ाारण लालन पालन नहीं। इस बीच दो में एक बच्चा गंभीर रूप से बीमार भी हुआ। यह एक दुर्लभ उदाहरण है क्योंकि मेरी के पति ने सिर्फ पत्नी का सहयोग ही नहीं किया पत्नी के लिए त्याग भी किया। भारतीय पुरुषों में बचपन से ही पालित-पोषित अहं को भी उन्होंने बीच में नहीं आने दिया और यह समझने की कोशिश की कि वे दोनों ही खिलाड़ी हैं तो क्या उनकी पत्नी की प्रतिभा और जुनून दोनों ही उनसे ज्यादा हैं अत: घर के लिए खेल उन्हें छोड़ना चाहिए पत्नी को नहीं। जिस देश में जेंडर के हिसाब से यह तय होता हो कि त्याग कौन करेगा वहां मेरी कॉम के पति की मिसाल बहुत बड़ी है।
मेरी कॉम पर बनी बायोपिक देखकर यकायक कई किस्से याद आ जाते हैं। मीना कुमारी और कमल अमरोही दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र के प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। मगर मीना कुमारी चूंकि अभिनेत्री थी अत: अध्ािक प्रकाश में थीं। यदि कमाल अमरोही का परिचय कोई यह कह कर करवा दे कि ये मीना कुमारी के पति हैं तो उन्हें बुरा लग जाता था। एक बार मीना स्टेज पर गईं और अपना पर्स सीट पर भूल गईं तो अमरोहीजी ने दोस्तों के याद दिलाने के बावजूद उसे उठाया नहीं बल्कि यह कहा कि क्या मैं बीवी का पर्स उठाऊंगा? सुनते हैं जोहरा सहगल के पति ने इसीलिए आत्महत्या कर ली थी कि जोहरा उनसे काफी आगे निकल गई थीं। आखिर ऐसे लोग क्यों होते हैं जो पत्नी की सफलता पर गर्वित होने के बजाए चोटिल हो जाते हैं, उनके अहं को ठेस पहुंच जाती है?
फिल्म 'खेल-खेल" के एक गाने की पंक्ति है, 'ये भी जोड़ी है कैसी निराली, पीछे लाला चले आगे लाली।" गाने में पत्नी आगे और पति पीछे को अजीब इसलिए माना गया है कि हमारे समाज में यह अलिखित नियम रहा है कि पति आगे और पत्नी पीछे चलेगी। पति उम्र में बड़ा, पत्नी छोटी होगी। पति पत्नी को चाहे तू कह कर पुकारे वह तो उसे आप ही कहेगी। देखा जाए तो यह भी एक सामाजिक अपेक्षा ही है कि पुरुष का स्त्री से अध्ािक सफल होना जरूरी है। इस थोपी गई अपेक्षा का पुरुषों पर बहुत दबाव रहता है। यही अपेक्षा पुरुष मन पर यह मनौवैज्ञानिक प्रभाव भी छोड़ती है कि पत्नी की सफलता पर वह हीनता महसूस करने लगता है। यह पुरुष के दिमाग की उपज नहीं समाज के रवैए का बोया बीज है। पत्नी की सफलता से वह इसलिए परेशान होता है कि 'लोग क्या कहेंगे?"
मगर ध्ाीरे-ध्ाीरे ही सही हमारे समाज में और पुरुषों की मानसिकता में भी इस संदर्भ में तेजी से परिवर्तन आ रहा है। एक दूसरे को तू और आप में किया जाने वाला संबोध्ान दोनों द्वारा ही एक दूसरे को तुम कहे जाने से सम पर आ गया है। ऐसे बहुत से पुरुष हैं जो अपनी पत्नी की सफलता पर गर्वित होने लगे हैं और आगे बढ़ कर उसका परिचय कराते हैं। पत्नी को रोकने के बजाए उसको आगे बढ़ने में सहयोग करने वाले भी अब दिखने लगे हैं क्योंकि हमारा सामाजिक वातावरण भी बदला है। वैसे व्यक्तिगत तौर पर भी कुछ लोग संकीर्ण और अहंवादी होते हैं और कुछ लोग उदार। आत्मविश्वास से भरपूर ये दूसरे वाले लोग पत्नी की प्रगति से हीनता बोध्ा नहीं, गर्व महसूस करते हैं। मेरी कॉम के पति ने सिर्फ सहयोग ही नहीं, त्याग भी किया। कम ही सही, ऐसी मिसालें भी अब भारतीय समाज में दिखने लगी हैं। यह एक शुभ संकेत है।

निर्मला भुराड़िया