बुधवार, 4 जुलाई 2012

स्त्री, पुरुष और वे!

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कैथलिक क्रिश्चियन थियोलॉजी की मान्यता अनुसार जो बच्चा बपतिस्मा होने के पूर्व ही मर जाता है उसे स्वर्ग में जगह मिलती है नर्क में, वह जिस स्थान में रह जाता है उसे कहते हैं लिम्बो। यानी उसका निस्तार नहीं होता। शायद इसीलिए अंग्रेजी में 'इन लिम्बो" का आशय है अनिर्णित रहना। कहीं का होना, बीच में झूलते रह जाने वाली ध्वनियाँ भी इससे आती हैं। हिन्दू आख्यानों में भी एक त्रिशंकु हैं, जो आसमान से धकेले गए पर धरती पर भी ना टपके, सो बीच में ही झूलते रहे। हमारी भाषा में आर-पार होने की स्थितियों में त्रिशंकु शब्द का उपयोग किया जाता है। लेकिन कोरी भाषा के पार जाकर सोचें तो एक त्रिशंकु का दर्द दूसरा त्रिशंकु ही समझ सकता है, हालाँकि मनुष्यता के नाते एक समदु:खभागी को ही नहीं सभी को यह पीड़ा समझना चाहिए। मनुष्यता नाम ही इसी का है।
एशियाड खेलों की गोल्ड मैडलिस्ट धावक पिंकी प्रमानिक ओलिम्पिक शुरू होने के ठीक पहले एक विवाद में फँस गई हैं। तीन साल से उनकी रूममेट रही एक लड़की ने अचानक यह इल्जाम लगा दिया है कि पिंकी पुरुष है और उसने अपनी पार्टनर के साथ ज्यादती की! पिंकी लड़की है या लड़का इस बारे में जाँच का रिजल्ट इन पंक्तियों के लिखे जाने तक आया नहीं है। मगर रिजल्ट जो भी हो, ऐसा नहीं लगता कि मैडल जीतने के लिए स्त्री वेश बनाकर पिंकी ने धोखेबाजी की हो। वह शुरू से ही लड़कियों के स्कूल में पढ़ी। लड़की के रूप में ही पली-बढ़ी और धाविका बनी है।
साउथ अफ्रीका की एक खिलाड़ी केस्टर सेमन्या को एक बार ऐसे ही सेक्स डिटरमिनेशन टेस्ट से गुजरना पड़ा था। जिसके नतीजों में क्रोमोसोम के विचित्र पैटर्न्स के अलावा यह पाया गया कि उसके शरीर पर स्त्री के अंग हैं, मगर शरीर के भीतर ओवरी और गर्भाशय नहीं है। मगर बाहरी संरचना में स्त्री अंगों के साथ ही, अविकसित रूप में सही पुरुष अंडकोष भी हैं! अब इस अजीब संरचना के साथ केस्टर कैसे निर्णय करती कि वह कौन है। अत: उसने स्त्री रूप में खिलाड़ी बनना पसंद किया, तो कोई धोखा तो नहीं किया। भारत में तो स्थितियाँ और मुश्किल हैं। तीसरे जेंडर के लोग भारत में सिर्फ उपेक्षित ही नहीं हैं। पूरी तरह अलग-थलग कर दिए गए हैं, नतीजतन आम लोगों से अलग समांतर समाज में रहने को विवश हैं। अपने कुनबों के भीतर ही इन्हें मित्रता और सहायता मिलती है और अपने कुनबों की रूढ़ियों, अंधविश्वास और कुप्रथाओं में ही इन्हें आजीवन जीना पड़ता है। आम जन से तो इन्हें दुत्कार ही मिलती है, नतीजतन वे और उग्र हो जाते हैं तो और ज्यादा घृणा और दुत्कार मिलती है। इन्हें वह बर्ताव नहीं मिलता जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से करना चाहिए। उन्हें कहीं काम नहीं मिलता, कहीं भर्ती नहीं मिलती, कहीं पढ़ाई लिखाई के मौके नहीं मिलते। समाज की मुख्यधारा उन्हें सम्मानपूर्वक अपने भीतर समाहित नहीं करती। आखिर किस दोष की वजह से? यदि प्रकृति ने उन्हें कोई शारीरिक कमी या शारीरिक भिन्नाता दी है तो यह उनका दोष तो कदापि नहीं है। फिर यह अपमानजनक व्यवहार क्यों? कहीं भी प्रवेश चाहिए तो हमारे यहाँ 'एफ" या 'एम" के अलावा तीसरा ऑपशन कहाँ है? तमिलनाडु सरकार ने जरूर अभी-अभी कॉलेजों में प्रवेश हेतु अपने फॉर्म में यह सुविधा दी है। चुनावों में भी अब जाकर इस केटेगरी के वोट देने की पात्रता बनी है। मगर इतने भर से कुछ भी नहीं होता। थर्ड जेंडर के लोग बिना अपराध के कड़ा दंड भुगत रहे हैं। यदि वे लड़कियों के बाथरूम में चले जाएँ तो लड़कियाँ चिल्ला पड़ेंगी और उन्हें निकाल बाहर करेंगी। पुरुषों के बाथरूम का इस्तेमाल करने में उन्हें कुछ लोगों से खतरा भी हो सकता है और यह उनके लिए शारीरिक रूप से असुविधाजनक भी हो सकता है। क्या हमारे यहाँ जेंडर न्यूट्रल बाथरूम हैं? यदि नहीं तो वे एफ या एम किसी केटेगरी में तो जाएँगे ही? फीमेल केटेगरी में गए तो उन पर जाँच बैठा दी जाएगी। तो फिर वे क्या करें? आजकल सेक्स रिअसाईमेंट सर्जरी भी होती है। मगर यह भी सामाजिक, आर्थिक सहयोग और गहन मनोचिकित्सीय परामर्श के बाद ही संभव है। थर्ड जेंडर के आम व्यक्ति के लिए दूर की कौड़ी है। इसकी जटिलताओं के चलते यह हर किसी के लिए संभव भी नहीं है। अत: इस तरह के व्यक्ति को समाज का सहयोग, शिक्षा-दीक्षा, रोजगार, सम्मान ही मिल जाए तो वह सुखपूर्वक जी सकता है।
निर्मला भुराड़िया
रफ़्तार

गुरुवार, 24 मई 2012

बड़ी चीज तो वफादारी है


बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण और ध्यान आकर्षित करने वाला फैसला दिया है। एक महिला ने गिरीश नामक एक पुरुष पर आरोप लगाया था कि उसने शादी का प्रलोभन देकर उससे शारीरिक संबंध बनाए। इसका हवाला देकर अब वह गिरीश पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी। कोर्ट ने निर्णय दिया है कि किसी महिला की पवित्रता को उसकी संपत्ति नहीं माना जा सकता। और कोर्ट ने गिरीश को जमानत भी दे दी।
उक्त महिला को चाहे यह फैसला स्वयं के खिलाफ लग रहा हो, और व्यक्तिगत तौर पर उस महिला की हार हुई मगर गौर से देखें तो यह फैसला महिलाओं के हक में है। इस उदाहरण में शादी के वादे के बावजूद शादी करने से वादाखिलाफी और धोखे का मानसिक दुख महिला को अवश्य पहुँचा होगा। मगर जहाँ तक कौमार्य हरण का सवाल है तो यह आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध का मामला था। वर्जिनिटी कोई संपत्ति नहीं है। वर्जिनिटी को औरत का गहना मानने के कारण तो औरतों को बहुत दु: उठाने पड़े हैं। आज भी कई समुदायों में औरतें सतीत्व परीक्षण से गुजरती हंै। नव वधुओं को पति के शक का सामना करना पड़ता है कि कहीं पत्नी ने कौमार्य विवाह पूर्व ही खो तो नहीं दिया है? बलात्कार को सिर्फ एक दुर्घटना माना जाता तो कोई किसी भाई, पिता या पति से बदला लेने के लिए उसकी बहन, बेटी, पत्नी से बलात्कार नहीं करता। मगर कौमार्य, सतीत्व, पवित्रता जैसी अवधारणाओं ने औरतों की पवित्रता को औरत का ही नहीं उसके रिश्ते के पुरुषों के लिए भी अमूल्य रत्न की उपमा देकर, इसे इतनी कमजोर नस इतनी नाजुक चीज बना दिया कि बदला लेने के लिए सिर्फ इसे छू कर तड़काने भर की देर है और सामने वाला ध्वस्त हो जाए। महिलाओं की तथाकथित शुद्धता के चलते ही ऐसी मिसालें भी सामने आई हैं कि किसी फिल्मी दृश्य में या सचमुच में कोर्ट या खाप पंचायत ने कह दिया हो कि लड़की की बलात्कार करने वाले से ही शादी कर दो क्योंकि दैहिक संबंध बनने से कौमार्य इसी को अर्पित हुआ! कौमार्य एक गहना है वाली अवधारणा के कारण ही बलात्कार की शिकार महिलाएँ अपने पर हुए अत्याचार की शिकायत खुलकर नहीं कर पातीं। जमाना उन्हीं को अपवित्र मान लेता है! पवित्रता को औरत का गहना मानने का यह नुकसान होता है कि हिंसा करने वाला शिकायत और सबूत के अभाव में छुट्टा घूमता है और शिकार के लिए कहा जाता है उसकी इज्जत चली गई, आबरू लुट गई!
कहते हैं सभ्य समाज (असभ्य समाज) में औरत की वर्जिनिटी को लेकर इतनी रक्षालु और शंकालु प्रवृत्ति राजाओं और जमींदारों के घर से शुरू हुई होगी। वहाँ जहाँ एक राजा की तीन सौ पैंसठ रानियाँ हुआ करती होंगी। राजा का पुत्र आगे चल कर गद्दी पर बैठता होगा। तबके सत्ताधारी को यह भय सताता होगा कि रानियों के माध्यम से किसी और की संतान गद्दी पर बैठ जाए! और बड़े घर की औरतों की वर्जिनिटी इतना बड़ा मुद्दा बन गई। दुर्भाग्य से लेडी डायना को भी विवाह पूर्व वर्जिनिटी टेस्ट करवाना पड़ा था। अब जमाना बदला है। औरत किसी की संपत्ति है उसकी वर्जिनिटी उसका अमूल्य गहना। रही पितृत्व परख की बात तो अब डीएनए टेस्ट है। अब पुरुष भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता। दैहिक संबंध बनाया है तो संतति की जिम्मेदारी दोनों की ही है। पहले अक्सर हिन्दी फिल्मों में डायलोग होते थे गर्भवती औरत हाथ जोड़ती हुई उपस्थित होती थी, 'मुझे अपना लो, तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ।" विलेन ठोकर मार कर कहता था 'जाने किसका पाप लिए घूम रही हो।" अब ऐसा नहीं हो सकता विलेन के लिए कोर्ट का आदेश जाएगा कि इसे पकड़ो और माने तो जबरन खून का सैंपल ले लो! तो जनाब विज्ञान की प्रगति के इस जमाने में बहुत सी बातों के प्रति हमारा नजरिया बदलना जरूरी है। औरत की पवित्रता को संपत्ति मानना भी उनमें से एक है। वर्जिनिटी नहीं, वफादारी बड़ी चीज है किसी भी रिश्ते में। वह तो एक बार रिश्ता बनने के बाद स्त्री और पुरुष दोनों में ही होना चाहिए। 

 

शुक्रवार, 18 मई 2012

आपकी नाक नहीं दिल का टुकड़ा है वो

 
अभिनेता आमिर खान बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने अपनी स्टारडम का उपयोग तेल बेचने में करने के बजाए, सामाजिक जागृति का आगाज करने वाले कार्यक्रम 'सत्यमेव जयते" की प्रस्तुति करने में किया। सिनेमा के पर्दे पर भी आमिर ने एक्टर, प्रोड्यूसर के रूप में स्वस्थ मनोरंजन की कैप्सूल में लपेट कर गहरे सामाजिक मुद्दे भी उठाए हैं। इसीलिए जनता को उनके द्वारा उठाए गए सरोकारों की गंभीरता पर यकीन है, उनके स्टार होने का आकर्षण तो है ही। वजह जो भी हो इस कार्यक्रम में बदलाव की बयार बहाने की ताकत है।
'सत्यमेव जयते" की पहली प्रस्तुति में भारत में कन्या भ्रूण हत्या का मुद्दा उठाया गया। इसका असर कितना होगा, कब होगा यह तो समय ही बताएगा। चूँकि अच्छी बातों का असर धीरे-धीरे ही होता है। मगर हाँ प्रतिक्रियाएँ जरुर हौंसला बढ़ाने वाली रहीं। कुछ लोगों ने कसमें भी खाई होंगी, संकल्प भी लिए होंगे कि वे ऐसा नहीं करेंगे? मगर बहुत सारे लोग ऐसे भी होंगे जो शो खत्म होने के बाद ताली बजाकर फिर अपने संकीर्ण स्वरूप में गए होंगे। अत: इस मामले में हृदय परिवर्तन के साथ ही सामाजिक परिवर्तन भी जरूरी हैं। आज भी लड़कियों को लेकर हमारे समाज में जो रुढ़िवादी सोच और कट्टरपंथी बर्ताव है वह लड़कियों को कुछ नहीं समझता। उनका व्यक्तित्व, उनके सपने उनकी मर्जी पर कई आज्ञाओं और पाबंदियों के पहरे हैं।
पिछले दिनों एक पिता ने अपनी बेटी की हत्या कर दी, क्योंकि बेटी अपनी मर्जी से दूसरी जाति के लड़के से शादी करने वाली थी। लड़की के भाइयों ने पिता का समर्थन किया यह कहकर कि उसके दूसरी जाति में शादी करने से बिरादरी में हमारी नाक कट जाती। जैसे कि हत्या करने से नाक ऊँची हो गई हो! पिता यह जघन्य अपराध करके जेल गया तब क्या नाक नहीं कटी? सच तो यह है कि इस पिता ने अपनी पुत्री को और भाइयों ने बहन को 'नाक" ही माना, दिल का टुकड़ा नहीं। जहाँ औरत एक वस्तु होती है, वह दूसरों के रखरखाव में होती है, उनकी दया पर निर्भर, उसकी अपनी मर्जी कुछ नहीं होती। अपने ही जीवन पर उसका अपना हक भी कहाँ होता है, वह तो दूसरों के बनाए नियम-कायदों से संचालित होती है। इसलिए पहली सीढ़ी है नारी सशक्तिकरण। मगर समाज और परिवार तो अक्सर इसी सीढ़ी पर स्त्री को रोक देना चाहता है। ताकि वह घर-समाज पर अवलंबित ही रहे। पिता के रूप में तो तो भी लोग अब पुत्री को आत्मनिर्भर बनाने लगे हैं, मगर ससुराल और समाज की दृष्टि नहीं बदली है। उत्तरप्रदेश में एक भाई अपनी लापता बहन की रिपोर्ट लिखाने पुलिस के पास गया तो डीआईजी ने कहा, 'अगर मेरी बहन भागी होती तो मैं उसे मार डालता या फिर खुदकुशी कर लेता।" यह तो कानून के रक्षक द्वारा सीधे-सीधे ऑनर किलिंग की ताकीद है। सच तो यह है कि यह वह अफसर नहीं बोल रहा था, हमारी संकीर्ण मानसिकता बोल रही थी, जो जन-जन में व्याप्त है और पुलिस भी एक भारतीय जन है। एक और पुलिस वाले ने अपने निकम्मेपन की कैफियत यह कहकर दी कि भागने वाली लड़कियों को ढूँढें कि चोर पकड़ें! भगवान जाने हमारे यहाँ 'लड़की भाग गई" जैसे अपनमानजनक जुमले की सृष्टि क्यों हुई? शायद इसलिए कि हम इस घटना को इस परिप्रेक्ष्य में नहीं देख पाते कि वह बालिग है और उसने अपनी मर्जी से शादी कर ली है। जहाँ माता-पिता लड़की के जीवन का प्रश्न मान कर उसे किसी अवगुणी व्यक्ति से शादी करने की सलाह दे रहे हों, तब तो बात थोड़ी समझ आती है, क्योंकि माता-पिता ने दुनिया देखी है। मगर भारतीय संदर्भों में अक्सर ऐसा नहीं होता, अड़ियल पंथी माता-पिता जात-पात के संकीर्ण विचारों में पड़कर अपनी संतति के जीवन का सौदा कर देते हैं। इससे उनकी तथाकथित नाक रह जाती है संतति का वैवाहिक जीवन उसकी मर्जी का हो या हो।
गाँव की एक नववधु से मिलने का मौका पिछले हफ्ते मिला। देखकर हैरत हुई उसने लंबा सा घूँघट कर रखा था। उससे पूछा, इतना लंबा घूँघट क्यों? तो उसने कहा,'ससुरजी का आदेश है, मैं ही नहीं, गाँव में सभी बहुओं के लिए ये जरूरी है।" पूछा तुम खाना भी ऐसे बनाओगी? तो उसने कहा हाँ? दो-तीन बार तो गिर भी चुकी हूँ। मैंने मेरी माँ से कहा है कि अगली बार थोड़ी पतली साड़ी भिजवाए, जिसमें से बाहर का दिखे। यह पिछले हफ्ते की बात है, पिछली सदी की नहीं। शहरों की लड़कियों पर भी अक्सर यह पाबंदियाँ जाती हैं, जीन्स मत पहनो। यह मत, पहनो वह मत पहनो। भारतीय स्त्रियों को घर, समाज और ससुराल से वस्त्रों संबंधी जबरदस्त पाबंदियों का सामना करना पड़ता है। यूँ अब काफी लड़कियाँ अपना कैरियर भी बना रही हैं। मगर अब भी यह संख्या संतुष्टिदायक स्तर पर नहीं पहुँची है। अपने पैर पर खड़े होने की छूट होना स्त्री सशक्तिकरण में बहुत बड़ी बाधा है। फिर ऐसे सामाजिक नियम भी हमारे यहाँ हैं कि हम बेटी के घर का नहीं खाएँगे। बेटी को पराई अमानत मानकर ही चलेंगे वगैरह। नतीजतन बेटी सशक्त हो पाती है माँ-बाप के बुढ़ापे की लाठी हो पाती है। तब हम स्वयं ही बेटियों की भ्रूण हत्या कर देते हैं कि बेटी तो सहारा बनेगी नहीं, हमें तो बेटा ही चाहिए।
तात्पर्य यही कि सिर्फ कानून बन जाने से कन्या भ्रूण हत्या बंद नहीं हो सकती। स्त्रियों को लेकर हमारे समग्र सोच में परिवर्तन जरूरी है। स्त्री का सशक्तिकरण जरूरी है। 
निर्मला भुराड़िया