दुनिया में जब लोकतंत्रों का आगमन नहीं हुआ था तब राजाओं और धर्मगुरुओं का आज्ञातंत्र चलता था। इनकी आज्ञा ही कानून होती थी, भले फिर वह सही हो या गलत। उनसे असहमति या उनका विरोध करने का तो सवाल ही नहीं था। और तर्क? उसके लिए तो जगह ही नहीं थी। राजाज्ञा से तथाकथित अपराधी को जिंदा जला देना, चोरी करने का शुबहा होने पर हाथ काट देना, सिर धड़ से अलग कर देना आदि बर्बर सजाएँ देना आम बात थी। धार्मिक कट्टरताओं के चलते सही बात कहने वाले को जहर का प्याला पीना होता था। धर्मगुरुओं के खिलाफ जाकर पृथ्वी गोल है चपटी नहीं कहने वाले का भी यही हश्र हुआ। उन्हीं बर्बर युगों में भारत में सती प्रथा भी थी। मगर उस युग में धर्मांधता, कट्टरपन, तानाशाहियों, बंद समाज के चलते भी राजा राममोहन राय जैसे लोगों ने सती प्रथा का विरोध किया। असके लिए उनके असीम साहस की प्रशंसा की जाना चाहिए। क्योंकि हममें से अधिकांश तो इक्कीसवीं सदी के अपेक्षाकृत शिक्षित, स्वतंत्र समाज में भी कुप्रथाओं का विरोध करने से डरते हैं। धार्मिक कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाने में घबराते हैं। यह तो उन लोगों की बात हुई जो तर्कों को समझते हैं फिर भी आवाज नहीं उठाते, मगर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो स्वयं ही अंधश्रद्धा से ग्रस्त हैं। यह भय उन्हें कुप्रथाओं संबंधी किसी भी विवेचना से रोकता है कि कहीं यह धर्म की आलोचना तो नहीं होगी! ऐसा सोचना धार्मिक प्रवृत्ति नहीं पापबोध है, क्योंकि कुप्रथाओं की ओर इंगित करना आलोचना नहीं विवेचना है। और धर्म हो या दुनिया की कोई भी चीज वह समय-सपेक्ष है। नए समय के सन्दर्भों में पुरानी चीजें भी पुनर्व्याख्या चाहती है। जब पुरानी चीजें आडम्बर, पाखंड और कुप्रथाओं का रूप ले चुकी हैं तो उन्हें बदल डालने में या नए सिरे से समझने में कोई आपत्ती नहीं है।
इसी सन्दर्भ में कुछ समय पहले घटी एक घटना की ओर ध्यान जाता है। रिद्धिश्री नामक जैन साध्वी बड़े नाटकीय तरीके से गायब हुईं। समाज ने इस घटना को धर्म के लिए कलंक माना। रिद्धिश्री उर्फ समता के सन्दर्भ में अपमानजनक शब्दों में बातें की जाने लगीं। शब्दावली यूँ बदली किवे रिद्धिश्री से सीधे आरोपी हो गईं। ठीक है एक पूज्य व्यक्ति का यह आचरण समाज की नजर में कलंक हो सकता है। लेकिन क्या किसी ने सोचा कि एक युवा स्त्री को प्रेमी के साथ घर बसा लेने जैसी सामान्य इच्छा के लिए ऐसा नाटक क्यों करना पड़ा? उसका अपराध यह था कि वह सांसारिक जीवन में लौटना चाहती थी और उसे अनुमति नहीं मिली, क्योंकि यह धर्मसम्मत नहीं था। मगर जब एक चौदह वर्ष की अवयस्क बालिका को दीक्षा दे दी गई थी, तो क्या वह कदम 'मानवधर्म सम्मत' था? अब वह वयस्क होने के पश्चात, अपनी खुद की समझ विकसित होने के पश्चात स्वनिर्णय से स्वइच्छा का जीवन जीना चाहती है, तो वापसी के द्वार पर लौह कपाट बंद हैं। यह तो कैद हुई धर्म कहाँ हुआ! और जो नाटक हुआ वह धर्म की मर्यादा तोड़ने का परिणाम नहीं बाल दीक्षा जैसी कुप्रथा का परिणाम माना जाना चाहिए। कहते हैं मोह के बाद मोहभंग आता है फिर आता है वीतराग। तब इंसान चाहे तो स्वेच्छा से किसी भी प्रकार की दीक्षा ले सकता है। अपने जीवन के साथ कोई भी प्रयोग कर सकता है। (हालाँकि प्रयोग सफल न होने पर पीछे लौटने के दरवाजे तो उसके लिए भी खुले होने चाहिए) खैर! बात है बच्चों की।
जैन धर्म में दीक्षा के बाद का जीवन बेहद कठिन है। कई बार बच्चे यह समझे बगैर दीक्षा ले लेते हैं। 1987 में इंदौर में एक पूर्व जैन साध्वी इंदुप्रभा अपना साध्वी जीवन छोड़कर ग्राम दूधिया के श्री राधेश्याम के साथ चली गई थी। इंदुप्रभा ने उस वक्त जो बयान दिया था वह आज भी गौर करने लायक है। उन्होंने कहा था, "मैं दुल्हन की तरह सजने की लालसा में साध्वी बनी थी। तब दीक्षा की कठोरता आदि के बारे में कुछ मालूम नहीं था। न ही दीक्षा की गूढ़ता के बारे में समझती थी। दुल्हन की तरह सजकर शोभायात्रा निकाले जाने की उमंग में मैं साध्वी बन गई।" उल्लेखनीय है कि दीक्षा पूर्व व्यक्ति को सजाया जाता है, गाजे-बाजे से, धूम-धाम से शोभायात्रा निकाली जाती है। बड़े-बड़े लोग आकर चरण वंदना करते हैं। हालॉंकि यह वीतराग के पहले का आखिरी मोह होता है इसलिए ऐसा किया जाता है। मगर बच्चों को सिर्फ महिमामंडन दिखता है इसके आगे के बारे में वह जानता भी है तो समझता नहीं।बात सिर्फ इतनी भर भी नहीं है कि बच्चे या बच्चियॉं भव्यता से मोहित होकर दीक्षा ले लेते हैं। बाल दीक्षा थोपा-थोपी और "धार्मिकों (?) की राजनीति" के कुत्सित घेरे में भी चली गई है। जिस पर मुँह खोलने से भी लोग डरते हैं। पीछे वही डर "धर्म" (?) के खिलाफ कैसे बोलें। या फिर है कि जिस पर धर्म का ठप्पा लगा है वह सब अच्छा ही है। आँख मूँदकर उसे मान लो। लोगों की ऐसी ही धर्मंधता और भय के चलते आचार्य लोग राजनीति करने लगे हैं। 1998 में आचार्यों में से ही एक यति श्री विनयसागरजी महाराज ने इस ओर इंगित किया था। उन्होंने कहा था, "श्वेताम्बर जैन समाज के विभिन्न गच्छों के आचार्यों में अपनी शिष्य संख्या बढ़ाने के लिए चलने वाली होड़ में बाल दीक्षाएँ बढ़ रही हैं।" यानी धर्मगुरुओं में भी अहंकार और गलाकाट प्रतिस्पर्धा है कि किसने कितने शिष्य बनाए। इस प्रतिस्पर्धा की बलि चढ़ते हैं मासूम। क्योंकि उनके दिमाग में बाद डाल देना और उन्हें राजी करना अपेक्षाकृत अधिक आसान है।
बाल दीक्षा के और भी कारण हैं, जो कि सचमुच दिल दहला देने वाले हैं। ऐसे उदाहरण भी हुए हैं जहॉं दो बेटियों वाले गरीब पिता ने सोचा एक को तो दीक्षा दिला दें तो मिले दहेज से मुक्ति- महिमामंडन का महिमामंडन।
और ये कोरे इल्जाम नहीं हैं। जीते-जागते प्रकरण हैं। बस यही कि जब कोई सबूत सामने लाए जाने की कोशिश हो तो कुछ धार्मिक आचार्य और तथाकथित आस्था पर कोई सवाल न करने के पक्षधर अंधश्रद्धालु बिगड़ जाते हैं। मीडिया तक में इन मामलों की विवेचना को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप माना जाता है। कुप्रथाओं पर चोट को धर्म की निंदा समझकर लोग कानों परहाथ रख लेते हैं या बोलने वाले का मुँह तोड़ देने की धमकी देते हैं। नतीजा जबरिया दीक्षाएँ भी हो जाती हैं पर जनता में और मीडिया में धुआँधार मुद्दा नहीं बनता। न सिर्फ यह कि स्वस्थ बहस नहीं हो पाती, हम अत्याचार देखते रह जाते हैं। 1994 की ही एक खबर है कि राजस्थान में एक नाबालिग लड़की को उसकी मॉं की इच्छा के खिलाफ जबरन साध्वी बनाए जाने पर लड़की की मॉं ने बीस हजार लोगों के समक्ष मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा ली थी तथा प्रशासनिक अधिकारी मूकदर्शक बने रहे। उस वक्त राज्यसभा में शून्यकाल में जनता दल की कमला सिन्हा ने यह मामला उठाया था। जाहिर है बात आगे बढ़ी नहीं। क्योंकि राजनेता धर्म-संप्रदाओं, जातियों के थोकबंद वोट बैंकों से डरते हैं और मीडिया विज्ञापनदाताओं से!
और कुप्रथा की चपेट में आए व्यक्ति को न कोई रास्ता मिलता है न मददगार, क्योंकि बागड़ें खुद खेत का रही हैं। फिर रास्ता क्या? देखिए- 1994 में ही नासिक में जैन साध्वी श्रीयशजी ने आत्महत्या कर ली थी। शव के पास पत्र पड़ा था जिसमें लिखा था, "इस जिंदगी से तो मौत भली।"
ऐसे ही वाकयों के चलते कुछ लोग बाल दीक्षा को कुप्रथा मानकर इसके खिलाफ आगे भी आए हैं। उन लोगों के जिक्र से शायद आमजन को इस बारे में कुछ हौसला मिले या अपनी राय प्रकट करने की प्रेरणा मिले। तकरीबन पॉंच-छः साल पहले उस समय आत्मवल्लभ जैन श्वेतांबर संघ के अध्यक्ष श्री देवेन यशवंत ने बेबाकी है कहा था, "गरीबी और आचार्यों की गुटबाजी दो ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से जैन धर्म में दीक्षा के लिए वैराग्यभाव परिपक्वता की शर्त का पालन नहीं किया जा रहा।" कुछ लोगों ने तो बाल दीक्षा की प्रवृत्ति के खिलाफ न्यायालयों में याचिकाएँ भी दायर कीं।
1987 में दिल्ली के एक वकील ने जैन समाज के अंतर्गत बाल दीक्षा रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार व मध्यप्रदेश सरकार सहित अनेक राज्य सरकारों के खिलाफ याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था, "नाबालिग बच्चों को दीक्षा दिलाना न केवल संविधान व राष्ट्रीय शिशु नीति के खिलाफ है बल्कि इससे मानव अधिकार घोषणा पत्र का भी हनन होता है।" याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया था कि लड़कों से ज्यादा नाबालिग लड़कियों को इसलिए दीक्षा दिलाई जाती है कि उनके माता-पिता शादी के लिए दहेज की मॉंग पूरी करने में असमर्थ होते हैं। 1998 में भी राजस्थान उच्च न्यायालय में राकेश शर्मा नामक एक व्यक्ति ने एक याचिका दायर की थी। जैन समाज ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था - "दीक्षा शास्त्रोक्त है।" याचिकाकर्ता ने अंततः अपनी याचिका वापस ले ली थी। लेकिन 2004 में नौ वर्षीय प्रियाल बगरीचा उर्फ प्रीतवर्षा श्रीजी के मामले में वकील रवीन्द्र पारीख ने एक अनूठी पहल की थी। उन्होंने अपनी याचिका में बच्ची का अभिभावक बनने की गुजारिश की। उनका कहना था, "बाल दीक्षा बच्चों से संपत्ति का अधिकार छीन लेती है इसलिए प्रियाल को सुरक्षा देने के लिए मैं एक कल्याण ट्रस्ट बनाना चाहता हूँ।"
खैर संपत्ति का अधिकार तो क्या फिलहाल तो इन बच्चों का सामान्य मानव अधिकार ही सामने हैं। एक तो यह कि उस जीवन को आजमा लेने के बाद वापस लौटने का अधिकार नहीं। केशलोचन जैसी धार्मिक पद्धतियॉं हैं, जिसमें सारे बाल खींचकर तोड़े जाते हैं, बच्चे को लहूलुहान करके मुंडाई की जाती है। ऐसी और भी कई पद्धतियॉं उस जीवन में शामिल हैं जिनका विस्तार से विवरण यहॉं संभव नहीं है। पर यह तय है कि ये सब झेलने वाला नासमझ, अवयस्क बच्चा हो तो ये बातें क्रूरता की श्रेणी में आ जाती हैं। अब वह समय आ गया है जब हमें "भारतीय समाज" से जुड़ी ऐसी प्रथाओं की पुनर्विवेचना करना चाहिए।
- निर्मला भुराड़िया
बुधवार, 28 जुलाई 2010
सोमवार, 26 जुलाई 2010
असली मुद्दे मीडिया से 'गोल' हैं
मीडिया
औरत, मीडिया और सै....क्स....! क्या कहें? औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया... बाजार ने उन्हें फिर औरत दे दी। भई दुनिया गोल है। वैसे भी बाजार में औरत का अर्थ गोल... कहिए सिर्फ गोलाइयाँ और गोलाइयाँ हैं! वह सिर्फ भूगोल है इस परिदृश्य से उसकी आत्मा 'गोल' है, कहें नदारद है। और औरत के इस भूगोल का जबरदस्त महत्व ही इसीलिए है कि मीडिया बाजार है कोरा बाजार। मीडिया विज्ञापनों से ही चलता है, दर्शकों और पाठक से नहीं! तभी तो आज जो भाईलोग (!) एक रुपए में अखबार बेचने के तत्पर हैं वे कल मुफ्त में भी बाँट सकते हैं। मीडिया का काम तो विज्ञापनों से ही चलेगा। और औरत और सैक्स के बगैर विज्ञापन बगैर नमक की खिचड़ी है, यानी प्रकारांतर से मीडिया भी। तभी तो विज्ञापन शेविंग क्रीम का हो तो भी स्त्री जांघिया पहनकर पुरुष के साथ पधारेगी। उसे शेविंग करने में सहायता करेगी और कल को 'शबाना आंटी' के बचाए दो बकेट पानी से नहाने की बारी आई तो भी कोई अभी-अभी सत्रह की हुई 'मिसी' उस पानी को टब में उड़ेलकर सबके सामने मल-मल कर नहाएगी, मीडिया की दुकान चलाएगी। खैर यह तो बात हुई श्लील-अश्लील की। और सिर्फ सैक्स ही अश्लील नहीं और भी बहुत कुछ हो रहा है मीडिया में िजसे 'वल्गर' कहा जा सकता है। इस पर हम बाद में आएँगे, क्योंकि विषय है औरत, मीडिया और सैक्स। पहले इसी पर बात की जाए।
लाइफ साइंस की िवद्यार्थी रही हूँ, इसीलिए सैक्स शब्द का वही अर्थ ग्रहण नहीं करती जो औरत-मर्द से संबंधित या उत्तेजना से संबंधित है। विज्ञान के विद्यार्थियों को कई बार इसे निर्विकार तरीके से 'एनिमल फिजियोलॉजी' के एक िहस्से की तरह पढ़ना होता है। मगर मनुष्य एक ऐसा एनिमल (प्राणी) है जो प्रकृति की साधारण बातों में भी मनचाही दुष्टताएँ ढूंढ़ लेता है। मनुष्य की इसी दुष्टता पर उंगली रखने की नीयत से एक और विषय का जिक्र कर रही हूँ, जो दुर्भाग्य से आपके सुझाए विषय औरत, मीडिया और सैक्स के दायरे में ही आता है। यह विषय है 'सैक्स डिटरमिनेशन' जी हाँ, लिंग पता करके बेटियों को कोख में मार देने की 'वैज्ञानिक प्रथा' हमरे 'सांस्कृतिक देश' हिन्दुस्तान में इन दिनों जोरों पर है। हालांकि इसे रोकने के िलए कानून बने हैं, मगर िचकित्सकों और पालकों की साँठ-गाँठ से सब संभव है। जेंडर बताना कानूनन मना है तो परम आध्यात्मिक देवी पूजक माता-पिताओं को अपने पेट की देवी को नष्ट करने के लिए धार्मिक शब्दावली में 'जय श्रीकृष्ण' या 'जय माता दी' टाइप के क्लू मिल जाते हैं। ताकि अजन्मा संतान माता दी हो तो घर का पूजा-पाठ निपटाने के बाद पेट में ही 'उनकी' हत्या का इंतजाम कर सकें। अब किस पत्रकार का पेट इतना दु:ख रहा है समाज सेवा के लिए कि 'जेंडर सिलेक्शन' जैसे मखमली नामों वाले विज्ञापनों को ठुकरा कर, अखबार मालिकों की अवज्ञा करके, इस साँठ-गाँठ के सबूत जुटाए और इस दुष्ट स्टोरी को सामने लाए? पत्रकारिता का कोई भी 'बड़ा भाई' उसे समझा देगा 'भैया पत्रकारिता कोई मिशन नहीं है, इस रास्ते पर आगे बढ़ना है तो विधानसभा जाओ, मुख्यमंत्री का इंटरव्यू अपनी टेप में भर लाओ। नहीं तो उनके साथ हेलीकॉप्टर में बैठकर थोड़ी सैर कर आओ, इंटरव्यू वगैरा तो उनका सचिव ही दे देगा।' तो हंस संपादकजी, आपके दिए विषय के दायरे में इस तरह से 'सैक्स' डिटरमिनेशन भी आ गया, क्योंकि तकनीकी तौर पर इस विषय में 'सैक्स' शब्द का इस्तेमाल है।
वह क्या है कि पहले पत्रकारिता को दो 'बीट्स' में ही बाँटा जाता था, हार्ड इशूज और सॉफ्ट इशूज। अब इसकी एक और केटेगरी हो गई हैः पॉजिटिव इशूज और िनगेटिव इशूज। पॉजिटिव इशूज यानी वह कंटेट जो आपके प्रजेंटेशन को आकर्षक बनाएँ, रंग-बिरंगा बनाएँ, और निगेटिव इशू यानी जिसमें दुख, उदासी, गरीबी और बुढ़ापा हो। जाहिर है जवान स्त्री की देह, रैंप रिपोर्टिंग, फिल्मी चटखारे, मदमस्त जवानी, अधनंगे आदमी और औरत, सैक्स मुद्राएँ, रिच एंड फेमस, बोल्ड एवं ब्यूटीफुल आदि पॉजिटिव इशूज हैं। जबकि दहेज, जेंडर सिलेक्शन, मध्यमवर्ग की समस्याएँ, मध्यवर्गीय चौखटे ये सब निगेटिव इशूज हैं। अत: इस परिदृश्य में औरत और सैक्स, रेवेन्यू जनरेट करने (आज कमाई) के लिए कितने काम की चीज है!
वैसे मीडिया के ताजा परिदृश्य में हाई न्यूज, सॉफ्ट न्यूज, पॉजिटिव, निगेटिव के अलावा एक और महत्वपूर्ण चीज है, वह है 'सनसनी'। रिपोर्ट सेनसेशनल हो तो पॉजिटिवि निगेटिव का भेद नहीं िकया जाता, पर उसमें दहेज, भ्रष्टाचार, पोल खोल के साथ ही आपको मर्डर, बलात्कार भी जोड़ना पड़ेगा। और ऑफ कोर्स कास्टिंग काऊच भी! और 'काऊच' हो और औरत और सैक्स न हो, यह कैसे हो सकता है? सो आपके िदया विषय इस पॉईंट पर भी सार्थक हुआ।
यदि आप अखबारों में स्त्री छवि की बात कर रहे हैं, खासतौर से कम कपड़ों में स्त्री छवि की तो अब इस विषय को उठाने या इसके पक्ष या विपक्ष में कुछ भी कहने के बजाय इस िवषय को उसके हाल पर ही छोड़ देना चाहिए। न यह भला है, न बुरा है, क्योंकि मीडिया में कम कपड़ों में स्त्री को देखना लोगों की आदत में इस कदर शुमार हो गया है कि शायद अधिकांश लोगों का इस पर ध्यान ही नहीं जाता। वैसे भी मीडिया में औरत देह को समय-असमय उघाड़ने के अलावा भी इतना कुछ अश्लील हो रहा है कि पहले उसे गिनना होगा। भरी दोपहरी में दीप प्रज्ज्वलन कर उद्घाटन करके तर्कहीन लोग, एक पौधे को रोपते बारह-बारह हाथ और कैमरे की तरफ देखती उनकी विज्ञप्ति-भिक्षुक आँखें, एक दिन में चार जगह फीता काटते रेडीमेड अध्यक्ष, पार्टी के पैसे से अपने और अपने आकाओं की खींसे निपोरते हुए तस्वीरें छपवाने वाले छुटभैये नेता। खुद का इंटरव्यू खुद लिखकर भेजने वाले और उसे छापने की अनुनय करने वाले लेखक.... कितना कुछ है जो बेहत अश्लील है। औरत की देह ही अश्लील नहीं है।
दरअसल नॉन-इशूज ही इशूज हैं इन दिनों। नेता लोग नॉन इशूज में देश का ध्यान बरगलाए हुए हैं और मीडिया उनके छींकने, खाँसने से लेकर गाड़ी में रवाना होने से पहले एसी चालू करने तक का 'लाइव' परोसकर परोक्ष रूप से उनकी मदद कर रहा है। हाँ कभी-कभी गुड़िया और उसके दो पति होने का धर्म संकट भी उठा देता है मीडिया मगर शर्त यह कि स्टोरी एक्जक्लूजिव हो। नहीं तो द सेकंड सैक्स यहाँ भी उपेक्षित है। (माइंड कीजिए टेक्नीकली सैक्स शब्द यहाँ आ रहा है) क्योंकि यदि स्त्री वाले पक्ष में सनसनी कम हो तो बलात्कारी की फाँसी की लाईव रिपोर्ट मीडिया के लिए ज्यादा काम की होगी। रेपिस्टजी बाकायदा मीडिया के लिए ज्यादा काम की होगी। रेपिस्टजी बाकायदा मीडिया के नायक होंगे जिनकी मरने के पहले अंतिम इच्छा पूछी जाएगी।
औरत, मीडिया और सैक्स के दायरे में यदि मीडिया में काम करने वाली औरतों की परेशानियों, खासकर छेड़छाड़, यौन-प्रताड़ना झेलने संबंधी परेशानियों से मतलब है तो यह कहना पड़ेगा कि मीडिया को 'सेपरेट आऊट' नहीं किया जा सकता। यह किसी भी फील्ड में हो सकता है। इससे बचने के लिए औरत को कोई लौह कवच या चेस्टिटी बेल्ट नहीं चाहिए। उसे चाहिए एम्पॉवरमेंट। मीडिया या कोई भी जगह जहाँ पर औरत अपनी जगह बना लेती है, जहाँ उसकी अपनी ताकत होती है, अपना पॉवर होता है वहाँ मर्दुए दुस्साहस नहीं करते। तभी तो टिड्डी दल की तरह छा गई हैं औरतें हर क्षेत्र में। हाँ, जब तक वे सत्ता प्राप्त नहीं करतीं तब तक उनका सफर कठिन होता है। मीडिया क्या, किसी भी क्षेत्र में।
- निर्मला भुराड़िया
औरत, मीडिया और सै....क्स....! क्या कहें? औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया... बाजार ने उन्हें फिर औरत दे दी। भई दुनिया गोल है। वैसे भी बाजार में औरत का अर्थ गोल... कहिए सिर्फ गोलाइयाँ और गोलाइयाँ हैं! वह सिर्फ भूगोल है इस परिदृश्य से उसकी आत्मा 'गोल' है, कहें नदारद है। और औरत के इस भूगोल का जबरदस्त महत्व ही इसीलिए है कि मीडिया बाजार है कोरा बाजार। मीडिया विज्ञापनों से ही चलता है, दर्शकों और पाठक से नहीं! तभी तो आज जो भाईलोग (!) एक रुपए में अखबार बेचने के तत्पर हैं वे कल मुफ्त में भी बाँट सकते हैं। मीडिया का काम तो विज्ञापनों से ही चलेगा। और औरत और सैक्स के बगैर विज्ञापन बगैर नमक की खिचड़ी है, यानी प्रकारांतर से मीडिया भी। तभी तो विज्ञापन शेविंग क्रीम का हो तो भी स्त्री जांघिया पहनकर पुरुष के साथ पधारेगी। उसे शेविंग करने में सहायता करेगी और कल को 'शबाना आंटी' के बचाए दो बकेट पानी से नहाने की बारी आई तो भी कोई अभी-अभी सत्रह की हुई 'मिसी' उस पानी को टब में उड़ेलकर सबके सामने मल-मल कर नहाएगी, मीडिया की दुकान चलाएगी। खैर यह तो बात हुई श्लील-अश्लील की। और सिर्फ सैक्स ही अश्लील नहीं और भी बहुत कुछ हो रहा है मीडिया में िजसे 'वल्गर' कहा जा सकता है। इस पर हम बाद में आएँगे, क्योंकि विषय है औरत, मीडिया और सैक्स। पहले इसी पर बात की जाए।
लाइफ साइंस की िवद्यार्थी रही हूँ, इसीलिए सैक्स शब्द का वही अर्थ ग्रहण नहीं करती जो औरत-मर्द से संबंधित या उत्तेजना से संबंधित है। विज्ञान के विद्यार्थियों को कई बार इसे निर्विकार तरीके से 'एनिमल फिजियोलॉजी' के एक िहस्से की तरह पढ़ना होता है। मगर मनुष्य एक ऐसा एनिमल (प्राणी) है जो प्रकृति की साधारण बातों में भी मनचाही दुष्टताएँ ढूंढ़ लेता है। मनुष्य की इसी दुष्टता पर उंगली रखने की नीयत से एक और विषय का जिक्र कर रही हूँ, जो दुर्भाग्य से आपके सुझाए विषय औरत, मीडिया और सैक्स के दायरे में ही आता है। यह विषय है 'सैक्स डिटरमिनेशन' जी हाँ, लिंग पता करके बेटियों को कोख में मार देने की 'वैज्ञानिक प्रथा' हमरे 'सांस्कृतिक देश' हिन्दुस्तान में इन दिनों जोरों पर है। हालांकि इसे रोकने के िलए कानून बने हैं, मगर िचकित्सकों और पालकों की साँठ-गाँठ से सब संभव है। जेंडर बताना कानूनन मना है तो परम आध्यात्मिक देवी पूजक माता-पिताओं को अपने पेट की देवी को नष्ट करने के लिए धार्मिक शब्दावली में 'जय श्रीकृष्ण' या 'जय माता दी' टाइप के क्लू मिल जाते हैं। ताकि अजन्मा संतान माता दी हो तो घर का पूजा-पाठ निपटाने के बाद पेट में ही 'उनकी' हत्या का इंतजाम कर सकें। अब किस पत्रकार का पेट इतना दु:ख रहा है समाज सेवा के लिए कि 'जेंडर सिलेक्शन' जैसे मखमली नामों वाले विज्ञापनों को ठुकरा कर, अखबार मालिकों की अवज्ञा करके, इस साँठ-गाँठ के सबूत जुटाए और इस दुष्ट स्टोरी को सामने लाए? पत्रकारिता का कोई भी 'बड़ा भाई' उसे समझा देगा 'भैया पत्रकारिता कोई मिशन नहीं है, इस रास्ते पर आगे बढ़ना है तो विधानसभा जाओ, मुख्यमंत्री का इंटरव्यू अपनी टेप में भर लाओ। नहीं तो उनके साथ हेलीकॉप्टर में बैठकर थोड़ी सैर कर आओ, इंटरव्यू वगैरा तो उनका सचिव ही दे देगा।' तो हंस संपादकजी, आपके दिए विषय के दायरे में इस तरह से 'सैक्स' डिटरमिनेशन भी आ गया, क्योंकि तकनीकी तौर पर इस विषय में 'सैक्स' शब्द का इस्तेमाल है।
वह क्या है कि पहले पत्रकारिता को दो 'बीट्स' में ही बाँटा जाता था, हार्ड इशूज और सॉफ्ट इशूज। अब इसकी एक और केटेगरी हो गई हैः पॉजिटिव इशूज और िनगेटिव इशूज। पॉजिटिव इशूज यानी वह कंटेट जो आपके प्रजेंटेशन को आकर्षक बनाएँ, रंग-बिरंगा बनाएँ, और निगेटिव इशू यानी जिसमें दुख, उदासी, गरीबी और बुढ़ापा हो। जाहिर है जवान स्त्री की देह, रैंप रिपोर्टिंग, फिल्मी चटखारे, मदमस्त जवानी, अधनंगे आदमी और औरत, सैक्स मुद्राएँ, रिच एंड फेमस, बोल्ड एवं ब्यूटीफुल आदि पॉजिटिव इशूज हैं। जबकि दहेज, जेंडर सिलेक्शन, मध्यमवर्ग की समस्याएँ, मध्यवर्गीय चौखटे ये सब निगेटिव इशूज हैं। अत: इस परिदृश्य में औरत और सैक्स, रेवेन्यू जनरेट करने (आज कमाई) के लिए कितने काम की चीज है!
वैसे मीडिया के ताजा परिदृश्य में हाई न्यूज, सॉफ्ट न्यूज, पॉजिटिव, निगेटिव के अलावा एक और महत्वपूर्ण चीज है, वह है 'सनसनी'। रिपोर्ट सेनसेशनल हो तो पॉजिटिवि निगेटिव का भेद नहीं िकया जाता, पर उसमें दहेज, भ्रष्टाचार, पोल खोल के साथ ही आपको मर्डर, बलात्कार भी जोड़ना पड़ेगा। और ऑफ कोर्स कास्टिंग काऊच भी! और 'काऊच' हो और औरत और सैक्स न हो, यह कैसे हो सकता है? सो आपके िदया विषय इस पॉईंट पर भी सार्थक हुआ।
यदि आप अखबारों में स्त्री छवि की बात कर रहे हैं, खासतौर से कम कपड़ों में स्त्री छवि की तो अब इस विषय को उठाने या इसके पक्ष या विपक्ष में कुछ भी कहने के बजाय इस िवषय को उसके हाल पर ही छोड़ देना चाहिए। न यह भला है, न बुरा है, क्योंकि मीडिया में कम कपड़ों में स्त्री को देखना लोगों की आदत में इस कदर शुमार हो गया है कि शायद अधिकांश लोगों का इस पर ध्यान ही नहीं जाता। वैसे भी मीडिया में औरत देह को समय-असमय उघाड़ने के अलावा भी इतना कुछ अश्लील हो रहा है कि पहले उसे गिनना होगा। भरी दोपहरी में दीप प्रज्ज्वलन कर उद्घाटन करके तर्कहीन लोग, एक पौधे को रोपते बारह-बारह हाथ और कैमरे की तरफ देखती उनकी विज्ञप्ति-भिक्षुक आँखें, एक दिन में चार जगह फीता काटते रेडीमेड अध्यक्ष, पार्टी के पैसे से अपने और अपने आकाओं की खींसे निपोरते हुए तस्वीरें छपवाने वाले छुटभैये नेता। खुद का इंटरव्यू खुद लिखकर भेजने वाले और उसे छापने की अनुनय करने वाले लेखक.... कितना कुछ है जो बेहत अश्लील है। औरत की देह ही अश्लील नहीं है।
दरअसल नॉन-इशूज ही इशूज हैं इन दिनों। नेता लोग नॉन इशूज में देश का ध्यान बरगलाए हुए हैं और मीडिया उनके छींकने, खाँसने से लेकर गाड़ी में रवाना होने से पहले एसी चालू करने तक का 'लाइव' परोसकर परोक्ष रूप से उनकी मदद कर रहा है। हाँ कभी-कभी गुड़िया और उसके दो पति होने का धर्म संकट भी उठा देता है मीडिया मगर शर्त यह कि स्टोरी एक्जक्लूजिव हो। नहीं तो द सेकंड सैक्स यहाँ भी उपेक्षित है। (माइंड कीजिए टेक्नीकली सैक्स शब्द यहाँ आ रहा है) क्योंकि यदि स्त्री वाले पक्ष में सनसनी कम हो तो बलात्कारी की फाँसी की लाईव रिपोर्ट मीडिया के लिए ज्यादा काम की होगी। रेपिस्टजी बाकायदा मीडिया के लिए ज्यादा काम की होगी। रेपिस्टजी बाकायदा मीडिया के नायक होंगे जिनकी मरने के पहले अंतिम इच्छा पूछी जाएगी।
औरत, मीडिया और सैक्स के दायरे में यदि मीडिया में काम करने वाली औरतों की परेशानियों, खासकर छेड़छाड़, यौन-प्रताड़ना झेलने संबंधी परेशानियों से मतलब है तो यह कहना पड़ेगा कि मीडिया को 'सेपरेट आऊट' नहीं किया जा सकता। यह किसी भी फील्ड में हो सकता है। इससे बचने के लिए औरत को कोई लौह कवच या चेस्टिटी बेल्ट नहीं चाहिए। उसे चाहिए एम्पॉवरमेंट। मीडिया या कोई भी जगह जहाँ पर औरत अपनी जगह बना लेती है, जहाँ उसकी अपनी ताकत होती है, अपना पॉवर होता है वहाँ मर्दुए दुस्साहस नहीं करते। तभी तो टिड्डी दल की तरह छा गई हैं औरतें हर क्षेत्र में। हाँ, जब तक वे सत्ता प्राप्त नहीं करतीं तब तक उनका सफर कठिन होता है। मीडिया क्या, किसी भी क्षेत्र में।
- निर्मला भुराड़िया
गुरुवार, 22 जुलाई 2010
महंगाई का काम खोटा अब बटुवा पड़े छोटा!

अपनी बात
सन् १९७४ में एक फिल्म आई थी, रोटी, कपड़ा और मकान। फिल्म का शीर्षक ही आम व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी और उसकी कठिनाइयों से ताल्लुक रखता था। फिल्म प्रेमी आम जनता की नब्ज पर हाथ रखने के लिहाज से यह शीर्षक उस जमाने में उपयुक्त ही था। इस फिल्म में एक गाना भी था, जो महँगाई से त्रस्त आम आदमी की परेशानी को स्वर देता था। यह गाना था... "बाकी कुछ बचा तो महँगाई मार गई"। यानी व्यक्ति के पास बहुत सारे रोने थे, कोई कसर बाकी रहती थी तो वो महँगाई पूरी कर देती थी। यह उस जमाने का गाना है, जब दस पैसे का सिक्का अब भी चलन में था। यानी रुपए के दसवें टुकड़े में भी क्रयशक्ति थी। अधिकांश लोग पैदल, साइकल पर या ताँगे में चलते थे। यानी पेट्रोल-डीजल की जरूरत तो थी, पर उतनी आम जरूरत नहीं। घरों और ऑफिसों में एसी, कूलर भी इतने बहुतायत में नहीं थे। अतः बिजली का खर्च उतना नहीं था। फिर भी महँगाई का दंश आजादी के बाद २७ साल के हो चुके देश को चुभता था, मगर तकरीबन उसी दौर का एक गाना था, "समझो और समझाओ थोड़ी में मौज मनाओ, दाल-रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ," लेकिन अब जो महँगाई है उसमें तो दाल-रोटी ही महँगी हो चुकी है। आज की नायिका तो, "तेरी दो टकिया की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए" का ताना देने की बजाय खुद भी साथ में कमा रही है या यह बात समझ रही है, "सैंया तो खूबे कमात है, महँगाई डायन खाए जात है।"
इन दिनों महँगाई संबंधी यह गाना, "महँगाई डायन, खाए जात है", काफी चर्चित हो रहा है। आमिर खान प्रॉडक्शन की फिल्म "पीपली लाइव" का यह गीत मध्यप्रदेश के लेखक-शिक्षक, लोक गायक गयाप्रसाद प्रजापति ने लिखा है। इसे गाया भी बड़वाई गाँव की मंडली ने है। फिल्म का प्लॉट भी ग्राम केंद्रित है और इसमें आम किसान की परेशानी कटाक्ष के माध्यम से वर्णित की गई है। इस गाने के चर्चे फिल्म रिलीज होने के पहले ही शुरू हो गए हैं।
प्रचार माध्यम जहाँ इसके बारे में बात कर रहे हैं, वहीं सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर, ब्लॉग्स पर आम युवा अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर रहे हैं। चूँकि महँगाई इस वक्त अपने उच्चतम (आशा करें इससे ऊँचा नहीं) स्तर पर है, अतः इस गाने ने आम आक्रोश को स्वर दिया है। सुनते हैं भारतीय जनता पार्टी ने इस गाने के अधिकार माँगे हैं ताकि वह इसे अपना चुनावी गीत बनाकर सरकार को ताना दे सके, चूँकि केंद्र में अभी कांग्रेस की सरकार है। सच पूछा जाए तो जनता को इससे वास्ता नहीं रह गया है कि किसकी सरकार है। वह तो सिर्फ यह जानती है कि जमाने बदले, सरकारें बदलीं, फिल्म निर्माता बदले, गाने के अन्य बोल बदले, पर "महँगाई" का दंश कहाँ बदला। वह तो और विकराल हुआ। अब तो जनता यही चाहती है कोई भी आए- जाए, उसका नाम कोई भी, कोई भी झंडा, कोई भी ब्राण्ड हो बस वह मुद्रास्फीति को बस में करे। ताजा खबर है कि रुपए को भी अब डॉलर, पौंड, येन, यूरो की तरह प्रतीक चिन्ह मिल गया है। रुपए की अंतरराष्ट्रीय पहचान पर हम सभी भारतीयों को गर्व होगा, मगर साथ ही रुपए का अवमूल्यन भी न हो यह भी हर भारतीय चाहेगा। सखी के सैंया तो खूब कमात हैं, पर उतने में ठीक से दाल-रोटी भी न आत है- अभी तो यह आलम है।
- निर्मला भुराड़िया
सोमवार, 19 जुलाई 2010
ऊँची मूँछों वाला भैया!
अपनी बात
"मेरे भैया, मेरे चंदा, मेरे अनमोल रतन तेरे बदले मैं जमाने की कोई चीज न लूँ", इस गाने में भाई के प्रति बहन का प्यार है। "फूलों का तारों का सबका कहना है एक हजारों में मेरी बहना है" इस गाने में भाई अपनी भावनाएँ अपनी बहन के प्रति व्यक्त कर रहा है। सामान्य हिन्दुस्तानी परिवारों में भाई और बहन का रिश्ता अटूट होता है। यह मीठा भी होता है, खट्टा-मीठा भी होता है। वे लड़ते-झगड़ते भी हैं, एक भी हो जाते हैं। जब झगड़ा होता है तो बहन को लगता है मम्मी-पापा भाई का पक्ष लेते हैं और भाई को लगता है मम्मी-पापा बहन का पक्ष लेते हैं जबकि मम्मी-पापा के लिए दोनों ही आँखों के तारे होते हैं। एका होते ही भाई-बहन भी यह बात समझ जाते हैं। कुल जमा बात यही कि यह एक अनूठा रिश्ता है।
लेकिन उपरोक्त बात उन परिवारों पर लागू होती है जो सहज, सामान्य, आदर्श परिवार हैं। जिन परिवारों के मुखिया पर सामंतवाद हावी रहता है, जिन परिवारों की रक्त-मज्जा में रूढ़िवाद बहता है, ऐसे परिवारों में भाई और बहन को परिवार द्वारा मिलने वाले बर्ताव में भेदभाव किया जाता है। कुछ लोग यह भेदभाव खुलकर करते हैं, कुछ लोग बदलते जमाने के हक में दिखना चाहते हैं, मगर जमाने के साथ बदलना नहीं चाहते वे लोग सूक्ष्म तौर पर यह भेदभाव करते हैं। वे अपने लड़कों में निरंकुशता विकसित करते हैं और लड़की को नियंत्रण में रखते हैं। स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि भाई अपनी बहन का धौंसिया हो जाता है। वक्त आने पर भाई अपनी बहन को टाँग तोड़कर रख देने, फलाँ से मिली तो देख लेने, यहाँ न जाने, वहाँ न जाने जैसी धमकियाँ भी देना शुरू कर सकता है। मूँछ पूरी तरह उगती भी नहीं और वह उन पर ताव देते हुए दीदी का चौकीदार या छोटी बहन का हवलदार हो जाता है।
इन दिनों तथाकथित ऑनर किलिंग की खबरें जोरों पर हैं जिसे डिसऑनर किलिंग या हत्या कहना अधिक उपयुक्त होगा। बहन द्वारा अपनी पसंद से शादी कर लेने पर आहत अहम् भाइयों द्वारा बहन को जीजा सहित कत्ल कर देने की घटनाएँ इक्कीसवीं सदी के प्रजातांत्रिक भारत में जोरों पर हैं। बहन के ऐसे ही हत्यारे एक भाई के प्रति पिता, चाचा, ताऊ आदि ने "गर्व" व्यक्त किया है। जाति पंचायतों द्वारा ऐसे पिताओं, भाइयों, जाति पंचों, समाजजनों का समर्थन किया जा रहा है। देश के नेताओं के मुँह में मूँग भरे हैं (वोट भरे हैं) उनके द्वारा ऐसे जघन्य कांडों का जमकर विरोध नहीं किया जा रहा है। जनता का बहुत बड़ा प्रतिशत भी अपने स्वयं के भीतर रचे-बसे रूढ़िवाद के कारण ऐसे जघन्य कृत्यों का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि परंपराओं को तथाकथित रूप से विज्ञानसम्मत बताकर जनप्रवाह को अपने पक्ष में बहाने की कोशिश की जा रही है। मगर जनता को भी यह बात समझना चाहिए कि विज्ञान की तुला पर तौलना है तो चीजों को पूरा तौलें अधकचरा नहीं। वे लोग यह बहाना लाए हैं कि सगोत्र विवाह विज्ञानसम्मत नहीं है, मगर यह सच नहीं है। सच तो यह है कि सगोत्र और सपिंड में अंतर है। सगोत्र व्यक्ति हजारों होते हैं उनका आपस में कोई रिश्ता नहीं है। सपिंड में एक परिवार के लोग आते हैं। आनुवांशिकी वैज्ञानिक जनाब मेंडल के नियम के अनुसार दबे हुए और दंबग जीन (रेसेसिव और डॉमिनेंट जीन्स) का गणित सात पीढ़ियों के आगे लागू नहीं होता।
सच बात तो यह है कि विज्ञान यहाँ सिर्फ बहाना है कोई तथ्य नहीं। तथ्य यह है कि ये वो लोग है जो स्त्री को अपनी संपत्ति मानते हैं। रूढ़ियों को निभाने को अपनी नाक का सवाल मानते हैं, क्योंकि लड़कियों द्वारा रूढ़ियाँ तोड़ने से उनकी आज्ञा भंग होती है! आज्ञा भंग इन्हें सगोत्र के सवाल पर ही नापसंद हो ऐसा तो नहीं। अंतरजातीय विवाह पर, अंतर-सम्प्रदाय विवाह पर, एक ही गाँव में विवाह पर, अपने से नीची (?) जाति में विवाह पर आदि कई मामलों पर ये अपना हक रखना चाहते हैं। कुल जमा बात यही कि युवाओं के सपनों की उन्हें कोई फिक्र नहीं उन्हें तो अपना दंभ, अपना हठ प्यारा है। जमीन की जमींदारी तो खत्म हो गई लेकिन बहनों, बेटियों की जमींदारी वे अब तक कर रहे हैं। समाज, पुलिस, नेताओं, मीडिया सबको इन युवाओं के हक में आगे आना चाहिए जो बालिग हैं और एक प्रजातांत्रिक देश में अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का हक रखते हैं। जिनके माता-पिता उदार विचारों वाले हैं, जिन युवाओं के रिश्ते अपने माता-पिता से प्रजातांत्रिक हैं, वे अपने माता-पिता से राय यूँ भी करते हैं, उसके लिए दबिश बनाने की जरूरत नहीं होगी।
- निर्मला भुराड़िया
"मेरे भैया, मेरे चंदा, मेरे अनमोल रतन तेरे बदले मैं जमाने की कोई चीज न लूँ", इस गाने में भाई के प्रति बहन का प्यार है। "फूलों का तारों का सबका कहना है एक हजारों में मेरी बहना है" इस गाने में भाई अपनी भावनाएँ अपनी बहन के प्रति व्यक्त कर रहा है। सामान्य हिन्दुस्तानी परिवारों में भाई और बहन का रिश्ता अटूट होता है। यह मीठा भी होता है, खट्टा-मीठा भी होता है। वे लड़ते-झगड़ते भी हैं, एक भी हो जाते हैं। जब झगड़ा होता है तो बहन को लगता है मम्मी-पापा भाई का पक्ष लेते हैं और भाई को लगता है मम्मी-पापा बहन का पक्ष लेते हैं जबकि मम्मी-पापा के लिए दोनों ही आँखों के तारे होते हैं। एका होते ही भाई-बहन भी यह बात समझ जाते हैं। कुल जमा बात यही कि यह एक अनूठा रिश्ता है।
लेकिन उपरोक्त बात उन परिवारों पर लागू होती है जो सहज, सामान्य, आदर्श परिवार हैं। जिन परिवारों के मुखिया पर सामंतवाद हावी रहता है, जिन परिवारों की रक्त-मज्जा में रूढ़िवाद बहता है, ऐसे परिवारों में भाई और बहन को परिवार द्वारा मिलने वाले बर्ताव में भेदभाव किया जाता है। कुछ लोग यह भेदभाव खुलकर करते हैं, कुछ लोग बदलते जमाने के हक में दिखना चाहते हैं, मगर जमाने के साथ बदलना नहीं चाहते वे लोग सूक्ष्म तौर पर यह भेदभाव करते हैं। वे अपने लड़कों में निरंकुशता विकसित करते हैं और लड़की को नियंत्रण में रखते हैं। स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि भाई अपनी बहन का धौंसिया हो जाता है। वक्त आने पर भाई अपनी बहन को टाँग तोड़कर रख देने, फलाँ से मिली तो देख लेने, यहाँ न जाने, वहाँ न जाने जैसी धमकियाँ भी देना शुरू कर सकता है। मूँछ पूरी तरह उगती भी नहीं और वह उन पर ताव देते हुए दीदी का चौकीदार या छोटी बहन का हवलदार हो जाता है।
इन दिनों तथाकथित ऑनर किलिंग की खबरें जोरों पर हैं जिसे डिसऑनर किलिंग या हत्या कहना अधिक उपयुक्त होगा। बहन द्वारा अपनी पसंद से शादी कर लेने पर आहत अहम् भाइयों द्वारा बहन को जीजा सहित कत्ल कर देने की घटनाएँ इक्कीसवीं सदी के प्रजातांत्रिक भारत में जोरों पर हैं। बहन के ऐसे ही हत्यारे एक भाई के प्रति पिता, चाचा, ताऊ आदि ने "गर्व" व्यक्त किया है। जाति पंचायतों द्वारा ऐसे पिताओं, भाइयों, जाति पंचों, समाजजनों का समर्थन किया जा रहा है। देश के नेताओं के मुँह में मूँग भरे हैं (वोट भरे हैं) उनके द्वारा ऐसे जघन्य कांडों का जमकर विरोध नहीं किया जा रहा है। जनता का बहुत बड़ा प्रतिशत भी अपने स्वयं के भीतर रचे-बसे रूढ़िवाद के कारण ऐसे जघन्य कृत्यों का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि परंपराओं को तथाकथित रूप से विज्ञानसम्मत बताकर जनप्रवाह को अपने पक्ष में बहाने की कोशिश की जा रही है। मगर जनता को भी यह बात समझना चाहिए कि विज्ञान की तुला पर तौलना है तो चीजों को पूरा तौलें अधकचरा नहीं। वे लोग यह बहाना लाए हैं कि सगोत्र विवाह विज्ञानसम्मत नहीं है, मगर यह सच नहीं है। सच तो यह है कि सगोत्र और सपिंड में अंतर है। सगोत्र व्यक्ति हजारों होते हैं उनका आपस में कोई रिश्ता नहीं है। सपिंड में एक परिवार के लोग आते हैं। आनुवांशिकी वैज्ञानिक जनाब मेंडल के नियम के अनुसार दबे हुए और दंबग जीन (रेसेसिव और डॉमिनेंट जीन्स) का गणित सात पीढ़ियों के आगे लागू नहीं होता।
सच बात तो यह है कि विज्ञान यहाँ सिर्फ बहाना है कोई तथ्य नहीं। तथ्य यह है कि ये वो लोग है जो स्त्री को अपनी संपत्ति मानते हैं। रूढ़ियों को निभाने को अपनी नाक का सवाल मानते हैं, क्योंकि लड़कियों द्वारा रूढ़ियाँ तोड़ने से उनकी आज्ञा भंग होती है! आज्ञा भंग इन्हें सगोत्र के सवाल पर ही नापसंद हो ऐसा तो नहीं। अंतरजातीय विवाह पर, अंतर-सम्प्रदाय विवाह पर, एक ही गाँव में विवाह पर, अपने से नीची (?) जाति में विवाह पर आदि कई मामलों पर ये अपना हक रखना चाहते हैं। कुल जमा बात यही कि युवाओं के सपनों की उन्हें कोई फिक्र नहीं उन्हें तो अपना दंभ, अपना हठ प्यारा है। जमीन की जमींदारी तो खत्म हो गई लेकिन बहनों, बेटियों की जमींदारी वे अब तक कर रहे हैं। समाज, पुलिस, नेताओं, मीडिया सबको इन युवाओं के हक में आगे आना चाहिए जो बालिग हैं और एक प्रजातांत्रिक देश में अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का हक रखते हैं। जिनके माता-पिता उदार विचारों वाले हैं, जिन युवाओं के रिश्ते अपने माता-पिता से प्रजातांत्रिक हैं, वे अपने माता-पिता से राय यूँ भी करते हैं, उसके लिए दबिश बनाने की जरूरत नहीं होगी।
- निर्मला भुराड़िया
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
छुपाना क्यों? इलाज कराना
कलंक नहीं मन की समस्याएँ
मनुष्य का मस्तिष्क अत्यंत जटिल बुनावट रखता है। कई छुपी हुई परतें और नलिकाएँ इसमें हैं तो कई रसायन भी इसके भीतर दौड़ लगाते रहते हैं। मस्तिष्क के रसायनों के खेल से ही हमारा आचार व्यवहार संचालित होता है, अगर यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यूँ तो सामान्य मनुष्य में सबकुछ ठीक-ठाक ही चलता है,मगर कभी-कभी प्रकृति दिमागी व्यवस्था में कोई पेंच डालकर भेजती है तो कभी परिस्थितियों की मार रसायनों का खेल बिगाड़ देती है। नतीजा होता है मनोरोग। मनोरोग होना एक जैविक-कुठाराघात है,यह रोगी का दोष नहीं है, न ही उसका उपराध। लेकिन, फिर भी भारत में लाखों की संख्या में मनोरोगियों की चिकित्सा इसलिए नहीं हो पाती कि परिवार वाले, अपने वाले व्यक्ति का रोग समाज से छुपाते हैं। इस चक्कर में उसे दबाते रहते हैं और रोग बढ़ता ही जाता है। अपने परिजन की बीमारी समझने और सत्य को स्वीकार करने में भी कई लोग कोताही करते हैं, वे समाज को और खुद को कैफियत देते रहते हैं कि नहीं हमारा व्यक्ति तो सामान्य है, उसे ऐसा कुछ नहीं है। इस तरह वे 'डिनायल मोड' में चले जाते हैं। वे स्वयं से झूठ बोलते हैं, खुद को धोखा देते हैं और मरीज का नुकसान करते हैं। मरीज के हित में कोई बाहरी व्यक्ति समझाइश देना चाहे तो मरीज तो ठीक ही है यह कैफियत देने के अलावा परिजन बुरा भी मान सकते हैं। परिवारजनों का यह रवैया मरीज पर दुर्भाग्य बनकर टूटता है, क्योंकि छुपाने और इलाज न करवाने की वजह से मरीज का रोग बढ़ता ही जाता है।
एक और तरह के परिजन होते हैं। ये वे लोग होते हैं, जिन तक चेतना पहुँची ही नहीं होती है। वे अपने मरीज को लेकर चिकित्सक के पास नहीं जाते, बल्कि झाड़-फूँक इत्यादि करवाते हैं। देवी आने से लेकर भूत चढ़ने या भूत-प्रेत नजर आने जैसे संदेह हजारों की संख्या में मरीजों को होते हैं। मरीज के ऐसे किसी भी दिमागी भ्रम से जूझने की व्यवस्था आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने की है, लेकिन लोग चिकित्सक के पास जाने की बजाय अंधविश्वासों की शरण में जाते हैं, जहाँ मरीजों के साथ अज्ञानतावश क्रूरतापूर्ण तरीके से तथाकथित इलाज किया जाता है। जैसे दक्षिण के एक मंदिर में मरीज द्वारा पेड़ पर कील ठुकवाई जाती हैं, वह भी मरीज के कपाल से ठोक-ठोककर। यहाँ मरीजों के माथे से खून निकलने लगता है, वे बेहोश होकर गिर जाते हैं। कहीं शरीर में आए भूत-प्रेत भागने के नाम पर मिर्ची की धूनी दी जाती है, कहीं पानी में सिर डुबोया जाता है तो कहीं मरीज का झोंटा पकड़कर खींचा जाता है और पिटाई की जाती है। इन सब चीजों से मरीज के ठीक होने का तो कोई सवाल ही नहीं, उसके हालात और बिगड़ जाते हैं। उसकी बीमारी नियंत्रण से बाहर हो जाती है।
हम जिस सदी में रह रहे हैं, उस सदी में मनोचिकित्सा विज्ञान ने काफी प्रगति कर ली है। मस्तिष्क के रसायनों को व्यवस्थित करने वाली औषधियाँ, मस्तिष्क की लहरों को दर्ज करने वाले उपकरण, व्यवहार चिकित्सा, परामर्श चिकित्सा, मरीज की विचार प्रक्रिया के पैटर्न समझने और उन्हें वैज्ञानिक तरीके से सुधारने वाली कॉगनीटिव थैरापी,पर्सनल थैरापी, ग्रुप थैरापी, आर्ट थैरापी आदि कई चीजों का सुसंगत मिश्रण करके मनोचिकित्सक इलाज करता है। अत: दिमागी परेशानी के मरीज की अच्छी चिकित्सा आज के युग में संभव है। आज हम इतने निरुपाय नहीं है कि झाड़-फूँक के अलावा कोई तरीका ही न बचे। न ही हमें इतना अज्ञानी होना चाहिए कि बाबा-ओझाओं की शरण में जाएँ।
काफी कुछ मानसिक परेशानियाँ इलाज से ठीक हो सकती हैं, कुछ जिद्दी मनोरोग हैं, वे नियंत्रित हो सकते हैं। दवा लेने और चिकित्सा करवाते रहने पर मरीज सामान्य जीवन जी सकता है और रोग के अधिक बढ़ जाने से बच सकता है, लेकिन चूँकि ऐसे रोगों में मरीज से बड़ी भूमिका परिवार और समाज की है। अत: समाज यह समझे कि मनोरोगी की अवस्था खिल्ली उड़ाने के लिए नहीं है।
परिवार मरीज के रोग पर झेंपे-शर्माए नहीं, उसे दबाए नहीं, बल्कि इलाज करवाए। मनोरोगी होना कोई अपराध नहीं, फिर ग्लानि क्यों? यह किसी की गलती नहीं, फिर शर्म क्यों? हाँ, यह हो सकता है कि मरीज चूँकि मरीज है, अत: वह दवा लेने और चिकित्सा करवाने में आना-कानी कर सकता है। इस आना-कानी को परिजन तवज्जो न दें और चिकित्सक से ही तरीका समझें कि ऐसे में मरीज को दवा कैसे दें। बस मरीज के इस व्यवहार को आड़ बनाकर चिकित्सा न रोकें। मरीजों को आपकी उपेक्षा, उपहास की नहीं, समझदारी, सहयोग और चिकित्सा की जरूरत है।
-निर्मला भुराड़िया
मनुष्य का मस्तिष्क अत्यंत जटिल बुनावट रखता है। कई छुपी हुई परतें और नलिकाएँ इसमें हैं तो कई रसायन भी इसके भीतर दौड़ लगाते रहते हैं। मस्तिष्क के रसायनों के खेल से ही हमारा आचार व्यवहार संचालित होता है, अगर यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यूँ तो सामान्य मनुष्य में सबकुछ ठीक-ठाक ही चलता है,मगर कभी-कभी प्रकृति दिमागी व्यवस्था में कोई पेंच डालकर भेजती है तो कभी परिस्थितियों की मार रसायनों का खेल बिगाड़ देती है। नतीजा होता है मनोरोग। मनोरोग होना एक जैविक-कुठाराघात है,यह रोगी का दोष नहीं है, न ही उसका उपराध। लेकिन, फिर भी भारत में लाखों की संख्या में मनोरोगियों की चिकित्सा इसलिए नहीं हो पाती कि परिवार वाले, अपने वाले व्यक्ति का रोग समाज से छुपाते हैं। इस चक्कर में उसे दबाते रहते हैं और रोग बढ़ता ही जाता है। अपने परिजन की बीमारी समझने और सत्य को स्वीकार करने में भी कई लोग कोताही करते हैं, वे समाज को और खुद को कैफियत देते रहते हैं कि नहीं हमारा व्यक्ति तो सामान्य है, उसे ऐसा कुछ नहीं है। इस तरह वे 'डिनायल मोड' में चले जाते हैं। वे स्वयं से झूठ बोलते हैं, खुद को धोखा देते हैं और मरीज का नुकसान करते हैं। मरीज के हित में कोई बाहरी व्यक्ति समझाइश देना चाहे तो मरीज तो ठीक ही है यह कैफियत देने के अलावा परिजन बुरा भी मान सकते हैं। परिवारजनों का यह रवैया मरीज पर दुर्भाग्य बनकर टूटता है, क्योंकि छुपाने और इलाज न करवाने की वजह से मरीज का रोग बढ़ता ही जाता है।
एक और तरह के परिजन होते हैं। ये वे लोग होते हैं, जिन तक चेतना पहुँची ही नहीं होती है। वे अपने मरीज को लेकर चिकित्सक के पास नहीं जाते, बल्कि झाड़-फूँक इत्यादि करवाते हैं। देवी आने से लेकर भूत चढ़ने या भूत-प्रेत नजर आने जैसे संदेह हजारों की संख्या में मरीजों को होते हैं। मरीज के ऐसे किसी भी दिमागी भ्रम से जूझने की व्यवस्था आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने की है, लेकिन लोग चिकित्सक के पास जाने की बजाय अंधविश्वासों की शरण में जाते हैं, जहाँ मरीजों के साथ अज्ञानतावश क्रूरतापूर्ण तरीके से तथाकथित इलाज किया जाता है। जैसे दक्षिण के एक मंदिर में मरीज द्वारा पेड़ पर कील ठुकवाई जाती हैं, वह भी मरीज के कपाल से ठोक-ठोककर। यहाँ मरीजों के माथे से खून निकलने लगता है, वे बेहोश होकर गिर जाते हैं। कहीं शरीर में आए भूत-प्रेत भागने के नाम पर मिर्ची की धूनी दी जाती है, कहीं पानी में सिर डुबोया जाता है तो कहीं मरीज का झोंटा पकड़कर खींचा जाता है और पिटाई की जाती है। इन सब चीजों से मरीज के ठीक होने का तो कोई सवाल ही नहीं, उसके हालात और बिगड़ जाते हैं। उसकी बीमारी नियंत्रण से बाहर हो जाती है।
हम जिस सदी में रह रहे हैं, उस सदी में मनोचिकित्सा विज्ञान ने काफी प्रगति कर ली है। मस्तिष्क के रसायनों को व्यवस्थित करने वाली औषधियाँ, मस्तिष्क की लहरों को दर्ज करने वाले उपकरण, व्यवहार चिकित्सा, परामर्श चिकित्सा, मरीज की विचार प्रक्रिया के पैटर्न समझने और उन्हें वैज्ञानिक तरीके से सुधारने वाली कॉगनीटिव थैरापी,पर्सनल थैरापी, ग्रुप थैरापी, आर्ट थैरापी आदि कई चीजों का सुसंगत मिश्रण करके मनोचिकित्सक इलाज करता है। अत: दिमागी परेशानी के मरीज की अच्छी चिकित्सा आज के युग में संभव है। आज हम इतने निरुपाय नहीं है कि झाड़-फूँक के अलावा कोई तरीका ही न बचे। न ही हमें इतना अज्ञानी होना चाहिए कि बाबा-ओझाओं की शरण में जाएँ।
काफी कुछ मानसिक परेशानियाँ इलाज से ठीक हो सकती हैं, कुछ जिद्दी मनोरोग हैं, वे नियंत्रित हो सकते हैं। दवा लेने और चिकित्सा करवाते रहने पर मरीज सामान्य जीवन जी सकता है और रोग के अधिक बढ़ जाने से बच सकता है, लेकिन चूँकि ऐसे रोगों में मरीज से बड़ी भूमिका परिवार और समाज की है। अत: समाज यह समझे कि मनोरोगी की अवस्था खिल्ली उड़ाने के लिए नहीं है।
परिवार मरीज के रोग पर झेंपे-शर्माए नहीं, उसे दबाए नहीं, बल्कि इलाज करवाए। मनोरोगी होना कोई अपराध नहीं, फिर ग्लानि क्यों? यह किसी की गलती नहीं, फिर शर्म क्यों? हाँ, यह हो सकता है कि मरीज चूँकि मरीज है, अत: वह दवा लेने और चिकित्सा करवाने में आना-कानी कर सकता है। इस आना-कानी को परिजन तवज्जो न दें और चिकित्सक से ही तरीका समझें कि ऐसे में मरीज को दवा कैसे दें। बस मरीज के इस व्यवहार को आड़ बनाकर चिकित्सा न रोकें। मरीजों को आपकी उपेक्षा, उपहास की नहीं, समझदारी, सहयोग और चिकित्सा की जरूरत है।
-निर्मला भुराड़िया
सोमवार, 12 जुलाई 2010
भोपाल-गंध
अपनी बात
भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कचरे के निपटान की बात इंदौर के समीप पीथमपुर में करने की चल रही है। पीथमपुर के आसपास के रहवासी, ग्रामीण, इंदौर के शहरी स्वयंसेवी संगठन आदि इसके खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। नागरिकों की यह जागरूकता और जनकल्याण संघों की यह सकारात्मक आक्रामकता और सक्रियता प्रशंसनीय है। यदि हम जागृत हैं तो हम पर कोई बुरी चीज ऐसे ही नहीं लादी जा सकती। मगर पीथमपुर के भस्मक से उठने वाले संभावित जहरीले धुएँ की तरह और भी चीजें हैं जिनका हम सबको सक्रिय विरोध करना चाहिए। वह है हमारे सभी छोटे-बड़े शहरों में फैला गंदगी का ढेर, जो दिन-रात हमारे आसपास "भोपाल-गंध" उगलता रहता है। हमको बीमार करता रहता है। सभी नागरिकों, नागरिक संघों, रहवासी संघों आदि को यह कचरा, गंदगी न फैलाने, नगरपालिकाओं को कचरा उठवाने, सफाई करवाने में इतनी ही सक्रियता और आक्रामकता दिखाना चाहिए जितनी पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड का कचरा नष्ट करने वाले मामले में दिखाई जा रही है। रोजमर्रा की जिंदगी में हम लोगों द्वारा स्वयं फैलाई जाने वाली और न उठवाई जाने वाली गंदगी कितने बैक्टेरिया, कितनी बीमारियाँ, कितनी जहरीली गैसें धीरे-धीरे, न मालूम तरीके से उगल रही हैं यह मालूम रखना भी जरूरी है। नागरिक कल्याण संघों, गृहिणियों, कॉलोनियों के रहवासियों की सकारात्मक आक्रामक सक्रियता से यह भी संभव है।
दुर्योग से दो और तीन दिसंबर १९८४ की दरमियानी रात को हम लोग भोपाल में थे। बंगलोर जाने के लिए सुबह पाँच बजे जीटी एक्सप्रेस पकड़ना थी। पहले स्टेशन के वेटिंग रूम में ही समय काटने का सोचा, फिर लगा कुछ घंटों ही सही ठीक से नींद हो जाए तो अच्छा, अतः होटल पेगोड़ा आ गए। देर रात समय की बात होगी, महसूस हुआ रोशनदान से कोई तीखी गंध कमरे में आ रही है। लगा एक-दो मिनट में सेटल हो जाएगी। लेकिन नहीं हुई। तब सोचा दूसरी दिशा की खिड़की खोलकर साँस लें, शायद इस तरफ तो कुछ जल रहा है। मगर गंध तो उस दिशा में भी थी। धीरे-धीरे साँस लेना मुश्किल होने लगा तो दरवाजा खोला जो सीधे बालकनी में खुलता था। मगर राहत नहीं मिली, दम घोटने वाली हवा तो पूरी फिजाँ में थी। बुरी तरह दम घुट रहा था, साँस लेना मुश्किल था। हम लोगों ने एक अटकल यह लगाई शायद दंगा हो गया हो और पुलिस ने अश्रुगैस छोड़ी हो। पति को अस्थमा की शिकायत है तो एंटी हिस्टेमेनिक दवाएँ साथ रहती हैं। तो हम लोगों ने बाथरूम में जाकर नल के पानी से ही एक-एक एंटी एलर्जिक निगल ली थी ताकि एलर्जिक रिएक्शन से बच सकें। इसके अलावा पानी से खूब मुँह धोया और गीला रुमाल नाक-मुँह पर लपेटा इस तर्क के साथ कि गैस कोई भी हो पानी में घुलनशील होगी। मगर दम घुटना बढ़ता गया तो हमने सामान होटल में ही छोड़ दिया और कमरे का ताला लगाए बगैर ही होटल से निकल आए। यूँ कह सकते हैं कि जान बचाने के लिए भागे। सड़क पर आए तो पता चला कि हम अकेले ही नहीं हैं, चारों तरफ अफरातफरी मची हुई थी। सभी लोग जान बचाने के लिए भाग रहे थे। कोई पैदल, कोई स्कूटर पर, बस, कार जिसको जो भी मिला। बूढ़े, बच्चे, स्त्री, पुरुष, जवान सभी रात के आधे-अधूरे कपड़ों में। कोई दौड़ते-दौड़ते पटरियों पर ही मर गया था, कोई खाँस रहा था, कोई रो रहा था, चिल्ला रहा था। पता नहीं था कि यह गैस क्या है? कहाँ से आ रही है? तो कई बेचारे तो यूनियन कार्बाइड की दिशा में ही भाग रहे थे, मौत के मुँह में जाने के लिए। हम लोगों के पास भी अपना कोई वाहन तो वहाँ नहीं था अतः हम पैदल ही बस स्टैंड पहुँचे। वहाँ भी सभी बसें ड्रायवर सहित भाग चुकी थीं। सौभाग्य से एक बस बच गई थी जिसका ड्रायवर सिख था। उसकी बस स्टार्ट नहीं हो रही थी। हम पाँच-सात लोग थे, उन्होंने धक्का लगाया और जाने कैसे बस स्टार्ट हो गई, हम सब बैठ गए फिर बस ने सीहोर पहुँचकर ही दम लिया। उस बस में भी एक यात्री ने हमारे देखते ही देखते दम तोड़ दिया था। दूसरे दिन मेरी आँखें सूजकर बंद हो गई थीं, रोड भी हाथ पकड़कर क्रास करवाना पड़ा था। छाती में भी दर्द था, महीनों तक जिसका इलाज करवाना पड़ा। पता चला स्टेशन पर तो ताँगे के घोड़े तक मर गए थे, मनुष्य तो मनुष्य यानी हम वेटिंग रूम में रुके होते तो नहीं बचते। सो जान तो बच गई, मगर दिमाग में एक चीज रह गई वह थी "भोपाल की गंध"। उस घटना का यह असर हुआ कि अक्सर फैक्टरियों के प्रदूषकों, सड़क पर पड़े कचरे के ढेर आदि में से ऐसा एहसास होता है गंध आ रही है, वही दमघोंटू, जानलेवा गंध, मन ने जिसका नाम भोपाल-गंध रख दिया है।
भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कचरे के निपटान की बात इंदौर के समीप पीथमपुर में करने की चल रही है। पीथमपुर के आसपास के रहवासी, ग्रामीण, इंदौर के शहरी स्वयंसेवी संगठन आदि इसके खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। नागरिकों की यह जागरूकता और जनकल्याण संघों की यह सकारात्मक आक्रामकता और सक्रियता प्रशंसनीय है। यदि हम जागृत हैं तो हम पर कोई बुरी चीज ऐसे ही नहीं लादी जा सकती। मगर पीथमपुर के भस्मक से उठने वाले संभावित जहरीले धुएँ की तरह और भी चीजें हैं जिनका हम सबको सक्रिय विरोध करना चाहिए। वह है हमारे सभी छोटे-बड़े शहरों में फैला गंदगी का ढेर, जो दिन-रात हमारे आसपास "भोपाल-गंध" उगलता रहता है। हमको बीमार करता रहता है। सभी नागरिकों, नागरिक संघों, रहवासी संघों आदि को यह कचरा, गंदगी न फैलाने, नगरपालिकाओं को कचरा उठवाने, सफाई करवाने में इतनी ही सक्रियता और आक्रामकता दिखाना चाहिए जितनी पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड का कचरा नष्ट करने वाले मामले में दिखाई जा रही है। रोजमर्रा की जिंदगी में हम लोगों द्वारा स्वयं फैलाई जाने वाली और न उठवाई जाने वाली गंदगी कितने बैक्टेरिया, कितनी बीमारियाँ, कितनी जहरीली गैसें धीरे-धीरे, न मालूम तरीके से उगल रही हैं यह मालूम रखना भी जरूरी है। नागरिक कल्याण संघों, गृहिणियों, कॉलोनियों के रहवासियों की सकारात्मक आक्रामक सक्रियता से यह भी संभव है।
- निर्मला भुराड़िया
शनिवार, 10 जुलाई 2010
पेट खाली सिर पर दूध?
अपनी बात
एक सामूहिक भोज का आयोजन था। आयोजक-मेजबान भोजन करने वालों को मनुहार कर-करके परोस रहे थे 'एक और लड्डू हो जाए' शैली में! एक श्रीमतीजी के पास बैठी एक युवती मनुहार (?) में परोसा गया यह अतिरिक्त लड्डू छोड़कर उठने लगी तो श्रीमतीजी ने टोक दिया-जूठा नहीं छोड़ते, पाप लगता है। युवती ने फिर आनाकानी की तो श्रीमतीजी ने अपना लेक्चर जारी रखा कि कुछ लोग तो भूखे मरते हैं, तुम जूठा छोड़ती हो। अपनी संस्कृति में तो जूठा छोड़ना बहुत बुरा माना जाता है, अन्न श्राप देता है वगैरह-वगैरह! युवती ने समझाने की कोशिश की कि दीदी वैसे मैं जितना चाहिए, उतना ही लेती हूँ, पर वो जबर्दस्ती परोस गए इसलिए थाली में ही छोड़ना पड़ रहा है, क्योंकि भूख तृप्त होने के बाद भोजन डस्टबीन में जाए या पेट में, एक ही बात है। श्रीमतीजी को युवती के इस उत्तर पर भी आपत्ति हुई कि उसने एक तो जूठा छोड़ा, ऊपर से मनुहार को जबर्दस्ती कहा! अत: उन्होंने नए जमाने की इस युवती को अपने तथाकथित संस्कार में प्रशिक्षित करने की ठानी और वे युवती को द्रोपदी के अक्षय पात्र की कहानी सुनाने लगीं कि कैसे उसमें चिपके हुए चावल के एक दाने से भरपूर चावल बन जाता था।
दरअसल, श्रीमतीजी ने जो कथा सुनाई वह दिलचस्प तो थी और संदेश देने वाली भी थी, मगर श्रीमतीजी ने स्वयं ने ही कथा को सिर्फ रटा भर था, समझा नहीं था, संदेश ग्रहण नहीं किया था। क्योंकि श्रीमतीजी अगले जिस कार्यक्रम में जाने वाली थी वह दुग्धाभिषेक का था! है न दोहरा मापदंड! अभी तो श्रीमतीजी और उनकी संस्कृति कह रही थीं अन्न का अपव्यय न करो और फिर उन्हीं की संस्कृति खाने-पीने की चीजों से प्रस्तर प्रतिमा का स्नान करवाएगी। सब्जियों-फलों के बंगले से भगवान की झाँकी लगाएगी! छ:क्विंटल आम के रस से मूर्ति का अभिषेक होगा। उनकी उसी संस्कृति में जहाँ जूठा छोड़ने से पाप लगता है,उनके उसी देश में जहाँ भूखे बच्चे दूध के लिए रोते हैं, वहाँ दूध, दही, शहद, आमरस से भगवान का अभिषेक! सोचिए क्या ऐसा करने पर पाप नहीं लगता? आत्मग्लानि नहीं होती? शायद नहीं होती, क्योंकि हमने धर्म को आत्मशुद्धि, आत्मग्लानि और मनुष्यता के स्तर पर नहीं सोचा सिर्फ कर्मकांड के तौर पर अपनाया है। हमारी संस्कृति में जो कुछ अच्छा है, उसे तर्कों के साथ माँजते भी चलें, जो कुछ होता आया है, उसे अंधश्रद्धा के साथ न अपनाएँ तो शायद संस्कृति का ज्यादा भला हो!
- निर्मला भुराड़िया
एक सामूहिक भोज का आयोजन था। आयोजक-मेजबान भोजन करने वालों को मनुहार कर-करके परोस रहे थे 'एक और लड्डू हो जाए' शैली में! एक श्रीमतीजी के पास बैठी एक युवती मनुहार (?) में परोसा गया यह अतिरिक्त लड्डू छोड़कर उठने लगी तो श्रीमतीजी ने टोक दिया-जूठा नहीं छोड़ते, पाप लगता है। युवती ने फिर आनाकानी की तो श्रीमतीजी ने अपना लेक्चर जारी रखा कि कुछ लोग तो भूखे मरते हैं, तुम जूठा छोड़ती हो। अपनी संस्कृति में तो जूठा छोड़ना बहुत बुरा माना जाता है, अन्न श्राप देता है वगैरह-वगैरह! युवती ने समझाने की कोशिश की कि दीदी वैसे मैं जितना चाहिए, उतना ही लेती हूँ, पर वो जबर्दस्ती परोस गए इसलिए थाली में ही छोड़ना पड़ रहा है, क्योंकि भूख तृप्त होने के बाद भोजन डस्टबीन में जाए या पेट में, एक ही बात है। श्रीमतीजी को युवती के इस उत्तर पर भी आपत्ति हुई कि उसने एक तो जूठा छोड़ा, ऊपर से मनुहार को जबर्दस्ती कहा! अत: उन्होंने नए जमाने की इस युवती को अपने तथाकथित संस्कार में प्रशिक्षित करने की ठानी और वे युवती को द्रोपदी के अक्षय पात्र की कहानी सुनाने लगीं कि कैसे उसमें चिपके हुए चावल के एक दाने से भरपूर चावल बन जाता था।
दरअसल, श्रीमतीजी ने जो कथा सुनाई वह दिलचस्प तो थी और संदेश देने वाली भी थी, मगर श्रीमतीजी ने स्वयं ने ही कथा को सिर्फ रटा भर था, समझा नहीं था, संदेश ग्रहण नहीं किया था। क्योंकि श्रीमतीजी अगले जिस कार्यक्रम में जाने वाली थी वह दुग्धाभिषेक का था! है न दोहरा मापदंड! अभी तो श्रीमतीजी और उनकी संस्कृति कह रही थीं अन्न का अपव्यय न करो और फिर उन्हीं की संस्कृति खाने-पीने की चीजों से प्रस्तर प्रतिमा का स्नान करवाएगी। सब्जियों-फलों के बंगले से भगवान की झाँकी लगाएगी! छ:क्विंटल आम के रस से मूर्ति का अभिषेक होगा। उनकी उसी संस्कृति में जहाँ जूठा छोड़ने से पाप लगता है,उनके उसी देश में जहाँ भूखे बच्चे दूध के लिए रोते हैं, वहाँ दूध, दही, शहद, आमरस से भगवान का अभिषेक! सोचिए क्या ऐसा करने पर पाप नहीं लगता? आत्मग्लानि नहीं होती? शायद नहीं होती, क्योंकि हमने धर्म को आत्मशुद्धि, आत्मग्लानि और मनुष्यता के स्तर पर नहीं सोचा सिर्फ कर्मकांड के तौर पर अपनाया है। हमारी संस्कृति में जो कुछ अच्छा है, उसे तर्कों के साथ माँजते भी चलें, जो कुछ होता आया है, उसे अंधश्रद्धा के साथ न अपनाएँ तो शायद संस्कृति का ज्यादा भला हो!
- निर्मला भुराड़िया
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