बुधवार, 9 मई 2012
न हीरो करे बीए, न माँ चलाए मशीन!
शनिवार, 5 मई 2012
टॉयलेट नहीं तो ससुराल नहीं, हाथ न धोए तो खाना नहीं!
सोमवार, 13 फ़रवरी 2012
जिंदा मजा!
बारिश के दिन थे। बरामदे में बैठी दादी अपने नन्हे पोते से बात कर रही थी। बस ऐसी ही मासूम बातें जैसे कि बारिश संग धूप निकल आए तो चिड़िया की शादी होगी। इतने में बिजली कड़की। दादी ने खट कहा- 'वो देखो रामजी आसमान में बैठकर फोटो खींच रहे हैं। कैमरा चमका रहे हैं।" दादी बोली तो पोता ताली बजाकर हँसा। भीतर बच्चे के पिता यह वार्तालाप सुन रहे थे, वे बाहर आए और मुस्कुराते हुए प्यार से बोले- 'क्या अडंग-बड़ंग बता रही हो माँ।" 'अरे अड़ंग-बड़ंग नहीं, ऐसी बातों से तो बच्चे की कल्पना का विस्तार होता है," दादी ने कहा। और अब वे बच्चे को सारस और लोमड़ी वाली कहानी सुना रही थीं। कैसे लोमड़ी ने खीर बनाई और थाली में परोस दी, बेचारा सारस खा ही नहीं पाया, लोमड़ी लप-लप सब खीर चाट गई। जब सारस की बारी आई तो उसने चने बनाए और सुराही में परोस दिए। लोमड़ी उसमें मुँह ही न डाल पाई, सारस अपनी लंबी चोंच से उठाकर सब चने खा गया।
बच्चे को इस कहानी में बहुत मजा आया। उसने कई प्रश्न पूछे कि लोमड़ी का मुँह कैसा होता है, क्या वह सुराही में मुँह डालती तो उसका मुँह फँस जाता वगैरह। बच्चे के पिता ने लैपटॉप लाकर गूगल करके पुत्र को खट् से लोमड़ी बता दी। दादी माँ ने कहानी के पीछे लगाया सीख का पुछल्ला कि मेहमान बुलाए जाएँ तो उनके पसंद का खाना बनाना और उनकी सुविधानुसार व्यवस्था करना कितना जरूरी है। और, यह भी कि जैसे को तैसा मिलता है। वगैरह। शायद वे पोते को कोरा उपदेश देतीं तो वह सीख नहीं सुनता। टीवी और कम्प्यूटर के बनी-बनाई और कृत्रिम छबियों के अतिक्रमण से बेहाल लोग अब फिर किस्से-कहानियों की दुनिया में बच्चों का मानसिक विकास देखने लगे हैं। एकल परिवार में रहने वाली एक बड़ी कंपनी की सीईओ कहती हैं कि दादी-नानी के अभाव में उन्होंने अपनी बेटी के लिए एक डायरी तैयार की है। उसमें वह अपने बचपन में सुने किस्से तो लिखती ही हैं, कुछ समयानुकूल बाल कहानियाँ उन्होंने खुद तैयार की है, जिन्हें वह समय-समय पर अपनी बेटी को सुनाती हैं। धीरज, मदद, दयालुता, प्यार, एकता, हास्य बोध आदि भावनाओं को उभारने वाली कहानियाँ उन्होंने तैयार की हैं। उनकी बच्ची को टीवी देखने पर रोक-टोक नहीं है। जो कहानी मम्मी या पापा सुनाते हैं वह तो बच्ची के लिए अतिरिक्त है और बहुत मजेदार है। इसके कई फायदे हैं। कहानी सुनते वक्त वह पापा या मम्मी से सट कर बैठती है। उसे मम्मी के साथ-साथ एक्ंिटग करने को भी मिलता है। जैसे तरह-तरह की आवाज बनाना, आँखें गोल-गोल करना, हाथ की उँगलियाँ नचाना, भालू या शेर की आवाज निकालना वगैरह। टीवी में यह जिंदा मजा कहाँ? वहाँ तो यह कल्पना करने की भी जगह नहीं कि हम महल काँच का बनाएँ कि पत्थर का। किले की राजकुमारी किसके जैसी दिखती होगी वगैरह। इस गुड़िया की मम्मी का तो साफ कहना है कि हम जो किस्से-कहानी सुनाते हैं, वे बच्चों के लिए नैतिक वसीयत हैं। भले वह किस्सा वाचिक परंपरा के जरिए लोक-जीवन से आया हो, पंचतंत्र, हितोपदेश, ईसप की कहानियों से या स्वयं गढ़ा गया हो। आमने-सामने कहे जाने वाले किस्से बच्चों में जीवन के प्रति गहरी दिलचस्पी जगाते हैं, उनका मनोरंजन भी करते हैं। किस्सागोई का अनुपम संसार न सिर्फ बच्चों को अपनी मोहकता में बाँधे रखता है, उन्हें अधिक कल्पनाशील व अधिक संवेदनशील इंसान भी बनाता है। वो कहा जाता है न कहतेे, सुनते, हुँकारा भरते बच्चे ज्ञान और नैतिकता दोनों ही ग्रहण कर लेते हैं।
निर्मला भुराड़िया
शुक्रवार, 6 जनवरी 2012
धूप का आशीर्वाद

सुहानी धूप के दिनों में एक पुराने मोहल्ले की एक पुरानी दादी माँ याद आती हैं। यह धूप घड़ी पढ़ने वाली दादी माँ थीं। धूप सामने वाले खंभे पर कहाँ चढ़ी है, दीवार पर कहाँ तक पहुँची है इससे वे समय बता दिया करती थीं, हालाँकि मोटे तौर पर ही। दादी माँ धूप को बहुत प्यार करती थीं। सर्दियों में गुनगुनी धूप का मजा लेने के लिए, अपनी छोटी सी चटाई लेकर वे, पास के सार्वजनिक भवन के आँगन में पहुँच जातीं और अपनी चटाई बिछा कर बैठ जातीं। जैसे-जैसे धूप का टुकड़ा जगह बदलता, वे भी अपनी चटाई खिसकाती जातीं और नए टुकड़े का आनंद लेतीं। पुराने घरों में आँगन की धूप बहुत सी महिलाओं की सखी-सहेली रही है। यह धूप उनकी हड्डियों को ताकत देती थी, शरीर को ऊर्जा और मन को खुशी। आज की स्त्रियों और किशोरियों को धूप का सेवन करने के वैसे मौके नहीं मिल पाते हैं। मगर सर्दियों की धूप लेना उनके लिए भी अच्छा है। अब तो इस बात की ताकीद करने के लिए कई अनुसंधान भी आ गए हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि धूप मूड एलिवेटर है। बंद जगहें और बुझा-बुझा मौसम आपको उदास करता है। इसे सीजनल इफेक्ट डिसऑर्डर कहा जाता है। मगर उजली धूप में निकलने से मूड अच्छा हो जाता है! इस प्रकाश और ऊष्मा से मस्तिष्क में सिरेटॉनिन नामक हारमोन का स्तर बढ़ जाता है, जो कि खुशी का हारमोन है। अत: सर्दियों की गुनगुनी धूप अक्सर अवसादरोधी का भी काम करती है। धूप से विटामिन डी भी प्राप्त होता है जो कि शरीर में कैल्शियम के अवशोषण के लिए आवश्यक है। विटामिन डी से हड्डियों को मजबूती मिलती है। ऑस्टिेयोपोरोसिस का खतरा कम होता है। गुनगुनी धूप में बैठने से शरीर का सिकाव भी हो जाता है, इससे सर्दियों में होने वाले जोड़ों के दर्द, जकड़न में आराम मिलता है। किशोरियों का बढ़ता शरीर हो, मध्यवय स्त्री के मेनुपॉज का वक्त या बुढ़ापे में गलती हड्डियाँ हर उम्र में धूप सेवन के अपने फायदे हैं। हाँ, गर्मी की कड़कड़ाती धूप जो माइग्रेनकारक हो, प्यास, बेहोशी, लू लगने आदि का कारण बन जाए उसे तो टाला जाना चाहिए। सर्दी में भी पराबैंगनी किरणों से आँखों और चेहरे की त्वचा की रक्षा करना भी आवश्यक है। इसके उपाय किए जाने के बाद, शरीर पर सर्दी की धूप ली जाए तो यह ऊर्जा, खुशी, विटामिन डी सबकुछ देगी। आखिर हम सबको धूप का आशीर्वाद तो चाहिए ही।
दड़बों जैसे ऑफिस, बहुमंजिला भवनों के आंगन-बगीचा-दालान रहित घरों में घुटन महसूस करते लोगों और कम्प्यूटर, टीवी के घरघुस्सू मनोरंजन से ऊबे लोगों में बाग-बगीचों की सै, टिफिन पार्टी और पिकनिक का चलन अब लौट रहा है। इस बतबस को नए रूप में चाहें तो सर्दियों की दोपहर में सनशाइन पार्टी की जा सकती है जिसके ड्रेस कोड में बड़ी रिम वाला गोल हैट और गॉगल्स शामिल किए जा सकते हैं, बाकी पहनावा चाहे अनौपचारिक हो।
निर्मला भुराड़िया

